Monday, July 12, 2021

उनकी आंखों में तैरता था अखंड भारत का सपना

 

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उन सेनानियों में शुमार हैं ने अपने निजी स्वार्थों को दरकिनार करते हुए राष्ट्रहित में अपने जीवन की आहुति स्वतंत्रतारूपी यज्ञ में डालकर राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया। अखंड भारत के समर्थक रहे डॉ. मुखर्जी ने कश्मीर में प्रवेश के लिए परमिट के नेहरू के प्रावधान के विरुद्ध आंदोलन किया और देश की अखंडता के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया

भूमि,जन तथा संस्कृति के समन्वय से राष्ट्र बनता है। संस्कृति राष्ट्र का शरीर, चिति उसकी आत्मा तथा विराट उसका प्राण है। भारत एक राष्ट्र है और वर्तमान समय में एक शक्तिशाली भारत के रूप में उभर रहा है। राष्ट्र में रहने वाले जनों का सबसे पहला दायित्व होता है कि वो राष्ट्र के प्रति ईमानदार तथा वफादार रहे। प्रत्येक नागरिक के लिए राष्ट्र सर्वोपरि होता है, जब भी कभी अपने निजी हित, राष्ट्रहित से टकराएं, तो राष्ट्रहित को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए, यह हर एक राष्ट्रभक्त की निशानी होती है। भारत सदियों तक गुलाम रहा और उस गुलाम भारत को आजाद करवाने के लिए असंख्य वीरों ने अपने निजी स्वार्थों को दरकिनार करते हुए राष्ट्रहित में अपने जीवन की आहुति स्वतंत्रतारूपी यज्ञ में डालकर राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया। ऐसे ही महापुरुष थे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी।


यह कितना दुखद था कि माता वैष्णोदेवी भी परमिट मांगती थी। डल झील भी पूछती तू किस देश का वासी है, बर्फानी बाबा अमरनाथ के दर्शन के लिए इंतजार करना पड़ता था, जिस प्रकार कैलाश मानसरोवर के लिए करना पड़ता है कि आखिर मेरा नंबर कब आएगा। अगर देश के पास भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं होते तो कश्मीर का विषय चर्चा में नहीं आता। जिस प्रकार लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने खंड-खंड हो रहे देश को अखंड बनाया, उसी प्रकार डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अखंड भारत की संकल्पना को साकार करने के लिए अपना पूरा जीवन होम कर दिया।


राजनीति राष्ट्रसेवा का साधन

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी केवल राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे। उनके जीवन से ही राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को सीख लेनी चाहिए, उनका स्वयं का जीवन प्रेरणादायी, अनुशासित तथा निष्कलंक था। राजनीति उनके लिए राष्ट्र की सेवा का साधन थी, उनके लिए सत्ता केवल सुख के लिए नहीं थी। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी राजनीति में क्यों आए? इस प्रश्न का उत्तर है, उन्होंने राष्ट्रनीति के लिए राजनीति में पदार्पण किया। वे देश की सत्ता चाहते तो थे, किंतु किसके हाथों में? उनका विचार था कि सत्ता उनके हाथों में जानी चाहिए, जो राजनीति का उपयोग राष्ट्रनीति के लिए कर सकें।


डॉ. मुखर्जी 33 वर्ष की आयु में ही कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए और विश्व का सब से युवा कुलपति होने का सम्मान उन्हें प्राप्त हुआ। वे 1938 तक इस पद पर रहे। बाद में उनकी राजनीति में जाने की इच्छा के कारण उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी और कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि के रूप में बंगाल विधानपरिषद का सदस्य चुना गया, लेकिन कांग्रेस द्वारा विधायिका के बहिष्कार का निर्णय लेने के पश्चात उन्होंने  त्यागपत्र दे दिया। बाद में डॉ. मुखर्जी ने स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और निर्वाचित हुए।

1943 में बंगाल में पड़े अकाल के दौरान श्यामा प्रसाद जी का मानवतावादी पक्ष निखरकर सामने आया, जिसे बंगाल के लोग कभी भुला नहीं सकते। बंगाल पर आए संकट की ओर देश का ध्यान आकर्षित करने के लिए और अकाल-ग्रस्त लोगों के लिए व्यापक पैमाने पर राहत जुटाने के लिए उन्होंने प्रमुख राजनेताओं, व्यापारियों, समाजसेवी व्यक्तियों को जरुरतमंद और पीड़ितों को राहत पहुंचाने के उपाय खोजने के लिए आमंत्रित किया। फलस्वरूप बंगाल राहत समिति गठित की गई और हिन्दूमहासभा राहत समिति भी बना दी गई। श्यामा प्रसाद जी इन दोनों ही संगठनों के लिए प्रेरणा के स्रोत थे। लोगों से धन देने की उनकी अपील का देशभर में इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि बड़ी-बड़ी राशियां इस प्रयोजनार्थ आनी शुरू हो गई। इस बात का श्रेय उन्हीं को जाता है कि पूरा देश एकजुट होकर राहत देने में लग गया और लाखों लोग मौत के मुंह में जाने से बच गए। वह केवल मौखिक सहानुभूति प्रकट नहीं करते थे, बल्कि ऐसे व्यावहारिक सुझाव भी देते थे, जिनमें सहृदय मानव-हृदय की झलक मिलती, जो मानव पीड़ा को हरने के लिए सदैव लालायित और तत्पर रहता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्होंने संसद में एकबार कहा था, ‘‘अब हमें 40 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं, पता नहीं भविष्य में लोकसभा के सदस्यों के भत्ते क्या होंगे। हमें स्वेच्छा से इस दैनिक भत्ते में 10 रुपये प्रतिदिन की कटौती करनी चाहिए और इस कटौती से प्राप्त धन को हमें इन महिलाओं और बच्चों (अकालग्रस्त क्षेत्रों के) के रहने के लिए मकान बनाने और खाने-पीने की व्यवस्था करने के लिए रख देना चाहिए।’’


गुरुजी के परामर्श से जनसंघ की स्थापना

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अंतरिम सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया। लेकिन नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली के बीच हुए समझौते के पश्चात 6 अप्रैल, 1950 को उन्होंने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गुरु गोलवलकर जी से परामर्श लेकर मुखर्जी ने 21 अक्टूबर, 1951 को जनसंघ की स्थापना की। भारत में जिस समय जनसंघ की स्थापना हुई, उस समय देश विपरीत परिस्थितयों से गुजर रहा था। जनसंघ का उदेश्य साफ था। वह अखंड भारत की कल्पना कर कार्य करना चाहता था। वह भारत को खंडित भारत करने के पक्ष में नहीं था। जनसंघ का स्पष्ट मानना था कि भारत एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने आएगा। डॉ. मुखर्जी के अनुसार अखंड भारत देश की भौगोलिक एकता का ही परिचायक नहीं है, अपितु जीवन के भारतीय दृष्टिकोण का द्योतक है, जो अनेकता में एकता का दर्शन करता है। जनसंघ के लिए अखंड भारत कोई राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि यह तो हमारे संपूर्ण जीवन दर्शन का मूलाधार है।


देश में पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर, 1951 से 21 फरवरी, 1952 तक हुआ। इन आम चुनावों में जनसंघ के 3 सांसद चुने गए, जिनमें एक डॉ. मुखर्जी भी थे। तत्पश्चात उन्होंने संसद के अंदर 32 लोकसभा और 10 राज्यसभा सांसदों के सहयोग से नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी का गठन किया। डॉ. मुखर्जी सदन में नेहरू की नीतियों पर तीखा प्रहार करते थे। जब संसद में बहस के दौरान पंडित नेहरू ने भारतीय जनसंघ को कुचलने की बात कही, तब डॉ. मुखर्जी ने कहा, ‘‘हम देश की राजनीति से इस कुचलने वाली मनोवृत्ति को कुचल देंगे।’’


भारत विभाजन के विरुद्ध

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत का विभाजन नहीं होने देना चाहते थे। इसके लिए वे महात्मा गांधी के पास भी गए थे। परंतु गांधी जी का कहना था कि कांग्रेस के लोग उनकी बात सुनते ही नहीं। जब देश का विभाजन अनिवार्य जैसा हो गया, तो डॉ. मुखर्जी ने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं के हितों की उपेक्षा न हो। उन्होंने बंगाल के विभाजन के लिए जोरदार प्रयास किया, जिससे मुस्लिम लीग का पूरा प्रांत हड़पने का मंसूबा सफल नहीं हो सका। श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रभक्ति एवं देशप्रेम की उस महान परंपरा के वाहक थे, जो देश की परतंत्रता के युग तथा स्वतंत्रता के काल में देश की एकता, अखंडता तथा विघटनकारी शक्तियों के विरुद्ध सतत जूझते रहे। उनका जीवन भारतीय धर्म तथा संस्कृति के लिए पूर्णतः समर्पित था। वे एक महान शिक्षाविद तथा प्रखर राष्ट्रवादी थे। पारिवारिक परिवेश शिक्षा, संस्कृति तथा हिन्दुत्व के प्रति अनुराग उन्हें परिवार से मिला था।


डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी‘ एक भारत’ की कल्पना में विश्वास रखते थे। हमारे स्वाधीनता सेनानियों और संविधान निर्माताओं ने भी ऐसे ही भारत की कल्पना की थी। मगर जब आजाद भारत की कमान संभालने वालों का बर्ताव इस सिद्धांत के खिलाफ हो चला, तो डॉ. साहब ने बहुत मुखरता और प्रखरता के साथ इसका विरोध किया। महाराजा हरि सिंह के अधिमिलन पत्र अर्थात् 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर हस्ताक्षार करते ही समूचा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग हो गया। बाद में संविधान के अनुच्छेद एक के माध्यम से जम्मू कश्मीर भारत का 15वां राज्य घोषित हुआ। ऐसे में जम्मू कश्मीर में भी शासन व संविधान व्यवस्था उसी प्रकार चलनी चाहिए थी, जैसे कि भारत के किसी अन्य राज्य में। जब ऐसा नहीं हुआ तो मुखर्जी ने अप्रैल 1953 में पटना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि, “जम्मू एवं कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला और उनके मित्रों को यह साबित करना होगा कि भारतीय संविधान जिसके अंतर्गत देश के पैंतीस करोड़ लोग, जिनमें चार करोड़ लोग मुसलमान भी हैं, वे खुश रह सकते हैं, तो जम्मू-कश्मीर में रहने वाले 25 लाख मुसलमान क्यों नहीं?” उन्होंने शेख को चुनौती देते हुए कहा था कि, “यदि वह सेकुलर हैं, तो वह संवैधानिक संकट क्यों उत्पन्न करना चाहते हैं। आज जब राज्य का एक बड़ा हिस्सा अपने आप को संवैधानिक व्यवस्था से जोड़ना चाहता है, तो शेख अब्दुल्ला इसमें रोड़े क्यों अटका रहे हैं?” उनके द्वारा उठाये गए सवालों के जवाब न शेख के पास थे और न पंडित नेहरू के पास। इसीलिए दोनों ने कभी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी से सीधे बात करने की कोशिश भी नहीं की।

अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के विरुद्ध सत्याग्रह

अनुच्छेद 370 के राष्ट्रघातक प्रावधानों को हटाने के लिए भारतीय जनसंघ ने हिन्दू महासभा और रामराज्य परिषद के साथ सत्याग्रह आरंभ किया। डॉ. मुखर्जी इस प्रण पर सदैव अडिग रहे कि जम्मू एवं कश्मीर भारत का एक अविभाज्य अंग है। उन्होंने सिंह-गर्जना करते हुए कहा था कि, “एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान, नहीं चलेगा”।उस समय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 में यह प्रावधान किया गया था कि कोई भी भारत सरकार से बिना परमिट लिए हुए जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता। डॉ. मुखर्जी इस प्रावधान के सख्त खिलाफ थे। उनका कहना था कि, “नेहरू ने ही ये बार-बार ऐलान किया है कि जम्मू व कश्मीर राज्य का भारत में 100% विलय हो चुका है, फिर भी यह देख कर हैरानी होती है कि इस राज्य में कोई भारत सरकार से परमिट लिए बिना दाखिल नहीं हो सकता। मैं नहीं समझता कि भारत सरकार को यह हक है कि वह किसी को भी भारतीय संघ के किसी हिस्से में जाने से रोक सके, क्योंकि खुद नेहरू ऐसा कहते हैं कि इस संघ में जम्मू व कश्मीर भी शामिल है।”

उन्होंने इस प्रावधान के विरोध में भारत सरकार से बिना परमिट लिए हुए जम्मू व कश्मीर जाने की योजना बनाई। इसके साथ ही उनका अन्य मकसद था वहां के वर्तमान हालात से स्वयं को वाकिफ कराना, क्योंकि शेख अब्दुल्ला की सरकार ने वहां के सुन्नी कश्मीरी मुसलमानों के बाद दूसरे सबसे बड़े स्थानीय भाषाई डोगरा समुदाय के लोगों पर असहनीय जुल्म ढाना शुरू कर दिया था। नेशनल कांफ्रेंस का डोगरा-विरोधी उत्पीड़न वर्ष 1952 के शुरुआती दौर में अपने चरम पर पहुंच गया था। डोगरा समुदाय के आदर्श पंडित प्रेमनाथ डोगरा ने बलराज मधोक के साथ मिलकर ‘जम्मू व कश्मीर प्रजापरिषद् पार्टी’की स्थापना की थी। इस पार्टी ने डोगरा अधिकारों के अलावा जम्मू व कश्मीर राज्य के भारत संघ में पूर्ण विलय की लड़ाई, बिना रुके और बिना थके लड़ी।

संविधान की रक्षा या प्राणोत्सर्ग का प्रण

डॉ. मुखर्जी ने भारतीय संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को कहा था कि ‘या तो मैं संविधान की रक्षा करूंगा, नहीं तो अपने प्राण दे दूंगा’। हुआ भी यही। 8 मई, 1953 को सुबह 6:30 बजे दिल्ली रेलवे स्टेशन से पैसेंजर ट्रेन में अपने समर्थकों के साथ सवार होकर डॉ. मुखर्जी पंजाब के रास्ते जम्मू के लिए निकले। उनके साथ बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, टेकचंद, गुरुदत्त वैद्य और कुछ पत्रकार भी थे। रास्ते में हर जगह डॉ. मुखर्जी की एक झलक पाने एवं उनका अभिवादन करने के लिए लोगों का जनसैलाब उमड़ पड़ता था। डॉ. मुखर्जी ने जालंधर के बाद बलराज मधोक को वापस भेज दिया और अमृतसर के लिए ट्रेन पकड़ी। 11 मई, 1953 को कुख्यात परमिट सिस्टम का उलंघन करने पर कश्मीर में प्रवेश करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और गिरफ्तारी के दौरान ही रहस्मयी परिस्थितियों में 23 जून, 1953 को उनकी मौत हो गई। डॉ. मुखर्जी की माताजी ने नेहरू के 30 जून, 1953 के शोकसंदेश का 4 जुलाई,1953 को उत्तर देते हुए पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने उनके बेटे की रहस्मयी परिस्थितियों में हुई मौत की जांच की मांग की। जवाब में पंडित नेहरु ने जांच की मांग को ख़ारिज कर दिया। उन्होंने जवाब देते हुए यह लिखा कि, “मैंने कई लोगों से इस बारे में पता लगवाया है, जो इस बारे में काफी कुछ जानते थे और उनकी मौत में किसी प्रकार का कोई रहस्य नहीं था।”

उनके बिलदान पर शोक व्यक्त करते हुए तत्कालीन लोकसभा के अध्यक्ष श्री जी.वी. मावलंकर ने कहा था, ‘‘वे हमारे महान देशभक्तों में से एक थे और राष्ट्र के लिए उनकी सेवाएं भी उतनी ही महान थीं। जिस स्थिति में उनका निधन हुआ, वह स्थिति बड़ी ही दुःखदायी है। उनकी योग्यता, उनकी निष्पक्षता, अपने कार्यभार को कौशल्यपूर्ण निभाने की दक्षता, उनकी वाक्पटुता और सबसे अधिक उनकी देशभक्ति एवं अपने देशवासियों के प्रति उनके लगाव ने उन्हें हमारे सम्मान का पात्र बना दिया।’’

उनकी मृत्यु के पश्चात टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा अत्यंत उल्लेखनीय श्रद्धांजलि दी गई, जिसमें कहा गया कि ‘‘डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सरदार पटेल की प्रतिमूर्ति थे’’। यह एक अत्यंत उपर्युक्त श्रद्धांजलि थी, क्योंकि डॉ. मुखर्जी नेहरू सरकार पर बाहर से उसी प्रकार का संतुलित और नियंत्रित प्रभाव बनाए हुए थे, जिस प्रकार का प्रभाव सरकार पर अपने जीवनकाल में सरदार पटेल का था। राष्ट्र-विरोधी और एकदलीय शासन पद्धति की सभी नीतियों तथा प्रवृत्तियों के प्रति उनकी रचनात्मक एवं राष्ट्रवादी विचारधारा तथा उनके प्रबुद्ध एवं सुदृढ़ प्रतिरोध ने उन्हें देश में स्वतंत्रता और लोकतंत्र का प्राचीर बना दिया था। संसद में विपक्ष के नेता के रूप में उनकी भूमिका से उन्हें ‘‘संसद का शेर’’ की उपाधि अर्जित हुई।

मोदी सरकार ने डॉ. मुखर्जी के घोषवाक्य पर किया अमल

भारतीय जनसंघ से लेकर भाजपा के प्रत्येक घोषणापत्र में अपने बलिदानी नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के इस घोषवाक्य को, कि ‘हम संविधान की अस्थायी धारा 370 को समाप्त करेंगे’, सदैव लिखा जाता रहा। समय आया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्होंने स्वयं डॉ. मुरली मनोहर जोशी के साथ भारत की यात्रा करते हुए श्रीनगर के लालचौक पर तिरंगा फहराया था और गृह मंत्री अमित शाह ने 5 अगस्त, 2019 कोधारा 370 को राष्ट्रहित में समाप्त करने के निर्णय को दोनों सदनों से पारित कर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि दी। वे महापुरुष बहुत भाग्यशाली होते हैं, जिनकी आने वाली पीढ़ी अपने पूर्वर्जों की कही गई बातों को साकार करती है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भाग्यशाली हैं कि उनके विचारों के संवाहक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह सहित पूरे मंत्रिमंडल ने धारा 370 को समाप्त कर दुनिया को बता दिया:-

जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वो कश्मीर हमारा है,

जो कश्मीर हमारा है, वह सारा का सारा है।

सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धांतों के पक्के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सदैव राष्ट्रीय एकता की स्थापना को ही अपना प्रथम लक्ष्य रखा था। संसद में दिए अपने भाषण में उन्होंने स्पष्ट कहा था कि राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है। एक कर्मठ और जुझारू व्यक्तित्व वाले मुखर्जी अपनी मृत्यु के दशकों बाद भी अनेक भारतवासियों के आदर्श और पथप्रदर्शक हैं। जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय करने का श्रेय सरदार पटेल को जाता है, ठीक उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकांश भागों को भारत का अभिन्न अंग बनाये रखने की सफलता प्राप्ति में डॉ. मुखर्जी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। उन्हें किसी दल की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता,क्योंकि उन्होंने जो कुछ किया,देश के लिए किया और इसी भारतभूमि के लिए अपना बलिदान तक दे दिया।

वे सच्चे अर्थों में राष्ट्रधर्म का पालन करने वाले साहसी, निडर एवं जुझारु कर्मयोद्धा थे। जीवन में जब भी निर्माण की आवाज उठेगी, पौरुष की मशाल जगेगी, सत्य की आंख खुलेगी एवं अखंड राष्ट्रीयता की बात होगी, तो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अवदान को सदा याद किया जायेगा।


Sunday, June 13, 2021

चीन : गरीबी उन्मूलन करने का दिखावा,मात्र एक स्वांग!

