Monday, September 14, 2020

सतर्क और शक्तिशाली भारत

 सतर्क और शक्तिशाली भारत

कोविड कुहासे के बीच भारत के इस स्वतंत्रता दिवस का सूर्योदय कुछ अलग है। महामारी को चित्त करने के लिए दुनिया सामाजिक दूरी का दाव आजमा रही है और इस बीच भारत ने वैश्विक संबंधों की दशकों पुरानी खाइयों को पाटने वाले लंबे डग भर डाले हैं

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इस राष्ट्र की चाल-ढाल में ऐसा आत्मविश्वास देखकर विश्व हैरान है, शत्रु परेशान हैं और मित्रता के लिए आगे आते देश आश्वस्ति भाव से भर उठे हैं।

यह स्वाभाविक ही है।

‘यूरोपियन फाउंडेशन फॉर साउथ एशियन स्टडीज’ जैसे विचार समूह मानते हैं कि लद्दाख में चीन की धौंसबाजी को भारत ने जिस दृढ़ता से ठंडा किया है उसकी कल्पना भी ड्रैगन को नहीं थी। भू-रणनीतिक विशेषज्ञों का आकलन था कि जापान, अमेरिका, आस्ट्रेलिया के साथ मिलकर भारत चौकड़ी बनाएगा और तब चीन की हनक ठीक होगी। परन्तु बड़े आघात की आहट भर से भारत जिस तरह, अपने बूते चीन के सामने तनकर खड़ा हुआ उसने बता दिया कि चीजें तेजी से बदल रही हैं।

व्यक्ति, परिवार या राष्ट्र, मूल चरित्र की परीक्षा परेशानी के समय ही होती है। जो भीतर से कमजोर होते हैं, बाधाओं में बिखर जाते हैं। इसके उलट जो आंतरिक तौर पर शक्ति सम्पन्न होते हैं वे आपदाओं को अवसर में बदलने वाला इतिहास लिखते हैं।

कोरोना संक्रमण से पहले ही अर्थ, राजनीति तथा विश्व व्यवहार समीकरणों के जानकार यह मानकर चल रहे थे कि अगली सदी एशिया की है। किंतु एकाएक उत्पन्न डगमगाहट के समय संतुलन, अनिर्णय के समय निर्णय और फूट के समय एकजुटता का परिचय देकर भारत ने महाद्वीप में अपने स्थान व सम्मान को रेखांकित कर दिया है।

प्रश्न है कि अचानक भारत ने यह शक्ति और सूझ पाई

कहां से?

इसका उत्तर छह वर्ष पूर्व आम चुनाव के उन परिणामों में छिपा है, जहां से नीतिगत बदलावों का दौर शुरू हुआ।

नहीं, यह बात केवल एक दल या राजनीति की नहीं है। यह उस समाज के मनोनुकूल परिवर्तन की है जो देश, इसकी व्यवस्था आदि को ढर्रे पर लाने के लिए दशकों से मचल रहा था।

समाज का मन था, भाजपा माध्यम बनी।

जनता ने उम्मीदों की उछाल के साथ राज पहले भी बदले थे, किंतु इस बार सबने देखा कि राज का मिजाज बदला। सत्ता परिवर्तन के साथ ही भारत वह लीक ठीक करने के लिए संकल्पित होता दिखा, जो औपनिवेशिक विचारों के प्रभाव में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही छोड़ बैठा था।

1947 में अंग्रेज गए थे, शासकों-नौकरशाहों की सोच का खांचा वही था। व्यवस्था और तंत्र वही था। दबाव, आघातों को झटकते हुए व आधारभूत संस्कार-सिद्धांतों पर दृढ़ रहते हुए यह देश आज ‘स्व’ की अलख जगाता दिखता है।

सदियों से उलझे से सांस्कृतिक सम्मान के प्रश्न सुलझ रहे हैं। घिसे, अड़चन पैदा करते कानूनों के ढेर हट रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को देश से काटने वाले बंधन

कटे हैं।

नई शिक्षा नीति ‘मानव’ को ‘संसाधन’ भर बनाने की बजाय समझदार, संस्कारित करने की राह बनाती दिखती है।

सीमाओं पर सतर्क और शक्तिशाली, राजनीतिक तौर पर स्पष्ट और निर्णयक्षम तथा आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर आज के भारत का आधार ठोस है, यह न मानने का कोई कारण नहीं।

भौतिकी, अभियांत्रिकी का सिद्धांत है कि कोई त्रिभुज ही सबसे ठोस आधार हो सकता है, क्योंकि इसकी एक भुजा दूसरे को संभाले रहती है।

राष्ट्र को राजनीति से ऊपर रखने वाले विचार के साथ रीति-नीति में मूलभूत परिवर्तन के साथ भारत राज, समाज और अर्थ का, स्वदेशी, स्वावलंबन और विकेंद्रीकरण का ऐसा ही ठोस, अर्थपूर्ण त्रिकोण रचता दिखता है।

आत्मनिर्भरता के उद्घोष के साथ आपदा को अवसर में बदलने की जिद इस देश के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोल रही है।

Sunday, September 6, 2020

शिक्षक दिवस: विलक्षण थी प्राचीन भारत की शिक्षा पद्धति

 

शिक्षक दिवस: विलक्षण थी प्राचीन भारत की शिक्षा पद्धति

भारत की गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में "शिक्षक" को ऐसी मार्गदर्शक सत्ता माना जाता था जो भ्रम व अज्ञान के सभी आवरण हटाकर शिष्य के अन्तस को आत्मज्ञान की ज्योति से आलोकित कर देती थी

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प्राचीन भारत में शिक्षा को व्यवस्थित रूप देने के क्रम में हमारे तत्वदर्शी मनीषियों के समक्ष सर्वप्रथम दो प्रश्न उभरे थे। प्रथम ‘क्या’ सिखाया जाए तथा द्वितीय ‘कैसे’ सिखाया जाए? इन प्रश्नों पर व्यापक चिंतन के फलस्वरूप वैदिक भारत में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की नींव पड़ी थी। इस चिर पुरातन गुरु-शिष्य परम्परा के कारण प्राचीन काल में हमारा भारत आत्मविद्या के शीर्ष पर था। आधुनिक समाज सुशिक्षित मनुष्य का आकलन इस बात से करता है कि ‘‘तुम्हारे पास क्या है! ’’ जबकि प्राचीन भारतीय चिंतन में विद्यावान व्यक्ति को इस तराजू पर तौला जाता था कि ‘‘तुम क्या हो!’’ शिक्षा व विद्या, भोग व योग, भौतिकता व आध्यात्मिकता तथा प्रकृति व परमात्मा आदि के सन्तुलित समन्वय पर आधारित वैदिक भारत की शिक्षा व्यवस्था ने ही हमारे देश को ‘‘सोने की चिड़िया’’ व ‘‘विश्वगुरु’’ बनाया था।

शाश्वत जीवन मूल्यों और सुसंस्कारों के सतत बीजारोपण की इस अमूल्य परम्परा के पोषक भारतीय ऋषियों की मान्यता थी- ‘‘विद्या सा या विमुक्तये’’ अर्थात विद्या वह जो मुक्ति प्रदान करे। भारत की गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में "शिक्षक" को ऐसी मार्गदर्शक सत्ता माना जाता था जो भ्रम व अज्ञान के सभी आवरण हटाकर शिष्य के अन्तस को आत्मज्ञान की ज्योति से आलोकित कर देती थी। संस्कृति के पुण्य प्रवाह में हमारी आध्यात्मिक धरा के तप:पूत आचार्यों व शिक्षकों के आत्मज्ञान की प्रखर ऊर्जा ने न केवल समूचे राष्ट्रजीवन को प्रकाशमान किया था अपितु अपने सुपात्र शिष्यों के माध्यम से इस दिव्य आत्म विद्या के सतत प्रवाहमान बने रहने की व्यवस्था भी सुनिश्चित की थी।

प्राचीन भारतीय वांग्मय में हमें गुरुकुल शिक्षण परम्परा की तमाम विलक्षणताओं विहंगम दिग्दर्शन होते हैं। नगरों और गांवों से दूर शान्त, स्वच्छ और प्रकृति की सुरम्य गोद में संचालित होने वाले वैदिक भारत के इन गुरुकुलों का मुख्य उद्देश्य कोरे पुस्तकीय ज्ञान के स्थान पर शिक्षा, विद्या और दीक्षा के समन्वय पर केन्द्रित था। राजाश्रय व जनसहयोग से चलने वाले इन गुरुकुलों में हर वर्ण के छात्र साथ पढ़ते थे। इन शिक्षा केन्द्रों में अमीर-गरीब सबको समान सुविधाएं दी जाती थी, किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। गुरुकुल में प्रवेश करने के आठ साल की उम्र निर्धारित थी। गुरुकुल में छात्रों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता था-1. वासु - 24 साल की उम्र तक शिक्षा प्राप्त करने वाले। 2. रुद्र- 36 साल की उम्र तक शिक्षा प्राप्त करने वाले। 3. आदित्य- 48 साल की उम्र तक शिक्षा प्राप्त करने वाले। भोजन के लिए विद्यार्थियों को भिक्षाटन करना होता था पर निर्धारित नियमों के साथ। दिन में एक बार सिर्फ एक दरवाजे पर झोली फैलाना। इन गुरु आश्रमों में विद्यार्थियों को शाकाहार व ब्रह्मचर्य का पालन कठोरता से करना होता था। इस गुरुकुलीय शिक्षा का मूल उद्देश्य आध्यात्मिक विकास और चरित्र निर्माण के साथ विद्यार्थी को स्वावलंबी बनाना तथा भावी जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार करना था। शिक्षा पूरी होने पर बच्चे के अभिभावक अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार गुरु को जो भी देते थे, वे उसे प्रेम से स्वीकार करते थे। वह गांवों की जागीर से लेकर लौंग के दो दाने तक कुछ भी हो सकता था। शिक्षा पूर्ण हो जाने पर गुरु शिष्य की परीक्षा लेते थे। शिष्य अपने सामर्थ्य अनुसार दीक्षा देते थे किंतु गरीब विद्यार्थी उससे मुक्त कर दिए जाते थे और समावर्तन संस्कार संपन्न कर उसे अपने परिवार को भेज दिया जाता था।

