Sunday, December 27, 2020

संघ के चिंतन में सदैव ‘राष्ट्र’ रहता है':l

 अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत के  प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित भाषणों के संकलन 'यशस्वी भारत' का लोकार्पण जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी के करकमलों से संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल की गरिमामय उपस्थिति में भारत के पूर्व नियंत्रक व महाले खापरीक्षक श्री राजीव महर्षि के विशिष्ट आतिथ्य में संपन्न हुआ।

अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत के  प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित भाषणों के संकलन 'यशस्वी भारत' का लोकार्पण जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी के करकमलों से संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल की गरिमामय उपस्थिति में भारत के पूर्व नियंत्रक व महाले खापरीक्षक श्री राजीव महर्षि के विशिष्ट आतिथ्य में संपन्न हुआ।

1960 के बाद विश्व के सबसे विशाल संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी  सरसंघचालक के भाषणों का यह पहला संकलन है। इससे पूर्व तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ के भाषणों का संकलन प्रकाशित हुआ था। 'यशस्वी भारत' की प्रस्तावना संघ के पूर्व अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख, प्रखर चिंतक-विचारक, कई पुस्तकों के रचयिता,  मा गो वैद्य ने लिखी है। 

इस अवसर पर संघ के सह-सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल ने इस बात को रेखांकित किया कि हमें संपन्न, सामर्थ्यवान, शक्तिशाली तो बनना है लेकिन इससे आगे भारत को यशस्वी बनना है। उन्होंने कहा कि यश तब आता है जब कोई परमार्थ करता है। प्राचीन भारत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हम 18वीं शताब्दी तक दुनिया की आर्थिक महाशक्ति थे, शक्तिशाली भी थे लेकिन हमारी प्रतिष्ठा सर्वे भवन्तु  सुखिनः की हमारी नीति और सभी को ईश्वर का अंश मानने के हमारे भाव के कारण थी। साथ ही उन्होंने मिस्र, बेबीलोन, स्पार्टा आदि देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि बर्बर, हिंसक और क्रूर सभ्यताएँ सौम्य सभ्यताओं का नाश कर देती हैं। भारत के विषय में उन्होंने कहा कि हमने कोई हजार वर्षों तक ऐसे आक्रमणों से स्वयं को भी बचाया और धर्म की भी रक्षा की। उन्होंने कहा कि मोहन भागवतजी के सभी उद्बोधनों का मूल स्वर यही है कि कैसे हम सब भारतीय जाति-धर्म-भाषा के भेद मिटाकर भारत की यशस्विता और सर्वांगीण समेकित विकास में सहभागी बन सकें। हम अपने गौरवशाली अतीत का स्मरण करें जब भारत ‘विश्वगुरु’ था और एक नायक की भाँति विश्व का नेतृत्व करता था। अब भारत पुन: अँगड़ाई ले रहा है और अपनी खोई अस्मिता व प्रतिष्ठा अर्जित करने के पथ पर अग्रसर है।

जूनापीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी ने कहा कि स्थितियाँ बदल रही हैं। जाति की जकड़, स्त्रियों की स्थिति, समाज के चिंतन में बदलाव आया है। संन्यास परंपरा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अब तथाकथित छोटी जातियों से भी संन्यासी बन रहे हैं और किसी को कोई आपत्ति भी नहीं है। उन्होंने कहा कि हिंदू दूसरों का धर्म परिवर्तन नहीं कराते लेकिन कोरोना काल में दुनिया में जितने लोगों ने योग, आयुर्वेद और दूसरी भारतीय पद्धतियाँ अपनाईं, उससे भारतीय विचार का पूरे विश्व में व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ है। उन्होंने कहा कि मोहन भागवतजी के चिंतनपरक उद्बोधनों में भारत के स्वर्णिम भविष्य के निर्माण का 

विशिष्ट अतिथि राजीव महर्षि ने भी हिन्दू कौन विषय को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि संघ और सरसंघचालक मोहन भागवत के चिंतन में सदैव ‘राष्ट्र’ रहता है और इसीलिए इस वैश्विक संगठन की स्वीकार्यता समाज में निरंतर बढ़ रही है। 

पुस्तक में सरसंघचालक मोहन भागवत के अलग-अलग अवसरों पर दिए गए 17 भाषणों का संकलन है। प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित 286 पृष्ठों की इस पुस्तक का संपादन लोक सभा टीवी के संपादक श्याम किशोर ने किया है। प्रभात प्रकाशन के निदेशक पीयूष कुमार ने उपस्थित अभ्यागतों का स्वागत किया। प्रभात कुमार ने उपस्थित विशिष्टजनों का और प्रकाशन में सहयोगी रहे सभी व्यक्तियों का धन्यवाद ज्ञापन किया।

वनवासी कल्याण आश्रम के स्थापना दिवस पर विशेष : आश्रम से हुआ ‘कल्याण’:

 वनवासी कल्याण आश्रम के छात्रावासों में रहकर पढ़ने वाले जनजातीय समाज के सैकड़ों युवा आज  समाज जीवन के हर क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। ये स्वयं कह रहे हैं कि यदि कल्याण आश्रम में नहीं जाते तो आज जहां हैं, वहां नहीं पहुंच पाते।  इन युवाओं की कहानियां बहुत ही मार्मिक  और  प्रेरक हैं

आज देश में वनवासी कल्याण आश्रम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। 62 साल पहले रोपा गया संगठन रूपी यह पौधा आज विशाल वट वृक्ष का रूप ले चुका है। इसमें हजारों लोग आश्रय पाकर अपने सपनों को साकार कर रहे हैं। सच में यह संगठन जो कर रहा है, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। क्या आप सोच सकते हैं कि गरीबी के कारण बचपन में कोई छात्र पढ़ाई छोड़कर पिता के साथ सब्जी बेचने लगे और बाद में डॉक्टर बन जाए? शायद आप ऐसी कल्पना नहीं कर सकते। पर वनवासी कल्याण आश्रम के कारण ऐसा हो रहा है। यह संगठन शरणार्थी, निर्धन और वनवासी समाज के हजारों युवाओं का ‘कल्याण’ कर रहा है। एक ऐसे ही युवा हैं डॉ. धनंजय रियांग। ये इन दिनों दिल्ली की रोहिणी में ईएसआई अस्पताल में मुख्य चिकित्सा अधिकारी हैं। वे कहते हैं, ‘‘यह पक्की बात है कि मैं कल्याण आश्रम से नहीं जुड़ता तो आज सब्जी बेचता या मजदूरी करके गुजारा करता।’’


