Saturday, December 12, 2020

पहले वकालत फिर खिलाफत


कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों ने संसद की स्थायी समिति में किसान विधेयक में इन्हीं सुधारों की वकालत की थी और अब जब नरेन्द्र मोदी सरकार किसानों के हित में उन सुधारों को लागू कर रही है तो विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं।


कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों ने संसद की स्थायी समिति में किसान विधेयक में इन्हीं सुधारों की वकालत की थी और जब नरेन्द्र मोदी सरकार किसानों के हित में उन सुधारों को लागू कर रही है तो विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं।

यूपीए-2 की सरकार में कृषि मंत्री रहे शरद पवार ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी एक्ट में बदलाव की जरूरत बताते हुए देश में एक मॉडल एक्ट की वकालत की थी. कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों के चुनावी घोषणा पत्र में एपीएमसी एक्ट में संशोधन की बात प्रमुखता से कही गई. समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव, टीएमसी, अकाली दल और कांग्रेस के नेताओं ने संसद की स्थायी समिति में एपीएमसी एक्ट में संशोधन की आवश्यकता का समर्थन किया था.




इन सभी दलों ने समय-समय पर 'वन नेशन-वन मंडी' को देश के लिए उपयोगी बताया था लेकिन आज जब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार किसानों के उत्तम भविष्य को सुनिश्चित करते हुए यही कानून लाई है तो यही राजनीतिक दल इसका विरोध कर रहे हैं. जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार आई तो तत्कालीन कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया था कि हमें एपीएमसी एक्ट में संशोधन के लिए कोशिश करनी चाहिए. यही नहीं, दिल्ली की केजरीवाल सरकार तो नए अध्यादेश के मुताबिक नोटिफिकेशन जारी करने के बाद अब फिर इसी का विरोध कर रही है.

 उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस पूरे मसले पर कहा, “ यह दल जब सत्ता में रहते हैं तो इनका वक्तव्य कुछ और रहता है। स्टैंडिंग कमेटी में जहां गहन चर्चा होती है, वहां कुछ और कहते हैं और जब विपक्ष में होते हैं, तो इनके बयान आश्चर्यजनक रूप से बदल जाते हैं. दरअसल यही दोहरा चरित्र इनका असल चेहरा है. जनता इसे भली भांति समझती है. देश इस दोहरे रवैये वाले चरित्र को स्वीकार नहीं करेगा. एक ऐसे दौर में जबकि हम कोरोना के खिलाफ जारी वैश्विक जंग जीतने के कगार पर हैं, तब विपक्षी दलों द्वारा इस तरह किसानों को गुमराह कर अराजकता फैलाने की कोशिश हमारी लड़ाई को कमजोर करने का कुत्सित प्रयास है. पीएम किसान सम्मान, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना सहित अनेक योजनाओं के केंद्र में किसान कल्याण ही है. किसान भाइयों को गुमराह करने की हर कुत्सित कोशिश बेकार जाएगी. केंद्र की सरकार लगातार किसानों से वार्ता कर रही है, जल्द ही इसका सकारात्मक परिणाम सामने आएगा.”

Friday, December 11, 2020

सेवा कार्यों के माध्यम से समाज में पर‍िवर्तन लाएगा संघ

गत बुधवार को उत्तर प्रदेश स्थित बरेली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नए केन्‍द्र 'केशव कृपा' का लोकार्पण समारोह संपन्न् हुआ। इस दौरान राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि संघ सेवा कार्यों के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाएगा

सबके जीवन व्‍यवहार में सेवा का भाव होना चाह‍िए। सेवा का संस्‍कार इंसान को संवेदनशील बनाता है। सेवा से संगठन का भाव पैदा होता है। उक्त बात राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कही। वे गत बुधवार को उत्तर प्रदेश स्थित बरेली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नए केन्‍द्र 'केशव कृपा' के लोकार्पण समारोह में संगठन पदाध‍िकारी और प्रमुख लोगों को सम्‍बोध‍ित कर रहे थे

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री होसबाले ने कहा क‍ि सबको साथ लेकर चलने के संकल्‍प के साथ संघ का ध्‍येय सेवा है। सेवा कर्मों के माध्यम से संघ समाज में परिवर्तन लाएगा। पूरे देश में हर स्वयंसेवक का घर एक कार्यालय होता है। ऐसे कई लाख कार्यालय संचालित होते हैं। केशव कृपा एक मंदिर स्वरूप में है और इसके माध्यम से समाज की बड़ी सेवा की जा सकती है।

देश—दुनिया में जहां सरकारें विभिन्न काम समाज के ल‍िए  करती हैंं, वहीं भारत में समाज स्वयं बहुत सेवा कार्य करता है। उन्‍होंने पत्रकारों से वार्ता करते हुए कहा क‍ि स्‍वयंसेवकों ने समाज के सहयोग से बरेली में केशव कृपा केन्‍द्र को तैयार क‍िया है। इसमें योग और ध्‍यान केन्‍द्र के अलावा एलोपैथ‍िक, होम्‍योपैथ‍िक और आयुर्वेद च‍िक‍ित्‍सा की व्‍यवस्‍था भी की गई है। बाहर से आने वाले स्‍वयंसेवक यहां व‍िश्राम कर सकेंगे। केशव कृपा में मौजूद आधुन‍िक सुव‍िधाओं का इस्‍तेमाल सबको समाज ह‍ित में करना जाना चाह‍िए।

कार्यक्रम में उपस्थित स्वामी राजराजेश्वराश्रम जी महाराज ने कहा कि भगवान राम की कृपा से केशव कृपा का सपना साकार हुआ है। देश दुनिया में सभी यूनिवर्सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ़ आर्ट्स होती है। इसी प्रकार का यह एक बड़ा विश्वविद्यालय हैं, जिसे हम यूनिवर्सिटी ऑफ़ हार्ट्स कहते हैं। कार्यक्रम में उपस्थित अखिल भारतीय सह संपर्क प्रमुख श्री रामलाल ने कहा कि संघ स्वयं कुछ भी नहीं करता, परंतु उसके स्वयंसेवक समाज हित एवं राष्ट्र हित के लिए कुछ भी करना नहीं छोड़ते। उसी श्रृंखला में आज जिन केंद्रों का लोकार्पण हुआ है, सभी वह सभी स्वयंसेवकों द्वारा समाज़ को अर्पित हैं

Friday, September 25, 2020

पं. दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर विशेष : दीनों पर दया करने वाले दीनदयाल

 समाज के अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति भी एक दिन सुखी और संपन्न जीवन बिताए, इसकी कल्पना दीनदयाल जी ने  की थी। यह अच्छी बात है कि आज उनकी इस कल्पना को पूरा करने के लिए कई सरकारें काम कर रही हैं।


राष्ट्र का अस्तित्व उसके नागरिकों के जीवन का ध्येयभूत आधार है। जब एक मानव-समुदाय के समक्ष एक व्रत, विचार या आदर्श रहता है एवं वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो राष्ट्र कहलाता है। इनमें से एक का भी अभाव रहा तो राष्ट्र नहीं बनेगा।पं.दीनदयाल उपाध्याय