चीन ने दावा किया है कि उसने पिछले 8 वर्षों में 248 अरब डॉलर खर्च कर गरीबी के नवनिर्धारित मानकों के अनुसार 9.89 करोड़ गरीब ग्रामीण आबादी को गरीबी से बाहर निकाला है। हालांकि अर्थशास्त्री इन दावों की बखिया उधेड़ रहे हैं। माना जा रहा है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के शताब्दी वर्ष के अवसर पर जुलाई में होने वाले कामों के मद्देनजर यह शिगूफा छोड़ा गया है।

इस वर्ष फरवरी माह के अंत में एक भव्य समारोह में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने घोषणा की कि उनके देश ने नितांत गरीबी के उन्मूलन का "चमत्कार" कर दिखाया है। चीन की सरकार का दावा है कि पिछले आठ साल की अवधि में 248 अरब डॉलर खर्च कर, ‘नव-निर्धारित’ गरीबी के मानदंडों के अनुसार 9.89 करोड़ गरीब ग्रामीण आबादी को गरीबी से बाहर निकाला गया है, और इसके द्वारा 832 गरीबी से त्रस्त काउंटीज के साथ-साथ 128,000 गांवों को गरीबी रेखा से नीचे वाली सूची से हटा दिया गया है। परन्तु शी जिनपिंग और चीन की सरकार के इस दावे को संयुक्त राष्ट्र के एक पूर्व अर्थशास्त्री द्वारा किए गए एक अध्ययन द्वारा चुनौती दी गई है, जिसमें तर्क दिया गया है कि बीजिंग ने गरीब होने के अर्थ की एक सीमित और अनम्य परिभाषा का उपयोग किया है।

दावों पर शंका !

FT द्वारा प्रकाशित एक समाचार के अनुसार चीन में संयुक्त राष्ट्र के पूर्व वरिष्ठ अर्थशास्त्री बिल बिकलेस ने एक हालिया प्रकाशित शोध में बताया  है, कि चीन ने ऐसे पर्याप्त प्रयास ही नहीं किये हैं, जिससे कि वह दावा कर सके कि उसने गरीबी पर अंतिम जीत हासिल कर ली है। फाइनेंसियल टाइम्स  के अनुसार बिक्लेस ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि “चीन ने गरीबी को नहीं मिटाया है, और यह तब तक संभव भी नहीं है, जब तक कि वह ऐसी व्यवहार्य प्रणालियां उपयोग नहीं करता जो चीन में गरीब लोगों की पहचान कर सकें, साथ ही समस्त नागरिकों के लिए एक सुरक्षा जाल प्रदान नहीं करता है, जो मौत, गंभीर बीमारी, काम के नुकसान या अन्य किसी आघात की चपेट में हैं।  उल्लेखनीय है कि 2017 में उन्नीसवीं पार्टी कांग्रेस में चीन की सरकार के लिए कुछ महत्वपूर्ण लक्ष्य निर्धारित किये गये थे, जिनमें से एक कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के शताब्दी वर्ष अर्थात 2021 में गरीबी के समूल उन्मूलन का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। और, इस शताब्दी वर्ष के जुलाई माह में होने वाले कार्यक्रमों द्वारा इस विफल विचारधारा में प्राण फूंकने की कोशिश के तहत जोर-शोर से इस उपलब्धि का डंका विश्व भर में पीटा जा रहा है|

चीन में आखिर गरीब है कौन?

स्विस एजेंसी फॉर डेवलपमेंट एंड कोऑपरेशन द्वारा वित्त पोषित इस रिपोर्ट में बिकलेस बताते हैं कि समूल गरीबी उन्मूलन के लिए बीजिंग ने जिन स्थिर परिभाषाओं का इस्तेमाल किया, वे गरीबी की सतत परिवर्तनशील वास्तविकताओं के विपरीत थीं। चीन की अर्थव्यवस्था पर गहन अध्ययन करने वाले विश्लेषकों का भी मानना है कि  चीन के "गरीबी के खिलाफ लड़ाई" को जीतने के दावे संदेहास्पद हैं। पहला तो यह चीन गरीबी को विशुद्ध रूप से ग्रामीण परिघटना मानता है, भले ही उसकी 60 प्रतिशत से अधिक आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है। और जब चीन की सरकार गरीबी उन्मूलन की बात करती है तो वह भारी मात्रा में बेरोजगार बेहाल शहरी दरिद्रों को पूर्ण रूप से अनदेखा कर देती है। चीन के अनेकों प्रान्तों में  घोर अभाव के ढेरों मामले देखे जा सकते हैं। इसके साथ ही यह भी देखा गया है कि चीन ने गरीबी की अपनी परिभाषा में इसका निम्न स्तर निर्धारित किया है।


समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व बैंक की वैश्विक सीमा 1.90 डॉलर प्रतिदिन की तुलना में, चीन द्वारा अत्यधिक गरीबी की सीमा  मौजूदा विनिमय दरों पर 1.69 डॉलर प्रति दिन के स्तर पर निर्धारित की है। परन्तु यह मामला यहां भी पूर्णत: भ्रामक हो जाता है। गौरतलब है कि 2019 में, चीन के सांख्यिकी ब्यूरो ने ग्रामीण गरीबी को 2,300 युआन अथवा 356 डॉलर प्रतिवर्ष की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय से कम के रूप में परिभाषित किया था। 2020 में इसे बढ़ाकर 4000 युआन अर्थात 620 डॉलर प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति यानी 1.69 डॉलर प्रति दिन से कम आय के रूप में परिभाषित कर दिया  गया, जो कि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। परन्तु गड़बड़ी कहीं और ही है! यह सामान्यत: माना जा रहा है कि गरीबी रेखा विश्वबैंक की 1.90  डॉलर प्रति दिन की सीमा से कम के स्तर पर  है। परन्तु यह दर सार्वत्रिक उपयोग के लिए नहीं है।


विश्व बैंक ने विकास के अलग-अलग स्तरों पर मौजूद देशों के लिए इसकी अलग-अलग सीमाएं निर्धारित की हैं। 1.90  डॉलर प्रति दिन की सीमा केवल विकास के तुलनात्मक रूप से निचले पायदान के देशों के लिए है, वहीं अमेरिका जैसे उच्च सकल घरेलू उत्पाद वाले देश के लिए गरीबी रेखा, चार सदस्यों वाले परिवार के लिए 72 डॉलर प्रतिदिन से कम है, जो कि एक निम्न आय वाले देश के लिए एक स्वप्न की तरह है। इसी प्रकार अगर हम  चीन की बात करें तो वह जिस आर्थिक स्तर का दावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करता है, उस के अनुसार उसे उच्च-मध्यम आय वाले देशों में रखा जाना चाहिए जिसके लिए अर्थशास्त्रियों द्वारा गरीबी रेखा की सीमा 5.50 डॉलर प्रति दिन से कम सुझाई गई है। अगर यह तार्किक दृष्टिकोण से सर्वथा उपयुक्त पैमाना चीन पर लागू किया जाता है, तो देखना होगा कि चीन में कितने सौभाग्यशाली लोग ऐसे होंगे जो इस रेखा से ऊपर होंगे?

आंकड़ों की दरिद्रता !

