Monday, August 30, 2021

धर्मरक्षक वासुदेव श्री कृष्ण : ''कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन''

श्रीकृष्ण वादक हैं, नर्त्तक हैं, मुरलीधर हैं, चक्रधारी हैं, गीता के प्रवर्त्तक हैं, धर्म-संस्थापक हैं, मर्यादा-स्थापक हैं, निर्बलों के रक्षक, असुरों एवं अधर्मियों के संहारक हैं, वे देश के स्वाभिमान और शौर्य के प्रतीक भी हैं। कथा-काव्यों से लेकर प्रसंगों-प्रवचनों-आख्यानों में उनके समग्र रूप के दर्शन होते है 













सत्य, अहिंसा, करुणा, प्रेम आदि शाश्वत भाव हैं और किसी भी सभ्य समाज में इन मूल्यों को पालित-पोषित करने की परंपरा और प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं। भारत ने तो इन मूल्यों को सदैव ही सर्वोपरि माना। यहां कथाओं-पुराणों, शास्त्रों-संस्कारों, आदर्शों-अवतारों में इन मूल्यों की विशेष संकल्पना व प्रतिष्ठापना देखने को मिलती रही है।

यहां तक कि हमारे सर्वाधिक प्रचलित और आदर्श महानायक श्रीराम और श्रीकृष्ण के जीवन में भी हमें इन गुणों के दर्शन होते हैं। परंतु ध्यातव्य यह है कि राम और श्रीकृष्ण लोकमानस के सर्वाधिक स्वीकार्य ईष्ट-आदर्श इसलिए रहे हैं कि उन्होंने अधर्म पर धर्म की, अन्याय पर न्याय की स्थापना के लिए अंतिम सांस तक प्राणार्पण से प्रयास और संघर्ष किया। उन्होंने सज्जन शक्तियों को संगठित कर दुर्जन शक्तियों को परास्त किया। उनका संपूर्ण जीवन ''परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्'' का पर्याय रहा। वे बल-पौरुष-साहस के अधिष्ठाता रहे। उन्होंने केवल शब्दों से ही नहीं, अपितु अपने चरित्र और आचरण से क्लीवता एवं कायरता के स्थान पर पौरुष और पराक्रम का संदेश दिया। युद्ध से पलायन को उद्धत-अभिमुख अर्जुन को श्रीकृष्ण के संदेशों से ही 'धर्म संस्थापनाय' लड़ने की प्रेरणा मिली।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर यह विचार-विश्लेषण समीचीन एवं उपयुक्त ही होगा कि महापराक्रमी-तेजस्वी-नीतिज्ञ-चतुर श्रीकृष्ण का यशोगायन करने के बजाय क्यों अधिकांश कथित साहित्यकारों-कवियों-चिंतकों-कथाकारों ने उनके कोमल एवं रसिक स्वरूप का ही अधिकाधिक चित्रण किया ? क्या श्रीकृष्ण ने केवल कोमल और प्रेमिल भावों को ही जिया ? क्या उनके जीवन एवं व्यक्तित्व को केवल रासलीलाओं की परिधि में आबद्ध कर कथा-कहानियों, काव्यों-साहित्यों, प्रवचनों-आख्यानों में प्रस्तुत करना उनके विराट, बृहत्तर, कर्मयोगी व्यक्तित्व के साथ अन्याय नहीं है ? वीरता के स्थान पर भीरुता और पलायन-वृत्ति के अनुसरण की सामाजिक प्रवृत्ति के पीछे क्या कवियों-चिंतकों-प्रवचनकारों की ये प्रवृत्तियां जिम्मेदार नहीं हैं? क्या इन प्रवृत्तियों ने हमारे समाज एवं युवाओं को वीरता के स्थान पर भीरूता का पाठ नहीं पढ़ाया है ?

अनायास ही यह प्रश्न भी मन को उद्वेलित-व्यथित करता है कि सन 1192 में मोहम्मद गोरी के हाथों निर्णायक एवं अपमानजनक पराजय के पश्चात अपना यह प्राणप्रिय भारतवर्ष लगातार विदेशी आक्रांताओं के पदों के नीचे कुचला जाता रहा और सन 1857 आते-आते तो वह विदेशी साम्रज्यवाद के पूर्णतया अधीन हो गया। परंतु घोर आश्चर्य यह है कि अपमान, प्रताड़ना और गुलामी की उन सदियों में भी तुलसीदास जी जैसे अपवादों को छोड़ दें तो हमारा संपूर्ण भक्ति एवं रीति कालीन साहित्य और चिंतन धनुर्धारी राम के बजाय बांकेबिहारी, रासबिहारी, कुंजबिहारी श्रीकृष्ण के आस-पास ही घूमता-मंडराता रहा। जबकि गुलामी की उन सदियों में वीरता, स्वतंत्रता एवं सुसुप्त राष्ट्रीय व सांस्कृतिक चेतना जागृत करने वाले प्रसंगों को अधिक प्रमुखता से उभारा जाना चाहिए था। तब और कमोवेश आज के विषम, प्रतिकूल एवं अंतर्बाह्य चुनौतियों से घिरे कालखंड में हमें योगेश्वर के रूप में उस महाबली योद्धा श्रीकृष्ण की अधिक आवश्यकता है, जो शिशुपाल-जरासंध जैसे आतताइयों का नाश करता है, अबला एवं दुर्बलों की रक्षा करता है, चाणूर-मुष्टिक और कंस जैसे महाबलियों एवं महा आतताइयों का संहार करता है, और महाभारत के युद्ध में 'शठे शाठ्यम समाचरेत' की नीति का अनुसरण करते हुए धर्म की जीत और अधर्म की हार सुनिश्चित करता है।

मध्यकालीन कवियों-चिंतकों को केवल माखन चुराने वाले, मटकी फोड़नेवाले, वंशी बजाने वाले, श्रीकृष्ण ही याद रहते हैं, पर उन्हें उसी आयु, बल्कि उससे भी छोटी आयु में प्रलंब, धेनुक, कालिया और बक जैसे न जाने कितने असुरों की नकेल कसने वाले श्रीकृष्ण; 'महाभारत' और 'भगवद्गीता' के महानायक और उद्घोषक श्रीकृष्ण-लगभग नहीं के बराबर याद आते! कविता-कहानियों का जनमानस पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है। साहित्य यदि समाज का दर्पण है तो समाज भी साहित्य से ही प्रेरणा-संदेश ग्रहण करता है। साहित्य ही उसे आदर्श और जीवन-मूल्य प्रदान करता है। आज समय आ गया है कि जो भूल मध्यकालीन कवियों-साहित्यकारों-चिंतकों से हुई, वर्तमान में उसका परिशोधन-परिमार्जन हो! माना कि लोकमानस कोमल-मधुर-भावपूर्ण प्रसंगों में अधिक रुचि लेता है, पर साहित्य एवं साहित्यकारों का उद्देश्य केवल लोक का रंजन नहीं, चरित्र का गठन और परिमार्जन भी होना चाहिए। और यह तभी संभव होगा, जब वह अपने लोकनायकों का युगीन एवं आदर्श चित्र व चरित्र प्रस्तुत करे।

आज भी वंशी बजैया, रास रचैया, गाय चरैया, लोक लुभैया, माखन चुराने वाले, मटकी फोड़ने वाले कृष्ण-रूप का ही सर्वत्र बोलबाला है। श्रीकृष्ण वादक हैं, नर्त्तक हैं, मुरलीधर हैं, चक्रधारी हैं, गीता के प्रवर्त्तक हैं, धर्म-संस्थापक हैं, मर्यादा-स्थापक हैं, निर्बलों के रक्षक, असुरों एवं अधर्मियों के संहारक हैं, वे देश के स्वाभिमान और शौर्य के प्रतीक भी हैं। कथा-काव्यों से लेकर प्रसंगों-प्रवचनों-आख्यानों में उनके समग्र रूप के दर्शन होने चाहिए

कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी एवं उसके दुष्प्रभावों के इस कठिन कालखंड में उनके ''कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'' संदेश की महत्ता एवं प्रासंगिकता और बढ़ गई है। एक ऐसे दौर में जबकि हमारा देश विस्तारवाद, साम्राज्यवाद, अलगाववाद, आतंकवाद जैसी बड़ी चिंताओं और समस्याओं की चपेट में है। हमें श्रीकृष्ण के पराक्रमी-तेजस्वी-कर्मयोगी-चक्रधारी रूप की महती आवश्यकता है। हमें उनके जैसा ही दूरदर्शी एवं रणनीतिक नेतृत्व भी चाहिए, जो दुष्टों के लिए मारक-संहारक, चतुरों के लिए चतुर तो सज्जनों के लिए कुशल संगठक एवं जीवनदायी उत्प्रेरक और उद्धारक हो

मेजर ध्यानचंद

 जब इस जादूगर की हॉकी स्टिक तोड़ कर जांची गई थी, कि इसमें चुंबक तो नहीं है :










हॉकी के जादूगर पद्मभूषण ‘दद्दा’ मेजर ध्यानचंद खिलाड़ियों के लिए भगवान की तरह हैं। इसीलिए केंद्र सरकार ने खेल के सबसे बड़े पुरस्कार का नाम मेजर ध्यानचंद के नाम पर रखने का निर्णय किया। कुश्ती के शौकीन ध्यानचंद को सेना में सूबेदार मेजर बाले तिवारी ने हॉकी खेलने के लिए प्रेरित किया। फिर तो ध्यानचंद हॉकी में ऐसे रमे कि दुनियाभर में उनकी कलाई का चमत्कार देखने लोग उमड़ पड़ते थे

हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद अपने खेल से न सिर्फ पूरी दुनिया में चर्चित हैं, वरन वह खिलाड़ियों के लिए भगवान की तरह हैं। ध्यानचंद की महानता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह सबके लिए आश्चर्य का विषय रहता था कि वे दूसरे खिलाड़ियों की अपेक्षा इतने अधिक गोल कैसे कर लेते थे। इसके लिए उनकी हॉकी स्टिक को ही तोड़ कर जांचा भी गया। नीदरलैंड्स में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक तोड़कर यह चेक किया गया था कि कहीं इसमें चुंबक तो नहीं लगा।

भारत के इस महान सपूत को शासन ने 1956 में ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया। उनका जन्मदिवस 29 अगस्त भारत में ‘खेल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।मेजर ध्यानचंद ने 1928, 1932 और 1936 ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। तीनों ही बार भारत ने ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता।

हॉकी के जादूगर

1928 में एम्सटर्डम में हुए ओलंपिक खेलों में वह भारत की ओर से सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी रहे। उस टूर्नामेंट में ध्यानचंद ने 14 गोल किए थे। एम्सटर्डम के एक स्थानीय समाचार पत्र में लिखा था, ‘यह हॉकी नहीं बल्कि जादू था, और ध्यानचंद हॉकी के जादूगर हैं।’

इसके बाद 1932 में लॉस एंजेल्स में खेले गए ओलंपिक में भी भारतीय टीम ने शानदार प्रदर्शन किया। प्रतियोगिता के फाइनल में भारत ने अमेरिका को 24-1 से हराया था। इसमें 10 गोल अकेले मेजर ध्यानचंद ने ही दागे थे। इसके बाद 1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम की कमान मेजर ध्यानचंद के हाथ में ही थी। फाइनल मैच में भारत ने उस दौर की दुनिया की सबसे सशक्त टीम जर्मनी को 8-1 से हराकर विश्व पटल पर भारत का परचम फहराया था।

सेना में हुए हॉकी के लिए प्रेरित

मेजर ध्यानचन्द का जन्म प्रयाग, उत्तर प्रदेश में 29 अगस्त, 1905 को हुआ था। उनके पिता सेना में सूबेदार थे। उन्होंने 16 साल की अवस्था में ध्यानचन्द को भी सेना में भर्ती करा दिया। वहाँ वे कुश्ती में बहुत रुचि लेते थे परन्तु सूबेदार मेजर बाले तिवारी ने उन्हें हॉकी के लिए प्रेरित किया। इसके बाद तो वे और हॉकी एक दूसरे के पर्याय बन गये।

वे कुछ दिन बाद ही अपनी रेजिमेंट की टीम में चुन लिये गये। उनका मूल नाम ध्यानसिंह था। वे प्रायः चाँदनी रात में अकेले घण्टों तक हॉकी का अभ्यास करते रहते थे। इससे उनके साथी तथा सेना के अधिकारी उन्हें ‘चाँद’ कहने लगे। फिर तो यह उनके नाम के साथ ऐसा जुड़ा कि वे ध्यानसिंह से ध्यानचन्द हो गये। आगे चलकर वे ‘दद्दा’ ध्यानचन्द कहलाने लगे।

कई बार बदली गई स्टिक

चार साल तक ध्यानचन्द अपनी रेजिमेण्ट की टीम में रहे। 1926 में वे सेना एकादश और फिर राष्ट्रीय टीम में चुन लिये गये। इसी साल भारतीय टीम ने न्यूजीलैण्ड का दौरा किया। इस दौरे में पूरे विश्व ने उनकी अद्भुत प्रतिभा को देखा। गेंद उनके पास आने के बाद फिर किसी अन्य खिलाड़ी तक नहीं जा पाती थी। कई बार उनकी हॉकी की जाँच की गयी कि उसमें गोंद तो नहीं लगी है। अनेक बार खेल के बीच में उनकी हॉकी बदली गयी पर वे तो अभ्यास के धनी थे। वे उल्टी हॉकी से भी उसी कुशलता से खेल लेते थे। इसीलिए उन्हें लोग हॉकी का ‘जादूगर’ कहते थे।

1926 से 1948 तक ध्यानचन्द दुनिया में जहाँ भी हॉकी खेलने गये, वहां दर्शक उनकी कलाइयों का चमत्कार देखने के लिए उमड़ आते थे। ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना के एक स्टेडियम में उनकी प्रतिमा ही स्थापित कर दी गयी। 42 वर्ष की अवस्था में उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास ले लिया। कुछ समय वे राष्ट्रीय खेल संस्थान में हॉकी के प्रशिक्षक भी रहे, 3 दिसम्बर, 1979 को उनका देहान्त हुआ

Wednesday, July 21, 2021

कानपुर के दर्जन भर गांव बनेंगे संस्कृत भाषी

संस्कृत भाषा जन-जन के बीच बोलचाल की भाषा के रूप में स्थापित हो, इसके लिए संस्कृत भारती लगातार प्रयास करती रही है। कानपुर में संगठन द्वारा कुछ गांव को संस्कृत भाषी बनाने के लिए बच्चों और युवाओं के बीच प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है।

संस्कृत भारती ग्रामीण क्षेत्रों में संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है। इसी क्रम में कानपुर के बिठूर के आसपास दर्जन भर गांवों को संस्कृत भाषी गांवों के रूप में विकसित करने की योजना है। जिन गांवों में संस्कृत का प्रचार-प्रसार किया जाएगा उनमें रमेल, हींगूपुर, पैगूपुर, बाकरगंज, ईश्वरीगंज, हृदयपुर, प्रतापपुर हरि, शिवदीन पुरवा, तिसजा, भारतपुरवा, भगवानदीन की पुरवा, मक्कापुरवा प्रमुख हैं। इस पूरे अभियान का संचालन संस्कृत भारती के कानपुर प्रांत कार्यालय से होगा।


11 जुलाई को ही इस कार्यालय की स्थापना की गई है। यह कार्यालय बिठूर स्थित चित्रकूट अखंड सच्चिदानंद आश्रम ट्रस्ट ब्रह्मावर्त में वैदिक मंत्रोच्चार और हवन-पूजन के साथ शुरू हुआ। कार्यालय में संस्कृत शिक्षण केंद्र का संचालन भी होगा। इसमें बाल, तरुण, युवा, वरिष्ठ और बहनें निशुल्क संस्कृत का पठन—पाठन कर सकेंगी।