उल्लेखनीय है कि डॉ. धनंजय उस रियांग समाज से हैं, जिसे सरकारी शह पर चर्च के लोगों ने मिजोरम से मारकर खदेड़ दिया था। यह समाज अभी भी त्रिपुरा, असम और मेघालय के विभिन्न हिस्सों में शरणार्थियों का जीवन जी रहा है। इस समाज के लोग बरसों तक दो जून की रोटी तक के लिए तरसते रहे, तो भला अपने बच्चों को कहां से पढ़ा-लिखा पाते। ऐसे में वनवासी कल्याण आश्रम ने उनके बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा उठाया और आज ये बच्चे हर क्षेत्र में काम करके भारत की सेवा कर रहे हैं। डॉ. धनंजय कहते हैं, ‘‘मैं बचपन में असम के एक सुदूर इलाके में रहता था। वहां दूर-दूर तक कोई विद्यालय नहीं था। उन्हीं दिनों हमारे गांव में एकल विद्यालय शुरू हुआ। वहीं से मैंने चौथी तक की पढ़ाई की। इसके बाद की पढ़ाई के लिए स्कूल जाना मेरे लिए संभव नहीं था, क्योंकि वह बहुत दूर था। इसलिए पढ़ाई छूट गई। इसके बाद पिताजी के साथ सब्जी बेचने लगा।’’ वे कहते हैं, ‘‘दो साल तक सब्जी बेचने का काम किया। इसके बाद वनवासी कल्याण आश्रम के एक कार्यकर्ता से भेंट हुई तो उन्होंने मेरे पिताजी से कहा कि पढ़ने के लिए इसको कानपुर ले जाओ। वहां कोई खर्च नहीं होगा। इस पर वे तैयार हो गए, लेकिन उनके पास किराए का भी पैसा नहीं था। किसी से उधार लेकर वे मुझे कानपुर छोड़ गए।’’ डॉ. रियांग कहते हैं, ‘‘वनवासी कल्याण आश्रम के छात्रावास में रहकर 12वीं तक की पढ़ाई की। इसके बाद कानपुर मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के लिए मेरा चयन हो गया। वहीं से एमडी की भी पढ़ाई करने के बाद नौकरी करने लगा। जब तक नौकरी नहीं लगी तब तक कल्याण आश्रम ने हर तरह की मदद की।’’




कुछ ऐसी ही कहानी डॉ. दानीरूंग रियांग की भी है। वे भी एक शरणार्थी परिवार से हैं। इन दिनों वे गुवाहाटी में सेवा भारती द्वारा संचालित एक अस्पताल में योग एवं नेचुरोपैथी विभाग में चिकित्सक हैं। 1988 में मिजोरम के एक शरणार्थी शिविर में जन्मीं रियांग को यहां तक पहुंचाने का काम वनवासी कल्याण आश्रम ने किया है। 2000 में जब वे केवल 12 साल की थीं तभी वनवासी कल्याण आश्रम के रायपुर स्थित छात्रावास में लाई गई थीं। वहां कक्षा छठी से उनकी पढ़ाई शुरू हुई। वहां से 12वीं करने के बाद दुर्ग, पुणे और जर्मनी से उच्च शिक्षा प्राप्त कर वे आज देश की सेवा कर रही हैं। वे कहती हैं, ‘‘पढ़ाई के दौरान आश्रम के अधिकारियों ने कदम-कदम पर मेरा मार्गदर्शन किया और जब भी किसी चीज की जरूरत पड़ी उसे उपलब्ध कराया। वनवासी कल्याण आश्रम ने सिखाया कि अपने देश और समाज से बढ़कर कुछ नहीं है। इसलिए जब तक जीना है, देश के लिए जीना है।’’


देश में आज वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा गढ़े गए ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है। कभी कल्याण आश्रम के छात्रावासों में रहकर पढ़ने वाले बहुत सारे लोग आज सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। इनमें कई तो आज मंत्री, सांसद और विधायक तक हैं। इसके एक उदाहरण हैं पूर्व केंद्रीय मंत्री और वर्तमान में लोहरदगा से सांसद सुदर्शन भगत। वे स्वयं कहते हैं, ‘‘मैं जो कुछ हूं, कल्याण आश्रम के कारण हंू। आश्रम के संपर्क में आने के बाद ही यह समझ बढ़ी कि भारत क्या है, भारतीय संस्कृति क्या है और भारत के सर्वांगीण विकास के लिए हमारी क्या भूमिका हो सकती है। यह भी जाना कि धर्म और अध्यात्म क्या है। अध्यात्म के प्रति बढ़ी रुचि ने जीवन की राह आसान कर दी।’’


सुदर्शन झारखंड में गुमला जिले के रहने वाले हैं। प्रारंभिक पढ़ाई गांव में करने के बाद वे 1984 में पहली बार वनवासी कल्याण आश्रम के गुमला स्थित ‘वाल्मीकि छात्रावास’ में आए। वहां रहकर उन्होंने स्नातक तक की पढ़ाई की। उन्हीं दिनों वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े। फिर बाद में भाजपा में गए। 2000 में पहली बार विधायक बनने से पहले कई साल तक उन्होंने ‘पाञ्चजन्य’ का वितरण भी किया है। 


इन दिनों हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में पुलिस विभाग में एएसआई के पद पर कार्यरत विजय कुमार भी वनवासी कल्याण आश्रम की ही देन हैं। वे गांव करगानू, जिला सिरमौर के रहने वाले हैं। वे कहते हैं, ‘‘बात 1989 की है। मेरे गांव में संघ की शाखा लगती थी। मैं भी अपने घर वालों के साथ वहां जाता था। वहीं एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने मेरे घर की आर्थिक स्थिति के बारे में जाना तो उन्होंने मुझे ‘हिमगिरि कल्याण छात्रावास’ जाने को कहा। वहां 12वीं तक की पढ़ाई की। इसके बाद ही जीवन में बदलाव आया।’’


12वीं करने के बाद उन्होंने तीन साल तक पूर्णकालिक कार्यकर्ता के नाते कार्य किया, साथ ही स्नातक की पढ़ाई भी की। स्नातक करते ही पुलिस विभाग में नौकरी लग गई।