सहृदयता, बुद्धिमता, सक्रियता एवं अध्यवसायी वृत्ति वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक व्यक्ति नहीं, अपितु एक विचार और जीवनशैली हैं। राष्ट्र एवं समाज के प्रति आजीवन समर्पित रहने वाले पंडित जी ने अपने मौलिक चिंतन से राष्ट्र-जीवन को प्रेरित और प्रभावित किया। वे ‘राष्ट्रधर्म प्रकाशन’ के संस्थापक एवं ‘राष्ट्रधर्म’, ‘पाञ्चजन्य’, ‘दैनिक स्वदेश’ व ‘तरुण भारत’ जैसी राष्ट्रवादी पत्र-पत्रिकाओं के प्रेरणास्रोत भी थे। भारतीय समाज-जीवन को सुखी, संपन्न एवं मंगलकारी बनाने के निमित्त उन्होंने ‘एकात्म मानवदर्शन’ व ‘अन्त्योदय’ की अद्भुत संकल्पना प्रस्तुत की। उनके चिंतन के मूल में लोकमंगल एवं राष्ट्र-कल्याण का भाव समाहित है। उन्होंने राष्ट्र को धर्म, अध्यात्म एवं संस्कृति का सनातन पुंज बताते हुए राजनीति की नई व्याख्या की। वे गांधी, तिलक एवं सुभाष की परंपरा के वाहक थे। वह दलगत एवं सत्ता की राजनीति से ऊपर उठकर वास्तव में एक ऐसे राजनीतिक दर्शन को विकसित करना चाहते थे जो भारत की प्रकृति एवं परंपरा के अनुकूल हो एवं राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने में समर्थ हो। अपनी व्याख्या को उन्होंने ‘एकात्म मानववाद’ का नाम दिया। एक ओर उन्होंने जहां समाजवाद, मार्क्सवाद एवं पूंजीवाद सरीखी अभारतीय विचारधाराओं को भारतीय चिंतन-परंपरा, भारतीय दृष्टिकोण एवं भारतीय जीवन-शैली के सर्वथा प्रतिकूल माना, उन्हें अस्वीकार किया, वहीं, दूसरी ओर भारतीय मानस के अनुकूल ‘एकात्म मानवदर्शन’ व ‘अन्त्योदय’ की संकल्पना प्रस्तुत कर भारत को भारत की दृष्टि से देखने-समझने का एक सार्थक सूत्र भी दिया।


‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की मान्यता से अनुप्राणित उनका चिंतन ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ भाव-साधना का सिद्धांत है। उन्होंने राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की प्रस्तावना करते हुए बताया कि ये अन्यान्योश्रित हैं। वे उत्पादन में वृद्धि, उपभोग में संयम और वितरण में समानता के पक्षधर थे। व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्टि की एकात्मता और शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के उन्नयन की चिंता उनका मूल ध्येय है।  अभारतीय विचारधाराओं में मानव-मात्र को टुकड़ों में बांट कर देखने की पद्धति अपनाई गई है। अत: वहां सम्यक मूल्यांकन का कोई अवकाश नहीं होता। दीनदयाल जी का स्पष्ट मत है कि एकांगी होकर मनुष्य को केवल ‘आर्थिक प्राणी’ के रूप में देखने की परंपरा नितांत अभारतीय है। इससे मानव-सभ्यता के विकास के उन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता, जो किसी राष्ट्र को ‘परम वैभव’ तक पहुंचाने में सहायक सिद्ध होते हैं। उनकी दृष्टि में मनुष्य को सर्वप्रथम ‘मनुष्य’ ही माना जाना चाहिए। उसकी समस्त आवश्यकताओं, उसके जीवन के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक आयामों को ध्यान में रखकर चिंतन करते हुए संतुलित-विकास के पथ पर निरंतर आगे बढ़ना चाहिए।


दीनदयाल जी भारत की ‘चिति’ और ‘विराट’ को अपने चिंतन-मनन के केंद्र में रखते हैं।


उनकी स्पष्ट धारणा है कि हमें अपनी प्राचीन संस्कृति का विचार अवश्य करना चाहिए। किंतु हम इस बात के प्रति भी सचेत रहें कि हम पुरातत्ववेत्ता नहीं हैं। हमारा ध्येय अपनी संस्कृति का संरक्षण करना ही नहीं, अपितु उसे गति देकर सजीव व सक्षम बनाए रखना भी होना चाहिए। हमें अपनी रूढ़ियां समाप्त करनी चाहिए। अपनी कमियों की परख कर उनमें सुधार करना चाहिए। सामाजिक जीवन में मौजूद भेदभाव, छुआछूत एवं अस्पृश्यता जैसी विभेदकारी धारणाओं को तोड़ना चाहिए। हमें प्रत्येक मनुष्य से सबसे पहले मनुष्य के रूप में जुड़ना चाहिए, क्योंकि सांस्कृतिक एकता एवं राष्ट्र की एकता के लिए उपरोक्त विभेदकारी विचार सर्वथा घातक है।

समाज ‘स्वयंभू’ है। जिस प्रकार व्यक्ति पैदा होता है, उसी प्रकार समाज भी पैदा होता है। व्यक्ति मिलकर कभी समाज को नहीं बनाते। ......वास्तव में समाज तो एक ऐसी सत्ता है, जिसकी अपनी आत्मा है, जिसका अपना एक जीवन है, इसलिए यह भी उसी प्रकार से जीवमान सत्ता है, जैसे मनुष्य जीवमान सत्ता है।

दीनदयाल जी की दृष्टि में धर्म, अर्थ एवं काम की पूर्ति व इनके सामंजस्य से मोक्ष की प्राप्ति ही मनुष्य जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएं हैं। इनमें से किसी एक के प्रति भी विशेष आग्रह या असंतुलन व्यक्ति के जीवन को समस्याग्रस्त बना सकता है। दीनदयाल जी अपने पूरे चिंतन में बारम्बार इस विचार पर बल देते हैं, ‘‘मानव केवल एक व्यक्ति मात्र नहीं है। शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा का समुच्चय है। व्यक्ति केवल एकवचन ‘मैं’ तक सीमित नहीं, उसका बहुवचन ‘हम’ से भी अभिन्न संबंध रखता है। अत: हमें समाज व समष्टि का विचार करना होगा।’’


वास्तव में, दीनदयाल जी व्यष्टि एवं समष्टि या कहें कि व्यक्ति एवं समाज को एक-दूसरे की सापेक्षता में देखने के आग्रही हैं। यह विचार पश्चिम के दार्शनिक-विचारों से भिन्न है। उनकी दृष्टि में, ‘‘मानव न केवल व्यक्ति है, मानव न केवल समाज है, वरन् मानव व्यक्ति एवं समाज की एकात्मता में से पैदा होता है। व्यक्ति एवं समाज को बांट दें तो मानव मर जाता है। अस्तित्व में ही नहीं आता। व्यष्टि एवं समष्टि एकात्म इकाई है। इस एकात्म इकाई का नाम मानव है। इसलिए मानव को सुखी करना है तो व्यक्तिवादी होकर नहीं कर सकते, क्योंकि व्यक्तिवादी समाज की उपेक्षा करता है। समाजवादी होकर भी नहीं कर सकते, क्योंकि समाजवाद व्यक्ति के व्यक्तित्व को कुचल देता है।’’ स्पष्ट है कि व्यष्टि से समष्टि एवं परमेष्टि तक पहुंचने की मनुष्य की यात्रा अलग-अलग खण्डों में विभाजित नहीं है। उसे अलग-अलग घेरे हुए नहीं है। यह एक-दूसरे से पूर्णत: असंबद्ध नहीं है। वह एक ही केंद्र से निसृत समग्र जीवन में सातत्य के साथ प्रवाहमान कहीं पर भी खंडित न होने वाला आवृत है। ‘एकात्म मानवदर्शन’ व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि व परमेष्टि तक की इसी यात्रा, इसी संबद्धता, मानव-जीवन की इसी समग्रता, इसी सातत्य व प्रवाह एवं इसी आवृत को समझने का सहज-सूत्र है।


‘एकात्म मानवदर्शन’ की संकल्पनाकार दीनदयाल जी के चिंतन का फलक बहुत व्यापक एवं सुगठित है। वे एक साथ व्यक्ति, समाज, राजनीति, धर्म, राष्ट्र आदि न जाने कितने विषयों पर विचार करते हैं। किंतु प्रत्येक जगह उनके विचारों में एक सह-संबंध, पारस्परिकता एवं नयापन परिलक्षित होता है। समाज के विषय में वे लिखते हैं, ‘‘समाज ‘स्वयंभू’ है। जिस प्रकार व्यक्ति पैदा होता है, उसी प्रकार समाज भी पैदा होता है। व्यक्ति मिलकर कभी समाज को नहीं बनाते। ......वास्तव में समाज तो एक ऐसी सत्ता है, जिसकी अपनी आत्मा है, जिसका अपना एक जीवन है, इसलिए यह भी उसी प्रकार से जीवमान सत्ता है, जैसे मनुष्य जीवमान सत्ता।’’ वास्तव में, यह समाज की भौतिक व्याख्या नहीं, अपितु तात्विक व्याख्या है। इसलिए यहां समाज को पश्चिम  के ‘द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ के सूत्र के आधार पर स्पष्ट नहीं किया जा सकता। ‘राष्ट्र’ पर चिंतन करते हुए पंडित जी ने लिखा है, ‘‘राष्ट्र का अस्तित्व उसके नागरिकों के जीवन का ध्येयभूत आधार है। जब एक मानव-समुदाय के समक्ष एक व्रत, विचार या आदर्श रहता है एवं वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो वह राष्ट्र कहलाता है। इनमें से एक का भी अभाव रहा तो राष्ट्र नहीं बनेगा।’’


