Sunday, August 23, 2020

सांस्कृतिक जागरण की बेला

 सांस्कृतिक जागरण की बेला : 

1947 में देश को राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिली, पर सांस्कृतिक स्वतंत्रता नहीं मिली। लोगों में इस स्वतंत्रता की चेतना न जग पाए, इसके लिए जाति, मजहब, भाषा, प्रांत की दीवारें खड़ी की जाती रहीं। इसके बावजूद कुछ लोग और संगठन इस कार्य में लगे रहे। अब उनकी मेहनत के सुफल का स्वाद लोगों को मिल रहा है और वे सांस्कृतिक रूप से जागरूक हो रहे हैं

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       अंदमान निकोबार द्वीप समूह में जनजाति महिलाओं द्वारा निकाली गई कलशयात्रा। ये महिलाएं वनवासी 
        कल्याण आश्रम से जुड़ी हैं और उनमें अपनी संस्कृति के प्रति जबर्दस्त जागरूकता बढ़ी है। (फाइल चित्र)

स्वाधीनता प्राप्ति की घड़ी में भारत माता की आंखें छलक पड़ी थीं। इस सच की अनुभूति उस समय सभी ने की थी, परंतु इस तथ्य को कम ही लोग अनुभव कर पाए थे कि भारत मां की एक आंख में खुशी के आंसू छलक रहे थे, जबकि दूसरी आंख दु:ख के आंसुओं से डबडबाई हुई थी। खुशी स्वाधीनता-स्वतंत्रता की थी और दु:ख राजनीतिक-सांस्कृतिक विभाजन का था। अपनी ही संतानों ने माता के अस्तित्व एवं अस्मिता के हिस्से को काटकर अलग कर दिया था। जबकि भौगोलिक दृष्टि से उनकी संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन में समानताएं थीं। विभाजन की यह पीड़ा बड़ी दारुण थी और यातना बड़ी असहनीय। फिर भी उम्मीद थी कि स्वाधीन देशवासी संभवत: समझदार हो जाएंगे और अपनी मां को अब यह पीड़ा नहीं देंगे।

परंतु दुर्देव और दुर्भाग्य। स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् भी  विभाजन के नए-नए रूप सामने आते गए। भूमि तो नहीं बंटी, पर भावनाएं बंटती गर्इं। संस्कृति बंटती गई। भूगोल तो वही रहा, परंतु उसमें खिंची संवेदनाओं की लकीर मिटती गई। संवेदनाओं की सरिता को सोखने वाले, इसे दूषित-कलुषित करने वाले विभाजनकारियों के कितने ही रूप सामने आते गए। विभाजन मजहब के नाम पर, विभाजन जाति के नाम पर, विभाजन भाषा के नाम पर, विभाजन सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयता के नाम पर, विभाजन संस्कृति के नाम पर। स्वाधीनता की हर वर्षगांठ पर भारत माता की आंखें छलकती तो जरूर हैं, परंतु यह अनुभूति गिने-चुने लोग ही कर पाते हैं कि अब उसकी दोनों आंखों में खुशी  के आंसू  नहीं, दु:ख  के आंसू डबडबा रहे हैं। लेकिन ये आंसू खून के आंसू हैं। इनमें जातीयता के संघर्ष का खून है।  पता नहीं उसकी अपनी संतानों में से कौन और कितने मां की इस पीड़ा की अनुभूति कर पाएंगे, क्योंकि यह अनुभूति तो राष्टÑीयता की अनुभूति से जुड़ी है, सांस्कृतिक स्वतंत्रता से जुड़ी है। सांस्कृतिक स्वतंत्रता की अनुभूति प्रत्येक भारतवासी का राष्ट्रीय कर्तव्य है।

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हमारा लक्ष्य जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण है। राष्ट्र की सांस्कृतिक आजादी है। नैतिक-चारित्रिक उत्थान है। शिक्षा एवं विद्या का समन्वय कर शिक्षण तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन है। आत्मबल संवर्द्धन कर राष्ट्र को समर्थ सशक्त नागरिक देना है।— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, संस्थापक, अखिल विश्व गायत्री परिवार


1947 में विश्व का यह सबसे बड़ा लोकतंत्र अंग्रेजों के हाथ से स्वतंत्र हुआ था। ढेरों ने अपनी कुर्बानियां दी थीं। अगणित अज्ञात स्थिति में ही शहीद हो गए। न कहीं किसी का नाम आया, न प्रशस्तिपत्र ही मिला, पर उन्होंने इसकी चिंता नहीं की। दक्षिणेश्वर की माटी हाथ में लिए, जेब में गीता की छोटी-सी पुस्तिका रखे न जाने कितने फांसी पर चढ़ गए, न जाने कितनों ने सारा जीवन  अविज्ञात स्थिति बिताकर देश की आजादी के लिए स्वयं व परिवार को भूखा, नगण्य से साधनों में जिए एवं गुमनामी के परदे के पीछे चले गए। ढेरों साहित्यकार, स्वयंसेवक स्तर के कार्यकर्ता, आजादी के आंदोलन के सिपाही, सत्याग्रही, सविनय अवज्ञा आंदोलन का पालन करने वाले गांधी के अनुचर, खादी को जीवनव्रत बना लेने वाले व्यक्ति एक उज्जवल भविष्य वाले भारतवर्ष की उम्मीद में जीवन जीते रहे, पर नाउम्मीद होकर इस धरती से चले गए।

भारत में ‘राष्ट्र’ सदैव एक सांस्कृतिक शब्द रहा है, राजनीतिक नहीं। राष्ट्र उपास्य है, ईष्ट है। विविधताओं के बावजूद भारत एक राष्ट्र रहा है। हमारे ऋषियों ने संसार की प्रकृति-प्रदत्त विविधताओं को बहुत सहज भाव से स्वीकार किया। किन्तु मनुष्य के अन्त:करण में स्थित परिष्कृत चेतना को लक्ष्य करके सांस्कृतिक एकता के भाव भरे सूत्रों को विकसित एवं प्रतिष्ठित करने में सफलता पाई। हमारे मनीषियों ने सांस्कृतिक आधारों को ही प्राथमिकता दी। सांस्कृतिक सूत्रों को उन्होंने जन-जन के भावनात्मक स्तर तक गहराई से बिठाने में सफलता पाई। यही कारण है कि हम गर्व से कह पाते हैं, ‘‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।’’ भले ही सदियों तक ‘दौरे जमां’(सांसारिक राजनीतिक चक्र) हमारा दुश्मन रहा है।

सांस्कृतिक अवधारणा हर भारतीय की रगों में रक्त की तरह सतत प्रवाहित है। अयोध्या में जन्मे राम कन्याकुमारी में रामेश्वरम्  की स्थापना करते हैं। बृज के श्रीकृष्ण द्वारिका में अपना आवास बनाते हैं। बंगाल के चैतन्य बृज में आकर अपने इष्ट के लीला क्षेत्र को खोजते हैं। केरल में जन्मे शंकराचार्य चारों दिशाओं में चारधामों की स्थापना करके काश्मीर के सरस्वती मन्दिर के पट खोले बिना अपनी यात्रा पूर्ण नहीं मानते। वे अपना शरीर दक्षिण में नहीं, उत्तराखण्ड में छोड़ना पसंद करते हैं। गंगोत्री का जल पिये बिना रामेश्वरम् की प्यास नहीं बुझती। उत्तराखण्ड के देवालयों के देवता दक्षिण के पुजारी मांगते हैं। भक्त को रामेश्वरम्, केदारनाथ, सोमनाथ, विश्वनाथ, पशुपतिनाथ, महाकालेश्वर, अमरनाथ आदि सभी जगह एक ही इष्ट के दर्शन होते हैं। वैष्णव देवी से कन्याकुमारी तथा अम्बाजी (गुजरात) से कामाख्या (असम) तक एक ही मातृसत्ता को नमन किया जाता है। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी भी इसी सांस्कृतिक अवधारणा का समर्थन करते हैं।

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                  अपनी संस्कृति, अपनी पहचान

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी सांस्कृतिक नवोन्मेष को जाग्रत करते हुए भारत के पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण को सांस्कृतिक दृष्टि से जोड़ने वाले सूत्रों को अपने उद्बोधनों मे रखते हैं। भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण, भगवान शिव के साम्राज्य को वे राजनीतिक सीमा में न बांधकर सांस्कृतिक दृष्टि से नेपाल, भूटान, बाली, सुमात्रा, इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका, मॉरीशस, सूरीनाम, फीजी, अमेरिका, जापान, चीन, त्रिनिदाद,  टोबेगो ब्राजील जैसे देशों से जोड़ते हैं। यह भाव भरी सांस्कृतिक चेतना ही उस कालजयी राष्ट्र को बनाती है, जो ‘भारत’ कहलाता है।

श्री मोदी सांस्कृतिक नवोन्मेष को जाग्रत करते हुए भारत के पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण को सांस्कृतिक दृष्टि से जोड़ने वाले सूत्रों को अपने उद्बोधनों मे रखते हैं। भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण, भगवान शिव के साम्राज्य को वे राजनीतिक सीमा में न बांधकर सांस्कृतिक दृष्टि से नेपाल, भूटान, बाली, सुमात्रा, इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका, मॉरीशस, सूरीनाम, फीजी, अमेरिका, जापान, चीन, त्रिनिदाद,  टोबेगो ब्राजील जैसे देशों से जोड़ते हैं। यह भाव भरी सांस्कृतिक चेतना ही उस कालजयी राष्ट्र को बनाती है, जो ‘भारत’ कहलाता है। इस राष्ट्र का संगठन राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से न कभी किया जा सका है और न कभी किया जा सकेगा। किन्तु सांस्कृतिक सूत्रों में बंधकर यह राष्ट्र सदैव विश्व मुकुट बना है और पुन: बनकर रहेगा। आज की परिस्थितियों में मनुष्य मात्र को उन सांस्कृतिक सूत्रों की खोज है जिनके आधार पर असमानता मिटें और स्वर्गिक परिस्थितियों का निर्माण किया जा सके। मनुष्यों में देवत्व का उदय हो एवं धरती पर स्वर्ग की परिस्थिति उत्पन्न हो सके। ऋषियों की धरोहर-देव संस्कृति और समय के अनुकूल व्यावहारिक सूत्रों को जन-जन तक पहुंचाना आज की अनिवार्यता है। उसी आधार पर व्यक्तियों में देवत्व का विकास एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव होगा।

अखिल विश्व गायत्री परिवार ने सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए जमीनी स्तर से प्रयास किया है। भारतीय संस्कार पद्धति के अन्तर्गत धर्म-सम्प्रदाय से हटकर ऊंच-नीच, जाति-पाति मिटाने  के लिए गायत्री परिवार ने बढ़-चढ़ कर प्रयास किया है।  वनवासी, जनजाति एवं अन्त्योदय बहुल क्षेत्रों (झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, असम, पश्चिम बंगाल, महाराष्टÑ के पिछड़े इलाके) में समानता का संदेश देने, उन्हें यज्ञोपवीत धारण करवा कर पौरोहित्य का प्रशिक्षण देने का कार्य किया है। उन्हें स्वावलम्बी बनाया है। युग तीर्थ शान्तिकुंज उसका जीता-जागता उदाहरण है। इन क्षेत्रों में लाखों की संख्या में संस्कारों का क्रम सम्पन्न हुआ। संस्कारों के क्रम में नामकरण, अन्नप्राशन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत, विवाह संस्कार प्रमुख हैं।