संस्कृत के लिए समय देने वाले विस्तारकों के सहयोग से जन-जन तक संस्कृत को पहुंचाया जाएगा। इसके साथ ही संस्कृत भाषी परिवारों की संख्या बढ़ाई जाएगी। वर्तमान और भावी पीढ़ी को संस्कृत भाषा की अहमियत और उसमें छिपी संभावनाओं की जानकारी देने की योजना पर संस्कृत भारती के कार्यकर्ता काम कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर संस्कृत भाषा को लेकर शुरू किए जा रहे प्रशिक्षण कार्यक्रमों को लेकर लोगों में विशेष उत्साह है।

Monday, July 12, 2021

उनकी आंखों में तैरता था अखंड भारत का सपना

 

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उन सेनानियों में शुमार हैं ने अपने निजी स्वार्थों को दरकिनार करते हुए राष्ट्रहित में अपने जीवन की आहुति स्वतंत्रतारूपी यज्ञ में डालकर राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया। अखंड भारत के समर्थक रहे डॉ. मुखर्जी ने कश्मीर में प्रवेश के लिए परमिट के नेहरू के प्रावधान के विरुद्ध आंदोलन किया और देश की अखंडता के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया

भूमि,जन तथा संस्कृति के समन्वय से राष्ट्र बनता है। संस्कृति राष्ट्र का शरीर, चिति उसकी आत्मा तथा विराट उसका प्राण है। भारत एक राष्ट्र है और वर्तमान समय में एक शक्तिशाली भारत के रूप में उभर रहा है। राष्ट्र में रहने वाले जनों का सबसे पहला दायित्व होता है कि वो राष्ट्र के प्रति ईमानदार तथा वफादार रहे। प्रत्येक नागरिक के लिए राष्ट्र सर्वोपरि होता है, जब भी कभी अपने निजी हित, राष्ट्रहित से टकराएं, तो राष्ट्रहित को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए, यह हर एक राष्ट्रभक्त की निशानी होती है। भारत सदियों तक गुलाम रहा और उस गुलाम भारत को आजाद करवाने के लिए असंख्य वीरों ने अपने निजी स्वार्थों को दरकिनार करते हुए राष्ट्रहित में अपने जीवन की आहुति स्वतंत्रतारूपी यज्ञ में डालकर राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया। ऐसे ही महापुरुष थे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी।


यह कितना दुखद था कि माता वैष्णोदेवी भी परमिट मांगती थी। डल झील भी पूछती तू किस देश का वासी है, बर्फानी बाबा अमरनाथ के दर्शन के लिए इंतजार करना पड़ता था, जिस प्रकार कैलाश मानसरोवर के लिए करना पड़ता है कि आखिर मेरा नंबर कब आएगा। अगर देश के पास भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं होते तो कश्मीर का विषय चर्चा में नहीं आता। जिस प्रकार लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने खंड-खंड हो रहे देश को अखंड बनाया, उसी प्रकार डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अखंड भारत की संकल्पना को साकार करने के लिए अपना पूरा जीवन होम कर दिया।


राजनीति राष्ट्रसेवा का साधन

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी केवल राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे। उनके जीवन से ही राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को सीख लेनी चाहिए, उनका स्वयं का जीवन प्रेरणादायी, अनुशासित तथा निष्कलंक था। राजनीति उनके लिए राष्ट्र की सेवा का साधन थी, उनके लिए सत्ता केवल सुख के लिए नहीं थी। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी राजनीति में क्यों आए? इस प्रश्न का उत्तर है, उन्होंने राष्ट्रनीति के लिए राजनीति में पदार्पण किया। वे देश की सत्ता चाहते तो थे, किंतु किसके हाथों में? उनका विचार था कि सत्ता उनके हाथों में जानी चाहिए, जो राजनीति का उपयोग राष्ट्रनीति के लिए कर सकें।


डॉ. मुखर्जी 33 वर्ष की आयु में ही कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए और विश्व का सब से युवा कुलपति होने का सम्मान उन्हें प्राप्त हुआ। वे 1938 तक इस पद पर रहे। बाद में उनकी राजनीति में जाने की इच्छा के कारण उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी और कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि के रूप में बंगाल विधानपरिषद का सदस्य चुना गया, लेकिन कांग्रेस द्वारा विधायिका के बहिष्कार का निर्णय लेने के पश्चात उन्होंने  त्यागपत्र दे दिया। बाद में डॉ. मुखर्जी ने स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और निर्वाचित हुए।

1943 में बंगाल में पड़े अकाल के दौरान श्यामा प्रसाद जी का मानवतावादी पक्ष निखरकर सामने आया, जिसे बंगाल के लोग कभी भुला नहीं सकते। बंगाल पर आए संकट की ओर देश का ध्यान आकर्षित करने के लिए और अकाल-ग्रस्त लोगों के लिए व्यापक पैमाने पर राहत जुटाने के लिए उन्होंने प्रमुख राजनेताओं, व्यापारियों, समाजसेवी व्यक्तियों को जरुरतमंद और पीड़ितों को राहत पहुंचाने के उपाय खोजने के लिए आमंत्रित किया। फलस्वरूप बंगाल राहत समिति गठित की गई और हिन्दूमहासभा राहत समिति भी बना दी गई। श्यामा प्रसाद जी इन दोनों ही संगठनों के लिए प्रेरणा के स्रोत थे। लोगों से धन देने की उनकी अपील का देशभर में इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि बड़ी-बड़ी राशियां इस प्रयोजनार्थ आनी शुरू हो गई। इस बात का श्रेय उन्हीं को जाता है कि पूरा देश एकजुट होकर राहत देने में लग गया और लाखों लोग मौत के मुंह में जाने से बच गए। वह केवल मौखिक सहानुभूति प्रकट नहीं करते थे, बल्कि ऐसे व्यावहारिक सुझाव भी देते थे, जिनमें सहृदय मानव-हृदय की झलक मिलती, जो मानव पीड़ा को हरने के लिए सदैव लालायित और तत्पर रहता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्होंने संसद में एकबार कहा था, ‘‘अब हमें 40 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं, पता नहीं भविष्य में लोकसभा के सदस्यों के भत्ते क्या होंगे। हमें स्वेच्छा से इस दैनिक भत्ते में 10 रुपये प्रतिदिन की कटौती करनी चाहिए और इस कटौती से प्राप्त धन को हमें इन महिलाओं और बच्चों (अकालग्रस्त क्षेत्रों के) के रहने के लिए मकान बनाने और खाने-पीने की व्यवस्था करने के लिए रख देना चाहिए।’’


गुरुजी के परामर्श से जनसंघ की स्थापना

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अंतरिम सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया। लेकिन नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली के बीच हुए समझौते के पश्चात 6 अप्रैल, 1950 को उन्होंने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गुरु गोलवलकर जी से परामर्श लेकर मुखर्जी ने 21 अक्टूबर, 1951 को जनसंघ की स्थापना की। भारत में जिस समय जनसंघ की स्थापना हुई, उस समय देश विपरीत परिस्थितयों से गुजर रहा था। जनसंघ का उदेश्य साफ था। वह अखंड भारत की कल्पना कर कार्य करना चाहता था। वह भारत को खंडित भारत करने के पक्ष में नहीं था। जनसंघ का स्पष्ट मानना था कि भारत एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने आएगा। डॉ. मुखर्जी के अनुसार अखंड भारत देश की भौगोलिक एकता का ही परिचायक नहीं है, अपितु जीवन के भारतीय दृष्टिकोण का द्योतक है, जो अनेकता में एकता का दर्शन करता है। जनसंघ के लिए अखंड भारत कोई राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि यह तो हमारे संपूर्ण जीवन दर्शन का मूलाधार है।


देश में पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर, 1951 से 21 फरवरी, 1952 तक हुआ। इन आम चुनावों में जनसंघ के 3 सांसद चुने गए, जिनमें एक डॉ. मुखर्जी भी थे। तत्पश्चात उन्होंने संसद के अंदर 32 लोकसभा और 10 राज्यसभा सांसदों के सहयोग से नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी का गठन किया। डॉ. मुखर्जी सदन में नेहरू की नीतियों पर तीखा प्रहार करते थे। जब संसद में बहस के दौरान पंडित नेहरू ने भारतीय जनसंघ को कुचलने की बात कही, तब डॉ. मुखर्जी ने कहा, ‘‘हम देश की राजनीति से इस कुचलने वाली मनोवृत्ति को कुचल देंगे।’’


