Wednesday, October 6, 2021

कभी मुसलमान, कभी 'दलित', कभी 'किसान' : कौन हैं ये नए नए बहानों से राष्ट्र को अशांत करने वाले

जिहादी, नक्सल और किसानवेशधारी आंदोलनकारियों में क्या समानता है ? तीनों रक्त पिपासू हैं. कट्टरपंथी हैं. व्यवस्था विध्वंसक हैं. लखीमपुर खीरी में जो रक्त-पात हुआ. चाहे किसी का भी हुआ, क्या वो होता, अगर सड़क पर किसानवेशधारी खालिस्तानी, जिहादी और नक्सलियों का गठजोड़ न होता.

जिहादी, नक्सल और किसानवेशधारी आंदोलनकारियों में क्या समानता है ? तीनों रक्त पिपासू हैं. कट्टरपंथी हैं. व्यवस्था विध्वंसक हैं. लखीमपुर खीरी में जो रक्त-पात हुआ. चाहे किसी का भी हुआ, क्या वो होता, अगर सड़क पर किसानवेशधारी खालिस्तानी, जिहादी और नक्सलियों का गठजोड़ न होता. जिहादी, नक्सल और विभिन्न वेश धरने वाले इन आंदोलनजीवियों ने कभी नागरिकता संशोधन कानून के नाम पर आग लगाई, तो कभी एससी—एसटी एक्ट के नाम पर. ये भीमा कोरेगांव में भी होते हैं और हाथरस रेप कांड में भी. अब यह पूछने का समय आ गया है कि आखिर इनका इलाज क्या है. क्या देश का पूरा विपक्ष जिहादी, नक्सल, आंदोलनजीवियों, ईसाई मिशनरी और सबसे अंत में इनके पीछे छिपी पाकिस्तान और चीन जैसी विदेशी ताकतों के हाथ का खिलौना बन गया है.

लखीमपुर खीरी का जो घटनाक्रम सामने आ रहा है, वह एक सुनियोजित साजिश की ओर इशारा कर रहा है. जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश चुनाव की ओर बढ़ रहा है, इस्लामाबाद, बीजिंग ही नहीं, इनके फंड पर जीने वाली देशव्यापी विध्वंसक शक्तियां बेचैन हो उठी हैं. असल में उत्तर प्रदेश पिछले साढ़े चार साल में कायाकल्प से गुजरा है. अब यह निवेश का सबसे पसंदीदा लक्ष्य हो गया है. प्रदेश की अर्थव्यवस्था देश के शीर्ष पर पहुंचने की ओर लपक रही है. एक्सप्रेस वे और हाईवे के जाल ने प्रदेश के सुदूर कोनों में विकास की लौ पहुंचा दी है. माफिया पर या तो पुलिस टूट पड़ी है या फिर बुलडोजर गरज रहा है. कुल मिलाकर साढ़े चार साल का सुशासन योगी आदित्यनाथ को एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की पहली पसंद बना चुका है. देश को सबसे ज्यादा सांसद देने वाला उत्तर प्रदेश अगर इसी रफ्तार से आगे बढ़ा, तो विभाजनकारी ताकतों का अस्तित्व यहां समाप्त हो जाएगा. अंतिम सांसें ले रही कांग्रेस, पार्टी जिंदा रखने के लिए फड़ाफड़ा रही समाजवादी पार्टी, अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ती बहुजन समाज पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश का अमन और विकास जहर का काम कर रहा है. ऐसे में उत्तर प्रदेश में आग लगाने के लिए प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, मायावती, असद्दुदीन औवेसी और इनके पीछे छिपे जिहादी, नक्सली और आंदोलनजीवी पेट्रोल का केन लिए घूम रहे हैं.