क्या यही स्वतंत्रता है?
हमें राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिल गई, किन्तु सांस्कृतिक स्वतंत्रता चाहिए और यह तब तक नहीं मिलेगी, जब तक जातिवाद का विष वृक्ष फलता-फूलता रहेगा। सारी राजनीति इसी से संचालित है। जाति, संप्रदाय और मजहब के नाम पर भाई को भाई से, पड़ोसी को पड़ोसी से और देशवासी को देशवासी से दूर करने का प्रयास हो रहा है। यह प्रयास देश की सांस्कृतिक चेतना को भी नष्ट कर रहा है। वहीं दूसरी ओर धनी और धनी बनते जा रहे हैं एवं गरीब और निर्धन। गांव उजड़ रहे हैं, शहरों के पेट में समा रहे हैं। अब कोई गांव में रहना नहीं चाहता। अपसंस्कृति और अपराधों ने वहां भी पैठ बना ली है। सरपंचों की भ्रष्ट राजनीति ने गांवों की एकता नष्ट कर, उन्हें भी बांट दिया है एवं लगता है कि सब कुछ दांव पर लग गया है। क्या यही स्वतंत्रता है, क्या यही लोकतंत्र है, जिसमें एक वैज्ञानिक-मनीषी-ऋषि स्तर का व्यक्ति पुन: राष्ट्रपति नहीं बन सकता, क्योंकि दलीय राजनीति का समीकरण उसके पक्ष में नहीं है?
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सांस्कृतिक समरसता उत्पन्न करने, विभिन्न जातियों के बीच भावनात्मक ऐक्य स्थापित करने का एक ही सूत्र है-सांस्कृतिक क्रांति। ऐसी सांस्कृतिक क्रांति, जो आध्यात्मिक भावापन्न हो।
— डॉ. हेडगेवार, आद्य सरसंघचालक

अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक, संरक्षक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने गायत्री परिवार का लक्ष्य सुनिश्चित करते हुए लिखा है, ‘‘हमारा लक्ष्य जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण है। राष्ट्र की सांस्कृतिक आजादी है। नैतिक-चारित्रिक उत्थान है। शिक्षा एवं विद्या का समन्वय कर शिक्षण तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन है। आत्मबल संवर्द्धन कर राष्ट्र को समर्थ सशक्त नागरिक देना है।’’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं प्रकाण्ड क्रांतिकारी डॉ. बलिराम हेडगेवार जी भी सांस्कृतिक स्वतंत्रता के पुरोधा थे। उनके एवं अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचारों में काफी समानताएं हैं। वनवासी बहुल क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषांगिक संगठनों के लाखों कार्यकर्ता सांस्कृतिक नवोन्मेष के लिए दिन-रात जुटे रहते हैं। डॉ. हेडगेवार ने सांस्कृतिक समरसता की नई परिभाषा लिखी है। उन्होंने लिखा है, ‘‘सांस्कृतिक समरसता उत्पन्न करने, विभिन्न जातियों के बीच भावनात्मक ऐक्य स्थापित करने का एक ही सूत्र है-सांस्कृतिक क्रांति। ऐसी सांस्कृतिक क्रांति, जो आध्यात्मिक भावापन्न हो।’’ नवजागरण काल में राजाराम मोहन राय, केशवचन्द्र सेन आदि ने यही सूत्र खोजने शुरू किए थे। उनके इन प्रयासों से भारतीयता अंगड़ाई लेने लगी थी। भारतीय राजनीति में एक प्रयोग हो चुका है। उसे गांधी जी ने अपने समय में सफलतापूर्वक लागू किया था। इसके द्वारा उन्होंने एक बड़े पैमाने पर आम भारतीय का राजनीतिकरण किया था, उन्हें अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन से जोड़ा था एवं आजादी के लक्ष्य को नजदीक ला दिया था। गांधी जी की खादी, विदेशी कपड़ों की होली और स्वदेशी आंदोलन ने एक नया जीवन-दर्शन दिया था। आज भी देश को हजारों-लाखों-करोड़ों कार्यकर्ता चाहिए, जो संघबद्ध हो गांव-मुहल्ले-प्रखंड स्तर पर अन्याय और शोषण के खिलाफ लड़ सकें। भ्रष्ट प्रशासनिक मशीनरी को ठीक करने का प्रयास करें। कहीं रिश्वतखोरी हो तो उससे भी जूझ सकें।

भारत को सांस्कृतिक दासता से मुक्ति दिलाने के लिए वीरभद्रों की जरूरत पड़ेगी। आने वाले दिनों में ऐसे गांडीवधारियों की आवश्यकता पड़ेगी, जो अर्जुन की तरह कौरवों की अक्षौहिणी सेनाओं को धराशायी कर दे। ऐसे हनुमानों की जरूरत होगी, जो ‘एक लाख पूत-सवा लाख नाती’ वाली लंका को पूंछ से जलाकर खाक कर दे। ऐसे कलाकारों की आवश्यकता है, जो चैतन्य महाप्रभु, मीरा, सूर, कबीर की भावनाओं को इस प्रकार लहरा सकें, जैसे सपेरा सांप को लहराता है। ऐसे धनवानों की जरूरत है, जो अपने पैसे को विलास में खर्च करने की अपेक्षा सम्राट अशोक की तरह अपना सर्वस्व समय की आवश्यकता पूरी करने के लिए लुटा सकें। तभी सच्चे अर्थों में सांस्कृतिक आजादी मिलेगी।
(लेखक देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलाधिपति हैं)

मंगलमूर्ति भगवान श्री गणेश

 मंगलमूर्ति भगवान श्री गणेश की महिमा अपरंपार : 

विभिन्न देशों में गणपति अलग-अलग नामों से प्रख्यात हैं। जापान में गणेश जी को ‘शोटन’ के नाम से जाना जाता है जबकि तांत्रिक बौद्ध गणपति को ‘महा-रक्त’ के नाम से पूजा करते है। गणेश जी तिब्बत में ‘महाकाल’, चीन में ‘हो टेई’, थायलैंड में ‘फ्रा फिकनेत’ या ‘फ्रा फिकानेसुअन’ और मेक्सिको में ‘वीरकोष’ के नाम से जाना जाता है

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                          इस्लामिक देश इंडोनेशिया में भगवान श्री गणेश के बारे में जानकारी लेते मुस्लिम छात्र।

रिद्धि सिद्धि के दाता गणेश जी सार्वभौमिक हैं। उनकी महिमा अपर अपरंपार है जो काल, परिस्थिति एवं देश की सीमाओं के बंधन से परे है। समय समय पर अनेक ज्ञानी-ध्यानी, इतिहास-वेत्ता, पुरातत्वविद एवं वैज्ञानिक अपने अपने विवेक से गणेश जी का तार्किक विश्लेषण करने का मिथ्या प्रयास करते हैं। विघ्न-विध्वंसक गणपति तो मानव-मात्र की तार्किक क्षमता और बुद्धि से परे ‘यो बुद्धे परतस्तु सः’ हैं। चर-अचर एवं जड़-चेतन जगत में सर्वव्याप्त गणेश जी की अनुकम्पा के बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता।

तथाकथित वैज्ञानिक विचारधारा वाले प्रबुद्ध-जन हमारे विचारों को “अज्ञानता” सिद्ध करने में ‘गर्व’ का अनुभव करने से बाज़ नहीं आएंगे। दरअसल तथाकथित वैज्ञानिक-प्रणाली एवं सोच, आँकड़ों का एक सोचा समझा मकड़जाल बनकर रह गयी है और सृजनात्मकता से शनैः-शनैः दूर जा रहीं है। भगवत-गीता के अठारहवें अध्याय के चौदहवे श्लोक में स्पष्ट लिखा है,‘देवं चैवात्र पञ्चमं’ अर्थार्थ किसी भी कार्य की अंतिम सफलता तभी होती है, जब‘ईश्वर’ चाहते हैं।

कला एवं अंतरराष्ट्रीय व्यापार के शोध-कार्य में संलग्न होने के कारण हमें देश-विदेश में अक्सर भ्रमण करना पड़ता है जहां सर्वशक्तिमान विध्न-विध्वंसक गणेश जी का प्रभाव दुनिया भर में परिलक्षित होता है। मंगलमूर्ति गणेश जी को अनादिकाल से ही विध्न-विध्वंसक, “निर्विघ्नम कुरु में देव, सर्व कार्येषु सर्वदा” सर्वप्रथम पूज्य देव के रूप में न केवल भारत-वर्ष, अपितु अनेक देशों में पूजा जाता है। विभिन्न देशों में गणपति अलग-अलग नामों से प्रख्यात हैं। जापान में गणेश जी को ‘शोटन’ के नाम से जाना जाता है जबकि तांत्रिक बौद्ध गणपति को ‘महा-रक्त’ के नाम से पूजा करते है। गणेश जी तिब्बत में ‘महाकाल’, चीन में ‘हो टेई’, थायलैंड में ‘फ्रा फिकनेत’ या ‘फ्रा फिकानेसुअन’ एवं मक्सिको में ‘वीरकोष’ के नाम से जाना जाता है। जापानी चित्रशैली में गणेश की तीस से भी अधिक विधाएं प्रचलित हैं जिनमें आलिंगित ‘कांगी’ शैली अत्यधिक लोक प्रिय है।

आधुनिक अर्थविद 1991 से ही भारत के ग्लोबलाईज़ेशन तक ही अपनी सोच एवं शोध दोनों ही सीमीत रखते हैं, जबकि भारतीय देवी देवता तो अनादिकाल से ही विश्व व्याप्त एवं सीमाओं से परे हैं। रोमन देवता ‘जेनस’ को भी अनेक इतिहासकारों नें गणेश जी का रूप बताया है। दक्षिण एवं मध्य अमेरिकी देशों, जैसे माक्सिको, पेरू, ग्वाटेमाला, बोलीविया एवं होंडरस की ‘इंका’ एवं ‘एज़टेक’ सभ्यताओं में भी हिन्दू देवी-देवता, मंदिर एवं संग्रहालय देखने को मिलते हैं। माक्सिको के डिअगे दिवेरिआ के मंदिर में गणेश-प्रतिमा, एवं ग्वाटेमाला के वेरा-क्रूज एवं क्वीरागाओं के गणपति प्राचीन अमेरिका में गणपति की व्याप्तता को प्रमाणित करते हैं। जापान में ‘शोटन’ (गणेश) बुद्धि, शक्ति एवं उत्साह के प्रतीक हैं। उम्रदराज लोग व्यावसायिक सफलता एवं धन-सम्पदा प्राप्त करने के लिए जबकि युवक-युवतियां प्यार में सफलता के लिए गणेश जी की पूजा करते हैं।