बताते चलें कि इन गुरुकुलों में सहशिक्षा का भी प्रचार था। स्त्री और पुरुषों की समान शिक्षा को लेकर यह गुरुकुल कितने अधिक सक्रिय थे, इसके कई उदाहरण मिलते हैं। मनुस्मृति में लड़के व लड़की दोनों की शिक्षा पर काफी बल दिया गया है। उत्तर रामचरित में वाल्मीकि के आश्रम में लव-कुश के साथ पढ़ने वाली आत्रेयी नामक स्त्री का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार आठवीं शताब्दी के कवि भवभूति के समय भी बालक-बालिकाओं की सह-शिक्षा का प्रचलन था। अपने ग्रन्थ मालती-माधव में भवभूति ने भूरिवसु एवं देवराट के साथ कामन्दकी नामक स्त्री के एक ही पाठशाला में शिक्षा प्राप्त करने का वर्णन किया है। इसी प्रकार पुराणों में कहोद और सुजाता, रूहु और प्रमदवरा की कथाएं वर्णित हैं।

हमारे ये गुरुकुल कई मायनों में विशिष्ट थे। यहां दी जाने वाली शिल्प, वास्तु, संगीत, नृत्य, कला आदि ज्ञान की विभिन्न लौकिक धाराओं की शिक्षा दीक्षा पर कभी भी ब्राह्मणों का एकाधिकार नहीं रहा। यहां अन्य वर्णों के लोग भी गुरु के गरिमामय पद पर बैठने के अधिकारी थे। पिछले एक हजार वर्ष के इतिहास में सबसे अधिक संख्या शूद्र सन्तों की रही जिनको तत्कालीन समाज के सभी वर्णों से मान्यता मिली तथा भरपूर सम्मान भी। मीरा बाई क्षत्राणी थीं और शिष्य बनी सन्त रविदास की। सन्त कबीर जुलाहे थे और बहुत सारे ब्राह्मण-क्षत्रियों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया था।

प्राचीन भारत में तक्षशिला, पाटलिपुत्र, कान्यकुब्ज, मिथिला, धारा, तंजोर, काशी, कर्नाटक, नासिक आदि की शिक्षा संस्थाएं समूचे आर्यावर्त में प्रसिद्ध थीं। सार्वजनिक शिक्षण संस्थाएं सर्वप्रथम बौद्ध विहारों में स्थापित हुई थीं। इनमें नालन्दा विश्वविद्यालय ( 450 ई.), वल्लभी (700 ई.), विक्रमशिला (800 ई.) प्रमुख शिक्षण संस्थाएं थीं। इन संस्थाओं का अनुसरण करके हिन्दुओं ने भी मन्दिरों में विद्यालय खोले जो आगे चल कर मठों के रूप में परिवर्तित हो गए। ‘पृथ्वीराज विजय’ (10 वीं सदी) में अजमेर के आसपास की अनेक शिक्षा संस्थाओं के उल्लेख मिलते हैं। चीनी यात्री हुएनसांग के अनुसार विश्वविख्यात शिक्षा केन्द्र नालंदा के लिए 500 व्यापारियों ने 10 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देकर जमीन खरीदी थी।

प्राचीन भारत की शिक्षण प्रणाली की महत्ता को उजागर करता पाश्चात्य दार्शनिक शोपेनहॉवर का यह कथन वाकई काबिले गौर है कि विश्व में यदि कभी कोई सर्वाधिक प्रभावशाली व सर्वव्यापी सांस्कृतिक क्रांति हो सकती है तो केवल उपनिषदों की भूमि-भारत से। जिज्ञासु शिष्यों ने ज्ञानी गुरु के समीप बैठकर उनके प्रतिपादनों को क्रमबद्ध कर उपनिषदों के रूप में दुनिया को जो दिव्य धरोहर दी है, उसका कोई तोड़ नहीं है। उनका कहना था कि यदि मुझसे पूछा जाए कि आकाश मंडल के नीचे कौन सी वह भूमि है, जहां के मानव ने अपने हृदय में देवीय गुणों का पूर्ण विकास किया तो मेरी उंगली भारत की ओर ही उठेगी। यदि मैं स्वयं से पूछूं कि वह कौन सा साहित्य है जिससे अब तक ग्रीक, रोमन व यहूदी विचारों में पलते आये यूरोपवासी प्रेरणा ले सकते हैं तो मेरी उंगली केवल भारत की ओर ही उठेगी। वहीँ प्राचीन भारत के चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में भारत आए यूनानी राजदूत मैगस्थनीज भी भारत की तद्युगीन की शिक्षा-दीक्षा से बेहद प्रभावित थे। उनके यात्रा वृत्रांत ‘‘इण्डिका’’ में स्पष्ट उल्लेख मिलता है, ‘‘मैं यह देख कर आश्चर्यचकित था कि भारत में रात्रि के समय भी कोई अपने मकान में ताला नहीं लगाता था। मकान के भीतर केवल चांद की सत्यनिष्ठ किरणें ही प्रवेश कर सकती थीं, कोई संदिग्ध व्यक्ति नहीं। सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत के व्यापारियों के ईमान की सौगंध खाई जाती थी।’’ इसी तरह विश्वमंच से भारत की पुरातन ज्ञान सम्पदा का गौरवगान करने वाले स्वामी विवेकानंद का कहना था, ‘‘हमें गर्व है कि हम अनंत गौरव की स्वामिनी उस भारतीय संस्कृति के वंशज हैं, जिसके महान शिक्षकों ने सदैव दम तोड़ती मानव जाति को अनुप्राणित किया है। समय की प्रचण्ड धाराओं में जहां यूनान, रोम, सीरीया, बेबीलोन जैसी तमाम प्राचीन संस्कृतियां बिखरकर अपना अस्तित्व खो बैठीं, वहीं एकमात्र हमारी भारतीय संस्कृति इन प्रवाहों के समक्ष चट्टान के समान अविचल बनी रही क्योंकि हमें हमारी आत्मज्ञान सम्पन्न दिव्य-विभूतियों का सशक्त मार्गदर्शन सतत मिलता रहा।"

शिक्षा के व्यवसायीकरण के कट्टर विरोधी थे डॉ. राधकृष्णन

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एक सर्वप्रिय आदर्श शिक्षक के रूप में अपने जीवन के 40 साल अध्यापन कार्य को समर्पित करने वाले भारतरत्न सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन का मानना था कि पश्चिमी जगत मनुष्य का आकलन इस बात से करता है कि तुम्हारे पास क्या है! क्योंकि उनका जीवन दर्शन भोगप्रधान है। जबकि भारतीय चिंतन में व्यक्ति को इस तराजू पर तौला जाता है कि तुम क्या हो! क्योंकि हमारा भारतीय दर्शन आत्मप्रधान है। हम भारतीय सदा से ज्ञान के उपासक रहे हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ज्ञान की प्रतिष्ठापना करना हमारी विशेषता रही है। देश के प्रथम शिक्षा आयोग के अध्यक्ष के रूप में विश्वविद्यालयीय व माध्यमिक शिक्षा के उत्थान के लिए अनेक सुधारवादी कदम उठाने वाले डॉ. राधकृष्णन शिक्षा के व्यवसायीकरण के कट्टर विरोधी थे।

सनद हो कि मैकाले प्रणीत शिक्षा पद्धति के आज कारण हमारी नई पौध अपनी जड़ों से कटती जा रही है। स्थिति यह है कि अध्य्यापन शिक्षक की नौकरी बन गयी है और छात्र जानकारियों का यह पुलंदा महज इसलिए बटोर रहे हैं ताकि भविष्य में मोटी कमाई कर सके। दूसरे शब्दों में कहें तो सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान, सूचना संग्रह और डिग्रियों तक सीमित आज शिक्षा की शिक्षा व्यवस्था का मूल मकसद केवल मोटा पैसा कमाना हो गया है। समूचे देश में कुकुरमुत्तों की तरह उगे पांच सितारा स्कूल व कालेजों की भरमार ने पुरातन भारत के दिव्य शैक्षिक लक्ष्यों को पलीता लगा दिया है। देश के शिक्षा केन्द्र आज भ्रष्टाचार, ट्यूशन, नकल, नंबर बढ़ाने और हिंसक आंदोलन जैसी प्रवृत्तियों के साथ नग्नता, गुंडागर्दी, दलाली और राजनीति के अड्डे बन रहे हैं। इनमें केवल अधिकारों की बात होती है, कर्त्तव्य भावना की नहीं। आर्थिक उदारीकरण ने शिक्षा जगत का कबाड़ा कर दिया है। बताते चलें कि शिक्षा के व्यावसायीकरण की इस समस्या को कुछ साल पहले आयी शबाना आजमी और जूही चावला अभिनीत एक संदेशपरक फिल्म "चाक एंड डस्टर" में अत्यन्त बारीकी से दर्शाया गया था। आज जितना अधिक शिक्षा का प्रभाव बढ़ रहा है, उतना ही मानसिक प्रदूषण भी बढ़ रहा है। शिक्षा बढ़ रही है पर जीवन विद्या घट रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बनी हालिया शिक्षा नीति के नए प्रावधान इस दिशा में कारगर कदम साबित हो सकेंगे।

