Wednesday, December 15, 2021

गीता जयंती पर विशेष : संसार की समस्त शुभता का सागर

 कुरुक्षेत्र के मैदान में गीतोपदेश देते भगवान श्रीकृष्ण


भगवद्गीता एक धर्मग्रंथ व एक पुस्तक न होकर एक जीवनशैली है, जो हर उम्र को अलग संदेश और हर सभ्यता को अलग अर्थ समझाती है। संसार की समस्त शुभता इसी में विद्यमान है।

भगवान् श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में मोहग्रस्त अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया। कर्म का वह महामंत्र प्रदान किया जो मानव जाति के लिए कल्याणकारी और पथ-प्रदर्शक है। श्रीकृष्ण ने गीता में नश्वर भौतिक शरीर और नित्य आत्मा के मूलभूत के अंतर को समझाया है। कहा है कि आत्मा अजर और अमर है। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रें को छोड़कर नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, उसी प्रकार आत्मा जीर्ण शरीर को त्यागकर नए शरीर में प्रवेश करती है। अतः मनुष्य को कल की चिंता किए बिना कर्तव्य का पालन करना चाहिए। सफलता और असफलता के प्रति समान भाव रखकर कार्य करना ही श्रेयस्कर है। यही कर्मयोग है। श्रीकृष्ण के उपदेश गीता के अमृत वचन हैं। उनके उपदेश से ही कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े बंधु-बांधवों से अर्जुन का मोह दूर हुआ। तदोपरांत ही वे अधर्मी और दुर्बल हृदय वाले कौरवों को पराजित करने में सफल हुए। कौरवों की हार महज पांडवों की विजय भर नहीं, बल्कि धर्म की अधर्म पर, न्याय की अन्याय पर और सत्य की असत्य पर जीत है। श्रीकृष्ण ने गीता में धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य और न्याय-अन्याय को सुस्पष्ट किया है। उन्होंने धृतराष्ट्र पुत्रों को अधर्मी, पापी और अन्यायी तथा पांडु पुत्रों को पुण्यात्मा कहा है। उन्होंने संसार के लिए क्या ग्राह्य और क्या त्याज्य है उसे भलीभाँति समझाया है। श्रीकृष्ण के उपदेश ज्ञान, भक्ति और कर्म का सागर है। भारतीय चिंतन और धर्म का निचोड़ है। सारे संसार और मानव जाति के कल्याण का मार्ग है। विश्व के महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा भी है कि श्रीकृष्ण के उपदेश अद्वितीय हैं। उन्हें पढ़कर ही मनुष्य को ज्ञान हुआ कि इस दुनिया का निर्माण कैसे हुआ। महात्मा गांधी ने भी कहा है कि जब मुझे कोई परेशानी घेर लेती है, मैं गीता के पन्नों को पलटता हूं। महान दार्शनिक श्री अरविंदो ने कहा कि भगवद्गीता एक धर्मग्रंथ व एक पुस्तक न होकर एक जीवनशैली है, जो हर उम्र को अलग संदेश और हर सभ्यता को अलग अर्थ समझाती है। संसार की समस्त शुभता इसी में विद्यमान है। उनके उपदेश जगत् कल्याण का सात्विक मार्ग हैं। श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में खड़े अर्जुन रूपी जीव को धर्म, समाज, राष्ट्र, राजनीति और कूटनीति की शिक्षा दी है। प्रजा के प्रति शासक के आचरण-व्यवहार और कर्म के ज्ञान को उद्घाटित किया है। श्रीकृष्ण के उपदेश कालजयी और संसार के लिए कल्याणकारी हैं। युद्ध और विनाश के मुहाने पर खड़े संसार को संभलने का संबल है। अत्याचार और राजनीतिक कुचक्र को किस तरह सात्विक बुद्धि से हराया जाता है महाभारत उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन का सारथी बनकर सत्य का पक्ष लिया। श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन अत्याचार और अहंकार के विरुद्ध एक संघर्ष है। बाल्यावस्था से ही वे अलौकिक थे। किंतु उनकी अलौकिकता में जगतकल्याण की भावना निहित है। श्रीकृष्ण उन बंधी-बंधाई धारणाओं और परंपराओं को, जो राष्ट्र-समाज के लिए अहितकर हैं उन्हें तोड़ने में हिचक नहीं दिखाते हैं। वे तत्कालीन निरंकुश शासकों की भोगवादी और वर्चस्ववादी जीवनशैलियों के विरुद्ध आवाज बुलंद करते हैं। जनता को अत्याचार से लड़ने का संदेश देते हैं। इसके साथ ही सभी मनुष्यों और प्राणियों के प्रति उनका एकात्मभाव देखते ही बनता है। उनकी हर क्रिया में जगत् का कल्याण निहित है। उन्होंने संसार को संदेश दिया है कि दुर्योधन, कर्ण, विकर्ण, जयद्रथ, कृतवर्मा, शल्य, अश्वथामा जैसे अहंकारी और अत्याचारी जीव राष्ट्र-राज्य के लिए शुभ नहीं होते। वे सत्ता और ऐश्यर्य के लोभी होते हैं। धृतराष्ट्र केवल जन्म से ही अंधा नहीं था, बल्कि वह आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टि से भी अंधा था। उसका सत्तामोह और पुत्र के प्रति आसक्ति का परिणाम रहा कि हस्तिानापुर विनाश को प्राप्त हुआ। धृतराष्ट्र तथा उसके स्वार्थी-अभिमानी पुत्रें में ये सभी अवगुण विद्यमान थे। श्रीकृष्ण ने विष देने वाला, घर में अग्नि लगाने वाला, घातक हथियार से आक्रमण करने वाला, धन लूटने वाला, दूसरों की भूमि हड़पने वाला और पराई स्त्री का अपहरण करने वाले राजाओं को अधम और आतातायी कहा है। धृतराष्ट्र के पुत्र ऐसे ही थे। सत्ता में बने रहने के लिए वे सदैव पांडु पुत्रों के विरुद्ध षड्यंत्र रचा करते थे। अनेक बार उनकी हत्या के प्रयत्न किए। श्रीकृष्ण ने ऐसे पापात्माओं और नराधमों को वध के योग्य बताया है। समाज को प्रजावत्सल शासक चुनने का संदेश दिया है। अहंकारी, आततायी, भोगी और संपत्ति संचय में लीन रहने वाले आसुरी प्रवृत्ति के शासकों को राष्ट्र के लिए अशुभ और आघातकारी माना है। कहा है कि ऐसे शासक प्रजावत्सल नहीं सिर्फ प्रजाहंता होते हैं।