एक तथ्य यह भी है कि इस चर्चा में प्रतीत हो रहा है कि बदहाली केवल गरीबी रेखा से नीचे वालों की ही है, परन्तु ऐसा भी नहीं है। एक बहुत बड़ा वर्ग, जो आंकड़ों के उलटफेर द्वारा किनारे पर फेंक दिया गया है, देखा जाए तो वह भी खतरे में है। ऐसी आबादी जो इस रेखा से नाममात्र को ऊपर है, वह केवल चीनी शासकों के दंभ की संतुष्टि भर करने के लिए है। वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार कई आर्थिक विश्लेषकों का आकलन है कि चीन के ऐसे कई नागरिक हैं, जो गरीबी रेखा से तो ऊपर हैं, पर उनका अस्तित्व के लिए संघर्ष किसी भी तरह से कम पीड़ादायक नहीं है। पिछले वर्ष चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग ने भी एक सार्वजनिक टिप्पणी में स्वीकार किया था, कि लगभग 60 करोड़ चीनी नागरिक, जो इस देश की  आबादी का लगभग 40  प्रतिशत हैं, प्रतिमाह 1000 युआन अर्थात 155 डॉलर  पर जीवन निर्वाह कर रहे हैं।


वाशिंगटन पोस्ट एक और महत्वपूर्ण संदेह को उठाता है। उसके अनुसार कोविड महामारी के आघात से उबरने के बाद इस साल चीन की अर्थव्यवस्था के लगभग 8 प्रतिशत की दर से बढ़ने की उम्मीद है, परन्तु उपभोक्ता द्वारा किये जाने वाले परिव्यय में पूरी तरह से सुधार नहीं आया है। साथ ही विश्लेषकों का मानना है कि बेरोजगारी दर जो चीनी अधिकारियों की रिपोर्ट दिखाती है, उसकी तुलना में बहुत अधिक है। इस समय चीन के नव स्नातकों को नौकरी खोजने के लिए संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है, इसके साथ ही साथ गिरती जन्म दर विकास की गति पर भविष्य में नकारात्मक प्रभाव की आशंका दर्शाती है। देश में व्यापक आय असमानताएं भी मौजूद हैं, और लगातार बढ़ती जा रही हैं, और साथ ही चीन के नागरिकों का आक्रोश भी। चीन के माइक्रोब्लॉगिंग साईट वीबो पर चीनियों के अनेक तरह की टिप्पणियों की बाढ़ आई हुई है, जिनमें वह चीनी सरकार पर व्यंग्य कर रहे हैं और उनसे तल्ख़ प्रश्न भी पूछ रहे हैं। गरीबी को खत्म करने के लिए आधिकारिक मानक क्या है? मैं अब भी सड़कों पर लोगों को भीख मांगते क्यों देख रहा हूं? परन्तु चीन में सरकार को जवाब देने के लिए बाध्य भी नहीं किया जा सकता!


पिछले आठ वर्षों में, जब से शी सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख बने हैं, सरकार ने विश्व भर में एक नवसाम्राज्यवाद के विस्तार का अभियान छेड़ दिया है। शी की महत्वाकांक्षाएं असीमित हैं। वह चीन के सर्वोपरि नेता तो हैं परन्तु अपने प्रभाव की दृष्टि से वह  चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक माओत्से तुंग को भी पीछे छोड़ने की इच्छा रखते हैं। और इस क्रम में माओ वाले तौर-तरीकों को त्यागा भी नहीं गया है,  चाहे वह भ्रामक दुष्प्रचार का हो या दमन और उत्पीड़न का। चीन, कम्युनिस्ट पार्टी के नए उदित होने वाले राजकुमारों का रंगमंच बना हुआ है जिनके हाथ में शक्ति का अभूतपूर्व सकेन्द्रण हो चुका है, वह भी बिना किसी उत्तरदायित्व के। गरीबी उन्मूलन जैसे शिगूफे इनके बदनुमा चेहरों के लिए बस एक फेसलिफ्ट हैं, और कुछ नही ।

Saturday, May 8, 2021

'किसान आंदोलन’ की सहानुभूति में भी पंचायत चुनावो में ध्वस्त हुए भाकियू-रालोद के किले :

26 जनवरी की दिल्ली हिंसा के बाद भाकियू नेता राकेश टिकैत के आंसुओं पर खड़े हुए ’किसान आंदोलन’ में भाजपा विरोधियों को ’संजीवनी’ दिखाई दे रही थी, लेकिन उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों में कथित किसान हितैषी  भारतीय किसान यूनियन के नेता अपने ही गढ़ में औंधे मुंह गिर गए।


मुजफ्फरनगर जनपद में भाकियू नेता व उनके परिजनों को जिला पंचायत चुनावों में करारी हार झेलनी पड़ी। किसान आंदोलन की सहानुभूति में भी वह अपनी चुनावी नैया पार नहीं लगा सकें।


केंद्र सरकार द्वारा पारित कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे कथित किसान आंदोलन की पोल तो पहले ही खुल चुकी है। इस आंदोलन की बैसाखी पर सवार होकर भाजपा विरोधी दल तो पहले ही ताल ठोक रहे थे, वहीं आंदोलन की सूत्रधार भाकियू के सिपहसालारों ने अपनी राजनीतिक पारी का आगाज करने के लिए उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों को मुफीद अवसर माना, लेकिन चुनावों में धराशायी हो गए। किसान आंदोलन की सहानुभूति का भी वह लाभ नहीं उठा सकें। खास बात रही कि इन भाकियू नेताओं को भाजपा समर्थित उम्मीदवारों ने ही चुनावी मैदान में पटखनी दी है।


भाकियू नेता भी कर चुके हैं असफल प्रयोग

एक समय भाकियू संस्थापक महेंद्र सिंह टिकैत ने रालोद मुखिया अजित सिंह के साथ मिलकर भारतीय किसान कामगार पार्टी का गठन करके राजनीतिक पारी खेलने की असफल कोशिश की थी। इसके बाद भाकियू नेता राकेश टिकैत ने पहले खतौली विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ने की हिमाकत की, लेकिन लोगों ने उनकी जमानत भी जब्त करा दी। इसके बाद 2014 में रालोद की बैसाखी के सहारे राकेश टिकैत ने अमरोहा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन यहां भी करारी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद से ही राकेश टिकैत सीधी चुनावी लड़ाई की बजाय बैकडोर के जरिए संसद या विधानमंडल में प्रवेश करने की जुगत लगा रहे हैं।


अब भाकियू के सिपहसालार हुए ढेर

किसान आंदोलन से गमाई सियासत और किसानों की नाराजगी का फायदा उठाने की नीयत से कई भाकियू नेता मुजफ्फरनगर से जिला पंचायत चुनाव लड़ने के लिए उतरें, लेकिन किसानों ने ही उन्हें आइना दिखा दिया। भाकियू जिलाध्यक्ष धीरज लाटियान ने जिला पंचायत के वार्ड 19 से अपनी पत्नी अजेता को चुनाव लड़ाया, लेकिन वह चौथे स्थान पर आकर बुरी तरह से चुनाव हार जिला पंचायत के वार्ड 29 से भाकियू के खतौली तहसील अध्यक्ष कपिल सोम ने चुनाव लड़ा, लेकिन वह भाजपा समर्थित उम्मीदवार मनोज राजपूत से हार गए। भाकियू के मंडल उपाध्यक्ष नवीन राठी को जिला पंचायत के वार्ड दो से अपना चुनाव हार गए। भाकियू के मंडल महासचिव राजू अहलावत के परिजन सुनील अहलावत भैंसी गांव में ग्राम प्रधान का चुनाव भी हार गए।


दंगों के आरोपित की पुत्रवधू भी चुनाव हारी

2013 के मुजफ्फरनर दंगों के आरोपित गुलाम मोहम्मद जौला को भाकियू अध्यक्ष नरेश टिकैत ने हाल ही में मुजफ्फरनगर के राजकीय इंटर काॅलेज मैदान में हुई महापंचायत में मंच पर स्थान दिया था। रालोद उपाध्यक्ष जयंत चैधरी ने मंच पर ही दंगों के आरोपित गुलाम मोहम्मद के पैर छुए थे। दंगों का यह आरोपित भी अपनी पुत्रवधू को जिला पंचायत के वार्ड 22 से चुनाव नहीं जिता सका। समाजवादी पार्टी का समर्थन होने के बाद भी हार का सामना करना पड़ा। गौरतलब है कि गुलाम मोहम्मद जौली कभी भाकियू संस्थापक महेंद्र सिंह टिकैत के प्रमुख सहयोगी रहे। दंगों के बाद उसने भाकियू का साथ छोड़ दिया था और किसान महापंचायत में फिर से भाकियू में सक्रिय हो गए।


रालोद के जिलाध्यक्ष की पत्नी भी हारी

किसान आंदोलन की छाया में अपने सियासी समीकरणों को नई धार देने वाले रालोद के दिग्गज भी जिला पंचायत चुनाव में हार गए। मुजफ्फरनगर के रालोद जिलाध्यक्ष अजित राठी ने वार्ड 34 से अपनी पत्नी सविता राठी को चुनाव लड़ाया। इस वार्ड में भाजपा समर्थित उम्मीदवार वंदना वर्मा ने सविता राठी को चुनाव में हराया। अपने ही गढ़ में चुनाव हारने के बाद भाकियू व रालोद नेता सकते में हैं। भाजपा के विरोध में पूरे देश में किसानों को एकजुट करने का दावा करने वाले भाकियू नेता राकेश टिकैत के सूरमा अपने ही गढ़ में ढेर हो गए। जिला पंचायत के इन परिणामों के बाद से भाकियू नेता चुप्पी साधे हुए हैं।


किसानों की भीड़ को वोट में नहीं बदल पाए

किसानों की मांगों को लेकर भारतीय किसान यूनियन लंबे समय से आंदोलन चलाती आ रही है। भाकियू संस्थापक महेंद्र सिंह टिकैत ने करमू खेड़ी बिजलीघर से अपने किसान आंदोलन की शुरूआत की। इसके बाद मेरठ के कमिश्नरी पार्क में लाखों किसानों को जुटाया। दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर लखनऊ में कई बार आंदोलन में किसानों को इकट्ठा किया। इसके बाद भी वह और उनके पुत्र किसानों की भीड़ को अपने वोट बैंक के रूप में स्थापित नहीं कर पाए। जब-जब भाकियू नेताओं ने किसानों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करना चाहा तो उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। इससे साफ है कि किसानों को बरगला कर भीड़ तो इकट्ठा की जा सकती है, लेकिन उसका सियासी मतलब के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।