स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन परंपरा में ‘राष्ट्र’ केवल भौतिक सीमाओं पर आधारित भौगोलिक इकाई या भौतिक सरणी नहीं है। इसका संबंध समानधर्मी, समानदर्शी एवं समानुभूति पर आधारित सामूहिक समभाव से है। यही कारण है कि पंडित जी ‘राष्ट्र’ की ऐसी परिकल्पना कर ‘भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को महत्त्व देते हैं। ‘भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की विचार-सरणी को मानने वाला प्रत्येक व्यक्ति समानव्रती, सामान दर्शन व सामान मूल्यों को मानने वाला होता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, कच्छ से कामरूप तक प्रत्येक भारतीय एक-दूसरे से ‘एकात्म-भाव’ से जुड़ा हुआ है। भले ही उसकी भाषा अलग हो, संस्कृति अलग हो, रहन-सहन अलग हो, पंथ-संप्रदाय अलग हो, किंतु वह संपूर्ण भारतभूमि के कण-कण को पवित्र मनाता है। सबके हित की कामना करता है।


इतना ही नहीं, समान व्रत, समान दर्शन, समान मूल्यों को मानने वाले व्यक्ति संसार में जहां भी उपस्थित हैं, वे सभी इस भारत-भूमि, इस राष्ट्र के समभाव एवं संकल्पना में समाहित हैं। इस प्रकार दीनदयाल जी की ‘राष्ट्र’ की संकल्पना व ‘भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की विचार-प्रणाली भी संपूर्णता एवं सामूहिकता की भावना से अनुप्राणित है। यह दृष्टि पश्चिम की ‘नेशन’ एवं ‘नेशनलिज्म’ अर्थात ‘राष्ट्र’ एवं ‘राष्ट्रवाद’ की दृष्टि से सर्वथा भिन्न है। वे ‘एकात्म मानव-दर्शन’ के तहत ‘राष्ट्र’ की भी तात्विक व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार, ‘‘राष्ट्र की भी एक आत्मा होती है। उसका एक शास्त्रीय नाम है। इसे ‘चिति’ कहा गया है।’’ इस प्रकार दीनदयाल जी ‘राष्ट्र’ की संकल्पना में व्यक्ति को एक साधन के रूप में देखते हैं। व्यक्ति स्वयं के अतिरिक्त अपने राष्ट्र का भी प्रतिनिधित्व करता है। स्पष्ट है कि दीनदयाल जी द्वारा प्रस्तावित ‘एकात्म मानव-दर्शन’ एक वायवीय विचार नहीं है, बल्कि एक कालजयी सिद्धांत है।

Monday, September 14, 2020

सतर्क और शक्तिशाली भारत

 सतर्क और शक्तिशाली भारत

कोविड कुहासे के बीच भारत के इस स्वतंत्रता दिवस का सूर्योदय कुछ अलग है। महामारी को चित्त करने के लिए दुनिया सामाजिक दूरी का दाव आजमा रही है और इस बीच भारत ने वैश्विक संबंधों की दशकों पुरानी खाइयों को पाटने वाले लंबे डग भर डाले हैं

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इस राष्ट्र की चाल-ढाल में ऐसा आत्मविश्वास देखकर विश्व हैरान है, शत्रु परेशान हैं और मित्रता के लिए आगे आते देश आश्वस्ति भाव से भर उठे हैं।

यह स्वाभाविक ही है।

‘यूरोपियन फाउंडेशन फॉर साउथ एशियन स्टडीज’ जैसे विचार समूह मानते हैं कि लद्दाख में चीन की धौंसबाजी को भारत ने जिस दृढ़ता से ठंडा किया है उसकी कल्पना भी ड्रैगन को नहीं थी। भू-रणनीतिक विशेषज्ञों का आकलन था कि जापान, अमेरिका, आस्ट्रेलिया के साथ मिलकर भारत चौकड़ी बनाएगा और तब चीन की हनक ठीक होगी। परन्तु बड़े आघात की आहट भर से भारत जिस तरह, अपने बूते चीन के सामने तनकर खड़ा हुआ उसने बता दिया कि चीजें तेजी से बदल रही हैं।

व्यक्ति, परिवार या राष्ट्र, मूल चरित्र की परीक्षा परेशानी के समय ही होती है। जो भीतर से कमजोर होते हैं, बाधाओं में बिखर जाते हैं। इसके उलट जो आंतरिक तौर पर शक्ति सम्पन्न होते हैं वे आपदाओं को अवसर में बदलने वाला इतिहास लिखते हैं।

कोरोना संक्रमण से पहले ही अर्थ, राजनीति तथा विश्व व्यवहार समीकरणों के जानकार यह मानकर चल रहे थे कि अगली सदी एशिया की है। किंतु एकाएक उत्पन्न डगमगाहट के समय संतुलन, अनिर्णय के समय निर्णय और फूट के समय एकजुटता का परिचय देकर भारत ने महाद्वीप में अपने स्थान व सम्मान को रेखांकित कर दिया है।

प्रश्न है कि अचानक भारत ने यह शक्ति और सूझ पाई

कहां से?

इसका उत्तर छह वर्ष पूर्व आम चुनाव के उन परिणामों में छिपा है, जहां से नीतिगत बदलावों का दौर शुरू हुआ।

नहीं, यह बात केवल एक दल या राजनीति की नहीं है। यह उस समाज के मनोनुकूल परिवर्तन की है जो देश, इसकी व्यवस्था आदि को ढर्रे पर लाने के लिए दशकों से मचल रहा था।

समाज का मन था, भाजपा माध्यम बनी।

जनता ने उम्मीदों की उछाल के साथ राज पहले भी बदले थे, किंतु इस बार सबने देखा कि राज का मिजाज बदला। सत्ता परिवर्तन के साथ ही भारत वह लीक ठीक करने के लिए संकल्पित होता दिखा, जो औपनिवेशिक विचारों के प्रभाव में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही छोड़ बैठा था।

1947 में अंग्रेज गए थे, शासकों-नौकरशाहों की सोच का खांचा वही था। व्यवस्था और तंत्र वही था। दबाव, आघातों को झटकते हुए व आधारभूत संस्कार-सिद्धांतों पर दृढ़ रहते हुए यह देश आज ‘स्व’ की अलख जगाता दिखता है।

सदियों से उलझे से सांस्कृतिक सम्मान के प्रश्न सुलझ रहे हैं। घिसे, अड़चन पैदा करते कानूनों के ढेर हट रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को देश से काटने वाले बंधन

कटे हैं।

नई शिक्षा नीति ‘मानव’ को ‘संसाधन’ भर बनाने की बजाय समझदार, संस्कारित करने की राह बनाती दिखती है।

सीमाओं पर सतर्क और शक्तिशाली, राजनीतिक तौर पर स्पष्ट और निर्णयक्षम तथा आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर आज के भारत का आधार ठोस है, यह न मानने का कोई कारण नहीं।

भौतिकी, अभियांत्रिकी का सिद्धांत है कि कोई त्रिभुज ही सबसे ठोस आधार हो सकता है, क्योंकि इसकी एक भुजा दूसरे को संभाले रहती है।

राष्ट्र को राजनीति से ऊपर रखने वाले विचार के साथ रीति-नीति में मूलभूत परिवर्तन के साथ भारत राज, समाज और अर्थ का, स्वदेशी, स्वावलंबन और विकेंद्रीकरण का ऐसा ही ठोस, अर्थपूर्ण त्रिकोण रचता दिखता है।