धर्मनिरपेक्ष भारत के सरकारी भवनों एवं सार्वजनिक स्थानों पर गणेश या अन्य किसी हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाए शायद ही कहीं दृष्टिगोचर हों किन्तु बौद्ध देश थायलैंड की राजधानी बैंकॉक के स्वर्णभूमि एयरपोर्ट की तो रक्षा का सारा जिम्मा एवं श्रेय गणेश जी सहित अनेक हिन्दू देवी-देवताओं सहित यक्ष समूह को जाता है। बैंकॉक एयरपोर्ट पर ये विशाल प्रतिमाएं सहज ही पौराणिक युग में प्रवेश का अहसास करती हैं। इतना ही नहीं, दुनिया के सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या वाले देश इन्डोनेशिया के कोने कोने में न केवल गणेश-मंदिर हैं, अपितु उनकी मुद्रा पर भी गणेश जी के चित्र को वहां के राष्ट्रपति के फोटो के साथ दर्शाया गया है।

अनेक एशियाई देशों के सरकारी संस्थानों, यहां तक कि सैन्य उपक्रमों एवं सार्वजनिक जगहों पर विघ्नहरण मंगलमूर्ति गणेश जी कि प्रतिमा को प्रमुखता से स्थापित किया गया है। बैंकॉक के सेंट्रल वर्ड (वर्ड ट्रेड सेंटर) में गणेश जी कि एक भव्य प्रतिमा, ऊंचे सिंहासन पर, व्यवसाय एवं कूटनीति के देवता के रूप में स्थापित की गई है, जहां उन्हें फूल, अगरबत्ती एवं अन्य वस्तुएं बड़ी श्रद्धापूर्वक अर्पित की जाती है।

विश्वव्यापी सर्वव्याप्त, “समस्त विघनौघविनाश दक्ष‘, समस्त विघ्न एवं पापों के विनाश में दक्ष, गणपती की आलौकिक शक्ति’ का अहसास यदि भारत में भी ‘सरकारी आईने’ से हो जाए, तो शायद देश की दशा सुधर जाए एवं भारत में ‘अच्छे दिन’ आ जाए।

Saturday, August 15, 2020

नेपाल का भविष्य के तिब्बत बनने की और बढ़ते कदम

 नेपाल नहीं समझ पा रहा कि वह भविष्य का तिब्बत बन सकता है:

नेपाल में कम्युनिस्ट शक्तियों के सत्ता ग्रहण करते ही भारत—नेपाल संबधों का काला अध्याय शुरू होता दिखाई पड़ने लगा। जहां एक ओर वामपंथी नेपाली सरकार ने कम्युनिस्ट चीन का खुल कर समर्थन और साथ देना शुरू किया वहीं भारत के साथ अपने सघन और सशक्त संबंधों की जड़ें खुद ही काटनी शुरू कर दीं। हालांकि इस सबमें नेपाल यह नहीं समझ पा रहा है कि वह भविष्य का तिब्बत बन सकता है।

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चीन, नेपाल और भारत के त्रिकोणीय संबंधों और इसके बीच भारत-नेपाल के बीच गहराते संकट पर चर्चाएं चल ही रही थीं कि नेपाल के प्रधान मंत्री ने भारत के कण—कण में बसे श्री राम की अयोध्या पर विवादित बयान देकर संकटों का एक नया ही अध्याय शुरू कर दिया। ओली ने एक ओर अयोध्या को नेपाल में स्थित बता दिया तो वहीं दूसरी ओर भारत के कई हिस्सों को नेपाली नक़्शे का हिस्सा बना कर पूरे विश्व के सामने पेश कर दिया। आखिर ये क्या हो रहा है और क्यों ? नेपाल और भारत के बीच सदियों से बहुत सशक्त सांस्कृतिक सम्बन्ध रहे हैं। यहां तक कि विश्व राजनीति के पटल पर नेपाल की छवि हमेशा भारत के छोटे भाई के रूप में प्रस्तुत की गयी और मान्य भी रही है। सुदूर दक्षिण से यहां पहुंच श्री आदि शंकराचार्य द्वारा श्री पशुपतिनाथ जी की स्थापना हो या यहां की हिन्दू बहुल जनसँख्या के साथ भारत के सांस्कृतिक सम्बन्ध, नेपाल और भारत हमेशा 'दो राष्ट्र, एक संस्कृति' के रूप में देखे जाते रहे हैं। किन्तु आज जो स्थिति दिखाई पड़ रही है वह एक सुनियोजित वैचारिक तथा राजनीतिक षड़यंत्र का नतीजा है।

 नेपाल के माध्यम से चीन भारत पर अपना शिकंजा कसने की तैयारी में है। नेपाल में कम्युनिस्ट शक्तियों के सत्ता ग्रहण करते ही भारत—नेपाल संबधों का काला अध्याय शुरू होता दिखाई पड़ने लगा। जहां एक ओर वामपंथी नेपाली सरकार ने कम्युनिस्ट चीन का खुल कर समर्थन और साथ देना शुरू किया वहीं भारत के साथ अपने सघन और सशक्त संबंधों की जड़ें खुद ही काटनी शुरू कर दीं। हालांकि इस सबमें नेपाल यह नहीं समझ पा रहा है कि वह भविष्य का तिब्बत बन सकता है। पिछले कुछ समय में भारत चीन के बीच तनातनी की स्थिति उत्पन्न होने पर नेपाल ने न सिर्फ चीन का साथ दिया, भारत को अपने कूटनीतिक महत्व के कई निर्णयों के माध्यम से कई नकारात्मक सन्देश दिए। नेपाली सरकार ने जहां एक ओर अपने सभी नेपाली विद्यालयों में मंदारिन (चीनी) भाषा पढ़ना अनिवार्य कर दिया तो दूसरी ओर भारतीय मीडिया का प्रसारण रोक दिया, हालांकि यह रोक बाद में हटा ली गयी। आर्थिक मोर्चे पर नेपाल ने चीन के साथ कई समझौते किये हैं और यहीं सबसे बड़ा संकट दिखाई पड़ता है। चीन नेपाल में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के नाम पर जो पैसा लगा रहा है, वह भविष्य में नेपाल के अपने भविष्य के लिए भी खतरनाक है और भारत के लिए भी। लगभग 10 अन्य विकासशील या पिछड़े देशों को इस प्रकार पैसा उधार दे कर चीन पहले ही श्रीलंका का हम्बनटोटा पोर्ट हथिया चुका है और पाकिस्तान के ग्वादर पर भी कब्ज़ा जमा चुका है। चीन ने नेपाल के साथ फरवरी, 2020 में चीन-नेपाल ट्रांजिट प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किये हैं जिससे नेपाल को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए अब भारत पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। चीन की काली नज़र नेपाल पर सिर्फ भारत की वजह से नहीं है। और नेपाल हाल फिलहाल चीन से पूरी तरह से प्रभावित नज़र आ रहा है। nepal_1  H x W:

हालांकि भारत ने अपनी तरफ से हमेशा नेपाल की आर्थिक तथा अन्य सहायता करने का प्रयास किया है पर चीन की तुलना में भारत का नेपाल में निवेश या सहायता कम है। इसका कारण दोनों के उद्देश्यों में अंतर भी हो सकता है। जहां चीन नेपाल पर अपना वर्चस्व जमाना चाहता है, तो वहीं भारत नेपाल के विकास में बिना किसी नकारात्मक उद्देश्य से सहायता करता आया है।  भारत द्वारा 2017—18 में नेपाल को प्रदान की गयी 374 करोड़ की आर्थिक सहायता 2019—20 में बढ़ाकर 1050 करोड़ कर दी गयी है। इसके अलावा भारत ने नेपाल में कई अस्पताल, विद्यालय और अन्य आवश्यक सुविधाओं को जुटाने के लिए निर्माण की घोषणा कर काम भी शुरू कर दिया है।  इसके बावजूद नेपाली सरकार का नकारात्मक रवैया यहाँ वामपंथी विचारधारा के फैलने का एक परिणाम कहा जा सकता है।

 नेपाल के कई कम्युनिस्ट नेता भारत के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे संस्थाओं से पढ़ कर यहां पहुंचे हैं। ज़ाहिर सी बात है वामपंथ की पाठशाला से ग्रहण की गयी ट्रेनिंग भारत के विरोध में ही इस्तेमाल होगी। चीन से बढ़ते सुरक्षा, राजनीतिक और कूटनीतिक संकटों के बीच नेपाल से खट्टे होते संबंधों पर भारत को गहन विश्लेषण कर कदम उठाने होंगे। द्विपक्षीय सकारात्मक वार्ताओं के अलावा कहीं न कहीं नेपाल को कड़े सन्देश भी दिए जाने चाहिए क्योंकि वर्तमान नेपाली सरकार से भारत को सहयोग दिया जाना अपेक्षित नहीं है। साथ ही नेपाल को यह भी समझाने की आवश्यकता है कि विचारधारा के नाम पर वह आज भले ही चीन का साथ दे ले, पर भविष्य में यह उसके अपने अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौतियां पैदा कर सकता है।

हाल फिलहाल में वैश्विक स्तर पर चीन को कोविड—19 फ़ैलाने का न सिर्फ गुनहगार माना जा रहा है बल्कि अमेरिका जैसी शक्ति से उसे कड़े विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है। भारत के अमेरिका के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों की दृष्टि से देखें तो भारत न सिर्फ चीन बल्कि नेपाल को भी अपनी तरफ से कड़े सन्देश दे सकता है कि भारतीय सीमाओं में किसी भी प्रकार की घुसपैठ बर्दाश्त नहीं की जाएगी। 

राम का वनवास खत्म हुआ। हार्दिक आनंद!

 हार्दिक आनंद :

राम का वनवास खत्म हुआ। हार्दिक आनंद! किन्तु ध्यान रखिए, अयोध्या से निकलने वाली शांति-सौहार्द की राह के कई कांटे अभी बाकी हैं। एक संघर्ष समाप्त हुआ किन्तु सरकार और समाज दोनों के लिए आने वाला दौर निश्चित ही परीक्षाओं का दौर है। नहीं भूलना चाहिए कि कुछ तत्व ऐसे भी हैं जिनकी ‘दाल-रोटी’ इस देश में नफरत का चूल्हा सुलगाए रहने से ही चलती है।

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36 संप्रदायों के 140 संत, देश की समस्त पावन नदियों का निर्मल जल, विभिन्न तीर्थक्षेत्रों की मिट्टी और विविधता के इस सागर में मानवता को मर्यादा की दिशा देता श्रीराम का जयघोष। यह ऐसा क्षण था जब लगातार दौड़ता समय राष्ट्र स्मृति में स्थिर हो गया। 

5 अगस्त! एक दिन जो कैलेंडर के सहज पलट और बिसरा दिए जाने वाले अल्पजीवी पृष्ठ से बदलकर अयोध्या के आंगन में गड़ा शिलास्तम्भ बन गया।

राम का वनवास खत्म हुआ। हार्दिक आनंद!