Thursday, December 9, 2021

स्वराज मिला, स्वतंत्रता नहीं

अमृत महोत्सव आयोजन समिति, काशी हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा किया गया था। उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र में स्वतंत्रता के लिए कार्य हुआ। महामना जी ने विश्वविद्यालय रूपी तीर्थ बनाया है। यह भी शिक्षा के क्षेत्र में स्वतंत्रता संग्राम है।

27 नवंबर को काशी मेंस्वाधीनता से स्वतंत्रता की ओर कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस अवसर पर प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक श्री जे. नंदकुमार ने कहा कि 1947  की मध्य रात्रि में स्वराज मिला, स्वतंत्रता नहीं मिली। भारत के सभी लोग अपने दायित्व का निर्वहन राष्ट्रहित में करें, स्वाधीनता अवश्य प्राप्त होगी।

कार्यक्रम का आयोजन अमृत महोत्सव आयोजन समिति, काशी हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा किया गया था। उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र में स्वतंत्रता के लिए कार्य हुआ। महामना जी ने विश्वविद्यालय रूपी तीर्थ बनाया है। यह भी शिक्षा के क्षेत्र में स्वतंत्रता संग्राम है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के कार्यवाह डॉ. वीरेंद्र जायसवाल ने कहा कि प्राचीन समय में न्यायशास्त्र हमारा धर्म हुआ करता था।