आत्मनिर्भरता के उद्घोष के साथ आपदा को अवसर में बदलने की जिद इस देश के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोल रही है।

Sunday, September 6, 2020

शिक्षक दिवस: विलक्षण थी प्राचीन भारत की शिक्षा पद्धति

 

शिक्षक दिवस: विलक्षण थी प्राचीन भारत की शिक्षा पद्धति

भारत की गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में "शिक्षक" को ऐसी मार्गदर्शक सत्ता माना जाता था जो भ्रम व अज्ञान के सभी आवरण हटाकर शिष्य के अन्तस को आत्मज्ञान की ज्योति से आलोकित कर देती थी

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प्राचीन भारत में शिक्षा को व्यवस्थित रूप देने के क्रम में हमारे तत्वदर्शी मनीषियों के समक्ष सर्वप्रथम दो प्रश्न उभरे थे। प्रथम ‘क्या’ सिखाया जाए तथा द्वितीय ‘कैसे’ सिखाया जाए? इन प्रश्नों पर व्यापक चिंतन के फलस्वरूप वैदिक भारत में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की नींव पड़ी थी। इस चिर पुरातन गुरु-शिष्य परम्परा के कारण प्राचीन काल में हमारा भारत आत्मविद्या के शीर्ष पर था। आधुनिक समाज सुशिक्षित मनुष्य का आकलन इस बात से करता है कि ‘‘तुम्हारे पास क्या है! ’’ जबकि प्राचीन भारतीय चिंतन में विद्यावान व्यक्ति को इस तराजू पर तौला जाता था कि ‘‘तुम क्या हो!’’ शिक्षा व विद्या, भोग व योग, भौतिकता व आध्यात्मिकता तथा प्रकृति व परमात्मा आदि के सन्तुलित समन्वय पर आधारित वैदिक भारत की शिक्षा व्यवस्था ने ही हमारे देश को ‘‘सोने की चिड़िया’’ व ‘‘विश्वगुरु’’ बनाया था।

शाश्वत जीवन मूल्यों और सुसंस्कारों के सतत बीजारोपण की इस अमूल्य परम्परा के पोषक भारतीय ऋषियों की मान्यता थी- ‘‘विद्या सा या विमुक्तये’’ अर्थात विद्या वह जो मुक्ति प्रदान करे। भारत की गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में "शिक्षक" को ऐसी मार्गदर्शक सत्ता माना जाता था जो भ्रम व अज्ञान के सभी आवरण हटाकर शिष्य के अन्तस को आत्मज्ञान की ज्योति से आलोकित कर देती थी। संस्कृति के पुण्य प्रवाह में हमारी आध्यात्मिक धरा के तप:पूत आचार्यों व शिक्षकों के आत्मज्ञान की प्रखर ऊर्जा ने न केवल समूचे राष्ट्रजीवन को प्रकाशमान किया था अपितु अपने सुपात्र शिष्यों के माध्यम से इस दिव्य आत्म विद्या के सतत प्रवाहमान बने रहने की व्यवस्था भी सुनिश्चित की थी।

प्राचीन भारतीय वांग्मय में हमें गुरुकुल शिक्षण परम्परा की तमाम विलक्षणताओं विहंगम दिग्दर्शन होते हैं। नगरों और गांवों से दूर शान्त, स्वच्छ और प्रकृति की सुरम्य गोद में संचालित होने वाले वैदिक भारत के इन गुरुकुलों का मुख्य उद्देश्य कोरे पुस्तकीय ज्ञान के स्थान पर शिक्षा, विद्या और दीक्षा के समन्वय पर केन्द्रित था। राजाश्रय व जनसहयोग से चलने वाले इन गुरुकुलों में हर वर्ण के छात्र साथ पढ़ते थे। इन शिक्षा केन्द्रों में अमीर-गरीब सबको समान सुविधाएं दी जाती थी, किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। गुरुकुल में प्रवेश करने के आठ साल की उम्र निर्धारित थी। गुरुकुल में छात्रों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता था-1. वासु - 24 साल की उम्र तक शिक्षा प्राप्त करने वाले। 2. रुद्र- 36 साल की उम्र तक शिक्षा प्राप्त करने वाले। 3. आदित्य- 48 साल की उम्र तक शिक्षा प्राप्त करने वाले। भोजन के लिए विद्यार्थियों को भिक्षाटन करना होता था पर निर्धारित नियमों के साथ। दिन में एक बार सिर्फ एक दरवाजे पर झोली फैलाना। इन गुरु आश्रमों में विद्यार्थियों को शाकाहार व ब्रह्मचर्य का पालन कठोरता से करना होता था। इस गुरुकुलीय शिक्षा का मूल उद्देश्य आध्यात्मिक विकास और चरित्र निर्माण के साथ विद्यार्थी को स्वावलंबी बनाना तथा भावी जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार करना था। शिक्षा पूरी होने पर बच्चे के अभिभावक अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार गुरु को जो भी देते थे, वे उसे प्रेम से स्वीकार करते थे। वह गांवों की जागीर से लेकर लौंग के दो दाने तक कुछ भी हो सकता था। शिक्षा पूर्ण हो जाने पर गुरु शिष्य की परीक्षा लेते थे। शिष्य अपने सामर्थ्य अनुसार दीक्षा देते थे किंतु गरीब विद्यार्थी उससे मुक्त कर दिए जाते थे और समावर्तन संस्कार संपन्न कर उसे अपने परिवार को भेज दिया जाता था।

बताते चलें कि इन गुरुकुलों में सहशिक्षा का भी प्रचार था। स्त्री और पुरुषों की समान शिक्षा को लेकर यह गुरुकुल कितने अधिक सक्रिय थे, इसके कई उदाहरण मिलते हैं। मनुस्मृति में लड़के व लड़की दोनों की शिक्षा पर काफी बल दिया गया है। उत्तर रामचरित में वाल्मीकि के आश्रम में लव-कुश के साथ पढ़ने वाली आत्रेयी नामक स्त्री का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार आठवीं शताब्दी के कवि भवभूति के समय भी बालक-बालिकाओं की सह-शिक्षा का प्रचलन था। अपने ग्रन्थ मालती-माधव में भवभूति ने भूरिवसु एवं देवराट के साथ कामन्दकी नामक स्त्री के एक ही पाठशाला में शिक्षा प्राप्त करने का वर्णन किया है। इसी प्रकार पुराणों में कहोद और सुजाता, रूहु और प्रमदवरा की कथाएं वर्णित हैं।

हमारे ये गुरुकुल कई मायनों में विशिष्ट थे। यहां दी जाने वाली शिल्प, वास्तु, संगीत, नृत्य, कला आदि ज्ञान की विभिन्न लौकिक धाराओं की शिक्षा दीक्षा पर कभी भी ब्राह्मणों का एकाधिकार नहीं रहा। यहां अन्य वर्णों के लोग भी गुरु के गरिमामय पद पर बैठने के अधिकारी थे। पिछले एक हजार वर्ष के इतिहास में सबसे अधिक संख्या शूद्र सन्तों की रही जिनको तत्कालीन समाज के सभी वर्णों से मान्यता मिली तथा भरपूर सम्मान भी। मीरा बाई क्षत्राणी थीं और शिष्य बनी सन्त रविदास की। सन्त कबीर जुलाहे थे और बहुत सारे ब्राह्मण-क्षत्रियों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया था।

प्राचीन भारत में तक्षशिला, पाटलिपुत्र, कान्यकुब्ज, मिथिला, धारा, तंजोर, काशी, कर्नाटक, नासिक आदि की शिक्षा संस्थाएं समूचे आर्यावर्त में प्रसिद्ध थीं। सार्वजनिक शिक्षण संस्थाएं सर्वप्रथम बौद्ध विहारों में स्थापित हुई थीं। इनमें नालन्दा विश्वविद्यालय ( 450 ई.), वल्लभी (700 ई.), विक्रमशिला (800 ई.) प्रमुख शिक्षण संस्थाएं थीं। इन संस्थाओं का अनुसरण करके हिन्दुओं ने भी मन्दिरों में विद्यालय खोले जो आगे चल कर मठों के रूप में परिवर्तित हो गए। ‘पृथ्वीराज विजय’ (10 वीं सदी) में अजमेर के आसपास की अनेक शिक्षा संस्थाओं के उल्लेख मिलते हैं। चीनी यात्री हुएनसांग के अनुसार विश्वविख्यात शिक्षा केन्द्र नालंदा के लिए 500 व्यापारियों ने 10 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देकर जमीन खरीदी थी।