किन्तु ध्यान रखिए, अयोध्या से निकलने वाली शांति-सौहार्द की राह के कई कांटे अभी बाकी हैं।

एक संघर्ष समाप्त हुआ किन्तु सरकार और समाज दोनों के लिए आने वाला दौर निश्चित ही परीक्षाओं का दौर है। नहीं भूलना चाहिए कि कुछ तत्व ऐसे भी हैं जिनकी ‘दाल-रोटी’ इस देश में नफरत का चूल्हा सुलगाए रहने से ही चलती है।

शांत अयोध्या भारत के आंगन में दबे उपद्रवी तत्वों की अशांति का चरम है।

देश को उत्पात का अखाड़ा बनाने में लगे इन तत्वों को आप मोटे तौर पर तीन हिस्सों में बांट सकते हैं-

पहला, कट्टरवाद की बिसात पर मुसलमानों को मोहरों की तरह चलाने के अभ्यस्त संगठन।

दूसरा, लोकतंत्र के आंगन में खूनी क्रांति की चिंगारी लिए बैठे वामपंथी।

और तीसरा, शक्तिसम्पन्न भारत की अंतरराष्ट्रीय राजनीति और समीकरणों पर पड़ने वाले प्रभावों से चिंतित विदेशी गुट-गुर्गे।

हैरानी नहीं कि ‘अयोध्या से आगे’ बढ़ते भारत के रास्ते में अगला मोर्चा उत्पात के इसी त्रिकोण से हो। बहुत सम्भव है कि तीनों की छीजती ताकत से पैदा बौखलाहट इन्हें एक कर दे!

संशय दूर करने के लिए तीन झलकियां देखिए-

पहला नजारा भूमिपूजन के बाद सोशल मीडिया पर आई ऐसी सारी ‘पोस्ट’ का जहां विवाद के पटाक्षेप के बाद पहली बार खुलकर बाहर निकले उन मुस्लिम बंधुओं के चेहरे देश-दुनिया के सामने आए, जो आमतौर पर मिंबरों पर काबिज कट्टरपंथियों के हल्लेगुल्ले में छिप जाते हैं। इन चेहरों ने मुस्लिम समाज की वह तस्वीर दिखाई जो यह बताती है कि आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी उन्माद से भरी, पिद्दी-सी संस्थाएं इस पूरे वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं।

दूसरा दृश्य उन वामपंथियों की पोल खुल जाने का था जो मुस्लिम समाज की आड़ में बरसों से अदालत में अयोध्या को अखाड़ा बनाए थे।

विचार का तीसरा झरोखा, उन यूरोपीय विचार समूहों की पड़ताल से खुलता है जिनका मानना है कि गलवान में भारत के जबरदस्त पलटवार और तनकर खड़े हो जाने से ड्रैगन आशंका और हैरानी से भर गया है।

उपरोक्त तीनों स्थितियां बताती हैं कि भारत जैसे-जैसे उलझनों को हटाते हुए आगे बढ़ रहा है इसकी राह में परेशानियां खड़ी करने वालों की बेचैनी भी उससे ज्यादा अनुपात में बढ़ रही है।

ध्यान दीजिए, शाहीन बाग का हिंसक समर्थन, दिल्ली दंगों में तेजाब के पाउच, बम-पिस्तौलें और लद्दाख में तनाव के बीच चीनी कम्पनियों और कारोबार की पैरवी करने के लिए लोग मंगल ग्रह से नहीं आए थे!

इसलिए सीमापर युद्ध और समाज में टकराव टालने की अगली दवा इस भारत विरोधी ‘त्रिकोण’ का इलाज है। उपचार का प्रारंभ होने से ही शरीर में आशा और उत्साह के संकेत उठने लगे हैं।

बड़े नीतिगत निर्णयों के साथ-साथ अब यह उपचार छद्म सूचनाओं की छंटाई और राष्ट्रीय एकता के विमर्श को बढ़ाते हुए जरा लम्बा चलेगा।

 देश ने पिछले कुछ सालों में कई पुरानी बीमारियों का इलाज किया है, राष्ट्रीय अस्मिता और एकता के कई मोर्चों पर पताका फहराई है।

धैर्यपूर्वक, कंधे से कंधा मिलाकर डटे रहे तो भले एकबार में न सही किन्तु अंत में (और निकट भविष्य में) इस त्रिकोण का टूटना तय है।

Sunday, July 19, 2020

चीन को सबक जरूरी था

चीन को सबक जरूरी था :

गलवान घाटी में मुंह की खाने के बाद चीन पीछे हट चुका है। भारतीय जवानों की बहादुरी और भारत की विदेश नीति के चलते आज चीन के साथ कोई खड़ा होने को तैयार नहीं है। विस्तारवादी चीन के लिए ऐसा सबक बेहद जरूरी था

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15 और 16 जून रात्रि को चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पीएलए (जिसका मुखिया चीन का राष्ट्रपति होता है) के जवानों की गर्दन और रीढ़ की हड्डियां टूट जाएंगी कितनी विध्वंसक कार्रवाई भारतीय जवानों के द्वारा होगी चीन के लगभग 48 जवान मारे जाएंगे यह ड्रैगन ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा।

इस अप्रत्याशित मारकाट ने भारतीय कर्नल के ऊपर पीएलए के द्वारा हमले के बाद घातक रूप ले लिया। पीएलए या चीन यह हिमाकत बार-बार क्यों करता है क्योंकि उसकी उदंडी व्यवहार हमारी पूर्व की सरकारों ने बिगाड़ी हुई है। पूरे देश को इस बात का दुख है कि गलवान घाटी में हमारे 20 जवानों का बलिदान हुआ लेकिन चीन को हमारे जवानों ने औकात दिखा दी।

आज पूरा जवानों के साथ खड़ा है हमें अपने जवानों पर गर्व है कि उनके शौर्य के आगे पीपुल्स लिबरेशन आर्मी टिक नहीं पाई और लगभग 48 पीएलए के शैतान मारे गए। चीन विश्व की दूसरी बड़ी आर्मी है ,जो ड्रैगन सपने लेता है कि वह विश्व शक्ति और मुखिया बनकर के पूरे विश्व पर आर्थिक और सामरिक रूप से राज करेगा । उसकी दुर्गति इस तरह से भारतीय जवान करेंगे उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा।

चीन के चरित्र में ही धोखा घड़ी है लेकिन भारत में भी कम्युनिस्ट और कांग्रेस पार्टी ने चीनी कुनैन की की गोली खाई हुई है।

चीन बहुत चलाक है वह अपनी वीचैट जो उसकी फेसबुक की तरह मीडिया ऐप है अपनी जनता और मीडिया से किसी भी तरह की सूचना को प्रचारित करने से बच रहा है , उसे डर है कि उसके जवानों की जो दुर्गति हुई है उसके देश में लोगों तक वह खबर पूरी सत्यता के साथ ना पहुंचे।

वैसे भी चीन इस सूचना या अपनी बदहाली को को कभी भी नहीं मानेगा कि उसके इतनी बड़ी संख्या में उद्दंड जवान मारे गए हैं ।

क्योंकि वह खबरों को छुपाने मैं हमेशा से ही चलाक और शातिर रहा है।

अभी युद्ध की संभावना आरंभिक दौर में हैं अभी भविष्य में क्या होगा कुछ भी कहना मुश्किल है आज चीन कह रहा है भारत की तरफ से हमें प्रताड़ित किया जा रहा है और भारत लाइन ऑफ कंट्रोल का उल्लंघन कर रहा है।
यह हास्यास्पद है।

गलवान घाटी विवाद

1962 के युद्ध में नेहरू सरकार के अल्हड़ निर्णय के कारण भारतीय फौजियों को अपमानित होना पड़ा ,चीन की 80000 चीनी फौजों ने भारत के 10 से 15 हजार सैनिकों को बुरी तरह घेरा ,एक तरह से नरसंहार ही किया था ,क्योंकि उस समय की नेहरू सरकार ने भारतीय फौजों के साजो सामान आधुनिक हथियार ,सेना की वर्दी कपड़े यहां तक कि -30 डिग्री में कड़ाके की सर्दी में लड़ने के लिए जूते तक नहीं थे, । भारतीय जवानों को आवश्यक

युद्ध संसाधनों से वंचित रखा।

नतीजा यह निकला पूर्वी तिब्बत के अक्साई चीन का 38000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ,चीन ने अपने कब्जे में ले लिया और गलवान नदी का उद्गम क्षेत्र भी अक्साई चीन ही है जो तिब्बत के रास्ते होते हुए श्योक नदी में जाकर मिलती है।

केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के अध्यक्ष डॉ लोबसांग सांगे ने कहा गलवान शब्द ही लद्दाख की पृष्ठभूमि से आया है। चीनी प्रशासन का तो वहां पर वैसे भी कोई दावा बनता ही नहीं है।

तिब्बत पर 1954 में चीन ने पूर्ण रूप कब्जा किया लिया था ,वह इसकी योजना चीन 1950 से ही बना रहा था ।
क्योंकि तत्कालीन तिब्बत में चीन के खिलाफ लगातार आंदोलन चलते रहते थे ,अपनी स्वाधीनता स्वतंत्रता को लेकर।

तिब्बत की आजादी का आंदोलन आज भी चल रहा है। तिब्बत चीन के लिए दुखती रग है,

संपूर्ण तिब्बत को घेरने के लिए चीन ने शिंजियांग तिब्बत राजमार्ग जिसकी कुल लंबाई 2743 किलोमीटर है उसने इस राजमार्ग मार्ग का निर्माण 1950 में ही प्रारंभ कर दिया था ।

तत्कालीन भारतीय सरकार सोती रही और चीन पूर्वी लद्दाख (अक्साई चीन) के अंदर ही घुस कर के वह अपने राजमार्ग बना रहा था । भारत को वह हमेशा इस राजमार्ग से दूर रखने का प्रयास करता रहा है ।

मुझे इसका एक कारण यह भी लगता है लद्दाख और तिब्बत का संबंध सांस्कृतिक धार्मिक रूप से बहुत करीब रहा हैं । उदाहरण के लिए जैसे भारत का मिथिला क्षेत्र नेपाल के मिथिला क्षेत्र से सांस्कृतिक रूप से बहुत ज्यादा घुला मिला है लेकिन मिथिला का क्षेत्र दो हिस्सों में बटा हुआ है 52% नेपाल में है और 48% भारत में है,

भारत 1947 में आजाद हुआ आजादी के बाद से ही जवाहरलाल नेहरू हिंदी चीनी भाई भाई करते रहे और चीन की सेना ने 1962 में गलवान घाटी के आसपास बहादुर भारतीय फौजों का नरसंहार किया ,क्योंकि भारतीय जवानों के पास हौसला तो था लेकिन जरूरत के अनुसार ना भोजन था ना हथियार थे ना युद्ध नीति थी और युद्ध में कोई बैकअप भी नहीं था ।

देशवासियों को समझना होगा 1962 में नहीं चीन ने अक्साई चीन यानी पूर्वी लद्दाख के भारतीय क्षेत्र पर 1950 में ही कब्जा कर लिया था ।