शिक्षा में उच्च नैतिक मूल्यों के प्रबल हिमायती थे डॉ. कलाम

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गौरतलब हो कि भारत में "मिसाइलमैन" के नाम से विख्यात देश के ग्यारहवें राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की भी जिंदगी शिक्षा को समर्पित रही। डॉ. राधाकृष्णन की ही भांति उनको भी शिक्षक की भूमिका बेहद पसंद थी। उनका मानना था कि शिक्षा कारोबार की वस्तु नहीं हो सकती। उनकी मान्यता थी कि मूल्यपरक शिक्षा, ज्ञान और प्रकाश की ऐसी अंतहीन यात्रा है जो हमें सत्य की खोज में ले जाती है। अगर व्यक्ति अपने जीवन में शिक्षा के इस मूल यथार्थ को हर अंगीकार कर ले तो यह दुनिया रहने के लिए सबसे बेहतरीन जगह बन जाए। डॉ. कलाम शिक्षा प्रणाली को उच्च नैतिक मूल्यों से जोड़कर उपयोगी और रोजगारोन्मुख बनाने के प्रबल हिमायती थे। उनका मानना था कि विकसित राष्ट्र बनने की प्रक्रिया शिक्षा के बिना असंभव है। पिता से ईमानदारी व आत्मानुशासन तथा माता से ईश्वर-विश्वास और करुणा की विरासत का उपहार पाने वाले इस महामानव ने ऐसे स्वर्णिम भारत का स्वप्न देखा था जहां महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध न हों, जहां समाज में कोई भी व्यक्ति खुद को अलग थलग महसूस न करे, जहां गांव और शहर के बीच बहुत कम अंतर हो और जहां का शासन पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त हो।

Sunday, August 23, 2020

सांस्कृतिक जागरण की बेला

 सांस्कृतिक जागरण की बेला : 

1947 में देश को राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिली, पर सांस्कृतिक स्वतंत्रता नहीं मिली। लोगों में इस स्वतंत्रता की चेतना न जग पाए, इसके लिए जाति, मजहब, भाषा, प्रांत की दीवारें खड़ी की जाती रहीं। इसके बावजूद कुछ लोग और संगठन इस कार्य में लगे रहे। अब उनकी मेहनत के सुफल का स्वाद लोगों को मिल रहा है और वे सांस्कृतिक रूप से जागरूक हो रहे हैं

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       अंदमान निकोबार द्वीप समूह में जनजाति महिलाओं द्वारा निकाली गई कलशयात्रा। ये महिलाएं वनवासी 
        कल्याण आश्रम से जुड़ी हैं और उनमें अपनी संस्कृति के प्रति जबर्दस्त जागरूकता बढ़ी है। (फाइल चित्र)

स्वाधीनता प्राप्ति की घड़ी में भारत माता की आंखें छलक पड़ी थीं। इस सच की अनुभूति उस समय सभी ने की थी, परंतु इस तथ्य को कम ही लोग अनुभव कर पाए थे कि भारत मां की एक आंख में खुशी के आंसू छलक रहे थे, जबकि दूसरी आंख दु:ख के आंसुओं से डबडबाई हुई थी। खुशी स्वाधीनता-स्वतंत्रता की थी और दु:ख राजनीतिक-सांस्कृतिक विभाजन का था। अपनी ही संतानों ने माता के अस्तित्व एवं अस्मिता के हिस्से को काटकर अलग कर दिया था। जबकि भौगोलिक दृष्टि से उनकी संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन में समानताएं थीं। विभाजन की यह पीड़ा बड़ी दारुण थी और यातना बड़ी असहनीय। फिर भी उम्मीद थी कि स्वाधीन देशवासी संभवत: समझदार हो जाएंगे और अपनी मां को अब यह पीड़ा नहीं देंगे।

परंतु दुर्देव और दुर्भाग्य। स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् भी  विभाजन के नए-नए रूप सामने आते गए। भूमि तो नहीं बंटी, पर भावनाएं बंटती गर्इं। संस्कृति बंटती गई। भूगोल तो वही रहा, परंतु उसमें खिंची संवेदनाओं की लकीर मिटती गई। संवेदनाओं की सरिता को सोखने वाले, इसे दूषित-कलुषित करने वाले विभाजनकारियों के कितने ही रूप सामने आते गए। विभाजन मजहब के नाम पर, विभाजन जाति के नाम पर, विभाजन भाषा के नाम पर, विभाजन सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयता के नाम पर, विभाजन संस्कृति के नाम पर। स्वाधीनता की हर वर्षगांठ पर भारत माता की आंखें छलकती तो जरूर हैं, परंतु यह अनुभूति गिने-चुने लोग ही कर पाते हैं कि अब उसकी दोनों आंखों में खुशी  के आंसू  नहीं, दु:ख  के आंसू डबडबा रहे हैं। लेकिन ये आंसू खून के आंसू हैं। इनमें जातीयता के संघर्ष का खून है।  पता नहीं उसकी अपनी संतानों में से कौन और कितने मां की इस पीड़ा की अनुभूति कर पाएंगे, क्योंकि यह अनुभूति तो राष्टÑीयता की अनुभूति से जुड़ी है, सांस्कृतिक स्वतंत्रता से जुड़ी है। सांस्कृतिक स्वतंत्रता की अनुभूति प्रत्येक भारतवासी का राष्ट्रीय कर्तव्य है।

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हमारा लक्ष्य जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण है। राष्ट्र की सांस्कृतिक आजादी है। नैतिक-चारित्रिक उत्थान है। शिक्षा एवं विद्या का समन्वय कर शिक्षण तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन है। आत्मबल संवर्द्धन कर राष्ट्र को समर्थ सशक्त नागरिक देना है।— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, संस्थापक, अखिल विश्व गायत्री परिवार


1947 में विश्व का यह सबसे बड़ा लोकतंत्र अंग्रेजों के हाथ से स्वतंत्र हुआ था। ढेरों ने अपनी कुर्बानियां दी थीं। अगणित अज्ञात स्थिति में ही शहीद हो गए। न कहीं किसी का नाम आया, न प्रशस्तिपत्र ही मिला, पर उन्होंने इसकी चिंता नहीं की। दक्षिणेश्वर की माटी हाथ में लिए, जेब में गीता की छोटी-सी पुस्तिका रखे न जाने कितने फांसी पर चढ़ गए, न जाने कितनों ने सारा जीवन  अविज्ञात स्थिति बिताकर देश की आजादी के लिए स्वयं व परिवार को भूखा, नगण्य से साधनों में जिए एवं गुमनामी के परदे के पीछे चले गए। ढेरों साहित्यकार, स्वयंसेवक स्तर के कार्यकर्ता, आजादी के आंदोलन के सिपाही, सत्याग्रही, सविनय अवज्ञा आंदोलन का पालन करने वाले गांधी के अनुचर, खादी को जीवनव्रत बना लेने वाले व्यक्ति एक उज्जवल भविष्य वाले भारतवर्ष की उम्मीद में जीवन जीते रहे, पर नाउम्मीद होकर इस धरती से चले गए।

भारत में ‘राष्ट्र’ सदैव एक सांस्कृतिक शब्द रहा है, राजनीतिक नहीं। राष्ट्र उपास्य है, ईष्ट है। विविधताओं के बावजूद भारत एक राष्ट्र रहा है। हमारे ऋषियों ने संसार की प्रकृति-प्रदत्त विविधताओं को बहुत सहज भाव से स्वीकार किया। किन्तु मनुष्य के अन्त:करण में स्थित परिष्कृत चेतना को लक्ष्य करके सांस्कृतिक एकता के भाव भरे सूत्रों को विकसित एवं प्रतिष्ठित करने में सफलता पाई। हमारे मनीषियों ने सांस्कृतिक आधारों को ही प्राथमिकता दी। सांस्कृतिक सूत्रों को उन्होंने जन-जन के भावनात्मक स्तर तक गहराई से बिठाने में सफलता पाई। यही कारण है कि हम गर्व से कह पाते हैं, ‘‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।’’ भले ही सदियों तक ‘दौरे जमां’(सांसारिक राजनीतिक चक्र) हमारा दुश्मन रहा है।

सांस्कृतिक अवधारणा हर भारतीय की रगों में रक्त की तरह सतत प्रवाहित है। अयोध्या में जन्मे राम कन्याकुमारी में रामेश्वरम्  की स्थापना करते हैं। बृज के श्रीकृष्ण द्वारिका में अपना आवास बनाते हैं। बंगाल के चैतन्य बृज में आकर अपने इष्ट के लीला क्षेत्र को खोजते हैं। केरल में जन्मे शंकराचार्य चारों दिशाओं में चारधामों की स्थापना करके काश्मीर के सरस्वती मन्दिर के पट खोले बिना अपनी यात्रा पूर्ण नहीं मानते। वे अपना शरीर दक्षिण में नहीं, उत्तराखण्ड में छोड़ना पसंद करते हैं। गंगोत्री का जल पिये बिना रामेश्वरम् की प्यास नहीं बुझती। उत्तराखण्ड के देवालयों के देवता दक्षिण के पुजारी मांगते हैं। भक्त को रामेश्वरम्, केदारनाथ, सोमनाथ, विश्वनाथ, पशुपतिनाथ, महाकालेश्वर, अमरनाथ आदि सभी जगह एक ही इष्ट के दर्शन होते हैं। वैष्णव देवी से कन्याकुमारी तथा अम्बाजी (गुजरात) से कामाख्या (असम) तक एक ही मातृसत्ता को नमन किया जाता है। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी भी इसी सांस्कृतिक अवधारणा का समर्थन करते हैं।

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                  अपनी संस्कृति, अपनी पहचान