प्राचीन भारत की शिक्षण प्रणाली की महत्ता को उजागर करता पाश्चात्य दार्शनिक शोपेनहॉवर का यह कथन वाकई काबिले गौर है कि विश्व में यदि कभी कोई सर्वाधिक प्रभावशाली व सर्वव्यापी सांस्कृतिक क्रांति हो सकती है तो केवल उपनिषदों की भूमि-भारत से। जिज्ञासु शिष्यों ने ज्ञानी गुरु के समीप बैठकर उनके प्रतिपादनों को क्रमबद्ध कर उपनिषदों के रूप में दुनिया को जो दिव्य धरोहर दी है, उसका कोई तोड़ नहीं है। उनका कहना था कि यदि मुझसे पूछा जाए कि आकाश मंडल के नीचे कौन सी वह भूमि है, जहां के मानव ने अपने हृदय में देवीय गुणों का पूर्ण विकास किया तो मेरी उंगली भारत की ओर ही उठेगी। यदि मैं स्वयं से पूछूं कि वह कौन सा साहित्य है जिससे अब तक ग्रीक, रोमन व यहूदी विचारों में पलते आये यूरोपवासी प्रेरणा ले सकते हैं तो मेरी उंगली केवल भारत की ओर ही उठेगी। वहीँ प्राचीन भारत के चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में भारत आए यूनानी राजदूत मैगस्थनीज भी भारत की तद्युगीन की शिक्षा-दीक्षा से बेहद प्रभावित थे। उनके यात्रा वृत्रांत ‘‘इण्डिका’’ में स्पष्ट उल्लेख मिलता है, ‘‘मैं यह देख कर आश्चर्यचकित था कि भारत में रात्रि के समय भी कोई अपने मकान में ताला नहीं लगाता था। मकान के भीतर केवल चांद की सत्यनिष्ठ किरणें ही प्रवेश कर सकती थीं, कोई संदिग्ध व्यक्ति नहीं। सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत के व्यापारियों के ईमान की सौगंध खाई जाती थी।’’ इसी तरह विश्वमंच से भारत की पुरातन ज्ञान सम्पदा का गौरवगान करने वाले स्वामी विवेकानंद का कहना था, ‘‘हमें गर्व है कि हम अनंत गौरव की स्वामिनी उस भारतीय संस्कृति के वंशज हैं, जिसके महान शिक्षकों ने सदैव दम तोड़ती मानव जाति को अनुप्राणित किया है। समय की प्रचण्ड धाराओं में जहां यूनान, रोम, सीरीया, बेबीलोन जैसी तमाम प्राचीन संस्कृतियां बिखरकर अपना अस्तित्व खो बैठीं, वहीं एकमात्र हमारी भारतीय संस्कृति इन प्रवाहों के समक्ष चट्टान के समान अविचल बनी रही क्योंकि हमें हमारी आत्मज्ञान सम्पन्न दिव्य-विभूतियों का सशक्त मार्गदर्शन सतत मिलता रहा।"

शिक्षा के व्यवसायीकरण के कट्टर विरोधी थे डॉ. राधकृष्णन

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एक सर्वप्रिय आदर्श शिक्षक के रूप में अपने जीवन के 40 साल अध्यापन कार्य को समर्पित करने वाले भारतरत्न सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन का मानना था कि पश्चिमी जगत मनुष्य का आकलन इस बात से करता है कि तुम्हारे पास क्या है! क्योंकि उनका जीवन दर्शन भोगप्रधान है। जबकि भारतीय चिंतन में व्यक्ति को इस तराजू पर तौला जाता है कि तुम क्या हो! क्योंकि हमारा भारतीय दर्शन आत्मप्रधान है। हम भारतीय सदा से ज्ञान के उपासक रहे हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ज्ञान की प्रतिष्ठापना करना हमारी विशेषता रही है। देश के प्रथम शिक्षा आयोग के अध्यक्ष के रूप में विश्वविद्यालयीय व माध्यमिक शिक्षा के उत्थान के लिए अनेक सुधारवादी कदम उठाने वाले डॉ. राधकृष्णन शिक्षा के व्यवसायीकरण के कट्टर विरोधी थे।

सनद हो कि मैकाले प्रणीत शिक्षा पद्धति के आज कारण हमारी नई पौध अपनी जड़ों से कटती जा रही है। स्थिति यह है कि अध्य्यापन शिक्षक की नौकरी बन गयी है और छात्र जानकारियों का यह पुलंदा महज इसलिए बटोर रहे हैं ताकि भविष्य में मोटी कमाई कर सके। दूसरे शब्दों में कहें तो सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान, सूचना संग्रह और डिग्रियों तक सीमित आज शिक्षा की शिक्षा व्यवस्था का मूल मकसद केवल मोटा पैसा कमाना हो गया है। समूचे देश में कुकुरमुत्तों की तरह उगे पांच सितारा स्कूल व कालेजों की भरमार ने पुरातन भारत के दिव्य शैक्षिक लक्ष्यों को पलीता लगा दिया है। देश के शिक्षा केन्द्र आज भ्रष्टाचार, ट्यूशन, नकल, नंबर बढ़ाने और हिंसक आंदोलन जैसी प्रवृत्तियों के साथ नग्नता, गुंडागर्दी, दलाली और राजनीति के अड्डे बन रहे हैं। इनमें केवल अधिकारों की बात होती है, कर्त्तव्य भावना की नहीं। आर्थिक उदारीकरण ने शिक्षा जगत का कबाड़ा कर दिया है। बताते चलें कि शिक्षा के व्यावसायीकरण की इस समस्या को कुछ साल पहले आयी शबाना आजमी और जूही चावला अभिनीत एक संदेशपरक फिल्म "चाक एंड डस्टर" में अत्यन्त बारीकी से दर्शाया गया था। आज जितना अधिक शिक्षा का प्रभाव बढ़ रहा है, उतना ही मानसिक प्रदूषण भी बढ़ रहा है। शिक्षा बढ़ रही है पर जीवन विद्या घट रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बनी हालिया शिक्षा नीति के नए प्रावधान इस दिशा में कारगर कदम साबित हो सकेंगे।

शिक्षा में उच्च नैतिक मूल्यों के प्रबल हिमायती थे डॉ. कलाम

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गौरतलब हो कि भारत में "मिसाइलमैन" के नाम से विख्यात देश के ग्यारहवें राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की भी जिंदगी शिक्षा को समर्पित रही। डॉ. राधाकृष्णन की ही भांति उनको भी शिक्षक की भूमिका बेहद पसंद थी। उनका मानना था कि शिक्षा कारोबार की वस्तु नहीं हो सकती। उनकी मान्यता थी कि मूल्यपरक शिक्षा, ज्ञान और प्रकाश की ऐसी अंतहीन यात्रा है जो हमें सत्य की खोज में ले जाती है। अगर व्यक्ति अपने जीवन में शिक्षा के इस मूल यथार्थ को हर अंगीकार कर ले तो यह दुनिया रहने के लिए सबसे बेहतरीन जगह बन जाए। डॉ. कलाम शिक्षा प्रणाली को उच्च नैतिक मूल्यों से जोड़कर उपयोगी और रोजगारोन्मुख बनाने के प्रबल हिमायती थे। उनका मानना था कि विकसित राष्ट्र बनने की प्रक्रिया शिक्षा के बिना असंभव है। पिता से ईमानदारी व आत्मानुशासन तथा माता से ईश्वर-विश्वास और करुणा की विरासत का उपहार पाने वाले इस महामानव ने ऐसे स्वर्णिम भारत का स्वप्न देखा था जहां महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध न हों, जहां समाज में कोई भी व्यक्ति खुद को अलग थलग महसूस न करे, जहां गांव और शहर के बीच बहुत कम अंतर हो और जहां का शासन पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त हो।