भारत की तत्कालीन अल्हड़ सरकार को इसकी जानकारी ही नहीं लगी। मेरा शरीर सिहर उठता है तत्कालीन 1950 के आसपास कितने अनावश्यक और मस्तिष्क के कोढ़ी लोगों के पास भारतीय सरकार की कमान थी। परम पूजनीय बालासाहेब देवरस की पुस्तक सामाजिक "समरसता और हिंदुत्व" पुस्तक के 33 पृष्ठ पर श्री सीडी देशमुख जो अंग्रेजों के समय में आई सी एस अधिकारी रह चुके थे और प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू के कालखंड में वित्त मंत्री थे उन्होंने अपना आत्म चरित्र लिखा है और उसके कुछ पंक्तियां इस पुस्तक में आदरणीय बाला साहब देव रस जी ने उसका उल्लेख किया है उन्हें आज देश की जनता को समझना अत्यधिक जरूरी है ।

श्री सीडी देशमुख अपने आत्म चरित्र में लिखते हैं खासकर नौकरशाही के विषय को उन्होंने स्पष्ट किया है उन्होंने कहा कि अंग्रेज अपने शासनकाल में नौकरशाही का उपयोग स्वाधीनता आंदोलन को दबाने के लिए तो अवश्य करते थे ,लेकिन इतना होते हुए भी इस बात की चिंता करते थे कि प्रशासन कि मशीनरी भ्रष्ट ना हो । वह ईमानदार रहे परिश्रमी रहे किंतु देश के स्वाधीन होने के बाद जो लोग कुर्सी पर आकर बैठे हैं उन्होंने कुर्सी के लिए या व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए अथवा अपने दल के लिए सरकारी बाबू ओं का गलत काम करवाने की शुरुआत कर दी है ,इसलिए इन सरकारी नौकरशाही और प्रशासन की आदतें बिगड़ती जा रही है। श्री देशमुख के अनुसार कांग्रेस का भ्रष्ट आचरण उसकी सरकारों का नौकरशाही के लिए गलत इस्तेमाल 1962 में भारत की पराजय का मुख्य कारण बनी।

गलवान घाटी में 1962 में युद्ध का कारण भी शिनजियांग और तिब्बत का राजमार्ग था और आज भी चीन गलवान घाटी में बेहतर पोजीशन के लिए भारतीय सेनाओं से झड़प करता रहता है ।

यानी कि मैं यह प्रमाणित रुप से कह सकता हूं गलवान घाटी का विवाद तत्कालीन नासमझ अल्हड़ अक्षम सरकार ने 1950 से ही उत्पन्न कर लिया था। जिसे आज तक हम भुगत रहे हैं।

चीन 1950 से ही तिब्बत पर कब्जे की योजना बनाने के साथ-साथ भारतीय लद्दाख क्षेत्र में भी अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा था ,जिसकी सूचना उस समय की तत्कालीन सरकार को कई वर्षों तक लगी ही नहीं, क्योंकि भारतीय सेना को पेट्रोलिंग की कोई आवश्यकता ही नहीं है ऐसा सरकार मान कर के बैठी थी ।

भारतीय सेना कुछ करना चाहती थी तो सेना के पास अपने संसाधन ही नहीं थे। उनकी इस नासमझी का बहुत बड़ा खामियाजा हमें आज तक भुगतना पड़ रहा है। उसके पश्चात जब जब कांग्रेस की सरकारें रहीं 5000 वर्ग किलोमीटर जमीन और चीन द्वारा कबजा ली गई ,यानी कि अब लगभग 43000 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन के कब्जे में है। चीन भारतीय सीमा पर इतना आक्रमक क्यों है इसे समझने की जरूरत है ऑस्ट्रेलिया ने चीन के लिए कहा कि उसकी जांच होनी चाहिए कि चीन की तरफ से जानबूझकर कोरोना को पूरे विश्व में फैलाया गया है और भारत ने इसका समर्थन कर दिया। साथ ही क्रोना का खौफ पूरे चीन में फैल गया साथ ही विश्व के कई प्रमुख देशों ने चीन के साथ अपने आर्थिक संबंध तोड़ने का ऐलान जब प्रारंभ किया ,तो चीन में जितनी विदेशी कंपनियां थी उनमें हड़कंप मच गया और वह भारत खासकर उत्तर प्रदेश की ओर रुख करने पर ज्यादा विचार करने लगी स्वाभाविक है इससे चीन को बौखलाहट रही होगी ।

रक्षा विशेषज्ञ और मेजर जनरल पीके सहगल से बातचीत हुई उन्होंने बताया आज भारतीय सेना विश्व की एक बेहद व्यवहारिक ,,अनुशासित ,संगठित सेना है। अब यूपीए की सरकार नहीं है जो अक्सर सीपीएम के दबाव में रहती थी और सीपीएम का चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ क्या रिश्ता है यह विश्व की बिरादरी और भारतीय लोग अच्छी तरह से जानते हैं।

1962 के युद्ध में भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी चीन के समर्थन में खड़ी हुई थी। बकौल पीके सहगल के अनुसार विश्व की किसी भी बेहतरीन सेना के पास युद्ध लड़ने के लिए दो तरफा क्षेत्रों में लगभग 40 दिन का बैकअप साजो समान हथियार गोला बारूद, बेहतरीन मारक क्षमता वाले एयरक्राफ्ट, बैलेस्टिक मिसाइलें, तोपे ,हथियार सप्लाई लाइन ,बेहतरीन हथियारों की तकनीक और शानदार सूचना तकनीक होनी चाहिए। लेकिन जब जब कांग्रेस की और यूपीए की सरकार रही तो सेना के पास 2 दिन का भी बैकअप युद्ध का साजो सामान आदि नहीं बचा था ।
इस तथ्य की पुष्टि सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में भी की थी इसका अर्थ है प्रमाणिक रूप से कहा जा सकता है कि यूपीए सरकार के समय में भारतीय सेना का मनोबल अत्यधिक और लगातार तोड़ा गया था।

यूपीए कांग्रेस की सरकार थी तब मात्र बोफोर्स तोप के अलावा कोई भी युद्ध हेतु साजो सामान का सौदा नहीं किया गया कितना हास्यास्पद था ।

2014 एनडीए की सरकार आने के बाद फ्रांस ,इजरायल ,और रूस के साथ कई तरह के सैन्य साजो समान हथियारों का सौदा किया गया अपाचे हेलीकॉप्टर ,रफाएल लड़ाकू विमान का सौदा , M777 अत्यधिक त्रिव मारक क्षमता वाले अमेरिकी विमान आदि के सौदा नई एनडीए की सरकार में ही हुए। सरकार और प्रधानमंत्री की भूमिका भारतीय सरकार और भारतीय सेना पर हमें गर्व होना चाहिए पूरी तरीके से सेना के साथ खड़ी हुई भारत की सरकार सेना का हौसला बढ़ाने के लिए पूरी तत्परता से कार्य कर रही है। स्वाधीनता के बाद लगभग हमें पांच युद्ध लड़ने पड़े हैं

बालासाहेब देवराज अपनी पुस्तक सामाजिक समरसता और हिंदुत्व में कहते हैं अगर युद्ध लड़ने का प्रसंग राष्ट्र के ऊपर आता है तो राष्ट्र को पूरी शक्ति के साथ युद्ध लड़ना चाहिए और विजय प्राप्त करनी चाहिए उसके कारण से अगर किसी दल या व्यक्ति के जीवन में कोई तनाव आता है तो उसे सहज सहर्ष सहन करना चाहिए ।यह राष्ट्र के प्रति के प्रत्येक दल और व्यक्ति का नागरिक कर्तव्य है।

अक्साई चीन से लेकर अरुणाचल तक भारतीय फौज में पूरी तरीके से चौकन्ना युद्ध की स्थिति तैयार हैं उन्होंने हाय अलर्ट किया हुआ है। भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने देश को और सर्वदलीय बैठक में संपूर्ण विपक्ष को विश्वास दिलाया है भारतीय सीमा पर चीनी घुस नहीं पाए भारतीय फौजों ने बहादुरी से इसका जवाब दिया।

प्रधानमंत्री मोदी ने कई बार चीन का नाम लेकर स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत का राष्ट्र हित सर्वोपरि है पीएम
मोदी ने कहा जिन क्षेत्रों में पहले हमारी नजर नहीं होती थी वहां पर हमारी नजर है जल, थल ,नभ में हम पूरी तरह से तैयार हैं। भारतीय सेना में आज जैसा शौर्य और चैतन्य है वह बहुत ही प्रशंसनीय है क्योंकि वर्तमान सरकार सेना के कार्य योजना और तकनीकी दृष्टि से भारतीय सेना को मजबूत दिशा की ओर सकारात्मक रूप से बढ़ाती हुई नजर आ रही है।

निष्ठा ,लक्ष्य ,निर्धारित कर्म अनुशासन ,एकाग्रता कृतज्ञता, कुशाग्रता कुछ खास प्रवृत्ति के ही राजनेताओं में एक साथ विद्यमान होते हैं। इसे किसी व्यक्ति को दिया गया ईश्वर का उपहार ही कहेंगे। भारत सरकार और प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक जागरूकता कुशल रणनीति का प्रयोग ठीक से समय काल का अवलोकन करते हुए चीन जैसे दुस्साहसही शैतान को भी अपनी हाराकरी योजना को बदलते हुए अपने कदम को पीछे लेना पड़ा।

कांग्रेस पार्टी और विपक्ष की भूमिका

रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने कहा भारतीय सेना का मनोबल ऊंचा उठाने की आवश्यकता है। विपक्ष को सरकार पर ऐसे मामलों में सवाल नहीं खड़ा करना चाहिए। आखिर जब प्रधानमंत्री कुछ कहते हैं तो उनके पास अपने सेना के श्रेष्ठ सूचना के केंद्र इंफॉर्मेशन के रिसोर्सेज होते हैं सेना है इंटेलिजेंस के आधार पर वह कोई बयान देते हैं

अगर विपक्षी दल खासकर कांग्रेस इस समय सरकार पर सवाल खड़ा करते हैं तो एक तरह से वह दुश्मनों को फायदा पहुंचाने का काम कर रहे हैं और सीपीएम और कांग्रेस के बयानों को चीन मीडिया उठाती है और उसका इस्तेमाल मनोवैज्ञानिक युद्ध के लिए करती है।

लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह के अनुसार 15 जून और 16 जून की रात्रि भारतीय आर्मी का साहस शौर्य के बलिदान पर विपक्ष सवाल ना खड़ा करें हमारी फौजों ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को विश्व में एक्सपोज कर दिया है ।

भारत की आज की बेहतरीन विदेश नीति सैन्य नीति के कारण चीन को अपने सैनिकों को लगभग 2 किलोमीटर पीछे अपने स्थानों पर ले जाना पड़ा अपने टेंट हटाने पड़े।