सिकंदर जो भारत में प्रवेश नहीं कर पाया, उसे कुछ लोग विश्व विजेता बताते हैं। वर्तमान में भी हम बातचीत, पहनावे, संस्कार में पराधीन हैं। इस अवसर परएक मंच-एक स्वर का आयोजन किया गया। इस दौरान डॉ. ज्ञानेश चंद्र पांडेय एवं प्रो. बाला लखेंद्र के संयुक्त संयोजन में एक मंच पर एक स्वर में संगीत एवं मंच कला संकाय के 75 विद्यार्थियों द्वारा कुलगीत एवं वन्देमातरम् की प्रस्तुति दी गई।


Saturday, November 20, 2021

प्रधानमंत्री ने तीनों सेनाओं को देश में डिजाइन और विकसित हथियार सौंपे

स्वदेशी रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए रक्षा उद्योग गलियारा परियोजना का शिलान्यास किया, उत्तर प्रदेश डिफेंस कॉरिडोर में टैंकरोधी लक्षित मिसाइलों का उत्पादन संयंत्र तैयार किया जाएगा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'राष्ट्रीय रक्षा समर्पण पर्व' के मौके पर शुक्रवार को झांसी (उत्तर प्रदेश) में तीनों सेनाओं को देश में ही डिजाइन और विकसित हथियार सौंपे। इसमें सबसे प्रमुख स्वदेश निर्मित लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर (एलसीएच) है। उन्होंने स्वदेशी रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए 400 करोड़ रुपये की उत्तर प्रदेश रक्षा उद्योग गलियारा परियोजना का भी शिलान्यास किया। यह परियोजना भारत डायनेमिक लिमिटेड को सौंपी गई है। इसके अंतर्गत टैंकरोधी लक्षित मिसाइलों का उत्पादन संयंत्र तैयार किया जाएगा।

'आजादी का अमृत महोत्सव' समारोह के हिस्से के रूप में यह पर्व उत्तर प्रदेश सरकार के साथ मिलकर आयोजित किया गया। समारोह में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि लंबे समय से भारत को दुनिया के सबसे बड़े हथियार खरीदार देशों में गिना जाता रहा है लेकिन आज देश का मंत्र 'मेक इन इंडिया-मेक फॉर वर्ल्ड' है। आज भारत अपनी सेनाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम कर रहा है। आज हमारी सेनाओं की ताकत बढ़ने के साथ ही भविष्य में देश की रक्षा के लिए सक्षम युवाओं के लिए जमीन भी तैयार हो रही है। इसी मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने देश को आश्वस्त किया कि वह दिन जल्द आएगा, जब 90 प्रतिशत रक्षा उपकरण भारत में बनेंगे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय वायु सेना के प्रमुख वीआर चौधरी को हल्के वजन वाले लड़ाकू हेलीकॉप्टर का मॉडल सौंपा। एलसीएच दुनिया का एकमात्र अटैक हेलीकॉप्टर है जो हथियारों और ईंधन के काफी भार के साथ 5,000 मीटर (16,400 फीट) की ऊंचाई पर लैंडिंग और टेक ऑफ कर सकता है। हेलीकॉप्टर 20 एमएम बुर्ज गन, 70एमएम रॉकेट लॉन्चिंग सिस्टम, एयर टू ग्राउंड और एयर टू एयर लॉन्चिंग मिसाइल सिस्टम से लैस है। एलसीएच दो इंजन वाला हेलीकॉप्टर 5-8 टन वर्ग का लड़ाकू हेलीकॉप्टर है। एलसीएच में प्रभावी लड़ाकू भूमिकाओं के लिए उन्नत तकनीकों को शामिल किया गया है। इसे दुश्मन की वायु रक्षा, काउंटर विद्रोह, खोज और बचाव, टैंक विरोधी, काउंटर सर्फेस फोर्स ऑपरेशंस इत्यादि जैसी भूमिकाओं को पूरा करने के लिए डिजाइन किया गया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने नौसेना प्रमुख करमबीर सिंह को एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट 'शक्ति' सौंपा। इसे रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) की हैदराबाद में स्थित इलेक्ट्रॉनिक्स अनुसंधान प्रयोगशाला (डीएलआरएल) ने डिजाइन और विकसित किया है। यह प्रणाली भारतीय नौसेना की पिछली पीढ़ी के ईडब्ल्यू सिस्टम की जगह लेगी। मिसाइल हमलों के खिलाफ भारतीय नौसेना के जहाजों की रक्षा के लिए इस सिस्टम को वाइडबैंड इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ईएसएम) और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर मेजर (ईसीएम) के साथ एकीकृत किया गया है। शक्ति ईडब्ल्यू प्रणाली समुद्री युद्ध के मैदान में आधुनिक रडार और जहाज-रोधी मिसाइलों के खिलाफ रक्षा की एक इलेक्ट्रॉनिक परत प्रदान करेगी। पहली शक्ति प्रणाली आईएनएस विशाखापत्तनम पर स्थापित की गई है और इसे स्वदेशी विमान वाहक आईएनएस विक्रांत पर भी स्थापित किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल चंडी प्रसाद मोहंती को स्वदेश में विकसित 'स्विच 1.0 यूएवी' ड्रोन सौंपा। लगभग 2 घंटे की सहनशक्ति वाला स्विच 1.0 यूएवी भारत की सीमाओं पर दिन और रात की निगरानी के लिए कठोर वातावरण और उच्च ऊंचाई के तहत भारतीय सेना के सबसे अधिक मांग वाले निगरानी अभियानों का समर्थन करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वदेश में विकसित 'एमआर-20' हेक्साकॉप्टर ड्रोन भी सौंपा। इससे आगे के क्षेत्रों में ऊंचाई पर तैनात सैनिकों के लिए भोजन, आवश्यक वस्तुओं, आपातकालीन चिकित्सा सहायता, गोला-बारूद और हथियारों की 20 किलोग्राम तक की आपूर्ति की जा सकेगी। उन्होंने कहा कि भारत का ड्रोन उद्योग सशस्त्र बलों की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए अत्याधुनिक समाधान विकसित करने पर काम कर रहा है।