पहले जरा लखीमपुर खीरी के घटनाक्रम पर गौर कीजिए. सांसद अजय मिश्र टेनी के पिता की जयंती पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया. यह खेल संबंधित कार्यक्रम था. उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को इस कार्यक्रम में आना था. लेकिन बीच में कुछ तत्व घुस आए. ये कौन हैं. ये किसान हैं. जी नहीं. तराई का ये इलाका पंजाब आतंकवाद के समय भी सुलगा था. इस पूरे इलाके में बड़े जमीदारों के हाथ में सारी फसलें, मंडियां और कृषि उत्पादों के रेट हैं. पंजाब में अगर धुआं उठता है, तो तराई का ये इलाका बेवजह गर्माहट महसूस करने लगता है. नेपाल सीमा से सटे इस इलाके में न तो हथियारों की कमी है और न ही ड्रग्स की. दिल्ली बॉर्डर को जिस समय खालिस्तानियों ने घेरा, उस समय से लखीमपुर खीरी सुलग रहा है. भिंडरावाला के पोस्टर लेकर रैलियां यहां भी निकलीं. जाम यहां भी लगाए गए. लेकिन दिल्ली बार्डर की नौटंकी के चलते न तो इऩ्हें ज्यादा एक्सपोजर मिला और न ही ये लाल किले पर कब्जे जैसी किसी बड़ी हरकत को अंजाम दे पाए. पाकिस्तान, कनाडा में बैठे इस इलाके के कथित किसानों पर पिछले कुछ समय से भारी दबाव था. बस ये मौके की तलाश में थे. मौका इन्हें सांसद के कार्यक्रम के रूप में मिला.

हैलीपेड से कार्यक्रम स्थल का जो रूट था, उस पर मौजूद एक गुरुद्वारे के पास ये कथित किसान और इनकी मदद के लिए नेपाल से लेकर दिल्ली बॉर्डर तक से विध्वंसक तत्व पहुंचे हुए थे. वीडियो साक्ष्य और प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक घटना की शुरुआत उस समय हुई, जब यहां से गुजरती भाजपा कार्यकर्ताओं की एक जीप पर हमला किया गया. प्रदर्शनकारी इस जीप पर जा चढ़े और हमला बोल दिया. घबराहट में जीप बेकाबू हुई और कुछ लोग इसकी चपेट में आए. इसके बाद इन कथित भोले-भाले किसान प्रदर्शनकारियों ने ढूंढकर भाजपा से जुड़े लोगों की लिंचिंग की. लिंचिंग के इतने डरावने वीडियो मौजूद हैं कि तमाम सोशल साइट्स इन्हें बिना चेतावनी के आपको देखने की इजाजत नहीं देंगी. एक ड्राइवर को तो जबरन सांसद के बेटे का नाम लेने के लिए पीटा जा रहा था. जब इसने नाम नहीं लिया, तो इसकी पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. एक पत्रकार चपेट में आया, क्योंकि उसने इस लिंचिंग और घटनाक्रम की शुरुआत के कुछ वीडियो बना लिए थे.

इस रक्तपात में कुल आठ लोगों की मौत हुई है. और मौत विध्वंसक और विभाजनकारियों के लिए उत्सव का अवसर होती है. कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी रात में ही लखीमपुर खीरी जाने के लिए बेताब हो उठीं. अखिलेश यादव को सुबह होने का इंतजार न हो सका. होड़ लग गई. औवेसी निकल पड़े. तेजस्वी यादव को नेपाल सीमा की तराई पर इस इलाके में जाने की न जाने क्या ललक पैदा हुई. इसे भारत की राजनीति का शव पर्यटन कह सकते हैं. ये विभाजक मंडली लाशों के इंतजार में बैठी रहती है. इन रक्त पिपासा सिलेक्टिव (स्वादानुसार) है. भाजपा शासित और इस समय तो उत्तर प्रदेश में ये किसी भी घटना को लपकने के लिए स्लिप (क्रिकेट में विकेटकीपर के बराबर वाली पोजिशन) के फील्डर की तैयार खड़े हैं.