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी सांस्कृतिक नवोन्मेष को जाग्रत करते हुए भारत के पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण को सांस्कृतिक दृष्टि से जोड़ने वाले सूत्रों को अपने उद्बोधनों मे रखते हैं। भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण, भगवान शिव के साम्राज्य को वे राजनीतिक सीमा में न बांधकर सांस्कृतिक दृष्टि से नेपाल, भूटान, बाली, सुमात्रा, इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका, मॉरीशस, सूरीनाम, फीजी, अमेरिका, जापान, चीन, त्रिनिदाद,  टोबेगो ब्राजील जैसे देशों से जोड़ते हैं। यह भाव भरी सांस्कृतिक चेतना ही उस कालजयी राष्ट्र को बनाती है, जो ‘भारत’ कहलाता है।

श्री मोदी सांस्कृतिक नवोन्मेष को जाग्रत करते हुए भारत के पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण को सांस्कृतिक दृष्टि से जोड़ने वाले सूत्रों को अपने उद्बोधनों मे रखते हैं। भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण, भगवान शिव के साम्राज्य को वे राजनीतिक सीमा में न बांधकर सांस्कृतिक दृष्टि से नेपाल, भूटान, बाली, सुमात्रा, इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका, मॉरीशस, सूरीनाम, फीजी, अमेरिका, जापान, चीन, त्रिनिदाद,  टोबेगो ब्राजील जैसे देशों से जोड़ते हैं। यह भाव भरी सांस्कृतिक चेतना ही उस कालजयी राष्ट्र को बनाती है, जो ‘भारत’ कहलाता है। इस राष्ट्र का संगठन राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से न कभी किया जा सका है और न कभी किया जा सकेगा। किन्तु सांस्कृतिक सूत्रों में बंधकर यह राष्ट्र सदैव विश्व मुकुट बना है और पुन: बनकर रहेगा। आज की परिस्थितियों में मनुष्य मात्र को उन सांस्कृतिक सूत्रों की खोज है जिनके आधार पर असमानता मिटें और स्वर्गिक परिस्थितियों का निर्माण किया जा सके। मनुष्यों में देवत्व का उदय हो एवं धरती पर स्वर्ग की परिस्थिति उत्पन्न हो सके। ऋषियों की धरोहर-देव संस्कृति और समय के अनुकूल व्यावहारिक सूत्रों को जन-जन तक पहुंचाना आज की अनिवार्यता है। उसी आधार पर व्यक्तियों में देवत्व का विकास एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव होगा।

अखिल विश्व गायत्री परिवार ने सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए जमीनी स्तर से प्रयास किया है। भारतीय संस्कार पद्धति के अन्तर्गत धर्म-सम्प्रदाय से हटकर ऊंच-नीच, जाति-पाति मिटाने  के लिए गायत्री परिवार ने बढ़-चढ़ कर प्रयास किया है।  वनवासी, जनजाति एवं अन्त्योदय बहुल क्षेत्रों (झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, असम, पश्चिम बंगाल, महाराष्टÑ के पिछड़े इलाके) में समानता का संदेश देने, उन्हें यज्ञोपवीत धारण करवा कर पौरोहित्य का प्रशिक्षण देने का कार्य किया है। उन्हें स्वावलम्बी बनाया है। युग तीर्थ शान्तिकुंज उसका जीता-जागता उदाहरण है। इन क्षेत्रों में लाखों की संख्या में संस्कारों का क्रम सम्पन्न हुआ। संस्कारों के क्रम में नामकरण, अन्नप्राशन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत, विवाह संस्कार प्रमुख हैं।

क्या यही स्वतंत्रता है?
हमें राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिल गई, किन्तु सांस्कृतिक स्वतंत्रता चाहिए और यह तब तक नहीं मिलेगी, जब तक जातिवाद का विष वृक्ष फलता-फूलता रहेगा। सारी राजनीति इसी से संचालित है। जाति, संप्रदाय और मजहब के नाम पर भाई को भाई से, पड़ोसी को पड़ोसी से और देशवासी को देशवासी से दूर करने का प्रयास हो रहा है। यह प्रयास देश की सांस्कृतिक चेतना को भी नष्ट कर रहा है। वहीं दूसरी ओर धनी और धनी बनते जा रहे हैं एवं गरीब और निर्धन। गांव उजड़ रहे हैं, शहरों के पेट में समा रहे हैं। अब कोई गांव में रहना नहीं चाहता। अपसंस्कृति और अपराधों ने वहां भी पैठ बना ली है। सरपंचों की भ्रष्ट राजनीति ने गांवों की एकता नष्ट कर, उन्हें भी बांट दिया है एवं लगता है कि सब कुछ दांव पर लग गया है। क्या यही स्वतंत्रता है, क्या यही लोकतंत्र है, जिसमें एक वैज्ञानिक-मनीषी-ऋषि स्तर का व्यक्ति पुन: राष्ट्रपति नहीं बन सकता, क्योंकि दलीय राजनीति का समीकरण उसके पक्ष में नहीं है?
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सांस्कृतिक समरसता उत्पन्न करने, विभिन्न जातियों के बीच भावनात्मक ऐक्य स्थापित करने का एक ही सूत्र है-सांस्कृतिक क्रांति। ऐसी सांस्कृतिक क्रांति, जो आध्यात्मिक भावापन्न हो।
— डॉ. हेडगेवार, आद्य सरसंघचालक

अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक, संरक्षक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने गायत्री परिवार का लक्ष्य सुनिश्चित करते हुए लिखा है, ‘‘हमारा लक्ष्य जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण है। राष्ट्र की सांस्कृतिक आजादी है। नैतिक-चारित्रिक उत्थान है। शिक्षा एवं विद्या का समन्वय कर शिक्षण तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन है। आत्मबल संवर्द्धन कर राष्ट्र को समर्थ सशक्त नागरिक देना है।’’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं प्रकाण्ड क्रांतिकारी डॉ. बलिराम हेडगेवार जी भी सांस्कृतिक स्वतंत्रता के पुरोधा थे। उनके एवं अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचारों में काफी समानताएं हैं। वनवासी बहुल क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषांगिक संगठनों के लाखों कार्यकर्ता सांस्कृतिक नवोन्मेष के लिए दिन-रात जुटे रहते हैं। डॉ. हेडगेवार ने सांस्कृतिक समरसता की नई परिभाषा लिखी है। उन्होंने लिखा है, ‘‘सांस्कृतिक समरसता उत्पन्न करने, विभिन्न जातियों के बीच भावनात्मक ऐक्य स्थापित करने का एक ही सूत्र है-सांस्कृतिक क्रांति। ऐसी सांस्कृतिक क्रांति, जो आध्यात्मिक भावापन्न हो।’’ नवजागरण काल में राजाराम मोहन राय, केशवचन्द्र सेन आदि ने यही सूत्र खोजने शुरू किए थे। उनके इन प्रयासों से भारतीयता अंगड़ाई लेने लगी थी। भारतीय राजनीति में एक प्रयोग हो चुका है। उसे गांधी जी ने अपने समय में सफलतापूर्वक लागू किया था। इसके द्वारा उन्होंने एक बड़े पैमाने पर आम भारतीय का राजनीतिकरण किया था, उन्हें अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन से जोड़ा था एवं आजादी के लक्ष्य को नजदीक ला दिया था। गांधी जी की खादी, विदेशी कपड़ों की होली और स्वदेशी आंदोलन ने एक नया जीवन-दर्शन दिया था। आज भी देश को हजारों-लाखों-करोड़ों कार्यकर्ता चाहिए, जो संघबद्ध हो गांव-मुहल्ले-प्रखंड स्तर पर अन्याय और शोषण के खिलाफ लड़ सकें। भ्रष्ट प्रशासनिक मशीनरी को ठीक करने का प्रयास करें। कहीं रिश्वतखोरी हो तो उससे भी जूझ सकें।

भारत को सांस्कृतिक दासता से मुक्ति दिलाने के लिए वीरभद्रों की जरूरत पड़ेगी। आने वाले दिनों में ऐसे गांडीवधारियों की आवश्यकता पड़ेगी, जो अर्जुन की तरह कौरवों की अक्षौहिणी सेनाओं को धराशायी कर दे। ऐसे हनुमानों की जरूरत होगी, जो ‘एक लाख पूत-सवा लाख नाती’ वाली लंका को पूंछ से जलाकर खाक कर दे। ऐसे कलाकारों की आवश्यकता है, जो चैतन्य महाप्रभु, मीरा, सूर, कबीर की भावनाओं को इस प्रकार लहरा सकें, जैसे सपेरा सांप को लहराता है। ऐसे धनवानों की जरूरत है, जो अपने पैसे को विलास में खर्च करने की अपेक्षा सम्राट अशोक की तरह अपना सर्वस्व समय की आवश्यकता पूरी करने के लिए लुटा सकें। तभी सच्चे अर्थों में सांस्कृतिक आजादी मिलेगी।
(लेखक देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलाधिपति हैं)

मंगलमूर्ति भगवान श्री गणेश

 मंगलमूर्ति भगवान श्री गणेश की महिमा अपरंपार : 

विभिन्न देशों में गणपति अलग-अलग नामों से प्रख्यात हैं। जापान में गणेश जी को ‘शोटन’ के नाम से जाना जाता है जबकि तांत्रिक बौद्ध गणपति को ‘महा-रक्त’ के नाम से पूजा करते है। गणेश जी तिब्बत में ‘महाकाल’, चीन में ‘हो टेई’, थायलैंड में ‘फ्रा फिकनेत’ या ‘फ्रा फिकानेसुअन’ और मेक्सिको में ‘वीरकोष’ के नाम से जाना जाता है

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                          इस्लामिक देश इंडोनेशिया में भगवान श्री गणेश के बारे में जानकारी लेते मुस्लिम छात्र।