प्रधानमंत्री ने तीनों सेनाओं को देश में डिजाइन और विकसित हथियार सौंपे,

स्वदेशी रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए रक्षा उद्योग गलियारा परियोजना का शिलान्यास किया, उत्तर प्रदेश डिफेंस कॉरिडोर में टैंकरोधी लक्षित मिसाइलों का उत्पादन संयंत्र तैयार किया जाएगा

Saturday, November 6, 2021

वैदिक काल में आधुनिक आर्थिक व वाणिज्यिक विधानों की भांति ही आर्थिक विवादों के लिए व्यापक विधान थे

 

आर्थिक विवादों के निवारण के लिए थे व्यापक विधान:

आर्थिक याचिकाएं 18 भागों में विभाजित थीं और चार प्रकार के न्यायालयों का प्रावधान था

आधुनिक आर्थिक वाणिज्यिक विधानों की भांति प्राचीन राज-शास्त्रीय ग्रन्थों एवं स्मृतियों में भी क्रय-विक्रय, संविदा, अनुबन्ध, ऋण-शोधन, अस्वामी-विक्रय आदि अनेक प्रकार के आर्थिक व्यवहारों पर विस्तृत विधान नियमों का विवेचन है। वेदों में विवेचित वृहद स्तरीय व्यापार, वाणिज्य समुद्र पार निर्यात और जल, थल नभ मार्गों से परिवहन आदि के विवरणों के अनुरूप ही हमारे प्राचीन वाड्.मय में क्रय-विक्रय वाणिज्य सम्बन्धी विधियों अर्थात कानूनों का विस्तृत विवरण मिलता है। आर्थिक व्यवहारों के सम्बन्ध में जो वाद या लॉ सूट लाये जाते थे, उन्हें 18 प्रकार के व्यवहार पदों अर्थात 18 प्रकार की न्यायिक याचिकाओं में वर्गीकृत किया गया है, जिन्हें पुन: 108 श्रेणियों में उपविभाजित कर उनके सम्बन्ध में विस्तृत नियमावलियों का संकलन है