पहले दानदाता

वनवासी कल्याण आश्रम पूरी तरह समाज के सहयोग से काम करता है। इसके पहले दानदाता थे राजा विजय भूषण सिंह जूदेव। इसके बाद कार्यकर्ताओं ने समाज से संपर्क कर दान लेना शुरू किया। उसी दान से कल्याण आश्रम मुख्य रूप से शिक्षा, स्वावलंबन और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करता है। देश में जहां भी जनजातीय समाज है, वहां आश्रम का काम है। 


ऐसे हुई स्थापना

वनवासी कल्याण आश्रम के संस्थापक हैं वनयोगी रमाकांत केशव देशपांडे उपाख्य बाला साहब। वे संघ के स्वयंसेवक थे। श्रीगुरुजी की प्रेरणा से वे जनजातियों के बीच कार्य करने के लिए सपत्नीक नागपुर से जशपुर चले आए। उस समय उनकी उम्र केवल 35 साल थी और वे नागपुर में अच्छी-खासी वकालत कर रहे थे। सबसे बड़ी समस्या थी राष्ट्रीय विचारों की, शिक्षा की। उन्होंने थोड़ा-बहुत पढ़े ग्रामीणों को ही शिक्षक बनाया और उन्हें बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी। बाला साहब ने एक वर्ष के अंदर ही जशपुर के आस-पास 108 विद्यालय शुरू करवा दिए। इससे ग्रामीणों में उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी और वे उनकी बात मानने लगे। उन्होंने वनवासी बच्चों के लिए 26 दिसंबर, 1952 को छात्रावास की शुरुआत की। इसी दिन को वनवासी कल्याण आश्रम के स्थापना दिवस के रूप में भी जाना जाता है।


52,000 गांवों तक पहुंच

अभी वनवासी कल्याण आश्रम में 1,200 पूर्णकालिक कार्यकर्ता हैं। इनमें से 300 महिलाएं हैं। सबसे बड़ी बात है कि इन कार्यकर्ताओं में 70 प्रतिशत जनजातीय समाज से ग्रामीण पृष्ठभूमि के हैं। देश के 323 जिलों में कल्याण आश्रम का कार्य है। पूरे देश में लगभग 20,000 प्रकल्प हैं। लगभग 14,000 गांवों में समितियां हैं। कल्याण आश्रम की पहुंच लगभग 52,000 गांवों तक है। नगरों में भी वनवासी कल्याण आश्रम की समितियां हैं, जिनका कार्य है प्रकल्पों के लिए धन संग्रह करना।

वचनदेव कुजूर इन दिनों झारखंड में चतरा के समीप सिमरिया में सबडिवीजनल पुलिस आॅफिसर (एसडीपीओ) हैं। ये भी मानते हैं कि यहां तक का सफर पूरा करने में वनवासी कल्याण आश्रम की अहम भूमिका रही। वे 1997 में जब नौवीं कक्षा में थे तब गुमला में आश्रम के साथ जुड़े। वे कहते हैं, ‘‘आश्रम में नैतिक शिक्षा और जो संस्कार मिले, वे अभी भी काम आ रहे हैं। आज चारों ओर नैतिक पतन दिख रहा है। ऐसे समय में लगता है कि यदि मैं भी आश्रम के संपर्क में नहीं आता तो शायद उतना नैतिक  बल मेरे पास नहीं होता जितना आज है।’’


उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के चौबेपुर प्रखंड में पशुधन प्रसार पदाधिकारी के रूप में कार्यरत मनोज कुमार कहते हैं, ‘‘वनवासी कल्याण आश्रम के छात्रावास तो देवस्थान हैं और वहां सेवा करने वाले देव से कम नहीं हैं। इन देवों के आशीर्वाद से ही मुझ जैसे गरीब और उपेक्षित युवा आज एक सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं।’’ मनोज कुमार बलरामपुर जिले के नवलगढ़ के रहने वाले हैं। गरीबी के कारण घर वाले इन्हें पढ़ाने में समर्थ नहीं थे। जब उन्हें पता चला कि कानपुर के ‘बिरसा मुंडा वनवासी छात्रावास’ में बच्चों को पढ़ाने का कोई पैसा नहीं लगता तो वे मनोज को 1992 में छात्रावास छोड़ गए। वहां उन्होंने कक्षा छठी से पढ़ाई शुरू की। वहीं रहकर उन्होेंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और आज सरकारी अधिकारी हैं।


वनवासी कल्याण आश्रम के छात्रावासों में पढ़ने वाले कई युवा तो उच्च शिक्षा पाकर आश्रम का ही कार्य करने लगे हैं। जैसे मोहन भगत, डॉ. राजकिशोर हांसदा आदि। मोहन भगत तो इन दिनों वनवासी कल्याण आश्रम, असम के प्रांत संगठन मंत्री का दायित्व निभा रहे हैं। ये जब नौंवी कक्षा में पढ़ते थे तभी छत्तीसगढ़ में जशपुर के पास स्थित एक आश्रम से जुड़े। बाद में जशपुर आए और कल्याण आश्रम का काम करने के साथ-साथ पढ़ाई भी करने लगे। राजनीतिशास्त्र में स्नातकोत्तर करने के बाद वे पूरी तरह कल्याण आश्रम के कार्य में लग गए। वे कहते हैं, ‘‘आश्रम में पढ़ाई करने के दौरान अधिकारी कहा करते थे कि समाज के सहयोग से हम लोग काम कर रहे हैं। इसलिए हमें समाज के लिए भी कार्य करना चाहिए। उनकी इन बातों का मुझ पर बड़ा प्रभाव हुआ और तय किया कि पढ़ाई पूरी करके एक साल के लिए आश्रम के लिए कार्य करना है, लेकिन यहां ऐसा रम गया कि आज 20वें साल में भी लग रहा है कि अभी तो बहुत कुछ करना बाकी है।’’