रिद्धि सिद्धि के दाता गणेश जी सार्वभौमिक हैं। उनकी महिमा अपर अपरंपार है जो काल, परिस्थिति एवं देश की सीमाओं के बंधन से परे है। समय समय पर अनेक ज्ञानी-ध्यानी, इतिहास-वेत्ता, पुरातत्वविद एवं वैज्ञानिक अपने अपने विवेक से गणेश जी का तार्किक विश्लेषण करने का मिथ्या प्रयास करते हैं। विघ्न-विध्वंसक गणपति तो मानव-मात्र की तार्किक क्षमता और बुद्धि से परे ‘यो बुद्धे परतस्तु सः’ हैं। चर-अचर एवं जड़-चेतन जगत में सर्वव्याप्त गणेश जी की अनुकम्पा के बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता।

तथाकथित वैज्ञानिक विचारधारा वाले प्रबुद्ध-जन हमारे विचारों को “अज्ञानता” सिद्ध करने में ‘गर्व’ का अनुभव करने से बाज़ नहीं आएंगे। दरअसल तथाकथित वैज्ञानिक-प्रणाली एवं सोच, आँकड़ों का एक सोचा समझा मकड़जाल बनकर रह गयी है और सृजनात्मकता से शनैः-शनैः दूर जा रहीं है। भगवत-गीता के अठारहवें अध्याय के चौदहवे श्लोक में स्पष्ट लिखा है,‘देवं चैवात्र पञ्चमं’ अर्थार्थ किसी भी कार्य की अंतिम सफलता तभी होती है, जब‘ईश्वर’ चाहते हैं।

कला एवं अंतरराष्ट्रीय व्यापार के शोध-कार्य में संलग्न होने के कारण हमें देश-विदेश में अक्सर भ्रमण करना पड़ता है जहां सर्वशक्तिमान विध्न-विध्वंसक गणेश जी का प्रभाव दुनिया भर में परिलक्षित होता है। मंगलमूर्ति गणेश जी को अनादिकाल से ही विध्न-विध्वंसक, “निर्विघ्नम कुरु में देव, सर्व कार्येषु सर्वदा” सर्वप्रथम पूज्य देव के रूप में न केवल भारत-वर्ष, अपितु अनेक देशों में पूजा जाता है। विभिन्न देशों में गणपति अलग-अलग नामों से प्रख्यात हैं। जापान में गणेश जी को ‘शोटन’ के नाम से जाना जाता है जबकि तांत्रिक बौद्ध गणपति को ‘महा-रक्त’ के नाम से पूजा करते है। गणेश जी तिब्बत में ‘महाकाल’, चीन में ‘हो टेई’, थायलैंड में ‘फ्रा फिकनेत’ या ‘फ्रा फिकानेसुअन’ एवं मक्सिको में ‘वीरकोष’ के नाम से जाना जाता है। जापानी चित्रशैली में गणेश की तीस से भी अधिक विधाएं प्रचलित हैं जिनमें आलिंगित ‘कांगी’ शैली अत्यधिक लोक प्रिय है।

आधुनिक अर्थविद 1991 से ही भारत के ग्लोबलाईज़ेशन तक ही अपनी सोच एवं शोध दोनों ही सीमीत रखते हैं, जबकि भारतीय देवी देवता तो अनादिकाल से ही विश्व व्याप्त एवं सीमाओं से परे हैं। रोमन देवता ‘जेनस’ को भी अनेक इतिहासकारों नें गणेश जी का रूप बताया है। दक्षिण एवं मध्य अमेरिकी देशों, जैसे माक्सिको, पेरू, ग्वाटेमाला, बोलीविया एवं होंडरस की ‘इंका’ एवं ‘एज़टेक’ सभ्यताओं में भी हिन्दू देवी-देवता, मंदिर एवं संग्रहालय देखने को मिलते हैं। माक्सिको के डिअगे दिवेरिआ के मंदिर में गणेश-प्रतिमा, एवं ग्वाटेमाला के वेरा-क्रूज एवं क्वीरागाओं के गणपति प्राचीन अमेरिका में गणपति की व्याप्तता को प्रमाणित करते हैं। जापान में ‘शोटन’ (गणेश) बुद्धि, शक्ति एवं उत्साह के प्रतीक हैं। उम्रदराज लोग व्यावसायिक सफलता एवं धन-सम्पदा प्राप्त करने के लिए जबकि युवक-युवतियां प्यार में सफलता के लिए गणेश जी की पूजा करते हैं।

धर्मनिरपेक्ष भारत के सरकारी भवनों एवं सार्वजनिक स्थानों पर गणेश या अन्य किसी हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाए शायद ही कहीं दृष्टिगोचर हों किन्तु बौद्ध देश थायलैंड की राजधानी बैंकॉक के स्वर्णभूमि एयरपोर्ट की तो रक्षा का सारा जिम्मा एवं श्रेय गणेश जी सहित अनेक हिन्दू देवी-देवताओं सहित यक्ष समूह को जाता है। बैंकॉक एयरपोर्ट पर ये विशाल प्रतिमाएं सहज ही पौराणिक युग में प्रवेश का अहसास करती हैं। इतना ही नहीं, दुनिया के सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या वाले देश इन्डोनेशिया के कोने कोने में न केवल गणेश-मंदिर हैं, अपितु उनकी मुद्रा पर भी गणेश जी के चित्र को वहां के राष्ट्रपति के फोटो के साथ दर्शाया गया है।

अनेक एशियाई देशों के सरकारी संस्थानों, यहां तक कि सैन्य उपक्रमों एवं सार्वजनिक जगहों पर विघ्नहरण मंगलमूर्ति गणेश जी कि प्रतिमा को प्रमुखता से स्थापित किया गया है। बैंकॉक के सेंट्रल वर्ड (वर्ड ट्रेड सेंटर) में गणेश जी कि एक भव्य प्रतिमा, ऊंचे सिंहासन पर, व्यवसाय एवं कूटनीति के देवता के रूप में स्थापित की गई है, जहां उन्हें फूल, अगरबत्ती एवं अन्य वस्तुएं बड़ी श्रद्धापूर्वक अर्पित की जाती है।

विश्वव्यापी सर्वव्याप्त, “समस्त विघनौघविनाश दक्ष‘, समस्त विघ्न एवं पापों के विनाश में दक्ष, गणपती की आलौकिक शक्ति’ का अहसास यदि भारत में भी ‘सरकारी आईने’ से हो जाए, तो शायद देश की दशा सुधर जाए एवं भारत में ‘अच्छे दिन’ आ जाए।

Saturday, August 15, 2020

नेपाल का भविष्य के तिब्बत बनने की और बढ़ते कदम

 नेपाल नहीं समझ पा रहा कि वह भविष्य का तिब्बत बन सकता है:

नेपाल में कम्युनिस्ट शक्तियों के सत्ता ग्रहण करते ही भारत—नेपाल संबधों का काला अध्याय शुरू होता दिखाई पड़ने लगा। जहां एक ओर वामपंथी नेपाली सरकार ने कम्युनिस्ट चीन का खुल कर समर्थन और साथ देना शुरू किया वहीं भारत के साथ अपने सघन और सशक्त संबंधों की जड़ें खुद ही काटनी शुरू कर दीं। हालांकि इस सबमें नेपाल यह नहीं समझ पा रहा है कि वह भविष्य का तिब्बत बन सकता है।

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चीन, नेपाल और भारत के त्रिकोणीय संबंधों और इसके बीच भारत-नेपाल के बीच गहराते संकट पर चर्चाएं चल ही रही थीं कि नेपाल के प्रधान मंत्री ने भारत के कण—कण में बसे श्री राम की अयोध्या पर विवादित बयान देकर संकटों का एक नया ही अध्याय शुरू कर दिया। ओली ने एक ओर अयोध्या को नेपाल में स्थित बता दिया तो वहीं दूसरी ओर भारत के कई हिस्सों को नेपाली नक़्शे का हिस्सा बना कर पूरे विश्व के सामने पेश कर दिया। आखिर ये क्या हो रहा है और क्यों ? नेपाल और भारत के बीच सदियों से बहुत सशक्त सांस्कृतिक सम्बन्ध रहे हैं। यहां तक कि विश्व राजनीति के पटल पर नेपाल की छवि हमेशा भारत के छोटे भाई के रूप में प्रस्तुत की गयी और मान्य भी रही है। सुदूर दक्षिण से यहां पहुंच श्री आदि शंकराचार्य द्वारा श्री पशुपतिनाथ जी की स्थापना हो या यहां की हिन्दू बहुल जनसँख्या के साथ भारत के सांस्कृतिक सम्बन्ध, नेपाल और भारत हमेशा 'दो राष्ट्र, एक संस्कृति' के रूप में देखे जाते रहे हैं। किन्तु आज जो स्थिति दिखाई पड़ रही है वह एक सुनियोजित वैचारिक तथा राजनीतिक षड़यंत्र का नतीजा है।