2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आने से इन्हें सदमा लगा. फिर उत्तर प्रदेश में 2017 में प्रचंड बहुमत के साथ योगी आदित्यनाथ के हाथ में कमान आई, तो ये अवाक रह गए. 2019 में जब दोबारा केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार और ज्यादा बहुमत के साथ सत्तासीन हुई, तो ये कोमा में चले गए. इनकी बेचैनी इसलिए ज्यादा है कि उत्तर प्रदेश में फिर योगी आदित्यनाथ सुशासन की नैया पर सवार होकर दूसरी पारी खेलने की तैयारी कर रहे हैं. एनआरसी और सीएए के नाम पर इन्होंने मुसलमानों को भड़काया कि उनकी नागरिकता जाने वाली है. शाहीन बाग और जामिया से शुरू होकर आखिरकार इन्होंने दिल्ली में आग लगा दी. उत्तर प्रदेश तब भी इनकी तमाम कोशिशों के बावजूद योगी की सख्ती के चलते न सुलग सका. अनुसूचित समुदाय को भड़काने की कोशिश की कि एससी—एसटी एक्ट खत्म किया जा रहा है. लेकिन केंद्र सरकार की प्रोएक्टिव पॉलिसी के कारण इसमें भी नाकाम रहे. फिर कृषि सुधारों के लिए बनाए गए तीन कानूनों के नाम पर इन्होंने किसानों को डराने की कोशिश की कि उनकी जमीन छीन ली जाएगी. इस खेल में खालिस्तानी, जिहादी, नक्सली ताकतों ने पूरा जोर लगाया. 26 जनवरी, 2021 को देश ने इन दंगाइयों का असली रूप देखा. दिल्ली को रौंदा, लाल किले की गरिमा को तार-तार किया गया. पंजाब के चंद आढ़तियों और राकेश टिकैत, योगेंद्र यादव जैसे फुंके हुए कारतूसों के अलावा यह आंदोलन कहीं न पहुंच सका.

किसानों के बीच आंदोलन की आंच न पहुंच सकी. वजह मोदी पर भरोसा. किसान कैसे मान लें कि जो प्रधानमंत्री सीधे उनके खाते में सम्मान निधि पहुंचा रहा है, वह उनकी जमीन छीन लेगा. किसानों के नाम पर शोर मचाने वाले इस तथ्य को कैसे झुठला सकते हैं कि किसान सम्मान निधि का सालाना खर्च 75 हजार करोड़ रुपये है. साढ़े 11 करोड़ से ज्यादा किसानों के खाते में सीधे सालाना छह हजार रुपये पहुंचते हैं. दिल्ली बॉर्डर पर धरने के नाम पर मानसिक और भौतिक अय्याशी कर रहे इन कथित किसानों के लिए ये 6000 रुपये एक शाम का खर्च हो सकते हैं, लेकिन लघु और सीमांत किसानों के लिए यह बहुत बड़ी मदद है. फिलहाल उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने लखीमपुर खीरी में मारे जाने वालों को तमाम किस्म की मदद का ऐलान किया है. किसानों और सरकार के बीच समझौता हो गया है. लेकिन आग लगाने वाली ताकतें इस बुझती आग को हवा देने की कोशिश जारी रखेंगी.

किसानों पर मेहरबान मोदी


वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के मुताबिक देश के किसानों के लिए 75,100 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. सरकार ने वित्त वर्ष 2021-22 में कृषि ऋृण लक्ष्य को बढ़ाकर 16.5 लाख करोड़ रुपये करने की भी घोषणा की. गेहूं की खरीद पर 2013-14 में किसानों को 33,874 करोड़ रुपये दिये गये थे, जो बढ़कर 2019-20 में 62,802 करोड़ रुपये पर पहुंच गया.

2020-21 में किसानों को 75 हजार करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया है. जिन किसानों को लाभ हुआ है, उनकी संख्या भी 2019-20 के 35.57 लाख से बढ़कर 2020-21 में 43.36 लाख पर पहुंच गयी.