अब आंदोलन के लिए किसानों के पड़ रहे लाले

भाकियू के किसान आंदोलन से आम किसान पहले ही दूर थे, अब अन्य किसान भी आंदोलन से दूर हो गए हैं। गाजीपुर बाॅर्डर पर चल रहे आंदोलन में भाकियू नेताओं को किसानों को जुटाने में पसीने छूट रहे हैं। यहां पर लगाए गए टेंट खाली पड़े हुए हैं। भाकियू नेता राकेश टिकैत लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए तरह-तरह के बयान जारी कर रहे हैं। मुजफ्फरनगर के किसानों का भी साफ कहना है कि इस किसान आंदोलन का अब कोई मतलब नहीं रह गया है। केवल अपनी साख बचाने के लिए भाकियू नेता आंदोलन को खींच रहे हैं। देश का आम किसान इस सच्चाई को समझ चुका है। जिला पंचायत चुनावों के परिणाम इसी ओर इशारा कर रहे हैं।

नीति से परे रणनीतिक वोटिंग की जीत : पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को मिली भारी जीत के लिए तो ममता बनर्जी को भी आत्मविश्वास नहीं था। दूसरे चरण के बाद भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस-वामपंथियों के मैदान छोड़कर तृणमूल को आगे करने की रणनीति ने असर जता दिया है। हालांकि ऐसा करके कांग्रेस ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ अभियान को स्वयं ही समर्थन दे दिया-


चुनाव परिणाम आने के बाद आरामबाग में तृणमूल कार्यकर्ताओं द्वारा भाजपा कार्यालय जलाया गया

पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने अपने भाग्य का फैसला किया है। इसका पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को पूर्ण अधिकार है। लोकतंत्र में मतदाताओं का निर्णय सर्वोच्च होता है।

लेकिन यह भी तय है कि अगर किसी राज्य के लोकतांत्रिक निर्णय को शेष देश खून का घूंट पीकर स्वीकार करता है, तो उस राज्य को पूरे देश के साथ कदमताल कर सकने लायक बनने में एक-दो दशक का समय लग जाता है। लालू प्रसाद भी बिहार में चुनाव जीतते थे, और देश आह भर कर उसे स्वीकार करता था। परिणाम आज सबके सामने है।

खैर, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में दीदी को, या उनकी पार्टी को जो भारी जीत प्राप्त हुई है, उसकी पूर्व कल्पना या पूर्व अनुमान शायद ही किसी को रहा हो। सभी एग्जिट पोल, सभी राजनीतिक विश्लेषणों और जमीन से आती आवाजों को तो छोड़िए, खुद दीदी का आत्मविश्वास भी ऐसा नहीं था, जिससे अनुमान लगाया जा सकता हो कि वह इतनी बड़ी जीत प्राप्त करने जा रही हैं।

लेकिन यह अनुमान सभी को था कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट मिल कर भी दोनों में से किसी भी पक्ष के पासंग भी नहीं बन सकेंगे।

माने लड़ाई आमने-सामने की होगी।

माने दिल्ली विधानसभा चुनाव वाला मॉडल।

माने भाजपा की अप्रत्याशित हार, चाहे उसके पास कितने ही प्रतिशत वोट क्यों न हों।

माने एक परिपूर्ण रणनीति की ऐसी बिसात, जिसका कोई तोड़ नहीं था।

तोड़ इसलिए नहीं था, क्योंकि-डेमोग्राफी डेस्टिनी है। राज तो जनसंख्या करती है।

तोड़ इसलिए नहीं था, क्योंकि-दो वर्ष पूर्व 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और वाममोर्चा को 12 प्रतिशत वोट मिले थे। आज यह वोट प्रतिशत 7 दशमलव 63 है। लगभग आधा। लेकिन उनका यह वोट भाजपा को नहीं मिला है। बल्कि भाजपा को तो 2019 में जो 40 प्रतिशत वोट मिले थे, उनकी तुलना में इस बार लगभग 2 प्रतिशत कम वोट मिले हैं। मजेदार बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस का मत प्रतिशत 2019 में मिले 43.3 प्रतिशत से लगभग 5-6 प्रतिशत ज्यादा हो गया है।

तारीफ करने लायक बात है। क्योंकि यह वोट शुद्ध राजनीतिक है। कोई और सोच समझ नहीं। किसी दृष्टि, नीति, सिद्धांत की जरूरत नहीं। किसी विकास की, न्याय की कोई दरकार नहीं और न गुंडागर्दी से बचाव की कोई जरूरत। सीधे कहें- तो कोई मुद्दा ही नहीं। जाहिर है, इसे भाजपा अपनी उस तरह की नैतिक जीत भी नहीं बता सकती है, जैसी नैतिक जीत हाल के समय में फैशन में रही है।

कोई शक नहीं कि इस लड़ाई में भाजपा ने अपने सारे साधन झोंक दिए थे। हौसला, इरादा, सर्वश्रेष्ठ कार्यकर्ता मैदान में उतार दिए गए और न जाने कितने कार्यकतार्ओं को प्राण भी इस लड़ाई में गंवाने पड़े। ऐसे में यह हार भाजपा के लिए निश्चित एक भीषण क्षति है। लेकिन साथ ही तथ्य यह है कि यह एक ऐसी लड़ाई भी थी जिसे जीतने के लिए भाजपा इससे अधिक कुछ नहीं कर सकती थी।

वास्तव में बीच चुनाव में छद्म सहानुभूति कार्ड खेलने का विशेषाधिकार सिर्फ ममता बनर्जी के पास था। जब भी शक्तिशाली क्षेत्रीयतावादी कार्ड खेला जाता है, तो उसके आगे किसी राष्ट्रीय दल के पास कोई उपाय नहीं होता है। वह मात्र इस आधार पर ‘बाहरी दल’ हो जाता है कि वह अखिल भारतीय क्यों है। हालांकि सारे क्षेत्रीय दल खुद को अखिल भारतीय ही कहते हैं। लेकिन उसमें अंतर्निहित यह होता है कि धरती जिस धुरी पर घूमती है, उसकी लोकेशन उनकी क्षेत्रीय अस्मिता के अनुसार होती है। कोई अखिल भारतीय दल न उसे स्वीकार कर सकता है, न नकार सकता है।

और रणनीतिक वोटिंग। वह भी पांच करोड़ अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के साथ। ‘बहुत बड़ी संख्या वाले’ ‘अल्पसंख्यक’ वोटबैंक की मौजूदगी हर किस्म के तुष्टिकरण को एक कारगर हथियार बना देती है, और इसका भी प्रतिकार कर सकना राजनीतिक तौर पर सहज नहीं होता है।

इच्छा मृत्यु की कांग्रेस की इच्छा पूरी करने के मतदाताओं के फैसले का भी सम्मान किया जाना चाहिए। वास्तव में यह चुनाव ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के आगमन की सूचना देने वाले हूटर की तरह है। यह सहज बात नहीं है। बात यह है कि पूरे देश में भाजपा या तो सत्ता में है, या विपक्ष में। कोई अखिल भारतीय पार्टी उनके सामने टक्कर में नहीं है।

फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि भाजपा के सामने खाली मैदान है। खास तौर पर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का परिणाम इस बात का सबूत है कि भाजपा का जो भी शत्रु है, वह अदृश्य है, खुल कर सामने नहीं आता है, और उसके पास किसी भी ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री मनोनीत कर सकने की क्षमता है।

इसे ऐसे समझिए। हाल ही में देश भर में कोरोना की स्थिति को लेकर भारी विवाद हुआ। उसके पहले वैक्सीन का विरोध किया गया, उसकी उपलब्धता को संकट में डालने का प्रयास किया गया और उसके खिलाफ जमकर दुष्प्रचार किया गया। आर्थिक समझ की कमी किसी को भी वामपंथ की तरफ धकेल देती है, और इसी दौर में सोशल मीडिया पर यह ज्ञान बड़े पैमाने पर बांटा गया कि सरकार सड़क, कृषि, शिक्षा, सुरक्षा और यातायात तक पर खर्च करना बंद कर दे और अस्पताल खोले। बिना सड़क के अस्पताल क्या करेगा, या बिना शिक्षा के अस्पताल कैसे बनेगा- इन सवालों तक को शोर में दबा दिया गया। इस सारे टूल किट की अंत परिणिति को इस दिशा में मोड़ दिया गया कि भाजपा के और विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव प्रचार के कारण ही यह स्थिति बन रही है।

क्षेत्रीयता और तुष्टिकरण के कार्ड की तरह, इसका भी प्रतिकार कर सकना राजनीतिक तौर जोखिम भरा हो गया।

इससे भाजपा विरोध के प्रयासों को राजनैतिक और धारणागत मैदानों में वह अवसर मिल गया, जिसके बिना उनके लिए चुनाव जीतना संभव नहीं था।

यह टूल किट किसने चलाया? किसी गलतफहमी की गुंजाइश नहीं है। तृणमूल कांग्रेस इसकी लाभार्थी जरूर रही, लेकिन ठीक वैसे ही जैसे कोई प्यादा आगे बढ़कर वजीर हो जाता है। लेकिन अंतत: वह होता एक प्यादा ही है। और वह कभी यह नहीं जान पाता है कि उसे वजीर किसने और क्यों बनाया है। वह वजीर बन कर ही प्रसन्न हो लेता है।

ममता जी मुख्यमंत्री बन ही जाएंगी, प्रसन्न भी रह सकेंगी, और प्लास्टर भी अब तो कटवा ही लेंगी- यह कामना की जानी चाहिए। बाकी तो 2 मई के बाद उनके मुख्यमंत्री बनने की स्थिति में विरोधियों का क्या होगा, इसकी धमकी तो उन्होंने खुलेआम दी ही थी। यह धमकी कितनी कारगर है, इसकी झलक चुनाव परिणाम सामने आने के बाद आरामबाग में भाजपा दफ्तर फूंक कर तृणमूल कार्यकर्ताओं ने दे ही दी है।