ऐसे ही दूसरे कार्यकर्ता हैं डॉ. राजकिशोर हांसदा। वे इन दिनों ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ के राष्टÑीय सह संयोजक हैं। वे 1983 में झारखंड में जामताड़ा जिले के विद्यासागर स्थित छात्रावास में पढ़ने के लिए आए थे। वहीं इनका संघ से संपर्क हुआ और पढ़ाई के बाद प्रचारक बन गए। 1992 तक प्रचारक के रूप में इन्होंने प्रत्यक्ष रूप से संघ का कार्य किया। 1993 में उन्हें वनवासी कल्याण आश्रम का पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनाया गया। डॉ. हांसदा संथाल समाज से पहले ऐसे व्यक्ति हैं, जो संघ के प्रचारक बने। वे कहते हैं, ‘‘छात्रावास में रहते हुए यह जाना कि समाज के लिए नि:स्वार्थ भाव से कुछ करना ही सच्ची देश-सेवा है। सेवा की यह भावना हर व्यक्ति में आ जाए तो भारत पूरी दुनिया को पछाड़कर आगे निकल सकता है।’’


डॉ. हांसदा इन दिनों झारखंड में ‘सरना धर्म कोड’ के विरुद्ध आवाज बुलंद कर रहे हैं। उनका मानना है कि इस ‘कोड’ की मांग के पीछे देश-विरोधी ताकतें हैं। इसका उद्देश्य है जनजाति समाज को हिंदू समाज से दूर करना। इसलिए इसका विरोध होना ही चाहिए।


चाहे डॉ. धनंजय रियांग हों, डॉ. राजकिशोर हांसदा, सुदर्शन भगत या इस तरह के अन्य कार्यकर्ता, इन सबके जीवन को संवारने का काम वनवासी कल्याण आश्रम के उन हजारों कार्यकर्ताओं ने किया है, जिन्होंने कभी अपने लिए किसी से कुछ नहीं मांगा। ये लोग नींव के पत्थर के रूप में दिन-रात कार्य कर रहे हैं। इसी नींव पर वह भवन टिका है, जिसकी छत के नीचे जनजाति समाज के युवा अपना सुनहरा भविष्य गढ़ रहे हैं।

Friday, December 18, 2020

वॉलस्ट्रीट जर्नल तथा राहुल गांधी माफी मांगें: विहिप

 विश्व हिंदू परिषद ने एक बयान जारी कर कहा है कि बजरंग दल के विषय में वॉलस्ट्रीट जर्नल की मिथ्या रिपोर्ट के आधार पर राहुल गांधी ने जिस प्रकार फेसबुक की आड़ में बजरंग दल को बदनाम करने का षड्यंत्र रचा, उससे उनकी मानसिकता की कलई खुल गई है।

विश्व हिंदू परिषद ने एक बयान जारी कर कहा है कि बजरंग दल के विषय में वॉलस्ट्रीट जर्नल की मिथ्या रिपोर्ट के आधार पर राहुल गांधी ने जिस प्रकार फेसबुक की आड़ में बजरंग दल को बदनाम करने का षड्यंत्र रचा, उससे उनकी मानसिकता की कलई खुल गई है। विहिप महासचिव  मिलिंद परांडे की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा गया कि टुकड़े—टुकड़े गैंग, सीएए विरोधियों तथा दिल्ली के दंगाइयों सहित अनेक राष्ट्र विरोधियों के साथ खड़े होकर उनकी पैरवी करने वाले राहुल गांधी को बजरंग दल जैसा राष्ट्रवादी संगठन आंखों में खटक रहा है।

चीन के साथ उनके रिश्ते जगजाहिर हैं। उन्हें अमेरिकी जर्नल पर तो विश्वास है किंतु एक राष्ट्रव्यापी राष्ट्रवादी युवा संगठन पर नहीं! श्री परांडे ने वॉल स्ट्रीट जनरल से भी उसके इस अक्षम्य अपराध के लिए माफी मांगने को कहा है। उन्होंने कहा कि उसने बजरंग दल की आड़ में भारत को बदनाम करने का जो दुस्साहस किया है, उसे हम कदापि स्वीकार नहीं करेंगे।

उन्होंने कहा कि इससे पहले विकीलीक के माध्यम से मीडिया में आई खबरों से स्पष्ट होता है कि श्रीमती सोनिया गांधी भी बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने के अनेक षड्यंत्र रच चुकी हैं जिनमें, वे सफल नहीं हो पाईं। अब फेसबुक ने वॉल स्ट्रीट जनरल की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए जो सच्चाई बताई है, वह इन्हें पच नहीं पा रही। इससे इनकी विद्वेष पूर्ण हिन्दू विरोधी मानसिकता स्पष्ट परिलक्षित होती है।

श्री परांडे ने कहा कि राहुल गांधी तथा वाल स्ट्रीट जर्नल को बजरंग दल सहित देश के हिंदू समाज से माफी मांगनी चाहिए।

Saturday, December 12, 2020

अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे विपक्षी दल, इसलिए अब किसानों को भड़का रहे हैं

 

कथित किसान आंदोलन के पीछे एक ही सोच काम कर रही है और वह है अस्तित्व बचाने की आखिरी लड़ाई. कांग्रेस हो या टीआरएस, सपा हो या द्रमुक या फिर वामपंथी. इन सभी दलों के सामने अब अस्तित्व का संकट है. अस्तित्व बचाने की इस लड़ाई में ये दल कभी सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर राष्ट्र विरोधी ताकतों की गोद में बैठ जाते हैं. तो अब ये किसानों को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं.


22 पार्टियां मिलकर कृषि सुधारों को पलीता लगाने के लिए भारत बंद बुलाती हैं और ये फेल हो जाता है. क्यूं! बहुत से कारण हो सकते हैं. लेकिन इनमें सबसे अहम कारण है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लोगों का विश्वास. आप कितना ही जोर से चिल्ला लें, लेकिन आम भारतीय जनमानस कम से कम इस आरोप पर तो विश्वास नहीं कर सकता कि मोदी गरीबों, किसानों के अहित का कोई फैसला ले सकते हैं. अब इसका मुकाबला कीजिए, भारत बंद करने चली पार्टियों की विश्वसनीयता और ईमानदारी से. जरा तोल कर देखिए. एक तरफ मोदी और दूसरी तरफ चालीस चोर. दिल्ली में चल रहे प्रायोजित धरने-प्रदर्शन के अलावा कहीं विरोध नहीं. और विरोध तो छोड़िए, जरा राजस्थान के पंचायत चुनाव पर ही गौर कर लीजिए. विशुद्ध रूप से किसानों के बीच हुए इस चुनाव में भाजपा को जोरदार सफलता मिली है. ये सफलता कृषि सुधारों पर किसान की मोहर है.