धान की खरीद पर किसानों को 2013-14 में 63,928 करोड़ रुपये दिये गये थे. यह मोदीराज में बढ़कर 2019-20 में 1,41,930 करोड़ रुपये हो गया.

2020-21 में यह और बेहतर हुआ तथा इसके बढ़कर 1,72,752 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है.

लाभ पाने वाले धान किसानों की संख्या 2019-20 के 1.2 करोड़ से बढ़कर 2020-21 में 1.54 करोड़ पर पहुंच गयी.

दालों के मामले में किसानों को 2013-14 में 236 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था. यह बढ़कर 2019-20 में 8,285 करोड़ रुपये और 2020-21 में 10,530 करोड़ रुपये पर पहुंच गया.

यह 2013-14 की तुलना में 40 गुना से अधिक की वृद्धि है. इसी तरह कपास के किसानों को भुगतान 2013-14 में 90 करोड़ रुपये रहा था, जो 2020-21 में 27 जनवरी तक बढ़कर 25,974 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है।


लखीमपुर में लाठियों से पीट-पीटकर लोगों की निर्मम हत्या करने वाले किसान नहीं हो सकते: भारतीय किसान संघ

 उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में 3 अक्तूबर को हुई घटना पर भारतीय किसान संघ ने प्रतिक्रिया दी है। एक विज्ञप्ति जारी कर किसान संघ की ओर से कहा गया कि जो घटना घटी, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। घटना में लिप्त लोग किसान नहीं थे, विविध राजनैतिक दलों के थे। वामपंथी तरीकों से घटना को अंजाम दिया गया।


लाठियों से पीट-पीटकर लोगों की निर्मम हत्या की गई, जो कम से कम किसान तो नहीं कर सकते। कानून हाथ में लेना, सरेआम हत्याएं कराना, ऐसा लगता है जैसे प्रोफेशनल लोगों ने, जल्लादों ने यह कार्य किया हो।


इस घटना की जितनी निन्दा की जाए, कम है। इस प्रकार के कृत्यों में लिप्त लोगों को कठोरतम दण्ड दिया जाना चाहिए। भारतीय किसान संघ ने मांग की है कि इस जघन्य घटना की निष्पक्ष जांच जल्दी से जल्दी करके मृतकों के परिजनों को न्याय मिलें। भारतीय किसान संघ ने मृतक परिजनों के साथ अपनी संवेदना प्रकट की है

पुरे विश्व को सुख देने वाला धर्म हमारे पास: श्री मोहनराव भागवत

गत दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने जम्मू विश्वविद्यालय के जनरल जोरावर सिंह सभागार में प्रबुद्धजनों की गोष्ठी को संबोधित किया।

समारोह में विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि जीवन को सुख देने वाला धर्म हमारे पास है। हमारा धर्म संपूर्ण विश्व के लिए, आत्मीय दृष्टि रखने और सुख देने वाला है। समाज वास्तव में केवल भीड़ नहीं, समूह नहीं, अपितु वह सब मनुष्य हैं जो सम व अज से तब बनते हैं, जब उनके सामने एक उद्देश्य होता है। उनका अपना जीवन एक उद्देश्य के लिए चलता है.

उन्होंने कहा कि विश्व की नजरें भारत पर लगी हैं. उसकी वजह है कि भारत में विविधता में एकता है. समाजवाद और वामपंथ के बाद कोई तीसरा रास्ता होना चाहिए, ऐसा विचार आज चल रहा है. इंग्लैंड का आधार भाषा है, अतः जब तक अंग्रेजी है यूके है. यूएसए का आधार आर्थिक विषय हैं. अरब जैसे देशों का आधार इस्लाम है. उन्होंने इस संदर्भ में भारत का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में पहले से ही विविधताएं हैं, लेकिन जोड़ने वाले तत्व हमारे पास होने के कारण हम एक हैं.