Sunday, August 23, 2020

सांस्कृतिक जागरण की बेला

 सांस्कृतिक जागरण की बेला : 

1947 में देश को राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिली, पर सांस्कृतिक स्वतंत्रता नहीं मिली। लोगों में इस स्वतंत्रता की चेतना न जग पाए, इसके लिए जाति, मजहब, भाषा, प्रांत की दीवारें खड़ी की जाती रहीं। इसके बावजूद कुछ लोग और संगठन इस कार्य में लगे रहे। अब उनकी मेहनत के सुफल का स्वाद लोगों को मिल रहा है और वे सांस्कृतिक रूप से जागरूक हो रहे हैं

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       अंदमान निकोबार द्वीप समूह में जनजाति महिलाओं द्वारा निकाली गई कलशयात्रा। ये महिलाएं वनवासी 
        कल्याण आश्रम से जुड़ी हैं और उनमें अपनी संस्कृति के प्रति जबर्दस्त जागरूकता बढ़ी है। (फाइल चित्र)

स्वाधीनता प्राप्ति की घड़ी में भारत माता की आंखें छलक पड़ी थीं। इस सच की अनुभूति उस समय सभी ने की थी, परंतु इस तथ्य को कम ही लोग अनुभव कर पाए थे कि भारत मां की एक आंख में खुशी के आंसू छलक रहे थे, जबकि दूसरी आंख दु:ख के आंसुओं से डबडबाई हुई थी। खुशी स्वाधीनता-स्वतंत्रता की थी और दु:ख राजनीतिक-सांस्कृतिक विभाजन का था। अपनी ही संतानों ने माता के अस्तित्व एवं अस्मिता के हिस्से को काटकर अलग कर दिया था। जबकि भौगोलिक दृष्टि से उनकी संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन में समानताएं थीं। विभाजन की यह पीड़ा बड़ी दारुण थी और यातना बड़ी असहनीय। फिर भी उम्मीद थी कि स्वाधीन देशवासी संभवत: समझदार हो जाएंगे और अपनी मां को अब यह पीड़ा नहीं देंगे।

परंतु दुर्देव और दुर्भाग्य। स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् भी  विभाजन के नए-नए रूप सामने आते गए। भूमि तो नहीं बंटी, पर भावनाएं बंटती गर्इं। संस्कृति बंटती गई। भूगोल तो वही रहा, परंतु उसमें खिंची संवेदनाओं की लकीर मिटती गई। संवेदनाओं की सरिता को सोखने वाले, इसे दूषित-कलुषित करने वाले विभाजनकारियों के कितने ही रूप सामने आते गए। विभाजन मजहब के नाम पर, विभाजन जाति के नाम पर, विभाजन भाषा के नाम पर, विभाजन सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयता के नाम पर, विभाजन संस्कृति के नाम पर। स्वाधीनता की हर वर्षगांठ पर भारत माता की आंखें छलकती तो जरूर हैं, परंतु यह अनुभूति गिने-चुने लोग ही कर पाते हैं कि अब उसकी दोनों आंखों में खुशी  के आंसू  नहीं, दु:ख  के आंसू डबडबा रहे हैं। लेकिन ये आंसू खून के आंसू हैं। इनमें जातीयता के संघर्ष का खून है।  पता नहीं उसकी अपनी संतानों में से कौन और कितने मां की इस पीड़ा की अनुभूति कर पाएंगे, क्योंकि यह अनुभूति तो राष्टÑीयता की अनुभूति से जुड़ी है, सांस्कृतिक स्वतंत्रता से जुड़ी है। सांस्कृतिक स्वतंत्रता की अनुभूति प्रत्येक भारतवासी का राष्ट्रीय कर्तव्य है।

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हमारा लक्ष्य जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण है। राष्ट्र की सांस्कृतिक आजादी है। नैतिक-चारित्रिक उत्थान है। शिक्षा एवं विद्या का समन्वय कर शिक्षण तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन है। आत्मबल संवर्द्धन कर राष्ट्र को समर्थ सशक्त नागरिक देना है।— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, संस्थापक, अखिल विश्व गायत्री परिवार


1947 में विश्व का यह सबसे बड़ा लोकतंत्र अंग्रेजों के हाथ से स्वतंत्र हुआ था। ढेरों ने अपनी कुर्बानियां दी थीं। अगणित अज्ञात स्थिति में ही शहीद हो गए। न कहीं किसी का नाम आया, न प्रशस्तिपत्र ही मिला, पर उन्होंने इसकी चिंता नहीं की। दक्षिणेश्वर की माटी हाथ में लिए, जेब में गीता की छोटी-सी पुस्तिका रखे न जाने कितने फांसी पर चढ़ गए, न जाने कितनों ने सारा जीवन  अविज्ञात स्थिति बिताकर देश की आजादी के लिए स्वयं व परिवार को भूखा, नगण्य से साधनों में जिए एवं गुमनामी के परदे के पीछे चले गए। ढेरों साहित्यकार, स्वयंसेवक स्तर के कार्यकर्ता, आजादी के आंदोलन के सिपाही, सत्याग्रही, सविनय अवज्ञा आंदोलन का पालन करने वाले गांधी के अनुचर, खादी को जीवनव्रत बना लेने वाले व्यक्ति एक उज्जवल भविष्य वाले भारतवर्ष की उम्मीद में जीवन जीते रहे, पर नाउम्मीद होकर इस धरती से चले गए।

भारत में ‘राष्ट्र’ सदैव एक सांस्कृतिक शब्द रहा है, राजनीतिक नहीं। राष्ट्र उपास्य है, ईष्ट है। विविधताओं के बावजूद भारत एक राष्ट्र रहा है। हमारे ऋषियों ने संसार की प्रकृति-प्रदत्त विविधताओं को बहुत सहज भाव से स्वीकार किया। किन्तु मनुष्य के अन्त:करण में स्थित परिष्कृत चेतना को लक्ष्य करके सांस्कृतिक एकता के भाव भरे सूत्रों को विकसित एवं प्रतिष्ठित करने में सफलता पाई। हमारे मनीषियों ने सांस्कृतिक आधारों को ही प्राथमिकता दी। सांस्कृतिक सूत्रों को उन्होंने जन-जन के भावनात्मक स्तर तक गहराई से बिठाने में सफलता पाई। यही कारण है कि हम गर्व से कह पाते हैं, ‘‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।’’ भले ही सदियों तक ‘दौरे जमां’(सांसारिक राजनीतिक चक्र) हमारा दुश्मन रहा है।

सांस्कृतिक अवधारणा हर भारतीय की रगों में रक्त की तरह सतत प्रवाहित है। अयोध्या में जन्मे राम कन्याकुमारी में रामेश्वरम्  की स्थापना करते हैं। बृज के श्रीकृष्ण द्वारिका में अपना आवास बनाते हैं। बंगाल के चैतन्य बृज में आकर अपने इष्ट के लीला क्षेत्र को खोजते हैं। केरल में जन्मे शंकराचार्य चारों दिशाओं में चारधामों की स्थापना करके काश्मीर के सरस्वती मन्दिर के पट खोले बिना अपनी यात्रा पूर्ण नहीं मानते। वे अपना शरीर दक्षिण में नहीं, उत्तराखण्ड में छोड़ना पसंद करते हैं। गंगोत्री का जल पिये बिना रामेश्वरम् की प्यास नहीं बुझती। उत्तराखण्ड के देवालयों के देवता दक्षिण के पुजारी मांगते हैं। भक्त को रामेश्वरम्, केदारनाथ, सोमनाथ, विश्वनाथ, पशुपतिनाथ, महाकालेश्वर, अमरनाथ आदि सभी जगह एक ही इष्ट के दर्शन होते हैं। वैष्णव देवी से कन्याकुमारी तथा अम्बाजी (गुजरात) से कामाख्या (असम) तक एक ही मातृसत्ता को नमन किया जाता है। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी भी इसी सांस्कृतिक अवधारणा का समर्थन करते हैं।

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                  अपनी संस्कृति, अपनी पहचान