भारत विभाजन के विरुद्ध

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत का विभाजन नहीं होने देना चाहते थे। इसके लिए वे महात्मा गांधी के पास भी गए थे। परंतु गांधी जी का कहना था कि कांग्रेस के लोग उनकी बात सुनते ही नहीं। जब देश का विभाजन अनिवार्य जैसा हो गया, तो डॉ. मुखर्जी ने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं के हितों की उपेक्षा न हो। उन्होंने बंगाल के विभाजन के लिए जोरदार प्रयास किया, जिससे मुस्लिम लीग का पूरा प्रांत हड़पने का मंसूबा सफल नहीं हो सका। श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रभक्ति एवं देशप्रेम की उस महान परंपरा के वाहक थे, जो देश की परतंत्रता के युग तथा स्वतंत्रता के काल में देश की एकता, अखंडता तथा विघटनकारी शक्तियों के विरुद्ध सतत जूझते रहे। उनका जीवन भारतीय धर्म तथा संस्कृति के लिए पूर्णतः समर्पित था। वे एक महान शिक्षाविद तथा प्रखर राष्ट्रवादी थे। पारिवारिक परिवेश शिक्षा, संस्कृति तथा हिन्दुत्व के प्रति अनुराग उन्हें परिवार से मिला था।


डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी‘ एक भारत’ की कल्पना में विश्वास रखते थे। हमारे स्वाधीनता सेनानियों और संविधान निर्माताओं ने भी ऐसे ही भारत की कल्पना की थी। मगर जब आजाद भारत की कमान संभालने वालों का बर्ताव इस सिद्धांत के खिलाफ हो चला, तो डॉ. साहब ने बहुत मुखरता और प्रखरता के साथ इसका विरोध किया। महाराजा हरि सिंह के अधिमिलन पत्र अर्थात् 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर हस्ताक्षार करते ही समूचा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग हो गया। बाद में संविधान के अनुच्छेद एक के माध्यम से जम्मू कश्मीर भारत का 15वां राज्य घोषित हुआ। ऐसे में जम्मू कश्मीर में भी शासन व संविधान व्यवस्था उसी प्रकार चलनी चाहिए थी, जैसे कि भारत के किसी अन्य राज्य में। जब ऐसा नहीं हुआ तो मुखर्जी ने अप्रैल 1953 में पटना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि, “जम्मू एवं कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला और उनके मित्रों को यह साबित करना होगा कि भारतीय संविधान जिसके अंतर्गत देश के पैंतीस करोड़ लोग, जिनमें चार करोड़ लोग मुसलमान भी हैं, वे खुश रह सकते हैं, तो जम्मू-कश्मीर में रहने वाले 25 लाख मुसलमान क्यों नहीं?” उन्होंने शेख को चुनौती देते हुए कहा था कि, “यदि वह सेकुलर हैं, तो वह संवैधानिक संकट क्यों उत्पन्न करना चाहते हैं। आज जब राज्य का एक बड़ा हिस्सा अपने आप को संवैधानिक व्यवस्था से जोड़ना चाहता है, तो शेख अब्दुल्ला इसमें रोड़े क्यों अटका रहे हैं?” उनके द्वारा उठाये गए सवालों के जवाब न शेख के पास थे और न पंडित नेहरू के पास। इसीलिए दोनों ने कभी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी से सीधे बात करने की कोशिश भी नहीं की।

अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के विरुद्ध सत्याग्रह

अनुच्छेद 370 के राष्ट्रघातक प्रावधानों को हटाने के लिए भारतीय जनसंघ ने हिन्दू महासभा और रामराज्य परिषद के साथ सत्याग्रह आरंभ किया। डॉ. मुखर्जी इस प्रण पर सदैव अडिग रहे कि जम्मू एवं कश्मीर भारत का एक अविभाज्य अंग है। उन्होंने सिंह-गर्जना करते हुए कहा था कि, “एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान, नहीं चलेगा”।उस समय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 में यह प्रावधान किया गया था कि कोई भी भारत सरकार से बिना परमिट लिए हुए जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता। डॉ. मुखर्जी इस प्रावधान के सख्त खिलाफ थे। उनका कहना था कि, “नेहरू ने ही ये बार-बार ऐलान किया है कि जम्मू व कश्मीर राज्य का भारत में 100% विलय हो चुका है, फिर भी यह देख कर हैरानी होती है कि इस राज्य में कोई भारत सरकार से परमिट लिए बिना दाखिल नहीं हो सकता। मैं नहीं समझता कि भारत सरकार को यह हक है कि वह किसी को भी भारतीय संघ के किसी हिस्से में जाने से रोक सके, क्योंकि खुद नेहरू ऐसा कहते हैं कि इस संघ में जम्मू व कश्मीर भी शामिल है।”

उन्होंने इस प्रावधान के विरोध में भारत सरकार से बिना परमिट लिए हुए जम्मू व कश्मीर जाने की योजना बनाई। इसके साथ ही उनका अन्य मकसद था वहां के वर्तमान हालात से स्वयं को वाकिफ कराना, क्योंकि शेख अब्दुल्ला की सरकार ने वहां के सुन्नी कश्मीरी मुसलमानों के बाद दूसरे सबसे बड़े स्थानीय भाषाई डोगरा समुदाय के लोगों पर असहनीय जुल्म ढाना शुरू कर दिया था। नेशनल कांफ्रेंस का डोगरा-विरोधी उत्पीड़न वर्ष 1952 के शुरुआती दौर में अपने चरम पर पहुंच गया था। डोगरा समुदाय के आदर्श पंडित प्रेमनाथ डोगरा ने बलराज मधोक के साथ मिलकर ‘जम्मू व कश्मीर प्रजापरिषद् पार्टी’की स्थापना की थी। इस पार्टी ने डोगरा अधिकारों के अलावा जम्मू व कश्मीर राज्य के भारत संघ में पूर्ण विलय की लड़ाई, बिना रुके और बिना थके लड़ी।

संविधान की रक्षा या प्राणोत्सर्ग का प्रण

डॉ. मुखर्जी ने भारतीय संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को कहा था कि ‘या तो मैं संविधान की रक्षा करूंगा, नहीं तो अपने प्राण दे दूंगा’। हुआ भी यही। 8 मई, 1953 को सुबह 6:30 बजे दिल्ली रेलवे स्टेशन से पैसेंजर ट्रेन में अपने समर्थकों के साथ सवार होकर डॉ. मुखर्जी पंजाब के रास्ते जम्मू के लिए निकले। उनके साथ बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, टेकचंद, गुरुदत्त वैद्य और कुछ पत्रकार भी थे। रास्ते में हर जगह डॉ. मुखर्जी की एक झलक पाने एवं उनका अभिवादन करने के लिए लोगों का जनसैलाब उमड़ पड़ता था। डॉ. मुखर्जी ने जालंधर के बाद बलराज मधोक को वापस भेज दिया और अमृतसर के लिए ट्रेन पकड़ी। 11 मई, 1953 को कुख्यात परमिट सिस्टम का उलंघन करने पर कश्मीर में प्रवेश करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और गिरफ्तारी के दौरान ही रहस्मयी परिस्थितियों में 23 जून, 1953 को उनकी मौत हो गई। डॉ. मुखर्जी की माताजी ने नेहरू के 30 जून, 1953 के शोकसंदेश का 4 जुलाई,1953 को उत्तर देते हुए पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने उनके बेटे की रहस्मयी परिस्थितियों में हुई मौत की जांच की मांग की। जवाब में पंडित नेहरु ने जांच की मांग को ख़ारिज कर दिया। उन्होंने जवाब देते हुए यह लिखा कि, “मैंने कई लोगों से इस बारे में पता लगवाया है, जो इस बारे में काफी कुछ जानते थे और उनकी मौत में किसी प्रकार का कोई रहस्य नहीं था।”