श्री भागवत ने कहा कि भारत में व्यक्ति समाज के विकास में बाधा नहीं बनते और न ही समाज व्यक्ति के विकास में बाधा बनता है. हमारे पूर्वजों ने हमें यह सिखाया है. यही हमारी संस्कृति है जो सनातन काल से चल रही है. भारत में अनेक राज्य, व्यवस्थाएं और विविधताएं हैं. लेकिन, इससे हमारी एकता नहीं बदलती. इसलिए यह आवश्यक है कि निःस्वार्थ भाव के साथ सभी यह समझें कि देश से बढ़कर कुछ नंहीं है. हमारा देश जब सुरक्षित, प्रतिष्ठित, समर्थ बनेगा तब हम सुरक्षित, प्रतिष्ठित, समर्थ बनेंगे.

उन्होंने कहा कि व्यवस्था बदलती है और इसके अंतर्गत ही अनुच्छेद 370 हटा, मतलब व्यवस्था में परिवर्तन हुआ. मन की आस पूरी हुई. इसके लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी और प्रजा परिषद ने आंदोलन किया था.

इस अवसर पर संघ के अखिल भारतीय सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल, उत्तर क्षेत्र के संघचालक प्रो. सीता राम व्यास और जम्मू—कश्मीर प्रांत के सह संघचालक डॉ. गौतम मैंगी भी उपस्थित रहे।

Monday, August 30, 2021

धर्मरक्षक वासुदेव श्री कृष्ण : ''कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन''

श्रीकृष्ण वादक हैं, नर्त्तक हैं, मुरलीधर हैं, चक्रधारी हैं, गीता के प्रवर्त्तक हैं, धर्म-संस्थापक हैं, मर्यादा-स्थापक हैं, निर्बलों के रक्षक, असुरों एवं अधर्मियों के संहारक हैं, वे देश के स्वाभिमान और शौर्य के प्रतीक भी हैं। कथा-काव्यों से लेकर प्रसंगों-प्रवचनों-आख्यानों में उनके समग्र रूप के दर्शन होते है 













सत्य, अहिंसा, करुणा, प्रेम आदि शाश्वत भाव हैं और किसी भी सभ्य समाज में इन मूल्यों को पालित-पोषित करने की परंपरा और प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं। भारत ने तो इन मूल्यों को सदैव ही सर्वोपरि माना। यहां कथाओं-पुराणों, शास्त्रों-संस्कारों, आदर्शों-अवतारों में इन मूल्यों की विशेष संकल्पना व प्रतिष्ठापना देखने को मिलती रही है।

यहां तक कि हमारे सर्वाधिक प्रचलित और आदर्श महानायक श्रीराम और श्रीकृष्ण के जीवन में भी हमें इन गुणों के दर्शन होते हैं। परंतु ध्यातव्य यह है कि राम और श्रीकृष्ण लोकमानस के सर्वाधिक स्वीकार्य ईष्ट-आदर्श इसलिए रहे हैं कि उन्होंने अधर्म पर धर्म की, अन्याय पर न्याय की स्थापना के लिए अंतिम सांस तक प्राणार्पण से प्रयास और संघर्ष किया। उन्होंने सज्जन शक्तियों को संगठित कर दुर्जन शक्तियों को परास्त किया। उनका संपूर्ण जीवन ''परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्'' का पर्याय रहा। वे बल-पौरुष-साहस के अधिष्ठाता रहे। उन्होंने केवल शब्दों से ही नहीं, अपितु अपने चरित्र और आचरण से क्लीवता एवं कायरता के स्थान पर पौरुष और पराक्रम का संदेश दिया। युद्ध से पलायन को उद्धत-अभिमुख अर्जुन को श्रीकृष्ण के संदेशों से ही 'धर्म संस्थापनाय' लड़ने की प्रेरणा मिली।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर यह विचार-विश्लेषण समीचीन एवं उपयुक्त ही होगा कि महापराक्रमी-तेजस्वी-नीतिज्ञ-चतुर श्रीकृष्ण का यशोगायन करने के बजाय क्यों अधिकांश कथित साहित्यकारों-कवियों-चिंतकों-कथाकारों ने उनके कोमल एवं रसिक स्वरूप का ही अधिकाधिक चित्रण किया ? क्या श्रीकृष्ण ने केवल कोमल और प्रेमिल भावों को ही जिया ? क्या उनके जीवन एवं व्यक्तित्व को केवल रासलीलाओं की परिधि में आबद्ध कर कथा-कहानियों, काव्यों-साहित्यों, प्रवचनों-आख्यानों में प्रस्तुत करना उनके विराट, बृहत्तर, कर्मयोगी व्यक्तित्व के साथ अन्याय नहीं है ? वीरता के स्थान पर भीरुता और पलायन-वृत्ति के अनुसरण की सामाजिक प्रवृत्ति के पीछे क्या कवियों-चिंतकों-प्रवचनकारों की ये प्रवृत्तियां जिम्मेदार नहीं हैं? क्या इन प्रवृत्तियों ने हमारे समाज एवं युवाओं को वीरता के स्थान पर भीरूता का पाठ नहीं पढ़ाया है ?