किसानों की मसीहा बनने चली कांग्रेस पार्टी और उसके पिछलग्गू गैंग का ट्रैक रिकॉर्ड किसान के पास है. वही किसान, जो कभी यूरिया के लिए लाठी खाता. फिर ब्लैक में खाद खरीदता था. कांग्रेस के महान अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार को किसान भूला नहीं है. 2004 में जब यूपीए की सरकार बनी, तो अटल बिहारी वाजपेयी ने कृषि क्षेत्र में चार फीसद विकास दर की विरासत दी थी. सन 2014 में जब मनमोहन सिंह की मंडली से देश का पीछा छूटा, तो विकासदर नकारात्मक होकर शून्य से भी नीचे जा चुकी थी. यह कृषि और उस क्षेत्र से जुड़े समूचे वर्ग का सबसे अहम सूचकांक है. किसानों की ये दुर्गति करने में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार का अहम योगदान है. जी हां, वह यूपीए के स्टार कृषि मंत्री थे.

कृषि मंत्री बनने से पहले, मंत्री पद पर रहते हुए और उसके बाद भी आज तक, कृषि उत्पादों के दामों के साथ कैसे खेलना है, इसके पवार महारथी हैं. उनके इशारे पर आज भी एनसीडीएक्स के दामों में उठा-पटक चलती है. मनमोहन सिंह और शरद पवार की जोड़ी कितनी किसान हितैषी थी, जरा इन आंकड़ों पर गौर करें. आधिकारिक आंकड़ा एक लाख सत्तर हजार है. हालांकि उत्तर प्रदेश के कृषि अनुसंधान मंत्री सूर्य प्रताप शाही दावा करते हैं कि यूपीए के शासनकाल में कुल दो लाख 66 हजार किसानों ने आत्महत्या की. यह भी जानकर आपको ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि जिस महाराष्ट्र से शरद पवार आते हैं, वहां आबादी के औसत से किसानों की आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा रही. ये तो है कांग्रेस और उसके पिछलग्गू बनावटी किसान हितैषियों का काला सच.

अब जरा इस बात पर भी गौर कीजिए कि तमाम हाय-तौबा के बावजूद किसान क्यों झांसे में नहीं आ रहा है. 25 जून, 2015 को सरकार द्वारा प्रायोजित दुनिया की सबसे बड़ी आवासीय योजना शुरू हुई. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अभी तक 35 लाख गरीबों को पक्का मकान मिल चुका है. 60 लाख से ज्यादा आवास मंजूर किए जा चुके हैं. कुल मिलाकर एक करोड़ दस लाख लोगों के सिर पर पक्की छत के वादे में आधा काम पूरा हो चुका है. उन घरों में रहने वाला कोई व्यक्ति कैसे इस बात पर विश्वास कर सकता है कि उसे पक्की छत देने वाला शख्स उसकी जमीन छीन लेगा, उसकी उपज अमीरों को दे देगा. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2 अक्टूबर 2014 से अब तक देश में कुल 10,69,00,081 शौचालयों का निर्माण करवाया जा चुका है. जो शख्स आपकी बहु-बेटी को खुले में शौच के लिए जाते नहीं देख सकता, उस पर कितना बेजा लगता है ये इलजाम कि वह किसान के साथ धोखा कर देगा. उज्जवला योजना में अब तक आठ करोड़ से ज्यादा गैस कनेक्शन जारी किए गए हैं. इनके अधिकतर लाभार्थी ग्रामीण इलाकों की महिलाएं हैं. आप जब देखते हैं कि तमाम चुनावी सर्वेक्षण फेल हो जाते हैं और भाजपा जीतती है, तो वह इसी वजह से. सरकार घर की रसोई तक पहुंची है. बीपीएल परिवारों को मुख्य खाद्यान्न दिया जा रहा है. हर गांव तक बिजली पहुंचा देने जैसा असंभव काम हो चुका है.

जब आप ग्रेटर हैदराबाद नगर पालिका में भाजपा का चमत्कारी उदय देखते हैं, तो उसके पीछे वह गहरे तक जमती विश्वास की पूंजी है, जो मोदी सरकार ने बहुत मेहनत से कमाई है. इसी कथित किसान आंदोलन के बीच राजस्थान में पंचायत चुनाव हुए हैं. कांग्रेस ने तो पूरा चुनाव ही इस मुद्दे पर लड़ा. नतीजा, किसानों ने कांग्रेस को नकार दिया. राजस्थान विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा रही भाजपा 21 में से 14 जिलों में बोर्ड बनाने जा रही है. चुनाव आयोग द्वारा जारी फाइनल रिजल्ट के मुताबिक 636 जिला परिषद के सदस्यों में 353 पर भाजपा और 252 पर कांग्रेस सदस्य विजयी हुए हैं. वहीं पंचायत समिति की 4371 सीटों में से कांग्रेस ने 1799, तो भाजपा ने 1932 सीटें जीती हैं.

इस पूरे आंदोलन के पीछे एक ही सोच काम कर रही है और वह है अस्तित्व बचाने की आखिरी लड़ाई. कांग्रेस हो या टीआरएस, सपा हो या द्रमुक या फिर वामपंथी. इन सभी दलों के सामने अब अस्तित्व का संकट है. अस्तित्व बचाने की इस लड़ाई में ये दल कभी सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर राष्ट्र विरोधी ताकतों की गोद में बैठ जाते हैं. तो अब ये किसानों को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन जमाना बदल चुका है. हर गांव, नुक्कड़ तक मोबाइल फोन है और किसान को अपने फायदे व नुकसान को समझने के लिए कम से कम किसी कांग्रेसी नेता से ट्यूशन लेने की जरूरत तो बिल्कुल नहीं है

पहले वकालत फिर खिलाफत


कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों ने संसद की स्थायी समिति में किसान विधेयक में इन्हीं सुधारों की वकालत की थी और अब जब नरेन्द्र मोदी सरकार किसानों के हित में उन सुधारों को लागू कर रही है तो विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं।


कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों ने संसद की स्थायी समिति में किसान विधेयक में इन्हीं सुधारों की वकालत की थी और जब नरेन्द्र मोदी सरकार किसानों के हित में उन सुधारों को लागू कर रही है तो विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं।

यूपीए-2 की सरकार में कृषि मंत्री रहे शरद पवार ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी एक्ट में बदलाव की जरूरत बताते हुए देश में एक मॉडल एक्ट की वकालत की थी. कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों के चुनावी घोषणा पत्र में एपीएमसी एक्ट में संशोधन की बात प्रमुखता से कही गई. समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव, टीएमसी, अकाली दल और कांग्रेस के नेताओं ने संसद की स्थायी समिति में एपीएमसी एक्ट में संशोधन की आवश्यकता का समर्थन किया था.