प्रधानमंत्री मोदी की कुशल रणनीति के कारण अमेरिका के पेसिफिक ओशन में नेवी को अलर्ट कर दिया। फ्रांस
इंग्लैंड ऑस्ट्रेलिया ताइवान को अपने खेमे की तरफ लाकर प्रधानमंत्री मोदी ने एक वैश्विक नेता की छवि को बनाया है। और विश्व बिरादरी में चीन के साथ सिर्फ कंगाल पाकिस्तान खड़ा रह गया।

भारत के प्रधानमंत्री की चीन के लिए आर्थिक नाकेबंदी ,विदेश नीति कूटनीति, यह भारत की विजय है। देश की जनता का देशव्यापी ,चीन के उत्पादों को खिलाफ रोष बढ़ता जा रहा है सरकार को उसे ठीक से समझने की और उस विषय पर और क्या बेहतर कर सकते हैं विचार करने की आवश्यकता है।

भारत की सबसे पुरानी दो पार्टियां कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मानसिक रोगी की तरह इनके नेता व्यवहार कर रहे हैं।

राहुल गांधी के ट्वीट बार-बार भारतीय सेना का मनोबल ही नहीं तोड़ते अपितु चीन को वह मनोवैज्ञानिक लाभ देने का प्रयास करते हैं।

आखिर 2008 के बीजिंग ओलंपिक में राहुल और सोनिया गांधी चाइना गए थे वहां की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ उनका आखिर क्या समझौता हुआ था ।

यह हमें भी जानने का हक है। रही बात भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की तो भारतीय लोकतंत्र में अंतिम सांसे लेती हुई वह चीन के कम्युनिस्ट जूतों को अपने सर पर पीटने के अलावा कुछ नहीं कर सकती है।
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Saturday, July 11, 2020

दक्षिण भारत में सांस्कृतिक सूर्योदय :

दक्षिण भारत में सांस्कृतिक सूर्योदय :

तमिलनाडु सरकार ने उन स्थानों के नाम बदल दिए हैं, जिनके प्राचीन नाम को अंग्रेजों ने परिवर्तित कर दिए थे। अपनी संस्कृति को सहेजने की दिशा में इसे एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यह सांस्कृतिक सूर्योदय भारतीयता के लिए कल्याणकारी है

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कोयम्बटूर’ को अब ‘कोयंपुत्थथूर’ के नाम से जाना जाएगा। यहां के रेलवे स्टेशन के बाहर सांस्कृतिक जागरण के लिए ऐसे चित्र पहले से ही बने हुए हैं। 

गत दिनों तमिलनाडु सरकार ने एक महनीय कार्य करते हुए प्रदेश के 1,018 स्थानों का नाम परिवर्तित कर दिया है। उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों के दीर्घकालिक शासन के दौरान राज्य के बहुत सारे स्थलों के नाम उनके मूल तमिल रूप से बहुत अधिक परिवर्तित हो गए थे। अत: ये बदले हुए नाम हमें अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन व्यवस्था की याद दिलाते थे। राज्य सरकार ने इन सभी के मूलनामों को पुनस्स्थापित करके राज्य की भाषिक और सांस्कृतिक भावना को मजबूत करने का कार्य किया है।
तमिलनाडु में राज्य की राजधानी के पास एक स्थान है- ‘तिरुवालिकेन्नी’ जिसका तात्पर्य है ‘कमल से युक्त सरोवर।’ अंग्रेजी शासन के दौरान इस स्थान का नाम ‘ट्रिप्लीकेन’ रख दिया गया था। यह नाम इस स्थान से किसी भी प्रकार का कोई सार्थक संबंध नहीं स्थापित करता था। सरकार ने इस स्थान का नाम पुन: ‘तिरुवालिकेन्नी’ रख दिया है।

इस प्रकार वहां की स्थानीय जनता उच्चारण के स्तर पर इस स्थान से अधिक भावनात्मक रूप में जुड़ सकी है। इसी प्रकार से उच्चारण के स्तर पर भिन्नता वाले एक और स्थल ‘कांदलूर’ का नाम बदलकर अब ‘कांतलूर’ कर दिया गया है, क्योंकि तमिल में अंग्रेजी के ‘दा’ का उच्चारण एक भिन्न प्रकार से ‘ता’ रूप में होता है। इसी प्रकार से ‘कोयम्बटूर’ को अब ‘कोयंपुत्थथूर’, ‘मयलापोर’ को अब ‘मयलापपरो’ तथा ‘वेल्लोर’ को अब ‘वेल्लूर’ कहा जाएगा। तमिल भाषा और साहित्य के प्राचीन ग्रंथों और अभिलेखों में इन स्थानों के नाम इसी प्रकार वर्णित किए गए हैं। यह तमिलभाषी लोगों के स्थान विशेष से रागात्मक लगाव तथा भूमि के प्रति उनके भाव संबंधों को अधिक मजबूत बनाएगा।

नाम परिवर्तन के सांस्कृतिक संदर्भ
किसी भी व्यक्ति, स्थान, मत व क्षेत्र का नाम उसकी समग्र सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है। अतएव नाम विशिष्टार्थव्यंजक होने के साथ-साथ व्यक्ति या स्थान को परिवेशगत विराटता प्रदान करता है। दर्शनशास्त्र ‘नाम’ को एक अमूर्त तत्व कहता है, तो भाषाविज्ञान की शब्दावली में नाम एक यादृच्छिक संज्ञा है। अर्थात् नाम को व्यक्ति या स्थान पर आरोपित किया जाता है या मान लिया जाता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति या स्थान में नाम का कोई विशेष चिन्ह होना आवश्यक नहीं। अत: नाम एकसमष्टिबोधक भाव है, जो किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थिति या स्थान को विराट बनाता है। नाम का महत्व समाजसापेक्ष होता है। अत: नाम को समाज के द्वारा माना जाना अनिवार्य है। यदि व्यक्ति अपने नाम के द्वारा अपना वैशिष्ट्य निरूपित करने का प्रयास करे, किन्तु समाज द्वारा व्यक्ति को मान्यता प्राप्त न हो, समाज उसको उसके नाम के द्वारा विशिष्टता प्रदान न करे तो वह नाम अनुमन्य नहीं होगा। अत: नाम व्यक्ति अथवा वस्तुवैशिष्ट्य बोधक होने के साथ-साथ समाजप्रेक्षा भी रखता है।

वे आक्रांता केवल कलाभंजक, मूर्तिभंजक, शिल्पभंजक ही नहीं थे, अपितु वे सौन्दर्यभंजक तथा सद्धर्मभंजक भी थे। यदि हमें अपने सद्धर्म और सौंदर्य की पुनर्प्राप्ति सुनिश्चित करनी है तो अपने ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक प्रबोध की पुनस्स्थापना के लिए भी पुन: प्रयत्न करने होंगे।

-पं.दीनदयाल उपाध्याय (काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर की भग्न चारदीवारी के संदर्भ में)


भारतीय संस्कृति में नाम का अपना एक अलग ही महत्व है। प्रकृति, तीर्थ, देव तथा लोक का विशिष्टार्थ उनका नाम ही है। आदियुगीन समय से लेकर आज तक विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों स्थानों, कार्यों एवं समाजों के नामों की एक अनन्त सूची हमें प्राप्त होती है। दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहां देवाराधन के लिए ‘सहस्रनामस्तोत्र’ की रचना की गई। नाम के द्वारा विशिष्टता का बोध होता है, अत: सहस्रनामोच्चारण के द्वारा देवता की स्तुति तो होगी ही, इसके साथ-साथ उपासना की एक नई पद्धति ‘नामसाधना’ का भी विकास होगा।

प्राचीन काल में व्यक्ति के जीवन में नाम का बहुत अधिक महत्व होता था। इसी कारण से हमारे यहां सोलह प्रधान संस्कारों में एक नामकरण नामक संस्कार का भी प्रावधान है। व्यक्ति की जन्मलग्नस्थ राशि के अनुसार ही उसका नाम रखा जाता था। इन नामों में वंश, जाति, कुल अथवा गोत्र की विशिष्टता समाविष्ट होती थी। उदाहरण के लिए कश्यप के पुत्र को काश्यप, हिमालय की पुत्री को गिरिजा तथा दिति के पुत्र को दैत्य कहा जाता था। रावण के तीन अन्य नामों में पौलस्त्य-उसके कुल अथवा गोत्र का सूचक है, दशानन- उसकी अपनी शारीरिक विशिष्टता का सूचक तथा लंकेश-उसके अधिकारों और शासन वैशिष्ट्य का सूचक है। कभी-कभी व्यक्ति से जुड़ी वस्तुओं की विशिष्टता भी उस व्यक्ति के नाम के लिए प्रयुक्त होती थी। जैसे राजा दशरथ का रथ दसों दिशाओं में समान गति से प्रविष्ट होने में सक्षम था, अत: यह राजा के नाम का वैशिष्ट्य बन गया। गोस्वामी तुलसीदास ने नाम के प्रभाव को वर्णित करते हुए लिखा है-

नाम प्रभाउ जानि सिव नीके।
कालकूट फल दीन अमी के।।
राजा दशरथ के चारों राजकुमारों का नामकरण सभी के गुण-वैशिष्टय के अनुरूप ही होता है।
तुलसीदास लिखते हैं-
बिस्व भरन पोसन कर जोई।
ताकर नाम भरत अस होई।।

तात्पर्य यह है कि हमारे यहां नाम की सामाजिक एवं सांस्कृतिक सार्थकता रही है। यहां नाम उस प्रकार नहीं रखे जाते हैं जैसे कि यूरोप और पश्चिमी देशों की शब्दावलियों में रखे गए हैं। हमारे यहां नाम की सोद्देश्यता उसे सुन्दर, सुष्ठु और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।

शायद यही कारण था कि जब हमारे देश में विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किए तो उन्होंने यहां के विभिन्न स्थानों के नाम परिवर्तित किए। नाम परिवर्तन की यह पूरी प्रक्रिया एक योनाबद्ध तरीके से हुई। सूफियों, औलियाओं और अनेक मुल्ले-मौलवियों के कहने पर विभिन्न बादशाहों ने इस नाम परिवर्तन की प्रक्रिया को बखूबी अंजाम दिया। हिन्दू समाज को गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर इन सारे परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए बरगलाया गया। नाम परिवर्तन की इस सुनियोजित रणनीति का शिकार हमारे यहां के सांस्कृतिक और धार्मिक स्थल तो हुए ही, साथ ही साथ समाज में निहित उन अनेकानेक स्थलों के स्मृतिबोध को भी नष्ट करने का प्रयास किया गया।

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                  ‘ट्रिप्लीकेन’ को अब ‘तिरुवालिकेन्नी’ कहिए।