प्राचीन 18 प्रकार के व्यवहार पद अर्थात न्यायिक याचिकाएं
प्राचीन आर्थिक व्यवहार लेन-देन सम्बन्धी विवादों के 18 प्रकार के व्यवहार पदों पर आज के विधिशास्त्र से कहीं विस्तृत विधान लिपिबद्ध है।
स्मृतियों के अनुसार विवाद के 18 व्यवहार पद इस प्रकार हैं :

  1. वस्तु देकर फिर क्रोध, लोभ आदि के कारण बदल जाना। याज्ञवल्क्य नारद ने दत्तप्रदानिक बृहस्पति ने अदेयाद्य शब्द प्रयोग किया है।
  2. वेतन अनपाकर्म (वेतन देना)- किसी से काम लेकर उसका पारिश्रमिक देना। इसके लिए वेतन-अदान भृत्यदान शब्द भी मिलते हैं।
  3. संविद व्यतिक्रम - कोई अनुबन्ध या संविदा अर्थात कॉन्ट्रैक्ट करके उसे पूरा करना।
  4. क्रय-विक्रय का अनुशय - किसी वस्तु के खरीदने या बेचने के बाद में असंतोष होना। इसके लिए क्रीतनिुशय विक्रीत-क्रीतानुशय शब्दों का प्रयोग भी मिलता है।
  5. स्वामिपाल विवाद अर्थात स्वामी और पशुपालक का विवाद - चरवाहे की असावधानी से पशु मृत्यु के विवाद।
  6. क्षेत्रजविवाद (ग्राम आदि की सीमा का विवाद) - मकान आदि का सीमा विवाद भी इसी में आता है। भूवाद शब्द प्रयोग भी मिलता है।
  7. वाक् पारूष्य - गाली गलौज करना पारूष्य, मानहानि कारक अपकृव्य करना।
  8. दण्ड पारूष्य - मारपीट
  9. स्तेय (चोरी) -
  10. साहस (डकैती) या वध हिंसा - बलपूर्वक स्वामी की उपस्थिति में धन का हरण।
  11. स्त्री संग्रहण - स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार या अशोभनीय व्यवहार।
  12. स्त्री पुंधर्म - स्त्री और पुरूष (पति-पत्नी) के आपसी विवाद।
  13. विभाग-दाय विभाग - पैतृक सम्पत्ति विभाजन।
  14. द्यूत समाह्वय या अक्षवेदन-दोनों जुए के अन्तर्गत आते हैं। प्राणी रहित पदार्थों के द्वारा ताश, चौपड़, जुआ, द्यूत कहलाता है; प्राणियों के द्वारा तीतर, बटेर आदि का युद्ध घुड़दौड़ आदि समाह्वय।

  15. अतिरिक्त व्यवहार पद : कुछ ग्रन्थों में व्यवहारपद के अतिरिक्त वर्ग भी मिलते हैं:-

1.    अभ्यूपेत्यासुश्रूषा या असुश्रूषा
2.     विक्रीयसम्प्रदानष 3.    प्रकीर्णक


व्यवहार पद से आशय न्यायालयों के प्रकार
हिन्दू विधि के सन्दर्भ में व्यवहार एक महत्वपूर्ण संकल्पना है। कात्यायन ने इस शब्द का विश्लेषण इस प्रकार किया है- व्यवहार = वि $ अव $ हार; ‘विका अर्थविभिन्नतथाअवका अर्थ सन्देह तथा हार का अर्थहरनायादूर करनाहै। अर्थात पद व्यवहार विभिन्न प्रकार के आर्थिक विवादों का निवारण करता है।

न्यायालय के प्रकार या श्रेणियां
बृहस्पति स्मृतिचन्द्रिका के अनुसार भारत में चार प्रकार के न्यायालय होते थे-

  1. प्रतिष्ठित न्यायालय: किसी पुर या ग्राम में प्रतिष्ठित स्थायी रूप से विद्यमान या कार्यरत न्यायालय इस श्रेणी में आते हैं।
  2. अप्रतिष्ठित न्यायालय: ऐसे न्यायालय स्थायी रूप से एक स्थान पर प्रतिष्ठित होकर विभिन्न ग्रामों में समय-समय पर स्थापित किये जाते थे। इन्हें चल न्यायालय भी कहा जाता था।
  3. मुद्रित या मुद्रा युक्त न्यायालय: अर्थात शासकीय मुद्राओं के अन्तर्गत कार्यरत न्यायालय, तथा
  4. राज्य शासित संचालित न्यायालय।