उनके बिलदान पर शोक व्यक्त करते हुए तत्कालीन लोकसभा के अध्यक्ष श्री जी.वी. मावलंकर ने कहा था, ‘‘वे हमारे महान देशभक्तों में से एक थे और राष्ट्र के लिए उनकी सेवाएं भी उतनी ही महान थीं। जिस स्थिति में उनका निधन हुआ, वह स्थिति बड़ी ही दुःखदायी है। उनकी योग्यता, उनकी निष्पक्षता, अपने कार्यभार को कौशल्यपूर्ण निभाने की दक्षता, उनकी वाक्पटुता और सबसे अधिक उनकी देशभक्ति एवं अपने देशवासियों के प्रति उनके लगाव ने उन्हें हमारे सम्मान का पात्र बना दिया।’’

उनकी मृत्यु के पश्चात टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा अत्यंत उल्लेखनीय श्रद्धांजलि दी गई, जिसमें कहा गया कि ‘‘डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सरदार पटेल की प्रतिमूर्ति थे’’। यह एक अत्यंत उपर्युक्त श्रद्धांजलि थी, क्योंकि डॉ. मुखर्जी नेहरू सरकार पर बाहर से उसी प्रकार का संतुलित और नियंत्रित प्रभाव बनाए हुए थे, जिस प्रकार का प्रभाव सरकार पर अपने जीवनकाल में सरदार पटेल का था। राष्ट्र-विरोधी और एकदलीय शासन पद्धति की सभी नीतियों तथा प्रवृत्तियों के प्रति उनकी रचनात्मक एवं राष्ट्रवादी विचारधारा तथा उनके प्रबुद्ध एवं सुदृढ़ प्रतिरोध ने उन्हें देश में स्वतंत्रता और लोकतंत्र का प्राचीर बना दिया था। संसद में विपक्ष के नेता के रूप में उनकी भूमिका से उन्हें ‘‘संसद का शेर’’ की उपाधि अर्जित हुई।

मोदी सरकार ने डॉ. मुखर्जी के घोषवाक्य पर किया अमल

भारतीय जनसंघ से लेकर भाजपा के प्रत्येक घोषणापत्र में अपने बलिदानी नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के इस घोषवाक्य को, कि ‘हम संविधान की अस्थायी धारा 370 को समाप्त करेंगे’, सदैव लिखा जाता रहा। समय आया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्होंने स्वयं डॉ. मुरली मनोहर जोशी के साथ भारत की यात्रा करते हुए श्रीनगर के लालचौक पर तिरंगा फहराया था और गृह मंत्री अमित शाह ने 5 अगस्त, 2019 कोधारा 370 को राष्ट्रहित में समाप्त करने के निर्णय को दोनों सदनों से पारित कर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि दी। वे महापुरुष बहुत भाग्यशाली होते हैं, जिनकी आने वाली पीढ़ी अपने पूर्वर्जों की कही गई बातों को साकार करती है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भाग्यशाली हैं कि उनके विचारों के संवाहक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह सहित पूरे मंत्रिमंडल ने धारा 370 को समाप्त कर दुनिया को बता दिया:-

जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वो कश्मीर हमारा है,

जो कश्मीर हमारा है, वह सारा का सारा है।

सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धांतों के पक्के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सदैव राष्ट्रीय एकता की स्थापना को ही अपना प्रथम लक्ष्य रखा था। संसद में दिए अपने भाषण में उन्होंने स्पष्ट कहा था कि राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है। एक कर्मठ और जुझारू व्यक्तित्व वाले मुखर्जी अपनी मृत्यु के दशकों बाद भी अनेक भारतवासियों के आदर्श और पथप्रदर्शक हैं। जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय करने का श्रेय सरदार पटेल को जाता है, ठीक उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकांश भागों को भारत का अभिन्न अंग बनाये रखने की सफलता प्राप्ति में डॉ. मुखर्जी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। उन्हें किसी दल की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता,क्योंकि उन्होंने जो कुछ किया,देश के लिए किया और इसी भारतभूमि के लिए अपना बलिदान तक दे दिया।

वे सच्चे अर्थों में राष्ट्रधर्म का पालन करने वाले साहसी, निडर एवं जुझारु कर्मयोद्धा थे। जीवन में जब भी निर्माण की आवाज उठेगी, पौरुष की मशाल जगेगी, सत्य की आंख खुलेगी एवं अखंड राष्ट्रीयता की बात होगी, तो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अवदान को सदा याद किया जायेगा।


Sunday, June 13, 2021

चीन : गरीबी उन्मूलन करने का दिखावा,मात्र एक स्वांग!

चीन ने दावा किया है कि उसने पिछले 8 वर्षों में 248 अरब डॉलर खर्च कर गरीबी के नवनिर्धारित मानकों के अनुसार 9.89 करोड़ गरीब ग्रामीण आबादी को गरीबी से बाहर निकाला है। हालांकि अर्थशास्त्री इन दावों की बखिया उधेड़ रहे हैं। माना जा रहा है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के शताब्दी वर्ष के अवसर पर जुलाई में होने वाले कामों के मद्देनजर यह शिगूफा छोड़ा गया है।

इस वर्ष फरवरी माह के अंत में एक भव्य समारोह में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने घोषणा की कि उनके देश ने नितांत गरीबी के उन्मूलन का "चमत्कार" कर दिखाया है। चीन की सरकार का दावा है कि पिछले आठ साल की अवधि में 248 अरब डॉलर खर्च कर, ‘नव-निर्धारित’ गरीबी के मानदंडों के अनुसार 9.89 करोड़ गरीब ग्रामीण आबादी को गरीबी से बाहर निकाला गया है, और इसके द्वारा 832 गरीबी से त्रस्त काउंटीज के साथ-साथ 128,000 गांवों को गरीबी रेखा से नीचे वाली सूची से हटा दिया गया है। परन्तु शी जिनपिंग और चीन की सरकार के इस दावे को संयुक्त राष्ट्र के एक पूर्व अर्थशास्त्री द्वारा किए गए एक अध्ययन द्वारा चुनौती दी गई है, जिसमें तर्क दिया गया है कि बीजिंग ने गरीब होने के अर्थ की एक सीमित और अनम्य परिभाषा का उपयोग किया है।

दावों पर शंका !

FT द्वारा प्रकाशित एक समाचार के अनुसार चीन में संयुक्त राष्ट्र के पूर्व वरिष्ठ अर्थशास्त्री बिल बिकलेस ने एक हालिया प्रकाशित शोध में बताया  है, कि चीन ने ऐसे पर्याप्त प्रयास ही नहीं किये हैं, जिससे कि वह दावा कर सके कि उसने गरीबी पर अंतिम जीत हासिल कर ली है। फाइनेंसियल टाइम्स  के अनुसार बिक्लेस ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि “चीन ने गरीबी को नहीं मिटाया है, और यह तब तक संभव भी नहीं है, जब तक कि वह ऐसी व्यवहार्य प्रणालियां उपयोग नहीं करता जो चीन में गरीब लोगों की पहचान कर सकें, साथ ही समस्त नागरिकों के लिए एक सुरक्षा जाल प्रदान नहीं करता है, जो मौत, गंभीर बीमारी, काम के नुकसान या अन्य किसी आघात की चपेट में हैं।  उल्लेखनीय है कि 2017 में उन्नीसवीं पार्टी कांग्रेस में चीन की सरकार के लिए कुछ महत्वपूर्ण लक्ष्य निर्धारित किये गये थे, जिनमें से एक कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के शताब्दी वर्ष अर्थात 2021 में गरीबी के समूल उन्मूलन का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। और, इस शताब्दी वर्ष के जुलाई माह में होने वाले कार्यक्रमों द्वारा इस विफल विचारधारा में प्राण फूंकने की कोशिश के तहत जोर-शोर से इस उपलब्धि का डंका विश्व भर में पीटा जा रहा है|

चीन में आखिर गरीब है कौन?