इन सभी दलों ने समय-समय पर 'वन नेशन-वन मंडी' को देश के लिए उपयोगी बताया था लेकिन आज जब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार किसानों के उत्तम भविष्य को सुनिश्चित करते हुए यही कानून लाई है तो यही राजनीतिक दल इसका विरोध कर रहे हैं. जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार आई तो तत्कालीन कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया था कि हमें एपीएमसी एक्ट में संशोधन के लिए कोशिश करनी चाहिए. यही नहीं, दिल्ली की केजरीवाल सरकार तो नए अध्यादेश के मुताबिक नोटिफिकेशन जारी करने के बाद अब फिर इसी का विरोध कर रही है.

 उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस पूरे मसले पर कहा, “ यह दल जब सत्ता में रहते हैं तो इनका वक्तव्य कुछ और रहता है। स्टैंडिंग कमेटी में जहां गहन चर्चा होती है, वहां कुछ और कहते हैं और जब विपक्ष में होते हैं, तो इनके बयान आश्चर्यजनक रूप से बदल जाते हैं. दरअसल यही दोहरा चरित्र इनका असल चेहरा है. जनता इसे भली भांति समझती है. देश इस दोहरे रवैये वाले चरित्र को स्वीकार नहीं करेगा. एक ऐसे दौर में जबकि हम कोरोना के खिलाफ जारी वैश्विक जंग जीतने के कगार पर हैं, तब विपक्षी दलों द्वारा इस तरह किसानों को गुमराह कर अराजकता फैलाने की कोशिश हमारी लड़ाई को कमजोर करने का कुत्सित प्रयास है. पीएम किसान सम्मान, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना सहित अनेक योजनाओं के केंद्र में किसान कल्याण ही है. किसान भाइयों को गुमराह करने की हर कुत्सित कोशिश बेकार जाएगी. केंद्र की सरकार लगातार किसानों से वार्ता कर रही है, जल्द ही इसका सकारात्मक परिणाम सामने आएगा.”

Friday, December 11, 2020

सेवा कार्यों के माध्यम से समाज में पर‍िवर्तन लाएगा संघ

गत बुधवार को उत्तर प्रदेश स्थित बरेली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नए केन्‍द्र 'केशव कृपा' का लोकार्पण समारोह संपन्न् हुआ। इस दौरान राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि संघ सेवा कार्यों के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाएगा

सबके जीवन व्‍यवहार में सेवा का भाव होना चाह‍िए। सेवा का संस्‍कार इंसान को संवेदनशील बनाता है। सेवा से संगठन का भाव पैदा होता है। उक्त बात राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कही। वे गत बुधवार को उत्तर प्रदेश स्थित बरेली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नए केन्‍द्र 'केशव कृपा' के लोकार्पण समारोह में संगठन पदाध‍िकारी और प्रमुख लोगों को सम्‍बोध‍ित कर रहे थे

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री होसबाले ने कहा क‍ि सबको साथ लेकर चलने के संकल्‍प के साथ संघ का ध्‍येय सेवा है। सेवा कर्मों के माध्यम से संघ समाज में परिवर्तन लाएगा। पूरे देश में हर स्वयंसेवक का घर एक कार्यालय होता है। ऐसे कई लाख कार्यालय संचालित होते हैं। केशव कृपा एक मंदिर स्वरूप में है और इसके माध्यम से समाज की बड़ी सेवा की जा सकती है।

देश—दुनिया में जहां सरकारें विभिन्न काम समाज के ल‍िए  करती हैंं, वहीं भारत में समाज स्वयं बहुत सेवा कार्य करता है। उन्‍होंने पत्रकारों से वार्ता करते हुए कहा क‍ि स्‍वयंसेवकों ने समाज के सहयोग से बरेली में केशव कृपा केन्‍द्र को तैयार क‍िया है। इसमें योग और ध्‍यान केन्‍द्र के अलावा एलोपैथ‍िक, होम्‍योपैथ‍िक और आयुर्वेद च‍िक‍ित्‍सा की व्‍यवस्‍था भी की गई है। बाहर से आने वाले स्‍वयंसेवक यहां व‍िश्राम कर सकेंगे। केशव कृपा में मौजूद आधुन‍िक सुव‍िधाओं का इस्‍तेमाल सबको समाज ह‍ित में करना जाना चाह‍िए।

कार्यक्रम में उपस्थित स्वामी राजराजेश्वराश्रम जी महाराज ने कहा कि भगवान राम की कृपा से केशव कृपा का सपना साकार हुआ है। देश दुनिया में सभी यूनिवर्सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ़ आर्ट्स होती है। इसी प्रकार का यह एक बड़ा विश्वविद्यालय हैं, जिसे हम यूनिवर्सिटी ऑफ़ हार्ट्स कहते हैं। कार्यक्रम में उपस्थित अखिल भारतीय सह संपर्क प्रमुख श्री रामलाल ने कहा कि संघ स्वयं कुछ भी नहीं करता, परंतु उसके स्वयंसेवक समाज हित एवं राष्ट्र हित के लिए कुछ भी करना नहीं छोड़ते। उसी श्रृंखला में आज जिन केंद्रों का लोकार्पण हुआ है, सभी वह सभी स्वयंसेवकों द्वारा समाज़ को अर्पित हैं

Friday, September 25, 2020

पं. दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर विशेष : दीनों पर दया करने वाले दीनदयाल

 समाज के अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति भी एक दिन सुखी और संपन्न जीवन बिताए, इसकी कल्पना दीनदयाल जी ने  की थी। यह अच्छी बात है कि आज उनकी इस कल्पना को पूरा करने के लिए कई सरकारें काम कर रही हैं।