पौराणिक काल में हमारे यहां के प्रसिद्ध नगर ‘इन्द्रप्रस्थ’ को ‘दिल्ली’ बना दिया गया। ‘इन्द्रप्रस्थ’ नाम के पीछे पूरी एक गौरवमयी ऐतिहासिक परंपरा रही है। खाण्डवप्रस्थ नामक वन को पांडवों ने साफ करके मय दानव के सहयोग से ‘इन्द्रप्रस्थ’ नामक भव्य नगर का निर्माण किया था। अत: ‘इन्द्रप्रस्थ’ नाम के पीछे देव, मनुष्य और दानवों की एकीकृत सर्जनशीलता और सांस्कृतिक ऐक्यभाव का निहितार्थ समाहित है। किन्तु इस नाम को विकृत करके दिल्ली बना देने के पीछे एक ही उद्देश्य है- हमारे गौरवशाली सांस्कृतिक वैभव की परंपरा को तमावर्त में तिरोहित कर देना। आज के समय में राजस्थान में स्थित ‘अजमेर’ को कभी प्राचीनकाल में ‘अजयमेरु’ कहा जाता था। सूफी-औलियाओं का ठिकाना बनने के कारण इसे ‘अजमेर’ कहा जाने लगा। ‘अजमेर’ फारसी के ‘आजमी’ से ध्वन्यात्मक तुलना करता है, अत: ‘अजमेर’ मुसलमानों की परंपरा के अधिक करीब है। राजस्थान के अन्य नगरों के साथ यह नहीं हुआ है, क्योंकि वहां के मुसलमान आक्रांताओं ने अपना स्थायी ठिकाना नहीं बनाया था।
‘कांदलूर’ का नाम बदलकर अब ‘कांतलूर’ कर दिया गया है, क्योंकि तमिल में अंग्रेजी के ‘दा’ का उच्चारण एक भिन्न प्रकार से ‘ता’ रूप में होता है। इसी प्रकार से ‘कोयम्बटूर’ को अब ‘कोयंपुत्थथूर’, ‘मयलापोर’ को अब ‘मयलापपरो’ तथा ‘वेल्लोर’ को अब ‘वेल्लूर’ कहा जाएगा। तमिल भाषा और साहित्य के प्राचीन ग्रंथों और अभिलेखों में इन स्थानों के नाम इसी प्रकार वर्णित किए गए हैं।

हमारे देश में ज्ञान केन्द्रों की एक समृद्ध परंपरा रही है। नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय हमारी आदर्श शिक्षण परंपरा के मूर्तिमान स्तंभ थे। तेरहवीं शताब्दी के पहले दशक में बख्तियार खिलजी ने नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया तथा हजारों बौद्ध भिक्षुओं की हत्या कर दी। नालंदा विश्वविद्यालय के अत्यंत विशाल ‘धर्मयज्ञ’ नामक पुस्तकालय को जला दिया गया। लेकिन आज कितने शर्म की बात है कि हमने इन आक्रान्ताओं के नाम से विभिन्न नगरों का निर्माण किया है। बिहार में एक स्थान का नाम ‘बख्तियारपुर’ रखा गया है।

मुगलिया सल्तनत कायम होने से पूर्व ही हमारे देश में कई प्राचीन स्थलों के नाम बदले जा चुके थे। देश के वामपंथी इतिहासकारों ने बड़ी चालाकी से इस पूरी प्रक्रिया को सांस्कृतिक मेल-मिलाप बताया। नाम परिवर्तन की इस प्रक्रिया में हम एक बात प्रधान रूप से पाते हैं कि अधिक कट्टर और जिहादी मानसिकता वाले आक्रांताओं और शासकों ने इन कार्यों में अधिक रुचि ली है। मुहम्मद बिन तुगलक ने राजधानी परिवर्तन करते समय ‘दौलताबाद’ नामक नगर बसाया। सिकन्दर लोदी ने ‘आगरा’ की स्थापना की। यह वही सिकन्दर लोदी था जिसने नगरकोट के ज्वालामुखी मंदिर को तोड़कर उसकी मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे और उन्हें कसाइयों को मांस तौलने के लिए दे दिया था।

दिल्ली के मुगल शासक अकबर ने अपने ‘दीन-ए-इलाही’ को लोकप्रिय बनाने की सनक में भारत के अत्यंत प्राचीन एवं पवित्र तीर्थस्थल ‘प्रयागराज’ का नाम बदलकर ‘इलाहाबाद’ कर दिया था। इसी प्रकार उसके वंशज शाहजहां ने अपने आपको अमर बनाने की इच्छा से राजधानी ‘दिल्ली’ में ‘शाहजहानाबाद’ नामक नगर बसा दिया था।

महाराष्टÑ की धरती छत्रपति संभाजी महाराज के अप्रतिम शौर्य, त्याग और बलिदान की साक्षी रही है। वहां पर उन्हीं के निर्दयी हन्ता औरंगजेब के नाम पर ‘औरंगाबाद’ नामक नगर बसाया गया। ये सारे कृत्य हमारे गौरवशाली स्मृतिबोध को नष्ट करने और हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए किए गए।


जब हमारे देश में विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किए तो उन्होंने यहां के विभिन्न स्थानों के नाम परिवर्तित किए। नाम परिवर्तन की यह पूरी प्रक्रिया एक योनाबद्ध तरीके से हुई। सूफियों, औलियाओं और अनेक मुल्ले-मौलवियों के कहने पर विभिन्न बादशाहों ने इस नाम परिवर्तन की प्रक्रिया को बखूबी अंजाम दिया। हिन्दू समाज को गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर इन सारे परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए बरगलाया गया।

देश के मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इसे खूब महिमामंडित किया लेकिन हमारी स्मृतियों में इन सभी स्थलों की पूर्व परंपरा सदैव विद्यमान रही। ऐसा ही षड्यंत्र भगवान राम की जन्मस्थली ‘अयोध्या’ के साथ किया गया जिसका नाम मुस्लिम पद्धति के अनुसार ‘फैजाबाद’ रख दिया गया। यथासंभव ऐसे प्रत्येक स्थल जो विशेष रूप से हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े रहे हैं, इन आक्रांताओं के विशेष निशाने पर रहे। उन्होंने वहां की कला, शिल्प, वास्तु-सौन्दर्य को तो नष्ट किया ही, सामूहिक रूप से कन्वर्जन भी कराया और इनके प्राचीन नामों को भी बदल दिया। आज जब हम अपने अतीत की ओर देखते हैं तो हमें अपनी सप्तपुरियों, अष्टादश महाजनपद आदि के कोई भी चिन्ह नजर नहीं आते। बहुत सारे लोग आज इनके नाम भी भुला चुके हैं।

किसी भी राष्टऔर धर्म, संस्कृति और समाज की यथावत रक्षा तभी संभव है, जब हम उसके प्राचीन गौरव और स्मृतिबोध को पुन: स्थापित करें। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने इसी बोध की पुनस्स्थापना की बात अपनी पुस्तक ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’  में की है। काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर की भग्न चारदीवारी को देखकर वे कहते थे, ‘‘वे आक्रांता केवल कलाभंजक, मूर्तिभंजक, शिल्पभंजक ही नहीं थे, अपितु वे सौन्दर्यभंजक तथा सद्धर्मभंजक भी थे। यदि हमें अपने सद्धर्म और सौंदर्य की पुनर्प्राप्ति सुनिश्चित करनी है तो अपने ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक प्रबोध की पुनस्स्थापना के लिए भी पुन: प्रयत्न करने होंगे।’’ स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत देश की सत्ताओं ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि देश में लोकतंत्र की स्थापना के साथ ही अवसरवादी राजनीति और तुष्टीकरण की परंपरा की शुरुआत हो गई।

महाराष्ट की धरती छत्रपति संभाजी महाराज के अप्रतिम शौर्य, त्याग और बलिदान की साक्षी रही है। वहां पर उन्हीं के निर्दयी हन्ता औरंगजेब के नाम पर ‘औरंगाबाद’ नामक नगर बसाया गया। ये सारे कृत्य हमारे गौरवशाली स्मृतिबोध को नष्ट करने और हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए किए गए।

देश के कर्णधारों ने सेकुलरवाद के नाम पर मजहब विशेष को खूब तुष्ट करने के प्रयत्न किए। जो काम बहुत पहले हो जाने चाहिए थे, उनकी शुरुआत आज के समय में हो रही है। इस प्रक्रिया की शुरुआत औरंगजेब नामक अन्यायी और मजहबी  शासक के नाम पर बनी रोड का नाम परिवर्तित करके महान वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर रखने के साथ हुई। इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए हरियाणा सरकार ने ‘गुड़गांव’ का तत्समीकरण किया और इसका नाम ‘गुरुग्राम’ रखा। वस्तुत: इन्हीं नामों और प्रतीकों से हम ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जीवनदर्शन और अपनी गौरवशाली परंपरा का प्रबोध प्राप्त कर सकते हैं।

परिवर्तन की इस प्रक्रिया में उत्तर प्रदेश स्थित हमारे दो अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व धार्मिक महत्व के स्थल ‘प्रयागराज’ और ‘अयोध्या’ के नामों को सरकारी मान्यता प्रदान की गई। कुंभ मेला के अवसर पर देश के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालु प्रयागराज आते हैं। अब उन्हें ग्लानिपूर्वक नहीं कहना पड़ेगा कि वे अपने तीर्थस्थल ‘इलाहाबाद’ जा रहे हैं। इसी प्रकार ‘फैजाबाद’ को ‘अयोध्या’ के रूप में स्थापित करना प्रकारान्तर से हमारे द्वारा अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ों की ओर लौटने की ही प्रक्रिया है।

नाम परिवर्तन के इन सारे प्ररिप्रेक्ष्यों को जानते और समझते हुए हमें इसे राजनीतिक चश्मे से मुक्त होकर देखने की आवश्यकता है। अत: आज हमको अपने सांस्कृतिक परिपार्श्व का संधान करने की आवश्यकता है। हम अपनी भूमि, अपने क्षेत्र को जड़ तत्व न मानते हुए उसे अपनी विराट संस्कृति का चेतन भाग मानें, उससे जुड़ें- भावना और बुद्धि के दोनों स्तरों पर।

Saturday, July 4, 2020

संघीय ढांचे के समक्ष उभरती चुनौतियां:

संघीय ढांचे के समक्ष उभरती चुनौतियां:

संघीय ढांचे को संविधान की अपेक्षा के अनुसार बनाये रखना राष्ट्रहित में है। यह संतोष की बात है कि गत कुछ वर्षोें से संघीय ढांचा पुन: दृढ़ हो रहा है, परन्तु विदेशी मानसिकता और संबद्धता के कारण इसको कमजोर करने वाली राजनीतिक शक्तियां इस ढांचे को हानि पहुंचा रही हैं