 नेपाल के माध्यम से चीन भारत पर अपना शिकंजा कसने की तैयारी में है। नेपाल में कम्युनिस्ट शक्तियों के सत्ता ग्रहण करते ही भारत—नेपाल संबधों का काला अध्याय शुरू होता दिखाई पड़ने लगा। जहां एक ओर वामपंथी नेपाली सरकार ने कम्युनिस्ट चीन का खुल कर समर्थन और साथ देना शुरू किया वहीं भारत के साथ अपने सघन और सशक्त संबंधों की जड़ें खुद ही काटनी शुरू कर दीं। हालांकि इस सबमें नेपाल यह नहीं समझ पा रहा है कि वह भविष्य का तिब्बत बन सकता है। पिछले कुछ समय में भारत चीन के बीच तनातनी की स्थिति उत्पन्न होने पर नेपाल ने न सिर्फ चीन का साथ दिया, भारत को अपने कूटनीतिक महत्व के कई निर्णयों के माध्यम से कई नकारात्मक सन्देश दिए। नेपाली सरकार ने जहां एक ओर अपने सभी नेपाली विद्यालयों में मंदारिन (चीनी) भाषा पढ़ना अनिवार्य कर दिया तो दूसरी ओर भारतीय मीडिया का प्रसारण रोक दिया, हालांकि यह रोक बाद में हटा ली गयी। आर्थिक मोर्चे पर नेपाल ने चीन के साथ कई समझौते किये हैं और यहीं सबसे बड़ा संकट दिखाई पड़ता है। चीन नेपाल में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के नाम पर जो पैसा लगा रहा है, वह भविष्य में नेपाल के अपने भविष्य के लिए भी खतरनाक है और भारत के लिए भी। लगभग 10 अन्य विकासशील या पिछड़े देशों को इस प्रकार पैसा उधार दे कर चीन पहले ही श्रीलंका का हम्बनटोटा पोर्ट हथिया चुका है और पाकिस्तान के ग्वादर पर भी कब्ज़ा जमा चुका है। चीन ने नेपाल के साथ फरवरी, 2020 में चीन-नेपाल ट्रांजिट प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किये हैं जिससे नेपाल को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए अब भारत पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। चीन की काली नज़र नेपाल पर सिर्फ भारत की वजह से नहीं है। और नेपाल हाल फिलहाल चीन से पूरी तरह से प्रभावित नज़र आ रहा है। nepal_1  H x W:

हालांकि भारत ने अपनी तरफ से हमेशा नेपाल की आर्थिक तथा अन्य सहायता करने का प्रयास किया है पर चीन की तुलना में भारत का नेपाल में निवेश या सहायता कम है। इसका कारण दोनों के उद्देश्यों में अंतर भी हो सकता है। जहां चीन नेपाल पर अपना वर्चस्व जमाना चाहता है, तो वहीं भारत नेपाल के विकास में बिना किसी नकारात्मक उद्देश्य से सहायता करता आया है।  भारत द्वारा 2017—18 में नेपाल को प्रदान की गयी 374 करोड़ की आर्थिक सहायता 2019—20 में बढ़ाकर 1050 करोड़ कर दी गयी है। इसके अलावा भारत ने नेपाल में कई अस्पताल, विद्यालय और अन्य आवश्यक सुविधाओं को जुटाने के लिए निर्माण की घोषणा कर काम भी शुरू कर दिया है।  इसके बावजूद नेपाली सरकार का नकारात्मक रवैया यहाँ वामपंथी विचारधारा के फैलने का एक परिणाम कहा जा सकता है।

 नेपाल के कई कम्युनिस्ट नेता भारत के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे संस्थाओं से पढ़ कर यहां पहुंचे हैं। ज़ाहिर सी बात है वामपंथ की पाठशाला से ग्रहण की गयी ट्रेनिंग भारत के विरोध में ही इस्तेमाल होगी। चीन से बढ़ते सुरक्षा, राजनीतिक और कूटनीतिक संकटों के बीच नेपाल से खट्टे होते संबंधों पर भारत को गहन विश्लेषण कर कदम उठाने होंगे। द्विपक्षीय सकारात्मक वार्ताओं के अलावा कहीं न कहीं नेपाल को कड़े सन्देश भी दिए जाने चाहिए क्योंकि वर्तमान नेपाली सरकार से भारत को सहयोग दिया जाना अपेक्षित नहीं है। साथ ही नेपाल को यह भी समझाने की आवश्यकता है कि विचारधारा के नाम पर वह आज भले ही चीन का साथ दे ले, पर भविष्य में यह उसके अपने अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौतियां पैदा कर सकता है।

हाल फिलहाल में वैश्विक स्तर पर चीन को कोविड—19 फ़ैलाने का न सिर्फ गुनहगार माना जा रहा है बल्कि अमेरिका जैसी शक्ति से उसे कड़े विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है। भारत के अमेरिका के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों की दृष्टि से देखें तो भारत न सिर्फ चीन बल्कि नेपाल को भी अपनी तरफ से कड़े सन्देश दे सकता है कि भारतीय सीमाओं में किसी भी प्रकार की घुसपैठ बर्दाश्त नहीं की जाएगी। 

राम का वनवास खत्म हुआ। हार्दिक आनंद!

 हार्दिक आनंद :

राम का वनवास खत्म हुआ। हार्दिक आनंद! किन्तु ध्यान रखिए, अयोध्या से निकलने वाली शांति-सौहार्द की राह के कई कांटे अभी बाकी हैं। एक संघर्ष समाप्त हुआ किन्तु सरकार और समाज दोनों के लिए आने वाला दौर निश्चित ही परीक्षाओं का दौर है। नहीं भूलना चाहिए कि कुछ तत्व ऐसे भी हैं जिनकी ‘दाल-रोटी’ इस देश में नफरत का चूल्हा सुलगाए रहने से ही चलती है।

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36 संप्रदायों के 140 संत, देश की समस्त पावन नदियों का निर्मल जल, विभिन्न तीर्थक्षेत्रों की मिट्टी और विविधता के इस सागर में मानवता को मर्यादा की दिशा देता श्रीराम का जयघोष। यह ऐसा क्षण था जब लगातार दौड़ता समय राष्ट्र स्मृति में स्थिर हो गया। 

5 अगस्त! एक दिन जो कैलेंडर के सहज पलट और बिसरा दिए जाने वाले अल्पजीवी पृष्ठ से बदलकर अयोध्या के आंगन में गड़ा शिलास्तम्भ बन गया।

राम का वनवास खत्म हुआ। हार्दिक आनंद!

किन्तु ध्यान रखिए, अयोध्या से निकलने वाली शांति-सौहार्द की राह के कई कांटे अभी बाकी हैं।

एक संघर्ष समाप्त हुआ किन्तु सरकार और समाज दोनों के लिए आने वाला दौर निश्चित ही परीक्षाओं का दौर है। नहीं भूलना चाहिए कि कुछ तत्व ऐसे भी हैं जिनकी ‘दाल-रोटी’ इस देश में नफरत का चूल्हा सुलगाए रहने से ही चलती है।

शांत अयोध्या भारत के आंगन में दबे उपद्रवी तत्वों की अशांति का चरम है।

देश को उत्पात का अखाड़ा बनाने में लगे इन तत्वों को आप मोटे तौर पर तीन हिस्सों में बांट सकते हैं-

पहला, कट्टरवाद की बिसात पर मुसलमानों को मोहरों की तरह चलाने के अभ्यस्त संगठन।

दूसरा, लोकतंत्र के आंगन में खूनी क्रांति की चिंगारी लिए बैठे वामपंथी।

और तीसरा, शक्तिसम्पन्न भारत की अंतरराष्ट्रीय राजनीति और समीकरणों पर पड़ने वाले प्रभावों से चिंतित विदेशी गुट-गुर्गे।

हैरानी नहीं कि ‘अयोध्या से आगे’ बढ़ते भारत के रास्ते में अगला मोर्चा उत्पात के इसी त्रिकोण से हो। बहुत सम्भव है कि तीनों की छीजती ताकत से पैदा बौखलाहट इन्हें एक कर दे!

संशय दूर करने के लिए तीन झलकियां देखिए-

पहला नजारा भूमिपूजन के बाद सोशल मीडिया पर आई ऐसी सारी ‘पोस्ट’ का जहां विवाद के पटाक्षेप के बाद पहली बार खुलकर बाहर निकले उन मुस्लिम बंधुओं के चेहरे देश-दुनिया के सामने आए, जो आमतौर पर मिंबरों पर काबिज कट्टरपंथियों के हल्लेगुल्ले में छिप जाते हैं। इन चेहरों ने मुस्लिम समाज की वह तस्वीर दिखाई जो यह बताती है कि आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी उन्माद से भरी, पिद्दी-सी संस्थाएं इस पूरे वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं।

दूसरा दृश्य उन वामपंथियों की पोल खुल जाने का था जो मुस्लिम समाज की आड़ में बरसों से अदालत में अयोध्या को अखाड़ा बनाए थे।

विचार का तीसरा झरोखा, उन यूरोपीय विचार समूहों की पड़ताल से खुलता है जिनका मानना है कि गलवान में भारत के जबरदस्त पलटवार और तनकर खड़े हो जाने से ड्रैगन आशंका और हैरानी से भर गया है।

उपरोक्त तीनों स्थितियां बताती हैं कि भारत जैसे-जैसे उलझनों को हटाते हुए आगे बढ़ रहा है इसकी राह में परेशानियां खड़ी करने वालों की बेचैनी भी उससे ज्यादा अनुपात में बढ़ रही है।

ध्यान दीजिए, शाहीन बाग का हिंसक समर्थन, दिल्ली दंगों में तेजाब के पाउच, बम-पिस्तौलें और लद्दाख में तनाव के बीच चीनी कम्पनियों और कारोबार की पैरवी करने के लिए लोग मंगल ग्रह से नहीं आए थे!