Tuesday, May 4, 2021

आज 4 मई 2021 को नहीं रहे हमारे बीच महामना जगमोहनजी : 1990 में आतंकियों की आखिरी साजिश को विफल कर घाटी को बचाया था

 जगमोहन जी ने कश्मीरी पंडितों को घाटी से सुरक्षित निकलने का मौका मुहैया कराया, जिसके लिए पंडित उन्हें आज भी मसीहा मानते हैं। अरुण शौरी ने 2004 में यूँ ही नहीं कहा था, "यह जगमोहन ही रहे, जिन्होंने भारत के लिए घाटी को बचाया।"


जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन का निधन हो गया है। वे 94 साल के थे। दो बार जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल की जिम्मेदारी सँभालने वाले जगमोहन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री भी रहे थे। कड़क नौकरशाह रहे जगमोहन के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक जताया है।

उनका पूरा नाम जगमोहन मल्होत्रा था। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद बीजेपी ने जब संपर्क अभियान शुरू किया था तो अमित शाह और मौजूदा बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा उनसे मिलने उनके घर पहुँचे थे। जगमोहन को पहली बार राज्यपाल बनाकर जम्मू-कश्मीर 1984 में कॉन्ग्रेस ने भेजा था। उस समय वह 1989 तक इस पद पर रहे। दूसरी बार वीपी सिंह की सरकार ने उन्हें जनवरी 1990 में राज्यपाल बनाकर भेजा और मई 1990 तक वे पद पर रहे।

जगमोहन ने दूसरी बार 1990 में 19 जनवरी की उसी शाम राज्यपाल पद की शपथ ली थी, जिस मनहूस रात घाटी की हर मस्जिद से एक ही आवाज आ रही थी कि हमें कश्मीर में हिंदू औरतें चाहिए, लेकिन बिना किसी हिंदू मर्द के। वह रात जब हिंदुओं को केवल तीन विकल्प दिए गए थे। पहला, कश्मीर छोड़कर भाग जाओ। दूसरा, धर्मांतरण कर लो। तीसरा, मारे जाओ। वह रात जिसने मानवीय इतिहास के सबसे बड़ी पलायन त्रासदियों में से एक का दरवाजा खोला। जिसके कारण करीब 4 लाख कश्मीरी हिंदू जान बचाने के लिए अपना घर, अपनी संपत्ति अपने ही देश में छोड़कर भागने को मजबूर हुए।

उस दिन को लेकर जगमोहन ने ‘कश्मीर: समस्या और समाधान’ में लिखा है, “अचानक विमान झटके के साथ नीचे झुका। ऐसा बाहरी हवा में दबाव के अन्तर के कारण हुआ। सीमा सुरक्षा बल का वह छोटा सा विमान उसे आसानी से झेल नहीं सकता था। पूरा विमान काँप उठा और उसके साथ मेरी विचारधारा भी। शायद इसने मुझे संस्मरण दिलाया कि मैं ऐसे राज्य में जा रहा हूँ जो अशांति और दहशत में फँसा है। यह 19 जनवरी 1990 की दोपहर थी। मैं विमान द्वारा दूसरी बार जम्मू-कश्मीर जा रहा था।”

उस रात क्या हुआ इससे हम सब परिचित हैं। जगमोहन ने खुद लिखा है कि पहले ही दिन आतंकवादियों, पाकिस्तान समर्थित तत्वों, कट्टरपं​थी और सांप्रदायिक तत्वों तथा राजनीतिक और शासकीय निहित तत्वों ने अपने-अपने तरीके से उन्हें कमजोर और पंगु बनाने का निर्णय कर लिया था। लेकिन, जगमोहन की असली चुनौती 26 जनवरी 1990 को इंतजार कर रही थी।

असल में उस साल की 26 जनवरी जुमे के दिन थी। ईदगाह पर 10 लाख लोगों को जुटाने की योजना बनाई गई थी। मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से लोगों को छोटे-छोटे समूह में ईदगाह पहुँचने को उकसाया जा रहा था। श्रीनगर के आसपास के गाँव, कस्बों से भी जुटान होना था। योजना थी कि जोशो-खरोश के साथ नमाज अता की जाएगी। आजादी के नारे लगाए जाएँगे। आतंकवादी हवा में गोलियाँ चलाएँगे। राष्ट्रीय ध्वज जलाया जाएगा। इस्लामिक झंडा फहाराया जाएगा। विदेशी रिपोर्टर और फोटोग्राफर तस्वीरें लेने के लिए वहाँ जमा रहेंगे। उससे पहले 25 की रात टोटल ब्लैक आउट की कॉल थी।

आतंकियों को कामयाबी का पूरा गुमान था। वे जानते थे कि गणतंत्र दिवस होने के कारण आवाजाही पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा। नेता और अधिकारी जम्मू में सलामी लेने में व्यस्त होंगे। स्थानीय अधिकारी कोई काम नहीं करेंगे। इस्लामी झंडा लहराते ही उनका सरेंडर करवाया जाएगा। तैयारियाँ पूरी थी और साजिश पर गुप्त तरीके से अमल हो रहा था। अंतिम वक्त में हैरान कर देने के मॅंसूबे थे। 14 अगस्त 1989 को वे इसका एक प्रयोग कर चुके थे। तब कुछ आतंकियों ने परेड की सलामी ली थी। पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। अखबारों में उस जश्न की ख़बरें और तस्वीरें छपी थीं। अगले दिन भारत के स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे को सार्वजनिक रूप से जलाया गया था।

26 जनवरी से दो दिन पहले अफवाह फैलाई गई कि अर्धसैनिक बलों ने कश्मीर आर्म्ड फोर्सेस के चार जवानों को मार गिराया है। ‘खून का बदला खून’ का आह्वान किया गया। 25 जनवरी की सुबह श्रीनगर में भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना और तीन अन्य अफसर की आतंकियों ने निर्मम हत्या कर दी। हत्या उस समय की गई जब वे ड्यूटी पर जाने के लिए अपनी दफ्तर की गाड़ी का इंतजार कर रहे थे। आतंकियों ने संदेश दे दिया था।

आतंकियों के लिए आज़ादी बस कुछ घंटे दूर थी। उन्हें लग रहा था कि इस साजिश की भनक जगमोहन को नहीं लगेगी। लगी भी तो 10 लाख लोगों पर बल प्रयोग का जोखिम नहीं उठाया जाएगा। लेकिन, मजहबी उन्मादियों को घुटने पर लाने का प्लान पहले से तैयार था। उन्हें चौंकाते हुए जगमोहन ने 25 जनवरी की दोपहर ही कर्फ्यू लगा दिया। अपने कुछ विश्वस्त सहयोगियों को उसी शाम बता दिया कि वे सलामी लेने जम्मू नहीं जाएँगे। श्रीनगर में ही डेरा डाले रहेंगे। सभी सरकारी विभागों को आदेश दिए कि हर हाल में दफ्तरों में लाइटें जलनी चाहिए। हर हाल में स्ट्रीट लाइट ऑन रहनी चाहिए। इसके लिए पीडब्ल्यूडी और बिजली विभाग को विशेष आदेश दिए गए। शाम हुई तो बिजली जल उठी। बकौल जगमोहन, आप इसे अथॉरिटी का सम्मान कहिए या डर, कर्मचारियों ने इसका पालन किया।


इन लाइटों की रोशनी से जो गर्माहट पैदा हुई वह इस्लामिक आतंकवाद पर भारत की पहली मनोवैज्ञानिक जीत थी। इसने तय कर दिया कि जीतना भारत को ही है। कश्मीर को संविधान के आईन में ही चलना है, न कि किसी मजहबी उन्माद में जलना है। 1990 के जनवरी के आखिरी दिनों में जगमोहन ने राष्ट्रपति को लिखे पत्र में भी इस घटना का जिक्र किया था। जो कुछ इस तरह था,

आदरणीय राष्ट्रपति जी,
ठीक दस दिन पहले मैंने अपना कार्यभार संभाला था। तब से अब तक मैं एक छोटी रिपोर्ट लिखने के लिए दस मिनट का समय भी ​नहीं निकाल सका। स्थिति इतनी गंभीर और संकटपूर्ण थी।
… यह वाकई चमत्कार था कि 26 जनवरी को काश्मीर बचा लिया गया और हम राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी उठाने से बच गए। इस दिन की कहानी लम्बी है और यह बाद में पूरे ब्यौरे के साथ बताई जानी चाहिए।
… मैंने 26 जनवरी को हुई घटनाओं में अपनी भूमिका पूरी तरह अदा की है और मुझे इसका गर्व है। लेकिन अपना काम जारी रखना मेरे लिए कठिन हो जाएगा यदि यह प्रभाव बना रहा कि जनता में मुझे पूरा समर्थन नहीं प्राप्त है। पहले से ही मुझे एक टूटा और बिखरा प्रशासन मिला है। यदि कमांडर पर ही हर रोज छिप कर वार किया जाए तो सफलता का क्या अवसर रह जाता है इसकी कल्पना की जा सकती है।
… कामचलाऊ समाधानों या सुगम रास्तों का सहारा लेना आत्मघाती नहीं तो गलत जरूर होगा। विष महत्वपूर्ण अंशों तक पहुॅंच चुका है। जब तक कि उसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाता, हम एक संकटपूर्ण स्थिति से दूसरी में ही लड़खड़ाते रहेंगे।
आपका
-जगमोहन