राष्ट्र का अस्तित्व उसके नागरिकों के जीवन का ध्येयभूत आधार है। जब एक मानव-समुदाय के समक्ष एक व्रत, विचार या आदर्श रहता है एवं वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो राष्ट्र कहलाता है। इनमें से एक का भी अभाव रहा तो राष्ट्र नहीं बनेगा।पं.दीनदयाल उपाध्याय

सहृदयता, बुद्धिमता, सक्रियता एवं अध्यवसायी वृत्ति वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक व्यक्ति नहीं, अपितु एक विचार और जीवनशैली हैं। राष्ट्र एवं समाज के प्रति आजीवन समर्पित रहने वाले पंडित जी ने अपने मौलिक चिंतन से राष्ट्र-जीवन को प्रेरित और प्रभावित किया। वे ‘राष्ट्रधर्म प्रकाशन’ के संस्थापक एवं ‘राष्ट्रधर्म’, ‘पाञ्चजन्य’, ‘दैनिक स्वदेश’ व ‘तरुण भारत’ जैसी राष्ट्रवादी पत्र-पत्रिकाओं के प्रेरणास्रोत भी थे। भारतीय समाज-जीवन को सुखी, संपन्न एवं मंगलकारी बनाने के निमित्त उन्होंने ‘एकात्म मानवदर्शन’ व ‘अन्त्योदय’ की अद्भुत संकल्पना प्रस्तुत की। उनके चिंतन के मूल में लोकमंगल एवं राष्ट्र-कल्याण का भाव समाहित है। उन्होंने राष्ट्र को धर्म, अध्यात्म एवं संस्कृति का सनातन पुंज बताते हुए राजनीति की नई व्याख्या की। वे गांधी, तिलक एवं सुभाष की परंपरा के वाहक थे। वह दलगत एवं सत्ता की राजनीति से ऊपर उठकर वास्तव में एक ऐसे राजनीतिक दर्शन को विकसित करना चाहते थे जो भारत की प्रकृति एवं परंपरा के अनुकूल हो एवं राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने में समर्थ हो। अपनी व्याख्या को उन्होंने ‘एकात्म मानववाद’ का नाम दिया। एक ओर उन्होंने जहां समाजवाद, मार्क्सवाद एवं पूंजीवाद सरीखी अभारतीय विचारधाराओं को भारतीय चिंतन-परंपरा, भारतीय दृष्टिकोण एवं भारतीय जीवन-शैली के सर्वथा प्रतिकूल माना, उन्हें अस्वीकार किया, वहीं, दूसरी ओर भारतीय मानस के अनुकूल ‘एकात्म मानवदर्शन’ व ‘अन्त्योदय’ की संकल्पना प्रस्तुत कर भारत को भारत की दृष्टि से देखने-समझने का एक सार्थक सूत्र भी दिया।


‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की मान्यता से अनुप्राणित उनका चिंतन ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ भाव-साधना का सिद्धांत है। उन्होंने राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की प्रस्तावना करते हुए बताया कि ये अन्यान्योश्रित हैं। वे उत्पादन में वृद्धि, उपभोग में संयम और वितरण में समानता के पक्षधर थे। व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्टि की एकात्मता और शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के उन्नयन की चिंता उनका मूल ध्येय है।  अभारतीय विचारधाराओं में मानव-मात्र को टुकड़ों में बांट कर देखने की पद्धति अपनाई गई है। अत: वहां सम्यक मूल्यांकन का कोई अवकाश नहीं होता। दीनदयाल जी का स्पष्ट मत है कि एकांगी होकर मनुष्य को केवल ‘आर्थिक प्राणी’ के रूप में देखने की परंपरा नितांत अभारतीय है। इससे मानव-सभ्यता के विकास के उन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता, जो किसी राष्ट्र को ‘परम वैभव’ तक पहुंचाने में सहायक सिद्ध होते हैं। उनकी दृष्टि में मनुष्य को सर्वप्रथम ‘मनुष्य’ ही माना जाना चाहिए। उसकी समस्त आवश्यकताओं, उसके जीवन के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक आयामों को ध्यान में रखकर चिंतन करते हुए संतुलित-विकास के पथ पर निरंतर आगे बढ़ना चाहिए।


दीनदयाल जी भारत की ‘चिति’ और ‘विराट’ को अपने चिंतन-मनन के केंद्र में रखते हैं।


उनकी स्पष्ट धारणा है कि हमें अपनी प्राचीन संस्कृति का विचार अवश्य करना चाहिए। किंतु हम इस बात के प्रति भी सचेत रहें कि हम पुरातत्ववेत्ता नहीं हैं। हमारा ध्येय अपनी संस्कृति का संरक्षण करना ही नहीं, अपितु उसे गति देकर सजीव व सक्षम बनाए रखना भी होना चाहिए। हमें अपनी रूढ़ियां समाप्त करनी चाहिए। अपनी कमियों की परख कर उनमें सुधार करना चाहिए। सामाजिक जीवन में मौजूद भेदभाव, छुआछूत एवं अस्पृश्यता जैसी विभेदकारी धारणाओं को तोड़ना चाहिए। हमें प्रत्येक मनुष्य से सबसे पहले मनुष्य के रूप में जुड़ना चाहिए, क्योंकि सांस्कृतिक एकता एवं राष्ट्र की एकता के लिए उपरोक्त विभेदकारी विचार सर्वथा घातक है।

समाज ‘स्वयंभू’ है। जिस प्रकार व्यक्ति पैदा होता है, उसी प्रकार समाज भी पैदा होता है। व्यक्ति मिलकर कभी समाज को नहीं बनाते। ......वास्तव में समाज तो एक ऐसी सत्ता है, जिसकी अपनी आत्मा है, जिसका अपना एक जीवन है, इसलिए यह भी उसी प्रकार से जीवमान सत्ता है, जैसे मनुष्य जीवमान सत्ता है।

दीनदयाल जी की दृष्टि में धर्म, अर्थ एवं काम की पूर्ति व इनके सामंजस्य से मोक्ष की प्राप्ति ही मनुष्य जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएं हैं। इनमें से किसी एक के प्रति भी विशेष आग्रह या असंतुलन व्यक्ति के जीवन को समस्याग्रस्त बना सकता है। दीनदयाल जी अपने पूरे चिंतन में बारम्बार इस विचार पर बल देते हैं, ‘‘मानव केवल एक व्यक्ति मात्र नहीं है। शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा का समुच्चय है। व्यक्ति केवल एकवचन ‘मैं’ तक सीमित नहीं, उसका बहुवचन ‘हम’ से भी अभिन्न संबंध रखता है। अत: हमें समाज व समष्टि का विचार करना होगा।’’