इसलिए सीमापर युद्ध और समाज में टकराव टालने की अगली दवा इस भारत विरोधी ‘त्रिकोण’ का इलाज है। उपचार का प्रारंभ होने से ही शरीर में आशा और उत्साह के संकेत उठने लगे हैं।

बड़े नीतिगत निर्णयों के साथ-साथ अब यह उपचार छद्म सूचनाओं की छंटाई और राष्ट्रीय एकता के विमर्श को बढ़ाते हुए जरा लम्बा चलेगा।

 देश ने पिछले कुछ सालों में कई पुरानी बीमारियों का इलाज किया है, राष्ट्रीय अस्मिता और एकता के कई मोर्चों पर पताका फहराई है।

धैर्यपूर्वक, कंधे से कंधा मिलाकर डटे रहे तो भले एकबार में न सही किन्तु अंत में (और निकट भविष्य में) इस त्रिकोण का टूटना तय है।

Sunday, July 19, 2020

चीन को सबक जरूरी था

चीन को सबक जरूरी था :

गलवान घाटी में मुंह की खाने के बाद चीन पीछे हट चुका है। भारतीय जवानों की बहादुरी और भारत की विदेश नीति के चलते आज चीन के साथ कोई खड़ा होने को तैयार नहीं है। विस्तारवादी चीन के लिए ऐसा सबक बेहद जरूरी था

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15 और 16 जून रात्रि को चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पीएलए (जिसका मुखिया चीन का राष्ट्रपति होता है) के जवानों की गर्दन और रीढ़ की हड्डियां टूट जाएंगी कितनी विध्वंसक कार्रवाई भारतीय जवानों के द्वारा होगी चीन के लगभग 48 जवान मारे जाएंगे यह ड्रैगन ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा।

इस अप्रत्याशित मारकाट ने भारतीय कर्नल के ऊपर पीएलए के द्वारा हमले के बाद घातक रूप ले लिया। पीएलए या चीन यह हिमाकत बार-बार क्यों करता है क्योंकि उसकी उदंडी व्यवहार हमारी पूर्व की सरकारों ने बिगाड़ी हुई है। पूरे देश को इस बात का दुख है कि गलवान घाटी में हमारे 20 जवानों का बलिदान हुआ लेकिन चीन को हमारे जवानों ने औकात दिखा दी।

आज पूरा जवानों के साथ खड़ा है हमें अपने जवानों पर गर्व है कि उनके शौर्य के आगे पीपुल्स लिबरेशन आर्मी टिक नहीं पाई और लगभग 48 पीएलए के शैतान मारे गए। चीन विश्व की दूसरी बड़ी आर्मी है ,जो ड्रैगन सपने लेता है कि वह विश्व शक्ति और मुखिया बनकर के पूरे विश्व पर आर्थिक और सामरिक रूप से राज करेगा । उसकी दुर्गति इस तरह से भारतीय जवान करेंगे उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा।

चीन के चरित्र में ही धोखा घड़ी है लेकिन भारत में भी कम्युनिस्ट और कांग्रेस पार्टी ने चीनी कुनैन की की गोली खाई हुई है।

चीन बहुत चलाक है वह अपनी वीचैट जो उसकी फेसबुक की तरह मीडिया ऐप है अपनी जनता और मीडिया से किसी भी तरह की सूचना को प्रचारित करने से बच रहा है , उसे डर है कि उसके जवानों की जो दुर्गति हुई है उसके देश में लोगों तक वह खबर पूरी सत्यता के साथ ना पहुंचे।

वैसे भी चीन इस सूचना या अपनी बदहाली को को कभी भी नहीं मानेगा कि उसके इतनी बड़ी संख्या में उद्दंड जवान मारे गए हैं ।

क्योंकि वह खबरों को छुपाने मैं हमेशा से ही चलाक और शातिर रहा है।

अभी युद्ध की संभावना आरंभिक दौर में हैं अभी भविष्य में क्या होगा कुछ भी कहना मुश्किल है आज चीन कह रहा है भारत की तरफ से हमें प्रताड़ित किया जा रहा है और भारत लाइन ऑफ कंट्रोल का उल्लंघन कर रहा है।
यह हास्यास्पद है।

गलवान घाटी विवाद

1962 के युद्ध में नेहरू सरकार के अल्हड़ निर्णय के कारण भारतीय फौजियों को अपमानित होना पड़ा ,चीन की 80000 चीनी फौजों ने भारत के 10 से 15 हजार सैनिकों को बुरी तरह घेरा ,एक तरह से नरसंहार ही किया था ,क्योंकि उस समय की नेहरू सरकार ने भारतीय फौजों के साजो सामान आधुनिक हथियार ,सेना की वर्दी कपड़े यहां तक कि -30 डिग्री में कड़ाके की सर्दी में लड़ने के लिए जूते तक नहीं थे, । भारतीय जवानों को आवश्यक

युद्ध संसाधनों से वंचित रखा।

नतीजा यह निकला पूर्वी तिब्बत के अक्साई चीन का 38000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ,चीन ने अपने कब्जे में ले लिया और गलवान नदी का उद्गम क्षेत्र भी अक्साई चीन ही है जो तिब्बत के रास्ते होते हुए श्योक नदी में जाकर मिलती है।

केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के अध्यक्ष डॉ लोबसांग सांगे ने कहा गलवान शब्द ही लद्दाख की पृष्ठभूमि से आया है। चीनी प्रशासन का तो वहां पर वैसे भी कोई दावा बनता ही नहीं है।

तिब्बत पर 1954 में चीन ने पूर्ण रूप कब्जा किया लिया था ,वह इसकी योजना चीन 1950 से ही बना रहा था ।
क्योंकि तत्कालीन तिब्बत में चीन के खिलाफ लगातार आंदोलन चलते रहते थे ,अपनी स्वाधीनता स्वतंत्रता को लेकर।

तिब्बत की आजादी का आंदोलन आज भी चल रहा है। तिब्बत चीन के लिए दुखती रग है,

संपूर्ण तिब्बत को घेरने के लिए चीन ने शिंजियांग तिब्बत राजमार्ग जिसकी कुल लंबाई 2743 किलोमीटर है उसने इस राजमार्ग मार्ग का निर्माण 1950 में ही प्रारंभ कर दिया था ।

तत्कालीन भारतीय सरकार सोती रही और चीन पूर्वी लद्दाख (अक्साई चीन) के अंदर ही घुस कर के वह अपने राजमार्ग बना रहा था । भारत को वह हमेशा इस राजमार्ग से दूर रखने का प्रयास करता रहा है ।

मुझे इसका एक कारण यह भी लगता है लद्दाख और तिब्बत का संबंध सांस्कृतिक धार्मिक रूप से बहुत करीब रहा हैं । उदाहरण के लिए जैसे भारत का मिथिला क्षेत्र नेपाल के मिथिला क्षेत्र से सांस्कृतिक रूप से बहुत ज्यादा घुला मिला है लेकिन मिथिला का क्षेत्र दो हिस्सों में बटा हुआ है 52% नेपाल में है और 48% भारत में है,

भारत 1947 में आजाद हुआ आजादी के बाद से ही जवाहरलाल नेहरू हिंदी चीनी भाई भाई करते रहे और चीन की सेना ने 1962 में गलवान घाटी के आसपास बहादुर भारतीय फौजों का नरसंहार किया ,क्योंकि भारतीय जवानों के पास हौसला तो था लेकिन जरूरत के अनुसार ना भोजन था ना हथियार थे ना युद्ध नीति थी और युद्ध में कोई बैकअप भी नहीं था ।

देशवासियों को समझना होगा 1962 में नहीं चीन ने अक्साई चीन यानी पूर्वी लद्दाख के भारतीय क्षेत्र पर 1950 में ही कब्जा कर लिया था ।

भारत की तत्कालीन अल्हड़ सरकार को इसकी जानकारी ही नहीं लगी। मेरा शरीर सिहर उठता है तत्कालीन 1950 के आसपास कितने अनावश्यक और मस्तिष्क के कोढ़ी लोगों के पास भारतीय सरकार की कमान थी। परम पूजनीय बालासाहेब देवरस की पुस्तक सामाजिक "समरसता और हिंदुत्व" पुस्तक के 33 पृष्ठ पर श्री सीडी देशमुख जो अंग्रेजों के समय में आई सी एस अधिकारी रह चुके थे और प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू के कालखंड में वित्त मंत्री थे उन्होंने अपना आत्म चरित्र लिखा है और उसके कुछ पंक्तियां इस पुस्तक में आदरणीय बाला साहब देव रस जी ने उसका उल्लेख किया है उन्हें आज देश की जनता को समझना अत्यधिक जरूरी है ।

श्री सीडी देशमुख अपने आत्म चरित्र में लिखते हैं खासकर नौकरशाही के विषय को उन्होंने स्पष्ट किया है उन्होंने कहा कि अंग्रेज अपने शासनकाल में नौकरशाही का उपयोग स्वाधीनता आंदोलन को दबाने के लिए तो अवश्य करते थे ,लेकिन इतना होते हुए भी इस बात की चिंता करते थे कि प्रशासन कि मशीनरी भ्रष्ट ना हो । वह ईमानदार रहे परिश्रमी रहे किंतु देश के स्वाधीन होने के बाद जो लोग कुर्सी पर आकर बैठे हैं उन्होंने कुर्सी के लिए या व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए अथवा अपने दल के लिए सरकारी बाबू ओं का गलत काम करवाने की शुरुआत कर दी है ,इसलिए इन सरकारी नौकरशाही और प्रशासन की आदतें बिगड़ती जा रही है। श्री देशमुख के अनुसार कांग्रेस का भ्रष्ट आचरण उसकी सरकारों का नौकरशाही के लिए गलत इस्तेमाल 1962 में भारत की पराजय का मुख्य कारण बनी।

गलवान घाटी में 1962 में युद्ध का कारण भी शिनजियांग और तिब्बत का राजमार्ग था और आज भी चीन गलवान घाटी में बेहतर पोजीशन के लिए भारतीय सेनाओं से झड़प करता रहता है ।

यानी कि मैं यह प्रमाणित रुप से कह सकता हूं गलवान घाटी का विवाद तत्कालीन नासमझ अल्हड़ अक्षम सरकार ने 1950 से ही उत्पन्न कर लिया था। जिसे आज तक हम भुगत रहे हैं।

चीन 1950 से ही तिब्बत पर कब्जे की योजना बनाने के साथ-साथ भारतीय लद्दाख क्षेत्र में भी अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा था ,जिसकी सूचना उस समय की तत्कालीन सरकार को कई वर्षों तक लगी ही नहीं, क्योंकि भारतीय सेना को पेट्रोलिंग की कोई आवश्यकता ही नहीं है ऐसा सरकार मान कर के बैठी थी ।