वैसे जगमोहन को पहली बार जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल इंदिरा गाँधी की सरकार ने ही बनाया था। लेकिन यह भी छिपा नहीं कि बाद के वर्षों में वे कॉन्ग्रेस को खटकते रहे। उनका नाम लेकर कॉन्ग्रेस अपने शीर्ष परिवार की कश्मीर नीतियों की नाकामी को छिपाने की कोशिश करता रहा।

अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद उस समय राज्यसभा में विपक्ष के नेता रहे गुलाम नबी आजाद ने कहा था, “पिछले दिनों में जो घटनाएँ हुई हैं उससे जम्मू-कश्मीर और लेह-लद्दाख के लोग डरे हुए हैं। इससे 1990 की यादें ताजा हो गई हैं, जब वीपी सिंह की सरकार में बीजेपी ने जगमोहन को कश्मीर का राज्यपाल बनवाया था और फिर घाटी से कश्मीरी पंडितों को बसों में भर कर बाहर निकाला गया जो आज तक एक कलंक की तरह है।”

पत्रकार आदित्य राज कौल ने ट्वीट कर उस समय कहा था, “2014 में वाराणसी में एक साक्षात्कार के दौरान ने गुलाम नबी आजाद ने मुझे जगमोहन के बारे में सवाल पूछने को कहा था ताकि वे भाजपा पर निशाना साध सकें।” कश्मीरी पंडितों के मसीहा जगमोहन को खलनायक साबित करने के लिए एक अन्य कॉन्ग्रेसी और केन्द्र में मंत्री रह चुके सैफुद्दीन सोज तो बकायदा एक किताब ‘Kashmir: Glimpses of History and the Story of Struggle’ भी लिख चुके हैं।

यह सही है कि दूसरी बार, 1990 में जब जगमोहन को कुछ महीनों के लिए जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया गया तो केन्द्र में वीपी सिंह की सरकार थी और वह भाजपा के समर्थन से चल रही थी। यह भी सच है कि उनके इस कार्यकाल में कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। लेकिन, इसका दूसरा पहलू यह भी है कि उनके राज्यपाल बनने से पहले 1987-88 से ही पंडितों ने घाटी छोड़ना शुरू कर दिया था। 14 सितंबर 1989 को भाजपा नेता पंडित टीका लाल टपलू की निर्मम हत्या कर दी गई थी। इसके कुछ समय बाद ही जज नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई। गंजू ने जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल भट्ट को मौत की सजा सुनाई थी। जुलाई से नवंबर 1989 के बीच 70 अपराधी जेल से रिहा किए गए थे। घाटी में हमें पाकिस्तान चाहिए। पंडितों के बगैर, पर उनकी औरतों के साथ जैसे नारे लग रहे थे।

ऐसे माहौल में श्रीनगर पहुँचे जगमोहन ने कश्मीरी पंडितों को घाटी से सुरक्षित निकलने का मौका मुहैया कराया, जिसके लिए पंडित उन्हें आज भी मसीहा मानते हैं। अरुण शौरी ने 2004 में यूँ ही नहीं कहा था, “यह जगमोहन ही रहे, जिन्होंने भारत के लिए घाटी को बचाया।”

शत शत नमन इस महायोद्धा को, ईश्वर उनकी पुण्यात्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दे 🙏

Thursday, April 22, 2021

काशी विश्वनाथ: यहां कंकर-कंकर में बसते हैं विश्वेश्वर

पौराणिक मान्यता है कि वाराणसी में पवित्र गंगा नदी में स्नान के बाद अगर बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर लिए जाएं तो जीवन सफल हो जाता है और प्राणी आवागमन के बंधन से छूट कर शिवलोक पहुंच जाता है


काशी विश्वनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर  हजारों वर्ष से वाराणसी में स्थित है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, संत एकनाथ, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्वामी तुलसीदास जैसी विभूतियां पधारी थीं।  यहीं पर संत एकनाथजी ने वारकरी सम्प्रदाय का महान ग्रंथ ‘श्रीएकनाथी भागवत’ लिखकर पूरा किया और काशी नरेश तथा अन्य विद्वतजनों द्वारा उस ग्रंथ को हाथी पर रखकर खूब धूमधाम से शोभायात्रा निकाली गई। महाशिवरात्रि के मध्य रात्रि पहर में अन्य प्रमुख मंदिरों से भव्य शोभायात्रा ढोल, नगाड़े इत्यादि के साथ बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर तक जाती है।

पौराणिक मान्यता है कि प्रलयकाल में भी इस मंदिर का लोप नहीं होता। उस समय भगवान शंकर इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि काल आने पर इसे नीचे उतार देते हैं। यही नहीं, यही भूमि आदि सृष्टि स्थली भी बतायी जाती है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने की कामना से तपस्या करके आशुतोष को प्रसन्न किया था और फिर उनके शयन करने पर उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिन्होंने सारे संसार की रचना की। अगस्त्य मुनि ने भी विश्वेश्वर की बड़ी आराधना की थी और उन्हीं की अर्चना से श्री वशिष्ठ जी तीनों लोकों में पूजित हुए तथा राजर्षि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाए। यही कारण है कि प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहां पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए आते हैं।

धार्मिक महत्व के अलावा यह मंदिर वास्तुकला की दृष्टि से भी अनुपम है। इसका भव्य प्रवेश द्वार देखने वालों की दृष्टि में मानो बस जाता है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार इंदौर की महारानी अहिल्या  बाई होल्कर के स्वप्न में भगवान शिव आए। वे भगवान शिव की भक्त थीं और इसलिए उन्होंने 1780 में यह मंदिर बनवाया।

विश्वनाथ खण्ड को पुराना शहर भी कहा जाता है, जो दशाश्वमेध घाट और गोदौलिया के बीच मणिकर्णिका घाट के दक्षिण और पश्चिम तक नदी की उत्तर दिशा में वाराणसी के मध्य में स्थित है। यह पूरा क्षेत्र घूमने योग्य है। बाबा विश्वनाथ मंदिर के शिखर पर स्वर्ण लेपन होने के कारण इसे स्वर्ण मंदिर भी कहते हैं। यहां स्थापित शिवलिंग चिकने काले पत्थर से बना हुआ है और इसे ठोस चांदी के आधार पर रखा गया है। यहां भक्तजन आकर संकल्प करते हैं और पंच तीर्थयात्रा शुरू करने से पहले अपने मन की भावना यहां व्यक्त करते हैं। वाराणसी को एक ऐसा स्थान कहा जाता है जहां प्रथम ज्योतिर्लिंग है।

सर्वतीर्थमयी एवं सर्वसंतापहारिणी मोक्षदायिनी काशी की महिमा ऐसी है कि यहां प्राणत्याग करने से ही मुक्ति मिल जाती है। मान्यता है कि भगवान भोलेनाथ मरते हुए प्राणी के कान में तारक-मंत्र का उपदेश फूंकते हैं, जिससे वह जीवन और मृत्यु के आवागमन से छूट जाता है, चाहे मृत-प्राणी कोई भी क्यों न हो। मत्स्यपुराण का मत है कि जप, ध्यान और ज्ञान से रहित एवं दुखों से पीड़ित जन के लिए काशीपुरी ही एकमात्र गति है। विश्वेश्वर के इस आनंद-कानन में पांच मुख्य तीर्थ हैं- दशाश्वमेध, लोलार्ककुण्ड, बिन्दुमाधव,    केशव और मणिकर्णिका। और इन्हीं से युक्त यह अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है।

काशी विश्वनाथ मंदिर की महिमा आप इस बात से ही समझ लीजिए कि द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से सबसे प्रमुख इसी स्थान को प्रथम लिंग माना गया है। ऐसा माना जाता है कि साक्षात् भगवान शंकर माता पार्वती के साथ इस स्थान पर विराजमान हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास अनादि काल से माना जाता है। यहां तक कि कई उपनिषदों और महाकाव्य ‘महाभारत’ में इसका वर्णन मिलता है।

हालांकि अनेक आक्रमणों के बावजूद, तमाम कुत्सित प्रयासों के बाद भी काशी विश्वनाथ की महिमा उसी तरह से बरकरार रही, जिस प्रकार से ईसा पूर्व राजा हरिश्चंद्र, सम्राट विक्रमादित्य जैसे महान शासकों ने इस मंदिर की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाए थे। एक तरफ जहां मंदिर तोड़ने वाले थे, वहीं दूसरी तरफ राजा टोडरमल जैसे महान व्यक्तियों ने इसके पुनरुद्धार का कार्य किया। मराठों ने इसकी मुक्ति के लिए जान की बाजी लगा दी थी। अहिल्याबाई होल्कर और महाराणा रणजीत सिंह जैसे शासकों ने इस मंदिर की महिमा को हमेशा बरकरार रखा और उसमें वृद्धि ही की। विश्वनाथ मंदिर के बारे में एक बात और प्रचलित है कि जब यहां कि मूर्तियों का शृंगार होता है, तो सभी मूर्तियों का मुख पश्चिम दिशा की तरफ रहता है।

मानव को सिखाई मर्यादा : मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम

भगवान श्रीराम का पूरा जीवन प्रेरणादायी है। एक आदर्श राजा, आदर्श पति, आदर्श पुत्र, आदर्श भाई के रूप में उनका उदाहरण दिया जाता है। उनकी सत्यता, न्यायप्रियता, क्षमाशीलता और सदाचारिता की तो कोई सीमा नहीं है