स्विस एजेंसी फॉर डेवलपमेंट एंड कोऑपरेशन द्वारा वित्त पोषित इस रिपोर्ट में बिकलेस बताते हैं कि समूल गरीबी उन्मूलन के लिए बीजिंग ने जिन स्थिर परिभाषाओं का इस्तेमाल किया, वे गरीबी की सतत परिवर्तनशील वास्तविकताओं के विपरीत थीं। चीन की अर्थव्यवस्था पर गहन अध्ययन करने वाले विश्लेषकों का भी मानना है कि  चीन के "गरीबी के खिलाफ लड़ाई" को जीतने के दावे संदेहास्पद हैं। पहला तो यह चीन गरीबी को विशुद्ध रूप से ग्रामीण परिघटना मानता है, भले ही उसकी 60 प्रतिशत से अधिक आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है। और जब चीन की सरकार गरीबी उन्मूलन की बात करती है तो वह भारी मात्रा में बेरोजगार बेहाल शहरी दरिद्रों को पूर्ण रूप से अनदेखा कर देती है। चीन के अनेकों प्रान्तों में  घोर अभाव के ढेरों मामले देखे जा सकते हैं। इसके साथ ही यह भी देखा गया है कि चीन ने गरीबी की अपनी परिभाषा में इसका निम्न स्तर निर्धारित किया है।


समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व बैंक की वैश्विक सीमा 1.90 डॉलर प्रतिदिन की तुलना में, चीन द्वारा अत्यधिक गरीबी की सीमा  मौजूदा विनिमय दरों पर 1.69 डॉलर प्रति दिन के स्तर पर निर्धारित की है। परन्तु यह मामला यहां भी पूर्णत: भ्रामक हो जाता है। गौरतलब है कि 2019 में, चीन के सांख्यिकी ब्यूरो ने ग्रामीण गरीबी को 2,300 युआन अथवा 356 डॉलर प्रतिवर्ष की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय से कम के रूप में परिभाषित किया था। 2020 में इसे बढ़ाकर 4000 युआन अर्थात 620 डॉलर प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति यानी 1.69 डॉलर प्रति दिन से कम आय के रूप में परिभाषित कर दिया  गया, जो कि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। परन्तु गड़बड़ी कहीं और ही है! यह सामान्यत: माना जा रहा है कि गरीबी रेखा विश्वबैंक की 1.90  डॉलर प्रति दिन की सीमा से कम के स्तर पर  है। परन्तु यह दर सार्वत्रिक उपयोग के लिए नहीं है।


विश्व बैंक ने विकास के अलग-अलग स्तरों पर मौजूद देशों के लिए इसकी अलग-अलग सीमाएं निर्धारित की हैं। 1.90  डॉलर प्रति दिन की सीमा केवल विकास के तुलनात्मक रूप से निचले पायदान के देशों के लिए है, वहीं अमेरिका जैसे उच्च सकल घरेलू उत्पाद वाले देश के लिए गरीबी रेखा, चार सदस्यों वाले परिवार के लिए 72 डॉलर प्रतिदिन से कम है, जो कि एक निम्न आय वाले देश के लिए एक स्वप्न की तरह है। इसी प्रकार अगर हम  चीन की बात करें तो वह जिस आर्थिक स्तर का दावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करता है, उस के अनुसार उसे उच्च-मध्यम आय वाले देशों में रखा जाना चाहिए जिसके लिए अर्थशास्त्रियों द्वारा गरीबी रेखा की सीमा 5.50 डॉलर प्रति दिन से कम सुझाई गई है। अगर यह तार्किक दृष्टिकोण से सर्वथा उपयुक्त पैमाना चीन पर लागू किया जाता है, तो देखना होगा कि चीन में कितने सौभाग्यशाली लोग ऐसे होंगे जो इस रेखा से ऊपर होंगे?

आंकड़ों की दरिद्रता !

एक तथ्य यह भी है कि इस चर्चा में प्रतीत हो रहा है कि बदहाली केवल गरीबी रेखा से नीचे वालों की ही है, परन्तु ऐसा भी नहीं है। एक बहुत बड़ा वर्ग, जो आंकड़ों के उलटफेर द्वारा किनारे पर फेंक दिया गया है, देखा जाए तो वह भी खतरे में है। ऐसी आबादी जो इस रेखा से नाममात्र को ऊपर है, वह केवल चीनी शासकों के दंभ की संतुष्टि भर करने के लिए है। वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार कई आर्थिक विश्लेषकों का आकलन है कि चीन के ऐसे कई नागरिक हैं, जो गरीबी रेखा से तो ऊपर हैं, पर उनका अस्तित्व के लिए संघर्ष किसी भी तरह से कम पीड़ादायक नहीं है। पिछले वर्ष चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग ने भी एक सार्वजनिक टिप्पणी में स्वीकार किया था, कि लगभग 60 करोड़ चीनी नागरिक, जो इस देश की  आबादी का लगभग 40  प्रतिशत हैं, प्रतिमाह 1000 युआन अर्थात 155 डॉलर  पर जीवन निर्वाह कर रहे हैं।


वाशिंगटन पोस्ट एक और महत्वपूर्ण संदेह को उठाता है। उसके अनुसार कोविड महामारी के आघात से उबरने के बाद इस साल चीन की अर्थव्यवस्था के लगभग 8 प्रतिशत की दर से बढ़ने की उम्मीद है, परन्तु उपभोक्ता द्वारा किये जाने वाले परिव्यय में पूरी तरह से सुधार नहीं आया है। साथ ही विश्लेषकों का मानना है कि बेरोजगारी दर जो चीनी अधिकारियों की रिपोर्ट दिखाती है, उसकी तुलना में बहुत अधिक है। इस समय चीन के नव स्नातकों को नौकरी खोजने के लिए संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है, इसके साथ ही साथ गिरती जन्म दर विकास की गति पर भविष्य में नकारात्मक प्रभाव की आशंका दर्शाती है। देश में व्यापक आय असमानताएं भी मौजूद हैं, और लगातार बढ़ती जा रही हैं, और साथ ही चीन के नागरिकों का आक्रोश भी। चीन के माइक्रोब्लॉगिंग साईट वीबो पर चीनियों के अनेक तरह की टिप्पणियों की बाढ़ आई हुई है, जिनमें वह चीनी सरकार पर व्यंग्य कर रहे हैं और उनसे तल्ख़ प्रश्न भी पूछ रहे हैं। गरीबी को खत्म करने के लिए आधिकारिक मानक क्या है? मैं अब भी सड़कों पर लोगों को भीख मांगते क्यों देख रहा हूं? परन्तु चीन में सरकार को जवाब देने के लिए बाध्य भी नहीं किया जा सकता!


पिछले आठ वर्षों में, जब से शी सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख बने हैं, सरकार ने विश्व भर में एक नवसाम्राज्यवाद के विस्तार का अभियान छेड़ दिया है। शी की महत्वाकांक्षाएं असीमित हैं। वह चीन के सर्वोपरि नेता तो हैं परन्तु अपने प्रभाव की दृष्टि से वह  चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक माओत्से तुंग को भी पीछे छोड़ने की इच्छा रखते हैं। और इस क्रम में माओ वाले तौर-तरीकों को त्यागा भी नहीं गया है,  चाहे वह भ्रामक दुष्प्रचार का हो या दमन और उत्पीड़न का। चीन, कम्युनिस्ट पार्टी के नए उदित होने वाले राजकुमारों का रंगमंच बना हुआ है जिनके हाथ में शक्ति का अभूतपूर्व सकेन्द्रण हो चुका है, वह भी बिना किसी उत्तरदायित्व के। गरीबी उन्मूलन जैसे शिगूफे इनके बदनुमा चेहरों के लिए बस एक फेसलिफ्ट हैं, और कुछ नही ।

Saturday, May 8, 2021

'किसान आंदोलन’ की सहानुभूति में भी पंचायत चुनावो में ध्वस्त हुए भाकियू-रालोद के किले :

26 जनवरी की दिल्ली हिंसा के बाद भाकियू नेता राकेश टिकैत के आंसुओं पर खड़े हुए ’किसान आंदोलन’ में भाजपा विरोधियों को ’संजीवनी’ दिखाई दे रही थी, लेकिन उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों में कथित किसान हितैषी  भारतीय किसान यूनियन के नेता अपने ही गढ़ में औंधे मुंह गिर गए।