भारतीय सेना कुछ करना चाहती थी तो सेना के पास अपने संसाधन ही नहीं थे। उनकी इस नासमझी का बहुत बड़ा खामियाजा हमें आज तक भुगतना पड़ रहा है। उसके पश्चात जब जब कांग्रेस की सरकारें रहीं 5000 वर्ग किलोमीटर जमीन और चीन द्वारा कबजा ली गई ,यानी कि अब लगभग 43000 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन के कब्जे में है। चीन भारतीय सीमा पर इतना आक्रमक क्यों है इसे समझने की जरूरत है ऑस्ट्रेलिया ने चीन के लिए कहा कि उसकी जांच होनी चाहिए कि चीन की तरफ से जानबूझकर कोरोना को पूरे विश्व में फैलाया गया है और भारत ने इसका समर्थन कर दिया। साथ ही क्रोना का खौफ पूरे चीन में फैल गया साथ ही विश्व के कई प्रमुख देशों ने चीन के साथ अपने आर्थिक संबंध तोड़ने का ऐलान जब प्रारंभ किया ,तो चीन में जितनी विदेशी कंपनियां थी उनमें हड़कंप मच गया और वह भारत खासकर उत्तर प्रदेश की ओर रुख करने पर ज्यादा विचार करने लगी स्वाभाविक है इससे चीन को बौखलाहट रही होगी ।

रक्षा विशेषज्ञ और मेजर जनरल पीके सहगल से बातचीत हुई उन्होंने बताया आज भारतीय सेना विश्व की एक बेहद व्यवहारिक ,,अनुशासित ,संगठित सेना है। अब यूपीए की सरकार नहीं है जो अक्सर सीपीएम के दबाव में रहती थी और सीपीएम का चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ क्या रिश्ता है यह विश्व की बिरादरी और भारतीय लोग अच्छी तरह से जानते हैं।

1962 के युद्ध में भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी चीन के समर्थन में खड़ी हुई थी। बकौल पीके सहगल के अनुसार विश्व की किसी भी बेहतरीन सेना के पास युद्ध लड़ने के लिए दो तरफा क्षेत्रों में लगभग 40 दिन का बैकअप साजो समान हथियार गोला बारूद, बेहतरीन मारक क्षमता वाले एयरक्राफ्ट, बैलेस्टिक मिसाइलें, तोपे ,हथियार सप्लाई लाइन ,बेहतरीन हथियारों की तकनीक और शानदार सूचना तकनीक होनी चाहिए। लेकिन जब जब कांग्रेस की और यूपीए की सरकार रही तो सेना के पास 2 दिन का भी बैकअप युद्ध का साजो सामान आदि नहीं बचा था ।
इस तथ्य की पुष्टि सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में भी की थी इसका अर्थ है प्रमाणिक रूप से कहा जा सकता है कि यूपीए सरकार के समय में भारतीय सेना का मनोबल अत्यधिक और लगातार तोड़ा गया था।

यूपीए कांग्रेस की सरकार थी तब मात्र बोफोर्स तोप के अलावा कोई भी युद्ध हेतु साजो सामान का सौदा नहीं किया गया कितना हास्यास्पद था ।

2014 एनडीए की सरकार आने के बाद फ्रांस ,इजरायल ,और रूस के साथ कई तरह के सैन्य साजो समान हथियारों का सौदा किया गया अपाचे हेलीकॉप्टर ,रफाएल लड़ाकू विमान का सौदा , M777 अत्यधिक त्रिव मारक क्षमता वाले अमेरिकी विमान आदि के सौदा नई एनडीए की सरकार में ही हुए। सरकार और प्रधानमंत्री की भूमिका भारतीय सरकार और भारतीय सेना पर हमें गर्व होना चाहिए पूरी तरीके से सेना के साथ खड़ी हुई भारत की सरकार सेना का हौसला बढ़ाने के लिए पूरी तत्परता से कार्य कर रही है। स्वाधीनता के बाद लगभग हमें पांच युद्ध लड़ने पड़े हैं

बालासाहेब देवराज अपनी पुस्तक सामाजिक समरसता और हिंदुत्व में कहते हैं अगर युद्ध लड़ने का प्रसंग राष्ट्र के ऊपर आता है तो राष्ट्र को पूरी शक्ति के साथ युद्ध लड़ना चाहिए और विजय प्राप्त करनी चाहिए उसके कारण से अगर किसी दल या व्यक्ति के जीवन में कोई तनाव आता है तो उसे सहज सहर्ष सहन करना चाहिए ।यह राष्ट्र के प्रति के प्रत्येक दल और व्यक्ति का नागरिक कर्तव्य है।

अक्साई चीन से लेकर अरुणाचल तक भारतीय फौज में पूरी तरीके से चौकन्ना युद्ध की स्थिति तैयार हैं उन्होंने हाय अलर्ट किया हुआ है। भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने देश को और सर्वदलीय बैठक में संपूर्ण विपक्ष को विश्वास दिलाया है भारतीय सीमा पर चीनी घुस नहीं पाए भारतीय फौजों ने बहादुरी से इसका जवाब दिया।

प्रधानमंत्री मोदी ने कई बार चीन का नाम लेकर स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत का राष्ट्र हित सर्वोपरि है पीएम
मोदी ने कहा जिन क्षेत्रों में पहले हमारी नजर नहीं होती थी वहां पर हमारी नजर है जल, थल ,नभ में हम पूरी तरह से तैयार हैं। भारतीय सेना में आज जैसा शौर्य और चैतन्य है वह बहुत ही प्रशंसनीय है क्योंकि वर्तमान सरकार सेना के कार्य योजना और तकनीकी दृष्टि से भारतीय सेना को मजबूत दिशा की ओर सकारात्मक रूप से बढ़ाती हुई नजर आ रही है।

निष्ठा ,लक्ष्य ,निर्धारित कर्म अनुशासन ,एकाग्रता कृतज्ञता, कुशाग्रता कुछ खास प्रवृत्ति के ही राजनेताओं में एक साथ विद्यमान होते हैं। इसे किसी व्यक्ति को दिया गया ईश्वर का उपहार ही कहेंगे। भारत सरकार और प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक जागरूकता कुशल रणनीति का प्रयोग ठीक से समय काल का अवलोकन करते हुए चीन जैसे दुस्साहसही शैतान को भी अपनी हाराकरी योजना को बदलते हुए अपने कदम को पीछे लेना पड़ा।

कांग्रेस पार्टी और विपक्ष की भूमिका

रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने कहा भारतीय सेना का मनोबल ऊंचा उठाने की आवश्यकता है। विपक्ष को सरकार पर ऐसे मामलों में सवाल नहीं खड़ा करना चाहिए। आखिर जब प्रधानमंत्री कुछ कहते हैं तो उनके पास अपने सेना के श्रेष्ठ सूचना के केंद्र इंफॉर्मेशन के रिसोर्सेज होते हैं सेना है इंटेलिजेंस के आधार पर वह कोई बयान देते हैं

अगर विपक्षी दल खासकर कांग्रेस इस समय सरकार पर सवाल खड़ा करते हैं तो एक तरह से वह दुश्मनों को फायदा पहुंचाने का काम कर रहे हैं और सीपीएम और कांग्रेस के बयानों को चीन मीडिया उठाती है और उसका इस्तेमाल मनोवैज्ञानिक युद्ध के लिए करती है।

लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह के अनुसार 15 जून और 16 जून की रात्रि भारतीय आर्मी का साहस शौर्य के बलिदान पर विपक्ष सवाल ना खड़ा करें हमारी फौजों ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को विश्व में एक्सपोज कर दिया है ।

भारत की आज की बेहतरीन विदेश नीति सैन्य नीति के कारण चीन को अपने सैनिकों को लगभग 2 किलोमीटर पीछे अपने स्थानों पर ले जाना पड़ा अपने टेंट हटाने पड़े।

प्रधानमंत्री मोदी की कुशल रणनीति के कारण अमेरिका के पेसिफिक ओशन में नेवी को अलर्ट कर दिया। फ्रांस
इंग्लैंड ऑस्ट्रेलिया ताइवान को अपने खेमे की तरफ लाकर प्रधानमंत्री मोदी ने एक वैश्विक नेता की छवि को बनाया है। और विश्व बिरादरी में चीन के साथ सिर्फ कंगाल पाकिस्तान खड़ा रह गया।

भारत के प्रधानमंत्री की चीन के लिए आर्थिक नाकेबंदी ,विदेश नीति कूटनीति, यह भारत की विजय है। देश की जनता का देशव्यापी ,चीन के उत्पादों को खिलाफ रोष बढ़ता जा रहा है सरकार को उसे ठीक से समझने की और उस विषय पर और क्या बेहतर कर सकते हैं विचार करने की आवश्यकता है।

भारत की सबसे पुरानी दो पार्टियां कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मानसिक रोगी की तरह इनके नेता व्यवहार कर रहे हैं।

राहुल गांधी के ट्वीट बार-बार भारतीय सेना का मनोबल ही नहीं तोड़ते अपितु चीन को वह मनोवैज्ञानिक लाभ देने का प्रयास करते हैं।

आखिर 2008 के बीजिंग ओलंपिक में राहुल और सोनिया गांधी चाइना गए थे वहां की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ उनका आखिर क्या समझौता हुआ था ।

यह हमें भी जानने का हक है। रही बात भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की तो भारतीय लोकतंत्र में अंतिम सांसे लेती हुई वह चीन के कम्युनिस्ट जूतों को अपने सर पर पीटने के अलावा कुछ नहीं कर सकती है।
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