अनायास ही यह प्रश्न भी मन को उद्वेलित-व्यथित करता है कि सन 1192 में मोहम्मद गोरी के हाथों निर्णायक एवं अपमानजनक पराजय के पश्चात अपना यह प्राणप्रिय भारतवर्ष लगातार विदेशी आक्रांताओं के पदों के नीचे कुचला जाता रहा और सन 1857 आते-आते तो वह विदेशी साम्रज्यवाद के पूर्णतया अधीन हो गया। परंतु घोर आश्चर्य यह है कि अपमान, प्रताड़ना और गुलामी की उन सदियों में भी तुलसीदास जी जैसे अपवादों को छोड़ दें तो हमारा संपूर्ण भक्ति एवं रीति कालीन साहित्य और चिंतन धनुर्धारी राम के बजाय बांकेबिहारी, रासबिहारी, कुंजबिहारी श्रीकृष्ण के आस-पास ही घूमता-मंडराता रहा। जबकि गुलामी की उन सदियों में वीरता, स्वतंत्रता एवं सुसुप्त राष्ट्रीय व सांस्कृतिक चेतना जागृत करने वाले प्रसंगों को अधिक प्रमुखता से उभारा जाना चाहिए था। तब और कमोवेश आज के विषम, प्रतिकूल एवं अंतर्बाह्य चुनौतियों से घिरे कालखंड में हमें योगेश्वर के रूप में उस महाबली योद्धा श्रीकृष्ण की अधिक आवश्यकता है, जो शिशुपाल-जरासंध जैसे आतताइयों का नाश करता है, अबला एवं दुर्बलों की रक्षा करता है, चाणूर-मुष्टिक और कंस जैसे महाबलियों एवं महा आतताइयों का संहार करता है, और महाभारत के युद्ध में 'शठे शाठ्यम समाचरेत' की नीति का अनुसरण करते हुए धर्म की जीत और अधर्म की हार सुनिश्चित करता है।

मध्यकालीन कवियों-चिंतकों को केवल माखन चुराने वाले, मटकी फोड़नेवाले, वंशी बजाने वाले, श्रीकृष्ण ही याद रहते हैं, पर उन्हें उसी आयु, बल्कि उससे भी छोटी आयु में प्रलंब, धेनुक, कालिया और बक जैसे न जाने कितने असुरों की नकेल कसने वाले श्रीकृष्ण; 'महाभारत' और 'भगवद्गीता' के महानायक और उद्घोषक श्रीकृष्ण-लगभग नहीं के बराबर याद आते! कविता-कहानियों का जनमानस पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है। साहित्य यदि समाज का दर्पण है तो समाज भी साहित्य से ही प्रेरणा-संदेश ग्रहण करता है। साहित्य ही उसे आदर्श और जीवन-मूल्य प्रदान करता है। आज समय आ गया है कि जो भूल मध्यकालीन कवियों-साहित्यकारों-चिंतकों से हुई, वर्तमान में उसका परिशोधन-परिमार्जन हो! माना कि लोकमानस कोमल-मधुर-भावपूर्ण प्रसंगों में अधिक रुचि लेता है, पर साहित्य एवं साहित्यकारों का उद्देश्य केवल लोक का रंजन नहीं, चरित्र का गठन और परिमार्जन भी होना चाहिए। और यह तभी संभव होगा, जब वह अपने लोकनायकों का युगीन एवं आदर्श चित्र व चरित्र प्रस्तुत करे।