मुजफ्फरनगर जनपद में भाकियू नेता व उनके परिजनों को जिला पंचायत चुनावों में करारी हार झेलनी पड़ी। किसान आंदोलन की सहानुभूति में भी वह अपनी चुनावी नैया पार नहीं लगा सकें।


केंद्र सरकार द्वारा पारित कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे कथित किसान आंदोलन की पोल तो पहले ही खुल चुकी है। इस आंदोलन की बैसाखी पर सवार होकर भाजपा विरोधी दल तो पहले ही ताल ठोक रहे थे, वहीं आंदोलन की सूत्रधार भाकियू के सिपहसालारों ने अपनी राजनीतिक पारी का आगाज करने के लिए उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों को मुफीद अवसर माना, लेकिन चुनावों में धराशायी हो गए। किसान आंदोलन की सहानुभूति का भी वह लाभ नहीं उठा सकें। खास बात रही कि इन भाकियू नेताओं को भाजपा समर्थित उम्मीदवारों ने ही चुनावी मैदान में पटखनी दी है।


भाकियू नेता भी कर चुके हैं असफल प्रयोग

एक समय भाकियू संस्थापक महेंद्र सिंह टिकैत ने रालोद मुखिया अजित सिंह के साथ मिलकर भारतीय किसान कामगार पार्टी का गठन करके राजनीतिक पारी खेलने की असफल कोशिश की थी। इसके बाद भाकियू नेता राकेश टिकैत ने पहले खतौली विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ने की हिमाकत की, लेकिन लोगों ने उनकी जमानत भी जब्त करा दी। इसके बाद 2014 में रालोद की बैसाखी के सहारे राकेश टिकैत ने अमरोहा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन यहां भी करारी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद से ही राकेश टिकैत सीधी चुनावी लड़ाई की बजाय बैकडोर के जरिए संसद या विधानमंडल में प्रवेश करने की जुगत लगा रहे हैं।


अब भाकियू के सिपहसालार हुए ढेर

किसान आंदोलन से गमाई सियासत और किसानों की नाराजगी का फायदा उठाने की नीयत से कई भाकियू नेता मुजफ्फरनगर से जिला पंचायत चुनाव लड़ने के लिए उतरें, लेकिन किसानों ने ही उन्हें आइना दिखा दिया। भाकियू जिलाध्यक्ष धीरज लाटियान ने जिला पंचायत के वार्ड 19 से अपनी पत्नी अजेता को चुनाव लड़ाया, लेकिन वह चौथे स्थान पर आकर बुरी तरह से चुनाव हार जिला पंचायत के वार्ड 29 से भाकियू के खतौली तहसील अध्यक्ष कपिल सोम ने चुनाव लड़ा, लेकिन वह भाजपा समर्थित उम्मीदवार मनोज राजपूत से हार गए। भाकियू के मंडल उपाध्यक्ष नवीन राठी को जिला पंचायत के वार्ड दो से अपना चुनाव हार गए। भाकियू के मंडल महासचिव राजू अहलावत के परिजन सुनील अहलावत भैंसी गांव में ग्राम प्रधान का चुनाव भी हार गए।


दंगों के आरोपित की पुत्रवधू भी चुनाव हारी

2013 के मुजफ्फरनर दंगों के आरोपित गुलाम मोहम्मद जौला को भाकियू अध्यक्ष नरेश टिकैत ने हाल ही में मुजफ्फरनगर के राजकीय इंटर काॅलेज मैदान में हुई महापंचायत में मंच पर स्थान दिया था। रालोद उपाध्यक्ष जयंत चैधरी ने मंच पर ही दंगों के आरोपित गुलाम मोहम्मद के पैर छुए थे। दंगों का यह आरोपित भी अपनी पुत्रवधू को जिला पंचायत के वार्ड 22 से चुनाव नहीं जिता सका। समाजवादी पार्टी का समर्थन होने के बाद भी हार का सामना करना पड़ा। गौरतलब है कि गुलाम मोहम्मद जौली कभी भाकियू संस्थापक महेंद्र सिंह टिकैत के प्रमुख सहयोगी रहे। दंगों के बाद उसने भाकियू का साथ छोड़ दिया था और किसान महापंचायत में फिर से भाकियू में सक्रिय हो गए।


रालोद के जिलाध्यक्ष की पत्नी भी हारी

किसान आंदोलन की छाया में अपने सियासी समीकरणों को नई धार देने वाले रालोद के दिग्गज भी जिला पंचायत चुनाव में हार गए। मुजफ्फरनगर के रालोद जिलाध्यक्ष अजित राठी ने वार्ड 34 से अपनी पत्नी सविता राठी को चुनाव लड़ाया। इस वार्ड में भाजपा समर्थित उम्मीदवार वंदना वर्मा ने सविता राठी को चुनाव में हराया। अपने ही गढ़ में चुनाव हारने के बाद भाकियू व रालोद नेता सकते में हैं। भाजपा के विरोध में पूरे देश में किसानों को एकजुट करने का दावा करने वाले भाकियू नेता राकेश टिकैत के सूरमा अपने ही गढ़ में ढेर हो गए। जिला पंचायत के इन परिणामों के बाद से भाकियू नेता चुप्पी साधे हुए हैं।


किसानों की भीड़ को वोट में नहीं बदल पाए

किसानों की मांगों को लेकर भारतीय किसान यूनियन लंबे समय से आंदोलन चलाती आ रही है। भाकियू संस्थापक महेंद्र सिंह टिकैत ने करमू खेड़ी बिजलीघर से अपने किसान आंदोलन की शुरूआत की। इसके बाद मेरठ के कमिश्नरी पार्क में लाखों किसानों को जुटाया। दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर लखनऊ में कई बार आंदोलन में किसानों को इकट्ठा किया। इसके बाद भी वह और उनके पुत्र किसानों की भीड़ को अपने वोट बैंक के रूप में स्थापित नहीं कर पाए। जब-जब भाकियू नेताओं ने किसानों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करना चाहा तो उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। इससे साफ है कि किसानों को बरगला कर भीड़ तो इकट्ठा की जा सकती है, लेकिन उसका सियासी मतलब के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।


अब आंदोलन के लिए किसानों के पड़ रहे लाले

भाकियू के किसान आंदोलन से आम किसान पहले ही दूर थे, अब अन्य किसान भी आंदोलन से दूर हो गए हैं। गाजीपुर बाॅर्डर पर चल रहे आंदोलन में भाकियू नेताओं को किसानों को जुटाने में पसीने छूट रहे हैं। यहां पर लगाए गए टेंट खाली पड़े हुए हैं। भाकियू नेता राकेश टिकैत लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए तरह-तरह के बयान जारी कर रहे हैं। मुजफ्फरनगर के किसानों का भी साफ कहना है कि इस किसान आंदोलन का अब कोई मतलब नहीं रह गया है। केवल अपनी साख बचाने के लिए भाकियू नेता आंदोलन को खींच रहे हैं। देश का आम किसान इस सच्चाई को समझ चुका है। जिला पंचायत चुनावों के परिणाम इसी ओर इशारा कर रहे हैं।

नीति से परे रणनीतिक वोटिंग की जीत : पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को मिली भारी जीत के लिए तो ममता बनर्जी को भी आत्मविश्वास नहीं था। दूसरे चरण के बाद भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस-वामपंथियों के मैदान छोड़कर तृणमूल को आगे करने की रणनीति ने असर जता दिया है। हालांकि ऐसा करके कांग्रेस ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ अभियान को स्वयं ही समर्थन दे दिया-


चुनाव परिणाम आने के बाद आरामबाग में तृणमूल कार्यकर्ताओं द्वारा भाजपा कार्यालय जलाया गया

पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने अपने भाग्य का फैसला किया है। इसका पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को पूर्ण अधिकार है। लोकतंत्र में मतदाताओं का निर्णय सर्वोच्च होता है।