इन दिनों अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का कार्य चल रहा है। इससे समस्त भारतीय प्रसन्न हैं। श्रीराम इस देश की बहुसंख्यक आबादी के आराध्यदेव हैं। वे न सिर्फ हिंदुओं अथवा भारतवासियों के लिए परम पूजनीय हैं, बल्कि दुनिया के अनेक देशों के लोग भी उन्हें भगवान और मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में मान्यता प्रदान करते हुए पूजते रहे हैं। वे भारत की पहचान और राष्ट्रीयता के प्रतीक हैं। दरअसल, श्रीराम के आदर्श, उनका अनुकरणीय और आज्ञापालक चरित्र तथा रामायण काल के अन्य सभी पात्रों की अपार निष्ठा, भक्ति, प्रेम, त्याग एवं समर्पण अपने आप में अनुपम है

भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में प्रतिवर्ष चैत्र मास की शुक्ल पक्ष नवमी को रामनवमी का त्योहार समूचे भारत में अपार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में उत्सवों का विशेष आयोजन होता है, जिनमें भाग लेने के लिए देशभर से हजारों भक्तगण अयोध्या पहुंचते हैं तथा वहां स्थित सरयू नदी में पवित्र स्नान कर पंचकोसी की परिक्रमा करते हैं। समूची अयोध्या नगरी इस दिन पूरी तरह राममय नजर आती है और हर तरफ भजन-कीर्तन तथा रामायण के अखंड पाठ की गूंज सुनाई पड़ती है। देशभर में अन्य स्थानों पर भी जगह-जगह इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत, उपवास, यज्ञ, दान-पुण्य आदि विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता है। हालांकि इस वर्ष फिर से बढ़ते कोरोना संक्रमण के चलते ऐसे आयोजनों के ज्यादा धूमधाम से मनाए जाने की संभावना कम ही रहेगी, लेकिन भीड़-भाड़ से बचकर लोग अपने घर में भी अपने आराध्यदेव के जन्मोत्सव को श्रद्धापूर्वक मना सकते हैं।

श्रीराम का जन्म नवरात्र के अवसर पर नवदुर्गा के पाठ के समापन के पश्चात् हुआ था और उनके शरीर में मां दुर्गा की नौवीं शक्ति जाग्रत थी। मान्यता है कि त्रेता युग में इसी दिन अयोध्या के महाराज दशरथ की पटरानी महारानी कौशल्या ने श्रीराम को जन्म दिया था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, ‘‘भगवान श्रीराम चंद्रमा के समान अति सुंदर, समुद्र के समान गंभीर और पृथ्वी के समान अत्यंत धैर्यवान थे तथा इतने शील संपन्न थे कि दुखों के आवेश में जीने के बावजूद कभी किसी को कटु वचन नहीं बोलते थे। वे अपने माता-पिता, गुरुजन, भाइयों, सेवकों, प्रजाजन अर्थात् हर किसी के प्रति अपने स्नेहपूर्ण दायित्वों का निर्वाह किया करते थे। माता-पिता के प्रति कर्तव्य पालन एवं आज्ञा पालन की भावना तो उनमें कूट-कूटकर भरी थी। उनकी कठोर से कठोर आज्ञा के पालन के लिए वे हर समय तत्पर रहते थे।’’

 श्रीराम का चरित्र बेहद उदार प्रवृत्ति का था। उन्होंने उस अहिल्या का भी उद्धार किया, जिसे उसके पति ने एक बार पतित घोषित कर पत्थर की मूर्ति बना दिया था। जिस अहिल्या को निर्दोष मानकर किसी ने नहीं अपनाया, उसे श्रीराम ने अपनी छत्रछाया प्रदान की। लोगों को गंगा नदी पार कराने वाले एक मामूली से नाविक केवट की अपने प्रति अपार श्रद्धा व भक्ति से प्रभावित होकर भगवान श्रीराम ने उसे अपने छोटे भाई का दर्जा दिया और मोक्ष प्रदान किया। अपनी परम भक्त शबरी नामक भीलनी के झूठे बेर खाकर उसका कल्याण किया।

महारानी केकैयी ने महाराजा दशरथ से जब राम को 14 वर्ष का वनवास दिए जाने और अपने लाड़ले पुत्र भरत को राम की जगह राजगद्दी सौंपने का वचन मांगा तो दशरथ गंभीर धर्मसंकट में फंस गए थे। वे बिना किसी कारण राम को 14 वर्ष के लिए वनों में भटकने के लिए भला कैसे कह सकते थे और श्रीराम में तो वैसे भी उनके प्राण बसते थे। दूसरी ओर वचन का पालन करना रघुकुल की मर्यादा थी। ऐसे में जब श्रीराम को माता केकैयी के यह वचन मांगने और अपने पिता महाराज दशरथ के इस धर्मसंकट में फंसे होने का पता चला तो उन्होंने खुशी-खुशी उनकी यह कठोर आज्ञा भी सहज भाव से शिरोधार्य की और उसी समय 14 वर्ष का वनवास भोगने तथा छोटे भाई भरत को राजगद्दी सौंपने की तैयारी कर ली। श्रीराम के लाख मना किए जाने पर भी उनकी पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण भी उनके साथ वन को निकल पड़े।

वनवास की शुरुआत श्रृंगवेरपुर नामक स्थान से प्रारंभ कर वहां से वे भरद्वाज मुनि के आश्रम में चित्रकूट पहुंचे। उसके बाद विभिन्न स्थानों की यात्रा के दौरान पंचवटी में उन्होंने अपनी कुटिया बनाने का निश्चय किया। यहीं पर रावण की बहन शूर्पणखा की नाक काटे जाने की घटना हुई। उसी घटना के कारण वहां खर-दूषण सहित 14,000 राक्षस राम-लक्ष्मण के हाथों मारे गए। यहीं से श्रीराम व लक्ष्मण की अनुपस्थिति में लंका का राजा रावण माता सीता का अपहरण कर उन्हें अपने साथ लंका ले गया।

कहा जाता है कि जब सीता का विरह श्रीराम से नहीं सहा गया तो उन्होंने साधारण मनुष्य की भांति विलाप किया, लेकिन हिम्मत न हारते हुए सीता जी की खोज में राम-लक्ष्मण जंगलों में भटकने लगे। इसी दौरान उनकी भेंट अपने अनन्य भक्त हनुमान से हुई, जिन्होंने राम-लक्ष्मण को वानरराज बाली के छोटे भाई सुग्रीव से मिलवाया, जो उस समय बाली के भय से यहां-वहां छिपता फिर रहा था। श्रीराम ने बाली का वध करके सुग्रीव तथा बाली के पुत्र अंगद को किष्किंधा का राज्य सौंपा और उसके बाद सुग्रीव की वानर सेना की सहायता से लंका पर आक्रमण किया और रावण का वध कर सीता को उसके बंधन से मुक्त कराया और लंका पर खुद अपना अधिकार न जमाकर वहां शासन रावण के छोटे भाई विभीषण को सौंप दिया तथा वनवास की अवधि समाप्त होने पर भैया लक्ष्मण, सीता जी व हनुमान सहित अयोध्या लौट आए।

वास्तव में विधि के विधान के अनुसार राम को दुष्ट राक्षसों का विनाश करने के लिए ही वनवास मिला था। उन्होंने अपने मानव अवतार में न तो भगवान श्रीकृष्ण की भांति रासलीलाएं कीं और न ही कदम-कदम पर चमत्कारों का प्रदर्शन किया, बल्कि सृष्टि के समक्ष अपने क्रियाकलापों के जरिए ऐसा अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसकी वजह से उन्हें ‘मर्यादापुरुषोत्तम’  कहा गया।

जहां तक राम-रावण के बीच हुए भीषण युद्ध की बात है तो वह सिर्फ दो राजाओं के बीच का सामान्य युद्ध नहीं था, बल्कि दो विचारधाराओं का संघर्ष था, जिसमें एक मानव संस्कृति थी तो दूसरी राक्षसी। एक ओर क्षमादान की भावना को महत्व देने वाले व जनता के दुख-दर्द को समझने एवं बांटने वाले वीतरागी भाव थे, तो दूसरी ओर दूसरों का सब कुछ हड़प लेने की राक्षसी प्रवृत्ति। रावण अन्याय, अत्याचार और अनाचार का प्रतीक था, तो श्रीराम सत्य, न्याय एवं सदाचार के। यही नहीं, सीता जी के अपहरण के बाद भी श्रीराम ने अपनी मर्यादा को कभी तिलांजलि नहीं दी। उन्होंने इसके बाद भी रावण को एक महाज्ञानी के रूप में सदैव सम्मान दिया और यह इससे साबित भी हुआ कि रावण की मृत्यु से कुछ ही क्षण पूर्व श्रीराम ने लक्ष्मण को रावण के पास ज्ञानार्जन के लिए भेजा था।

श्रीराम में सभी के प्रति प्रेम की अगाध भावना कूट-कूटकर भरी थी। उनके प्रजा वात्सल्य, न्यायप्रियता और सत्यता के कारण ही उनके शासन को आज भी ‘आदर्श’ शासन की संज्ञा दी जाती है और आज भी अच्छे शासन को ‘रामराज्य’ कहकर परिभाषित किया जाता है। ‘रामराज्य’ यानी सुख, शांति एवं न्याय का राज्य। रामनवमी पर्व वास्तव में मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की गुरु सेवा, माता-पिता की सेवा व आज्ञापालन, जात-पात के भेदभाव को मिटाने, क्षमाशीलता, भ्रातृप्रेम, पत्नीव्रता, न्यायप्रियता आदि विभिन्न महान आदर्शों एवं गुणों को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है