आज भी वंशी बजैया, रास रचैया, गाय चरैया, लोक लुभैया, माखन चुराने वाले, मटकी फोड़ने वाले कृष्ण-रूप का ही सर्वत्र बोलबाला है। श्रीकृष्ण वादक हैं, नर्त्तक हैं, मुरलीधर हैं, चक्रधारी हैं, गीता के प्रवर्त्तक हैं, धर्म-संस्थापक हैं, मर्यादा-स्थापक हैं, निर्बलों के रक्षक, असुरों एवं अधर्मियों के संहारक हैं, वे देश के स्वाभिमान और शौर्य के प्रतीक भी हैं। कथा-काव्यों से लेकर प्रसंगों-प्रवचनों-आख्यानों में उनके समग्र रूप के दर्शन होने चाहिए

कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी एवं उसके दुष्प्रभावों के इस कठिन कालखंड में उनके ''कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'' संदेश की महत्ता एवं प्रासंगिकता और बढ़ गई है। एक ऐसे दौर में जबकि हमारा देश विस्तारवाद, साम्राज्यवाद, अलगाववाद, आतंकवाद जैसी बड़ी चिंताओं और समस्याओं की चपेट में है। हमें श्रीकृष्ण के पराक्रमी-तेजस्वी-कर्मयोगी-चक्रधारी रूप की महती आवश्यकता है। हमें उनके जैसा ही दूरदर्शी एवं रणनीतिक नेतृत्व भी चाहिए, जो दुष्टों के लिए मारक-संहारक, चतुरों के लिए चतुर तो सज्जनों के लिए कुशल संगठक एवं जीवनदायी उत्प्रेरक और उद्धारक हो

मेजर ध्यानचंद

 जब इस जादूगर की हॉकी स्टिक तोड़ कर जांची गई थी, कि इसमें चुंबक तो नहीं है :










हॉकी के जादूगर पद्मभूषण ‘दद्दा’ मेजर ध्यानचंद खिलाड़ियों के लिए भगवान की तरह हैं। इसीलिए केंद्र सरकार ने खेल के सबसे बड़े पुरस्कार का नाम मेजर ध्यानचंद के नाम पर रखने का निर्णय किया। कुश्ती के शौकीन ध्यानचंद को सेना में सूबेदार मेजर बाले तिवारी ने हॉकी खेलने के लिए प्रेरित किया। फिर तो ध्यानचंद हॉकी में ऐसे रमे कि दुनियाभर में उनकी कलाई का चमत्कार देखने लोग उमड़ पड़ते थे

हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद अपने खेल से न सिर्फ पूरी दुनिया में चर्चित हैं, वरन वह खिलाड़ियों के लिए भगवान की तरह हैं। ध्यानचंद की महानता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह सबके लिए आश्चर्य का विषय रहता था कि वे दूसरे खिलाड़ियों की अपेक्षा इतने अधिक गोल कैसे कर लेते थे। इसके लिए उनकी हॉकी स्टिक को ही तोड़ कर जांचा भी गया। नीदरलैंड्स में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक तोड़कर यह चेक किया गया था कि कहीं इसमें चुंबक तो नहीं लगा।

भारत के इस महान सपूत को शासन ने 1956 में ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया। उनका जन्मदिवस 29 अगस्त भारत में ‘खेल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।मेजर ध्यानचंद ने 1928, 1932 और 1936 ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। तीनों ही बार भारत ने ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता।