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी सांस्कृतिक नवोन्मेष को जाग्रत करते हुए भारत के पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण को सांस्कृतिक दृष्टि से जोड़ने वाले सूत्रों को अपने उद्बोधनों मे रखते हैं। भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण, भगवान शिव के साम्राज्य को वे राजनीतिक सीमा में न बांधकर सांस्कृतिक दृष्टि से नेपाल, भूटान, बाली, सुमात्रा, इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका, मॉरीशस, सूरीनाम, फीजी, अमेरिका, जापान, चीन, त्रिनिदाद,  टोबेगो ब्राजील जैसे देशों से जोड़ते हैं। यह भाव भरी सांस्कृतिक चेतना ही उस कालजयी राष्ट्र को बनाती है, जो ‘भारत’ कहलाता है।

श्री मोदी सांस्कृतिक नवोन्मेष को जाग्रत करते हुए भारत के पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण को सांस्कृतिक दृष्टि से जोड़ने वाले सूत्रों को अपने उद्बोधनों मे रखते हैं। भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण, भगवान शिव के साम्राज्य को वे राजनीतिक सीमा में न बांधकर सांस्कृतिक दृष्टि से नेपाल, भूटान, बाली, सुमात्रा, इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका, मॉरीशस, सूरीनाम, फीजी, अमेरिका, जापान, चीन, त्रिनिदाद,  टोबेगो ब्राजील जैसे देशों से जोड़ते हैं। यह भाव भरी सांस्कृतिक चेतना ही उस कालजयी राष्ट्र को बनाती है, जो ‘भारत’ कहलाता है। इस राष्ट्र का संगठन राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से न कभी किया जा सका है और न कभी किया जा सकेगा। किन्तु सांस्कृतिक सूत्रों में बंधकर यह राष्ट्र सदैव विश्व मुकुट बना है और पुन: बनकर रहेगा। आज की परिस्थितियों में मनुष्य मात्र को उन सांस्कृतिक सूत्रों की खोज है जिनके आधार पर असमानता मिटें और स्वर्गिक परिस्थितियों का निर्माण किया जा सके। मनुष्यों में देवत्व का उदय हो एवं धरती पर स्वर्ग की परिस्थिति उत्पन्न हो सके। ऋषियों की धरोहर-देव संस्कृति और समय के अनुकूल व्यावहारिक सूत्रों को जन-जन तक पहुंचाना आज की अनिवार्यता है। उसी आधार पर व्यक्तियों में देवत्व का विकास एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव होगा।

अखिल विश्व गायत्री परिवार ने सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए जमीनी स्तर से प्रयास किया है। भारतीय संस्कार पद्धति के अन्तर्गत धर्म-सम्प्रदाय से हटकर ऊंच-नीच, जाति-पाति मिटाने  के लिए गायत्री परिवार ने बढ़-चढ़ कर प्रयास किया है।  वनवासी, जनजाति एवं अन्त्योदय बहुल क्षेत्रों (झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, असम, पश्चिम बंगाल, महाराष्टÑ के पिछड़े इलाके) में समानता का संदेश देने, उन्हें यज्ञोपवीत धारण करवा कर पौरोहित्य का प्रशिक्षण देने का कार्य किया है। उन्हें स्वावलम्बी बनाया है। युग तीर्थ शान्तिकुंज उसका जीता-जागता उदाहरण है। इन क्षेत्रों में लाखों की संख्या में संस्कारों का क्रम सम्पन्न हुआ। संस्कारों के क्रम में नामकरण, अन्नप्राशन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत, विवाह संस्कार प्रमुख हैं।

क्या यही स्वतंत्रता है?
हमें राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिल गई, किन्तु सांस्कृतिक स्वतंत्रता चाहिए और यह तब तक नहीं मिलेगी, जब तक जातिवाद का विष वृक्ष फलता-फूलता रहेगा। सारी राजनीति इसी से संचालित है। जाति, संप्रदाय और मजहब के नाम पर भाई को भाई से, पड़ोसी को पड़ोसी से और देशवासी को देशवासी से दूर करने का प्रयास हो रहा है। यह प्रयास देश की सांस्कृतिक चेतना को भी नष्ट कर रहा है। वहीं दूसरी ओर धनी और धनी बनते जा रहे हैं एवं गरीब और निर्धन। गांव उजड़ रहे हैं, शहरों के पेट में समा रहे हैं। अब कोई गांव में रहना नहीं चाहता। अपसंस्कृति और अपराधों ने वहां भी पैठ बना ली है। सरपंचों की भ्रष्ट राजनीति ने गांवों की एकता नष्ट कर, उन्हें भी बांट दिया है एवं लगता है कि सब कुछ दांव पर लग गया है। क्या यही स्वतंत्रता है, क्या यही लोकतंत्र है, जिसमें एक वैज्ञानिक-मनीषी-ऋषि स्तर का व्यक्ति पुन: राष्ट्रपति नहीं बन सकता, क्योंकि दलीय राजनीति का समीकरण उसके पक्ष में नहीं है?
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सांस्कृतिक समरसता उत्पन्न करने, विभिन्न जातियों के बीच भावनात्मक ऐक्य स्थापित करने का एक ही सूत्र है-सांस्कृतिक क्रांति। ऐसी सांस्कृतिक क्रांति, जो आध्यात्मिक भावापन्न हो।
— डॉ. हेडगेवार, आद्य सरसंघचालक

अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक, संरक्षक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने गायत्री परिवार का लक्ष्य सुनिश्चित करते हुए लिखा है, ‘‘हमारा लक्ष्य जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण है। राष्ट्र की सांस्कृतिक आजादी है। नैतिक-चारित्रिक उत्थान है। शिक्षा एवं विद्या का समन्वय कर शिक्षण तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन है। आत्मबल संवर्द्धन कर राष्ट्र को समर्थ सशक्त नागरिक देना है।’’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं प्रकाण्ड क्रांतिकारी डॉ. बलिराम हेडगेवार जी भी सांस्कृतिक स्वतंत्रता के पुरोधा थे। उनके एवं अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचारों में काफी समानताएं हैं। वनवासी बहुल क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषांगिक संगठनों के लाखों कार्यकर्ता सांस्कृतिक नवोन्मेष के लिए दिन-रात जुटे रहते हैं। डॉ. हेडगेवार ने सांस्कृतिक समरसता की नई परिभाषा लिखी है। उन्होंने लिखा है, ‘‘सांस्कृतिक समरसता उत्पन्न करने, विभिन्न जातियों के बीच भावनात्मक ऐक्य स्थापित करने का एक ही सूत्र है-सांस्कृतिक क्रांति। ऐसी सांस्कृतिक क्रांति, जो आध्यात्मिक भावापन्न हो।’’ नवजागरण काल में राजाराम मोहन राय, केशवचन्द्र सेन आदि ने यही सूत्र खोजने शुरू किए थे। उनके इन प्रयासों से भारतीयता अंगड़ाई लेने लगी थी। भारतीय राजनीति में एक प्रयोग हो चुका है। उसे गांधी जी ने अपने समय में सफलतापूर्वक लागू किया था। इसके द्वारा उन्होंने एक बड़े पैमाने पर आम भारतीय का राजनीतिकरण किया था, उन्हें अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन से जोड़ा था एवं आजादी के लक्ष्य को नजदीक ला दिया था। गांधी जी की खादी, विदेशी कपड़ों की होली और स्वदेशी आंदोलन ने एक नया जीवन-दर्शन दिया था। आज भी देश को हजारों-लाखों-करोड़ों कार्यकर्ता चाहिए, जो संघबद्ध हो गांव-मुहल्ले-प्रखंड स्तर पर अन्याय और शोषण के खिलाफ लड़ सकें। भ्रष्ट प्रशासनिक मशीनरी को ठीक करने का प्रयास करें। कहीं रिश्वतखोरी हो तो उससे भी जूझ सकें।