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स्वतंत्रता एवं संविधान की प्राप्ति का महत्व कुछ लोग उत्तरोत्तर कम आंकते जा रहे हैं। इसका प्रमुख कारण है कि उन्होंने ठीक से भारत का समग्र इतिहास नहीं पढ़ा है। जिन्होंने स्वतंत्रता का संग्राम लड़ा और अपना जीवन मां भारती को अर्पित कर दिया, हमने उनकी शहादत का भी आदर नहीं किया है। इस राष्ट्र में प्राथमिक कक्षाओं से लेकर उच्च शिक्षा तक के पाठ्यक्रम में क्रमोत्तर विकास के सिद्धांत से भारतीय संस्कृति, औपनिवेशिक काल तथा स्वतंत्रता के इतिहास को अनिवार्य ज्ञानपुंज के रूप में पाठ्यक्रम में तो रखना ही चाहिये था, जो मजबूत इच्छाशक्ति के साथ अभी तक नहीं हो पाया है। एक-दो राष्ट्रीय पर्वों पर स्वरयंत्रों के माध्यम से हम ‘ऐ मेरे वतन के लोगों...’ जैसे मर्मस्पर्शी गानों को सुन तो लेते हैं, लेकिन प्रण के साथ प्राणशक्ति में लेकर हृदयंगम नहीं कर पाते हैं। भारत की वर्तमान लोकतंत्रात्मक संघीय राज्य व्यवस्था लाखों-लाख लोगों के बलिदान के प्रतिफल के रूप में मिली है। आज स्वतंत्रता के 73 वर्ष बाद तथा संविधान को विधिवत आत्मार्पित करने के 70 वर्ष बाद यह मूल्यांकन करना समीचीन प्रतीत होता है कि क्या संघीय ढांचा अपेक्षित दशा में है? क्या यह उचित दिशा में बढ़ रहा है? यदि है, तो संतोष की बात है, परन्तु क्या वर्तमान समय में संविधान में इंगित एवं अपेक्षित संघीय ढांचे के समक्ष कुछ चुनौतियां भी उभरी हैं? हम इसी प्रश्न का उत्तर ढूंढने का प्रयास करेंगे।

संविधान का मर्म समझें
कुछ लोग बिना गंभीर विमर्श के कह देते हैं कि भारत का संविधान तो मात्र कुछ राष्ट्रों के संविधानों का मिश्रण है। संविधान को मात्र एक पुस्तक के रूप में सरसरी निगाह से देखने पर ऐसा कहा जाता है। परन्तु भारत के संविधान को बनाने में एक विशद् बौद्धिक प्रक्रिया संविधान-सभा द्वारा अपनायी गयी थी। स्वतंत्रता संग्राम में घोर यातनाओं को सहने वाले त्यागी बौद्धिकों की राष्ट्रीय स्तर की संविधान सभा ने बड़े ही परिश्रम, तन्मयता, दूरदर्शिता, स्वातंत्र्य आंदोलन की मौलिक अपेक्षाओं की अनुभूति को ध्यान में रखकर इस संविधान को वर्तमान स्वरूप प्रदान किया। आज विश्व परिदृश्य में भारत का संविधान सारभर्मित एवं सुपारभाषित है। इसी को हमने 26 जनवरी 1950 को अपने संघीय गणराज्य का आधार माना तथा संवैधानिक शपथ ली।

आज आधुनिक नागर समाज के लिए सर्वमान्य संविधान अपरिहार्य है। भारत का संविधान भारतीय जनमानस के सम्यक् विकास के लिए समर्थ शास्त्र एवं शस्त्र है। रही बात इसके उपयुक्त प्रयोग की तो यह तो हम सभी नागरिकों का नैतिक दायित्व है कि हम अपना प्रत्येक आचरण संविधान की आत्मा के अनुरूप ही करें। आज जब हम नागरिक हो गये हैं तो अपने हमने मौलिक कर्तव्य वाले अनुच्छेदों को तो पढ़ लिया है, परन्तु मौलिक कर्तव्य का बोध भी नहीं रखना चाहते। भारत के संविधान का मस्तिष्क है इसकी मूलपीठिका (प्रिएम्बल)। इसी मूल मंतव्य को प्राप्त करने के लिए ‘राज्य’ बनाया गया। राज्य व्यवस्थाओं के अध्येता यह जानते हैं कि दुनिया में लोकतंत्रात्मक राज्य व्यवस्था धीरे-धीरे आयी है तथा इसको प्राप्त करने में अनगिनत प्राणों की आहुति देनी पड़ी है। अत: यह सर्वमान्य है कि लोकतंत्र दुनिया की सर्वाधिक सुसंगत और श्रेष्ठतम राज्य व्यवस्था है। भारत विविधताओं वाला देश प्रारम्भ से ही रहा है। यह विविधता उत्तरोत्तर बढ़ती ही गयी। इसी विविधता में एकता के दार्शनिक तत्व की सामाजिक-राजनीतिक अपरिहार्यता को दृष्टिगत रखते हुए संविधान निर्माताओं ने संविधान की मूलात्मा की घोषणा में यह स्पष्ट उद्घोषणा की है-‘‘हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा; और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत्, दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।’’

उपरोक्त उद्देशिका के सूक्ष्म अवलोकन से यह स्पष्ट है कि हम भारतवासियों ने अपने संविधान में समानता (समता), स्वतंत्रता, न्याय एवं भ्रातृत्व (बंधुता) को आदर्श जीवन मूल्य के रूप में स्वीकार करने की शपथ ली है। इन्हीं मूल्यों की प्राप्ति हेतु राज्य व्यवस्था के रूप में लोकतंत्रात्मक गणराज्य की अभिकल्पना रची है तथा संघीय संरचना के माध्यम से भारतीय जनमानस को विकास के पथ पर अग्रसर करने की आकांक्षा की है। संविधान की मौलिक मान्यता के रूप में हमारी पहचान के विभिन्न आयाम हैं और रहेंगे भी, परन्तु सर्वोच्च पहचान एक नागरिक के रूप में ही होनी चाहिए। इसके अनुपालन के अभिभावक के रूप में भारतीय गणराज्य के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति, संसद एवं उच्चतम न्यायालय सर्वोच्च हैं। राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी विपथन को रोकने तथा शुचितापूर्ण संवैधानिक मर्यादाओं का अनुसरण इन्हीं अभिभावक संस्थाओं द्वारा सुनिश्चित होता है। लेकिन क्या वर्तमान संघीय लोकतंत्रात्मक व्यवस्था ठीक प्रकार से संचालित हो रही है?

वर्तमान भारत कई प्रकार की आंतरिक एवं बाह्य विरोधी शक्तियों से जूझ रहा है। शहीदों के बलिदान के उपरान्त मिली स्वतंत्रता की जो समझ स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के शुरुआती वर्षों में थी, उसमें शिथिलता आयी है। अति स्वच्छंदता की प्रवृत्ति बढ़ी है। विघटनकारी क्षेत्रीय दलों ने अविवेकपूर्ण एवं स्वार्थपरक समझौते किये हैं। आज एकतरफ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) है, तो दूसरी तरफ संयुक्त प्रगतिशील संगठन (संप्रग)। भारत की जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया ही है। संघीय ढांचे को संविधान की अपेक्षा के अनुसार बनाये रखना राष्ट्रहित में है। यह संतोष की बात है कि गत कुछ वर्षों से संघीय ढांचा पुन: दृढ़ हो रहा है, परन्तु विदेशी मानसिकता और संबद्धता के कारण इसको कमजोर करने वाली राजनीतिक शक्तियां इस ढांचे को हानि पहुंचा रही हैं। ये शक्तियां निजी स्वार्थ, परिवारवाद एवं वैदेशिक कूटनीति के उपकरण बन जाने के कारण ऐसा कर रही हैं।

संघीय ढांचे के विपरीत आचरण
संघीय ढांचे एवं संविधान के विपरीत आचरण करने वालों ने एक आम नागरिक होने की नैतिकता को भी ताक पर रख दिया है। ‘वन्दे-मातरम्’ नहीं गायेंगे, ‘राष्ट्रगान’ के समय सावधान की मुद्र्रा में खड़े नहीं होंगे, संविधान की प्रति जलायेंगे, धारा 370 एवं 35ए के निरस्तीकरण का विरोध करेंगे, राष्ट्रीय जनसंख्या पंजिका नहीं बनने देंगे आदि जैसे आचरण किसी भी व्यक्ति, समूह, सम्प्रदाय अथवा राजनीतिक दल द्वारा किये जा रहे हैं तो यह उसी संविधान की घोर अवमानना एवं उपेक्षा है जिसके अंतर्गत उन्हें (हमें) नागरिकता, मूल अधिकार एवं मूल कर्तव्य प्राप्त हुए हैं। 

स्वतंत्रता से पूर्व ही विदेशी शासक अपने कूटनीतिक चातुर्य के अंतर्गत ‘फूट डालो राज करो’ की नीति को और विद्रुुप बनाते हुए विभेदकारी कारकों के प्रति उकसाने लगे थे, जिसका अवांछनीय रूप अब अधिक दिख रहा है। स्वतंत्र भारत में प्रांतों के बीच सीमा विवाद, जल संसाधन जैसे प्राकृतिक संसाधनों के बंटवारे का विवाद, भाषा विवाद आदि को अनुचित प्रोत्साहन दिया जाने लगा। केन्द्र की सरकार हो अथवा प्रान्त की सरकारें, सबका गठन तो संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत ही हुआ है, परन्तु दुर्भाग्य है कि जिस संविधान की मर्यादाओं के आलोक में एक ग्राम प्रधान से लेकर राष्ट्र प्रधान तक शपथ लेता है, कुछ दल अथवा ताकतें उसी संविधान की धज्जी उड़ाते हुए संविधान के विपरीत आचरण करने लगी हैं। प्रांत की सरकारों का केन्द्र से टकराव की स्थिति में आना उचित कैसे कहा जा सकता है? यह बड़ी साजिश प्रतीत होती है। अति तुष्टीकरण एवं वैदेशिक साठ-गांठ का कहीं न कहीं इसमें योगदान है।

भारतीय चुनाव आयोग के समक्ष राजनीतिक दलों द्वारा प्रस्तुत किये गये अनुबन्ध-पत्रों को एक उच्चस्तरीय समिति द्वारा परखना चाहिए कि दल द्वारा घोषित नीति, वक्तव्य एवं कार्यक्रम भारतीय संविधान के अनुरूप हैं अथवा नहीं। इसी आधार पर किसी दल को मान्यता मिलनी चाहिए। संघीय लोकतंत्रात्मक सम्प्रभु राष्ट्र के लिए यह मूलमंत्र है। राष्ट्र के प्रतीकों, संवैधानिक पर्वों एवं संकल्पों को एक स्वर में आदर के साथ सहर्ष स्वीकार करना चाहिए, तभी हम प्रगति के पथ पर आगे बढ़ेंगे। वास्तव में संघीय ढांचे की मूल अवधारणा चार स्तम्भों वाली राज्य व्यवस्था पर आधरित है जो गांव, जनपद, प्रांत और राष्ट्र में स्तरीकृत है, न कि विघटित अथवा विभाजित। इस संघीय ढांचे में सबकी समान सहभागिता होनी चाहिए। इसकी चार प्रमुख विशेषताएं सदैव परखी जानी चाहिए-यथा एकता, आंतरिक सुदृढ़ता, समन्वय एवं सामाजिक समरसता। व्यापक संवैधानिक अनुशासनहीनता की स्थिति में केन्द्र्र को कठोर कदम भी अवश्य उठाना चाहिए। 

आवश्यक है कि हम जीवन्तता (जन), गणराज्यबोध (गण) और मनस्विता (मन) की त्रयी को ठीक से आत्मसात करें। तभी संघीय लोकतंत्रात्मक संस्कृति को प्राणवान बना सकेंगे।