वास्तव में, दीनदयाल जी व्यष्टि एवं समष्टि या कहें कि व्यक्ति एवं समाज को एक-दूसरे की सापेक्षता में देखने के आग्रही हैं। यह विचार पश्चिम के दार्शनिक-विचारों से भिन्न है। उनकी दृष्टि में, ‘‘मानव न केवल व्यक्ति है, मानव न केवल समाज है, वरन् मानव व्यक्ति एवं समाज की एकात्मता में से पैदा होता है। व्यक्ति एवं समाज को बांट दें तो मानव मर जाता है। अस्तित्व में ही नहीं आता। व्यष्टि एवं समष्टि एकात्म इकाई है। इस एकात्म इकाई का नाम मानव है। इसलिए मानव को सुखी करना है तो व्यक्तिवादी होकर नहीं कर सकते, क्योंकि व्यक्तिवादी समाज की उपेक्षा करता है। समाजवादी होकर भी नहीं कर सकते, क्योंकि समाजवाद व्यक्ति के व्यक्तित्व को कुचल देता है।’’ स्पष्ट है कि व्यष्टि से समष्टि एवं परमेष्टि तक पहुंचने की मनुष्य की यात्रा अलग-अलग खण्डों में विभाजित नहीं है। उसे अलग-अलग घेरे हुए नहीं है। यह एक-दूसरे से पूर्णत: असंबद्ध नहीं है। वह एक ही केंद्र से निसृत समग्र जीवन में सातत्य के साथ प्रवाहमान कहीं पर भी खंडित न होने वाला आवृत है। ‘एकात्म मानवदर्शन’ व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि व परमेष्टि तक की इसी यात्रा, इसी संबद्धता, मानव-जीवन की इसी समग्रता, इसी सातत्य व प्रवाह एवं इसी आवृत को समझने का सहज-सूत्र है।


‘एकात्म मानवदर्शन’ की संकल्पनाकार दीनदयाल जी के चिंतन का फलक बहुत व्यापक एवं सुगठित है। वे एक साथ व्यक्ति, समाज, राजनीति, धर्म, राष्ट्र आदि न जाने कितने विषयों पर विचार करते हैं। किंतु प्रत्येक जगह उनके विचारों में एक सह-संबंध, पारस्परिकता एवं नयापन परिलक्षित होता है। समाज के विषय में वे लिखते हैं, ‘‘समाज ‘स्वयंभू’ है। जिस प्रकार व्यक्ति पैदा होता है, उसी प्रकार समाज भी पैदा होता है। व्यक्ति मिलकर कभी समाज को नहीं बनाते। ......वास्तव में समाज तो एक ऐसी सत्ता है, जिसकी अपनी आत्मा है, जिसका अपना एक जीवन है, इसलिए यह भी उसी प्रकार से जीवमान सत्ता है, जैसे मनुष्य जीवमान सत्ता।’’ वास्तव में, यह समाज की भौतिक व्याख्या नहीं, अपितु तात्विक व्याख्या है। इसलिए यहां समाज को पश्चिम  के ‘द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ के सूत्र के आधार पर स्पष्ट नहीं किया जा सकता। ‘राष्ट्र’ पर चिंतन करते हुए पंडित जी ने लिखा है, ‘‘राष्ट्र का अस्तित्व उसके नागरिकों के जीवन का ध्येयभूत आधार है। जब एक मानव-समुदाय के समक्ष एक व्रत, विचार या आदर्श रहता है एवं वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो वह राष्ट्र कहलाता है। इनमें से एक का भी अभाव रहा तो राष्ट्र नहीं बनेगा।’’


स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन परंपरा में ‘राष्ट्र’ केवल भौतिक सीमाओं पर आधारित भौगोलिक इकाई या भौतिक सरणी नहीं है। इसका संबंध समानधर्मी, समानदर्शी एवं समानुभूति पर आधारित सामूहिक समभाव से है। यही कारण है कि पंडित जी ‘राष्ट्र’ की ऐसी परिकल्पना कर ‘भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को महत्त्व देते हैं। ‘भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की विचार-सरणी को मानने वाला प्रत्येक व्यक्ति समानव्रती, सामान दर्शन व सामान मूल्यों को मानने वाला होता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, कच्छ से कामरूप तक प्रत्येक भारतीय एक-दूसरे से ‘एकात्म-भाव’ से जुड़ा हुआ है। भले ही उसकी भाषा अलग हो, संस्कृति अलग हो, रहन-सहन अलग हो, पंथ-संप्रदाय अलग हो, किंतु वह संपूर्ण भारतभूमि के कण-कण को पवित्र मनाता है। सबके हित की कामना करता है।


इतना ही नहीं, समान व्रत, समान दर्शन, समान मूल्यों को मानने वाले व्यक्ति संसार में जहां भी उपस्थित हैं, वे सभी इस भारत-भूमि, इस राष्ट्र के समभाव एवं संकल्पना में समाहित हैं। इस प्रकार दीनदयाल जी की ‘राष्ट्र’ की संकल्पना व ‘भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की विचार-प्रणाली भी संपूर्णता एवं सामूहिकता की भावना से अनुप्राणित है। यह दृष्टि पश्चिम की ‘नेशन’ एवं ‘नेशनलिज्म’ अर्थात ‘राष्ट्र’ एवं ‘राष्ट्रवाद’ की दृष्टि से सर्वथा भिन्न है। वे ‘एकात्म मानव-दर्शन’ के तहत ‘राष्ट्र’ की भी तात्विक व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार, ‘‘राष्ट्र की भी एक आत्मा होती है। उसका एक शास्त्रीय नाम है। इसे ‘चिति’ कहा गया है।’’ इस प्रकार दीनदयाल जी ‘राष्ट्र’ की संकल्पना में व्यक्ति को एक साधन के रूप में देखते हैं। व्यक्ति स्वयं के अतिरिक्त अपने राष्ट्र का भी प्रतिनिधित्व करता है। स्पष्ट है कि दीनदयाल जी द्वारा प्रस्तावित ‘एकात्म मानव-दर्शन’ एक वायवीय विचार नहीं है, बल्कि एक कालजयी सिद्धांत है।