भारत को सांस्कृतिक दासता से मुक्ति दिलाने के लिए वीरभद्रों की जरूरत पड़ेगी। आने वाले दिनों में ऐसे गांडीवधारियों की आवश्यकता पड़ेगी, जो अर्जुन की तरह कौरवों की अक्षौहिणी सेनाओं को धराशायी कर दे। ऐसे हनुमानों की जरूरत होगी, जो ‘एक लाख पूत-सवा लाख नाती’ वाली लंका को पूंछ से जलाकर खाक कर दे। ऐसे कलाकारों की आवश्यकता है, जो चैतन्य महाप्रभु, मीरा, सूर, कबीर की भावनाओं को इस प्रकार लहरा सकें, जैसे सपेरा सांप को लहराता है। ऐसे धनवानों की जरूरत है, जो अपने पैसे को विलास में खर्च करने की अपेक्षा सम्राट अशोक की तरह अपना सर्वस्व समय की आवश्यकता पूरी करने के लिए लुटा सकें। तभी सच्चे अर्थों में सांस्कृतिक आजादी मिलेगी।
(लेखक देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलाधिपति हैं)

मंगलमूर्ति भगवान श्री गणेश

 मंगलमूर्ति भगवान श्री गणेश की महिमा अपरंपार : 

विभिन्न देशों में गणपति अलग-अलग नामों से प्रख्यात हैं। जापान में गणेश जी को ‘शोटन’ के नाम से जाना जाता है जबकि तांत्रिक बौद्ध गणपति को ‘महा-रक्त’ के नाम से पूजा करते है। गणेश जी तिब्बत में ‘महाकाल’, चीन में ‘हो टेई’, थायलैंड में ‘फ्रा फिकनेत’ या ‘फ्रा फिकानेसुअन’ और मेक्सिको में ‘वीरकोष’ के नाम से जाना जाता है

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                          इस्लामिक देश इंडोनेशिया में भगवान श्री गणेश के बारे में जानकारी लेते मुस्लिम छात्र।

रिद्धि सिद्धि के दाता गणेश जी सार्वभौमिक हैं। उनकी महिमा अपर अपरंपार है जो काल, परिस्थिति एवं देश की सीमाओं के बंधन से परे है। समय समय पर अनेक ज्ञानी-ध्यानी, इतिहास-वेत्ता, पुरातत्वविद एवं वैज्ञानिक अपने अपने विवेक से गणेश जी का तार्किक विश्लेषण करने का मिथ्या प्रयास करते हैं। विघ्न-विध्वंसक गणपति तो मानव-मात्र की तार्किक क्षमता और बुद्धि से परे ‘यो बुद्धे परतस्तु सः’ हैं। चर-अचर एवं जड़-चेतन जगत में सर्वव्याप्त गणेश जी की अनुकम्पा के बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता।

तथाकथित वैज्ञानिक विचारधारा वाले प्रबुद्ध-जन हमारे विचारों को “अज्ञानता” सिद्ध करने में ‘गर्व’ का अनुभव करने से बाज़ नहीं आएंगे। दरअसल तथाकथित वैज्ञानिक-प्रणाली एवं सोच, आँकड़ों का एक सोचा समझा मकड़जाल बनकर रह गयी है और सृजनात्मकता से शनैः-शनैः दूर जा रहीं है। भगवत-गीता के अठारहवें अध्याय के चौदहवे श्लोक में स्पष्ट लिखा है,‘देवं चैवात्र पञ्चमं’ अर्थार्थ किसी भी कार्य की अंतिम सफलता तभी होती है, जब‘ईश्वर’ चाहते हैं।

कला एवं अंतरराष्ट्रीय व्यापार के शोध-कार्य में संलग्न होने के कारण हमें देश-विदेश में अक्सर भ्रमण करना पड़ता है जहां सर्वशक्तिमान विध्न-विध्वंसक गणेश जी का प्रभाव दुनिया भर में परिलक्षित होता है। मंगलमूर्ति गणेश जी को अनादिकाल से ही विध्न-विध्वंसक, “निर्विघ्नम कुरु में देव, सर्व कार्येषु सर्वदा” सर्वप्रथम पूज्य देव के रूप में न केवल भारत-वर्ष, अपितु अनेक देशों में पूजा जाता है। विभिन्न देशों में गणपति अलग-अलग नामों से प्रख्यात हैं। जापान में गणेश जी को ‘शोटन’ के नाम से जाना जाता है जबकि तांत्रिक बौद्ध गणपति को ‘महा-रक्त’ के नाम से पूजा करते है। गणेश जी तिब्बत में ‘महाकाल’, चीन में ‘हो टेई’, थायलैंड में ‘फ्रा फिकनेत’ या ‘फ्रा फिकानेसुअन’ एवं मक्सिको में ‘वीरकोष’ के नाम से जाना जाता है। जापानी चित्रशैली में गणेश की तीस से भी अधिक विधाएं प्रचलित हैं जिनमें आलिंगित ‘कांगी’ शैली अत्यधिक लोक प्रिय है।

आधुनिक अर्थविद 1991 से ही भारत के ग्लोबलाईज़ेशन तक ही अपनी सोच एवं शोध दोनों ही सीमीत रखते हैं, जबकि भारतीय देवी देवता तो अनादिकाल से ही विश्व व्याप्त एवं सीमाओं से परे हैं। रोमन देवता ‘जेनस’ को भी अनेक इतिहासकारों नें गणेश जी का रूप बताया है। दक्षिण एवं मध्य अमेरिकी देशों, जैसे माक्सिको, पेरू, ग्वाटेमाला, बोलीविया एवं होंडरस की ‘इंका’ एवं ‘एज़टेक’ सभ्यताओं में भी हिन्दू देवी-देवता, मंदिर एवं संग्रहालय देखने को मिलते हैं। माक्सिको के डिअगे दिवेरिआ के मंदिर में गणेश-प्रतिमा, एवं ग्वाटेमाला के वेरा-क्रूज एवं क्वीरागाओं के गणपति प्राचीन अमेरिका में गणपति की व्याप्तता को प्रमाणित करते हैं। जापान में ‘शोटन’ (गणेश) बुद्धि, शक्ति एवं उत्साह के प्रतीक हैं। उम्रदराज लोग व्यावसायिक सफलता एवं धन-सम्पदा प्राप्त करने के लिए जबकि युवक-युवतियां प्यार में सफलता के लिए गणेश जी की पूजा करते हैं।

धर्मनिरपेक्ष भारत के सरकारी भवनों एवं सार्वजनिक स्थानों पर गणेश या अन्य किसी हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाए शायद ही कहीं दृष्टिगोचर हों किन्तु बौद्ध देश थायलैंड की राजधानी बैंकॉक के स्वर्णभूमि एयरपोर्ट की तो रक्षा का सारा जिम्मा एवं श्रेय गणेश जी सहित अनेक हिन्दू देवी-देवताओं सहित यक्ष समूह को जाता है। बैंकॉक एयरपोर्ट पर ये विशाल प्रतिमाएं सहज ही पौराणिक युग में प्रवेश का अहसास करती हैं। इतना ही नहीं, दुनिया के सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या वाले देश इन्डोनेशिया के कोने कोने में न केवल गणेश-मंदिर हैं, अपितु उनकी मुद्रा पर भी गणेश जी के चित्र को वहां के राष्ट्रपति के फोटो के साथ दर्शाया गया है।

अनेक एशियाई देशों के सरकारी संस्थानों, यहां तक कि सैन्य उपक्रमों एवं सार्वजनिक जगहों पर विघ्नहरण मंगलमूर्ति गणेश जी कि प्रतिमा को प्रमुखता से स्थापित किया गया है। बैंकॉक के सेंट्रल वर्ड (वर्ड ट्रेड सेंटर) में गणेश जी कि एक भव्य प्रतिमा, ऊंचे सिंहासन पर, व्यवसाय एवं कूटनीति के देवता के रूप में स्थापित की गई है, जहां उन्हें फूल, अगरबत्ती एवं अन्य वस्तुएं बड़ी श्रद्धापूर्वक अर्पित की जाती है।

विश्वव्यापी सर्वव्याप्त, “समस्त विघनौघविनाश दक्ष‘, समस्त विघ्न एवं पापों के विनाश में दक्ष, गणपती की आलौकिक शक्ति’ का अहसास यदि भारत में भी ‘सरकारी आईने’ से हो जाए, तो शायद देश की दशा सुधर जाए एवं भारत में ‘अच्छे दिन’ आ जाए।