हॉकी के जादूगर

1928 में एम्सटर्डम में हुए ओलंपिक खेलों में वह भारत की ओर से सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी रहे। उस टूर्नामेंट में ध्यानचंद ने 14 गोल किए थे। एम्सटर्डम के एक स्थानीय समाचार पत्र में लिखा था, ‘यह हॉकी नहीं बल्कि जादू था, और ध्यानचंद हॉकी के जादूगर हैं।’

इसके बाद 1932 में लॉस एंजेल्स में खेले गए ओलंपिक में भी भारतीय टीम ने शानदार प्रदर्शन किया। प्रतियोगिता के फाइनल में भारत ने अमेरिका को 24-1 से हराया था। इसमें 10 गोल अकेले मेजर ध्यानचंद ने ही दागे थे। इसके बाद 1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम की कमान मेजर ध्यानचंद के हाथ में ही थी। फाइनल मैच में भारत ने उस दौर की दुनिया की सबसे सशक्त टीम जर्मनी को 8-1 से हराकर विश्व पटल पर भारत का परचम फहराया था।

सेना में हुए हॉकी के लिए प्रेरित

मेजर ध्यानचन्द का जन्म प्रयाग, उत्तर प्रदेश में 29 अगस्त, 1905 को हुआ था। उनके पिता सेना में सूबेदार थे। उन्होंने 16 साल की अवस्था में ध्यानचन्द को भी सेना में भर्ती करा दिया। वहाँ वे कुश्ती में बहुत रुचि लेते थे परन्तु सूबेदार मेजर बाले तिवारी ने उन्हें हॉकी के लिए प्रेरित किया। इसके बाद तो वे और हॉकी एक दूसरे के पर्याय बन गये।

वे कुछ दिन बाद ही अपनी रेजिमेंट की टीम में चुन लिये गये। उनका मूल नाम ध्यानसिंह था। वे प्रायः चाँदनी रात में अकेले घण्टों तक हॉकी का अभ्यास करते रहते थे। इससे उनके साथी तथा सेना के अधिकारी उन्हें ‘चाँद’ कहने लगे। फिर तो यह उनके नाम के साथ ऐसा जुड़ा कि वे ध्यानसिंह से ध्यानचन्द हो गये। आगे चलकर वे ‘दद्दा’ ध्यानचन्द कहलाने लगे।

कई बार बदली गई स्टिक

चार साल तक ध्यानचन्द अपनी रेजिमेण्ट की टीम में रहे। 1926 में वे सेना एकादश और फिर राष्ट्रीय टीम में चुन लिये गये। इसी साल भारतीय टीम ने न्यूजीलैण्ड का दौरा किया। इस दौरे में पूरे विश्व ने उनकी अद्भुत प्रतिभा को देखा। गेंद उनके पास आने के बाद फिर किसी अन्य खिलाड़ी तक नहीं जा पाती थी। कई बार उनकी हॉकी की जाँच की गयी कि उसमें गोंद तो नहीं लगी है। अनेक बार खेल के बीच में उनकी हॉकी बदली गयी पर वे तो अभ्यास के धनी थे। वे उल्टी हॉकी से भी उसी कुशलता से खेल लेते थे। इसीलिए उन्हें लोग हॉकी का ‘जादूगर’ कहते थे।

1926 से 1948 तक ध्यानचन्द दुनिया में जहाँ भी हॉकी खेलने गये, वहां दर्शक उनकी कलाइयों का चमत्कार देखने के लिए उमड़ आते थे। ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना के एक स्टेडियम में उनकी प्रतिमा ही स्थापित कर दी गयी। 42 वर्ष की अवस्था में उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास ले लिया। कुछ समय वे राष्ट्रीय खेल संस्थान में हॉकी के प्रशिक्षक भी रहे, 3 दिसम्बर, 1979 को उनका देहान्त हुआ