लेकिन यह भी तय है कि अगर किसी राज्य के लोकतांत्रिक निर्णय को शेष देश खून का घूंट पीकर स्वीकार करता है, तो उस राज्य को पूरे देश के साथ कदमताल कर सकने लायक बनने में एक-दो दशक का समय लग जाता है। लालू प्रसाद भी बिहार में चुनाव जीतते थे, और देश आह भर कर उसे स्वीकार करता था। परिणाम आज सबके सामने है।

खैर, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में दीदी को, या उनकी पार्टी को जो भारी जीत प्राप्त हुई है, उसकी पूर्व कल्पना या पूर्व अनुमान शायद ही किसी को रहा हो। सभी एग्जिट पोल, सभी राजनीतिक विश्लेषणों और जमीन से आती आवाजों को तो छोड़िए, खुद दीदी का आत्मविश्वास भी ऐसा नहीं था, जिससे अनुमान लगाया जा सकता हो कि वह इतनी बड़ी जीत प्राप्त करने जा रही हैं।

लेकिन यह अनुमान सभी को था कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट मिल कर भी दोनों में से किसी भी पक्ष के पासंग भी नहीं बन सकेंगे।

माने लड़ाई आमने-सामने की होगी।

माने दिल्ली विधानसभा चुनाव वाला मॉडल।

माने भाजपा की अप्रत्याशित हार, चाहे उसके पास कितने ही प्रतिशत वोट क्यों न हों।

माने एक परिपूर्ण रणनीति की ऐसी बिसात, जिसका कोई तोड़ नहीं था।

तोड़ इसलिए नहीं था, क्योंकि-डेमोग्राफी डेस्टिनी है। राज तो जनसंख्या करती है।

तोड़ इसलिए नहीं था, क्योंकि-दो वर्ष पूर्व 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और वाममोर्चा को 12 प्रतिशत वोट मिले थे। आज यह वोट प्रतिशत 7 दशमलव 63 है। लगभग आधा। लेकिन उनका यह वोट भाजपा को नहीं मिला है। बल्कि भाजपा को तो 2019 में जो 40 प्रतिशत वोट मिले थे, उनकी तुलना में इस बार लगभग 2 प्रतिशत कम वोट मिले हैं। मजेदार बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस का मत प्रतिशत 2019 में मिले 43.3 प्रतिशत से लगभग 5-6 प्रतिशत ज्यादा हो गया है।

तारीफ करने लायक बात है। क्योंकि यह वोट शुद्ध राजनीतिक है। कोई और सोच समझ नहीं। किसी दृष्टि, नीति, सिद्धांत की जरूरत नहीं। किसी विकास की, न्याय की कोई दरकार नहीं और न गुंडागर्दी से बचाव की कोई जरूरत। सीधे कहें- तो कोई मुद्दा ही नहीं। जाहिर है, इसे भाजपा अपनी उस तरह की नैतिक जीत भी नहीं बता सकती है, जैसी नैतिक जीत हाल के समय में फैशन में रही है।

कोई शक नहीं कि इस लड़ाई में भाजपा ने अपने सारे साधन झोंक दिए थे। हौसला, इरादा, सर्वश्रेष्ठ कार्यकर्ता मैदान में उतार दिए गए और न जाने कितने कार्यकतार्ओं को प्राण भी इस लड़ाई में गंवाने पड़े। ऐसे में यह हार भाजपा के लिए निश्चित एक भीषण क्षति है। लेकिन साथ ही तथ्य यह है कि यह एक ऐसी लड़ाई भी थी जिसे जीतने के लिए भाजपा इससे अधिक कुछ नहीं कर सकती थी।

वास्तव में बीच चुनाव में छद्म सहानुभूति कार्ड खेलने का विशेषाधिकार सिर्फ ममता बनर्जी के पास था। जब भी शक्तिशाली क्षेत्रीयतावादी कार्ड खेला जाता है, तो उसके आगे किसी राष्ट्रीय दल के पास कोई उपाय नहीं होता है। वह मात्र इस आधार पर ‘बाहरी दल’ हो जाता है कि वह अखिल भारतीय क्यों है। हालांकि सारे क्षेत्रीय दल खुद को अखिल भारतीय ही कहते हैं। लेकिन उसमें अंतर्निहित यह होता है कि धरती जिस धुरी पर घूमती है, उसकी लोकेशन उनकी क्षेत्रीय अस्मिता के अनुसार होती है। कोई अखिल भारतीय दल न उसे स्वीकार कर सकता है, न नकार सकता है।

और रणनीतिक वोटिंग। वह भी पांच करोड़ अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के साथ। ‘बहुत बड़ी संख्या वाले’ ‘अल्पसंख्यक’ वोटबैंक की मौजूदगी हर किस्म के तुष्टिकरण को एक कारगर हथियार बना देती है, और इसका भी प्रतिकार कर सकना राजनीतिक तौर पर सहज नहीं होता है।

इच्छा मृत्यु की कांग्रेस की इच्छा पूरी करने के मतदाताओं के फैसले का भी सम्मान किया जाना चाहिए। वास्तव में यह चुनाव ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के आगमन की सूचना देने वाले हूटर की तरह है। यह सहज बात नहीं है। बात यह है कि पूरे देश में भाजपा या तो सत्ता में है, या विपक्ष में। कोई अखिल भारतीय पार्टी उनके सामने टक्कर में नहीं है।

फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि भाजपा के सामने खाली मैदान है। खास तौर पर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का परिणाम इस बात का सबूत है कि भाजपा का जो भी शत्रु है, वह अदृश्य है, खुल कर सामने नहीं आता है, और उसके पास किसी भी ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री मनोनीत कर सकने की क्षमता है।

इसे ऐसे समझिए। हाल ही में देश भर में कोरोना की स्थिति को लेकर भारी विवाद हुआ। उसके पहले वैक्सीन का विरोध किया गया, उसकी उपलब्धता को संकट में डालने का प्रयास किया गया और उसके खिलाफ जमकर दुष्प्रचार किया गया। आर्थिक समझ की कमी किसी को भी वामपंथ की तरफ धकेल देती है, और इसी दौर में सोशल मीडिया पर यह ज्ञान बड़े पैमाने पर बांटा गया कि सरकार सड़क, कृषि, शिक्षा, सुरक्षा और यातायात तक पर खर्च करना बंद कर दे और अस्पताल खोले। बिना सड़क के अस्पताल क्या करेगा, या बिना शिक्षा के अस्पताल कैसे बनेगा- इन सवालों तक को शोर में दबा दिया गया। इस सारे टूल किट की अंत परिणिति को इस दिशा में मोड़ दिया गया कि भाजपा के और विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव प्रचार के कारण ही यह स्थिति बन रही है।

क्षेत्रीयता और तुष्टिकरण के कार्ड की तरह, इसका भी प्रतिकार कर सकना राजनीतिक तौर जोखिम भरा हो गया।

इससे भाजपा विरोध के प्रयासों को राजनैतिक और धारणागत मैदानों में वह अवसर मिल गया, जिसके बिना उनके लिए चुनाव जीतना संभव नहीं था।

यह टूल किट किसने चलाया? किसी गलतफहमी की गुंजाइश नहीं है। तृणमूल कांग्रेस इसकी लाभार्थी जरूर रही, लेकिन ठीक वैसे ही जैसे कोई प्यादा आगे बढ़कर वजीर हो जाता है। लेकिन अंतत: वह होता एक प्यादा ही है। और वह कभी यह नहीं जान पाता है कि उसे वजीर किसने और क्यों बनाया है। वह वजीर बन कर ही प्रसन्न हो लेता है।

ममता जी मुख्यमंत्री बन ही जाएंगी, प्रसन्न भी रह सकेंगी, और प्लास्टर भी अब तो कटवा ही लेंगी- यह कामना की जानी चाहिए। बाकी तो 2 मई के बाद उनके मुख्यमंत्री बनने की स्थिति में विरोधियों का क्या होगा, इसकी धमकी तो उन्होंने खुलेआम दी ही थी। यह धमकी कितनी कारगर है, इसकी झलक चुनाव परिणाम सामने आने के बाद आरामबाग में भाजपा दफ्तर फूंक कर तृणमूल कार्यकर्ताओं ने दे ही दी है।