आर्थिक नियमावली न्याय के आधार


आज के इकोनॉमिक लॉ या आर्थिक विधियों के समतुल्य मनुस्मृति, याज्ञवल्कय स्मृति, कौटिल्य अर्थशास्त्र तथा नारद बृहस्पति आदि की स्मृतियों में आर्थिक व्यवहारों के सम्बन्ध में विधानों एवं व्यवस्थाओं का विस्तृत वर्णन, व्यवहार पदों के अन्तर्गत किया गया है। स्मृतियां उन विषयों को, जिनके अन्तर्गत विवाद उत्पन्न हो सकता है, 18 शीर्षकों में रखती हैं। इन्हें व्यवहारपद कहते हैं। देश में जब प्रथम सिविल प्रक्रिया संहिता बनी थी, उसे भी तब प्रारम्भिक वर्षों में व्यवहार प्रक्रिया संहिता ही कहा जाता रहा है। व्यवहार के 18 पदों का तात्पर्य है कि सभी प्रकार के विवाद 18 में से किसी एक श्रेणी के अन्तर्गत रहेंगे। दण्ड व्यवस्था भी स्मृतियों में इन 18 प्रकार के पदों के अनुसार ही है। आपराधिक कृत्यों के विधान व्यवहार पदों से सभी में भिन्न हैं।

व्यवहार पदों के विषय में स्मृतिगत भिन्नताएं


व्यवहार के इन 18 पदों का मनु स्मृति एवं नारद स्मृति में भी भेद है। मनु स्मृति में क्रय-विक्रय दोनों पदों को एक साथ रखा है किन्तु नारद स्मृति में क्रय-विक्रय को अलग-अलग रखते हुए व्याख्या की है। इसमें स्वामी और पशुपालन का विवाद, स्तेय, स्त्री संग्रहण का वर्णन 18 पदों में नहीं किया गया है। परन्तु विवाद के 18 पदों की पूर्ति अन्य प्रकारों से की है। नारद स्मृति में क्रय-विक्रय को दो अलग-अलग पदों में रखा गया है तथा अभ्युयेत्यशुश्रूष तथा प्रकीर्णक को व्यवहार के पदों में स्थान देकर 18 पदों की पूर्ति की गई है। इसी प्रकार याज्ञवल्कय स्मृति के व्यवहार पद मनु स्मृति से कुछ भिन्न हैं। याज्ञवल्कय नारद स्मृति में क्रय-विक्रय को अलग-अलग रखा गया है तथा स्त्री पुंधर्म का उल्लेख नहीं है। नारदस्मृति के समान अभ्युयेत्यशुश्रूषा तथा प्रकीर्णक के वर्णन से 18 की संख्या पूर्ण हो जाती है।

व्यापकता


व्यवहार के पदों को, जो इस प्रकार विभिन्न शीर्षकों के अन्तर्गत रखा गया है, इसका अर्थ यह नहीं था कि इन्हीं शीर्षकों के अन्तर्गत यदि विवाद होगा तो उसी का ही निर्णय किया जाएगा तथा दूसरे विवादों को स्वीकार नहीं किया जाएगा। वास्तव में इन विभिन्न भेदों के रूप में अनेक प्रकार के विवादों का उपचार स्मृतियों से प्राप्त होता है। नारद ने इन विभिन्न भेदों की संख्या 108 बताई है। ये सभी इन शीर्षकों के अन्तर्गत किसी किसी प्रकार ही जाते हैं। इस प्रकार समाज में अपराध नियंत्रित रहे एवं लोग अपने-अपने धर्म का परिपालन करते रहें आर्थिक व्यवहारों में विश्वसनीयता समाज में सुव्यवस्था बनी रहे, इस हेतु मनु, याज्ञवलक्य एवं नारद आदि स्मृतियों में न्यायोचित विधानों की व्यवस्था की गई थी