Sunday, July 19, 2020

चीन को सबक जरूरी था

चीन को सबक जरूरी था :

गलवान घाटी में मुंह की खाने के बाद चीन पीछे हट चुका है। भारतीय जवानों की बहादुरी और भारत की विदेश नीति के चलते आज चीन के साथ कोई खड़ा होने को तैयार नहीं है। विस्तारवादी चीन के लिए ऐसा सबक बेहद जरूरी था

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15 और 16 जून रात्रि को चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पीएलए (जिसका मुखिया चीन का राष्ट्रपति होता है) के जवानों की गर्दन और रीढ़ की हड्डियां टूट जाएंगी कितनी विध्वंसक कार्रवाई भारतीय जवानों के द्वारा होगी चीन के लगभग 48 जवान मारे जाएंगे यह ड्रैगन ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा।

इस अप्रत्याशित मारकाट ने भारतीय कर्नल के ऊपर पीएलए के द्वारा हमले के बाद घातक रूप ले लिया। पीएलए या चीन यह हिमाकत बार-बार क्यों करता है क्योंकि उसकी उदंडी व्यवहार हमारी पूर्व की सरकारों ने बिगाड़ी हुई है। पूरे देश को इस बात का दुख है कि गलवान घाटी में हमारे 20 जवानों का बलिदान हुआ लेकिन चीन को हमारे जवानों ने औकात दिखा दी।

आज पूरा जवानों के साथ खड़ा है हमें अपने जवानों पर गर्व है कि उनके शौर्य के आगे पीपुल्स लिबरेशन आर्मी टिक नहीं पाई और लगभग 48 पीएलए के शैतान मारे गए। चीन विश्व की दूसरी बड़ी आर्मी है ,जो ड्रैगन सपने लेता है कि वह विश्व शक्ति और मुखिया बनकर के पूरे विश्व पर आर्थिक और सामरिक रूप से राज करेगा । उसकी दुर्गति इस तरह से भारतीय जवान करेंगे उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा।

चीन के चरित्र में ही धोखा घड़ी है लेकिन भारत में भी कम्युनिस्ट और कांग्रेस पार्टी ने चीनी कुनैन की की गोली खाई हुई है।

चीन बहुत चलाक है वह अपनी वीचैट जो उसकी फेसबुक की तरह मीडिया ऐप है अपनी जनता और मीडिया से किसी भी तरह की सूचना को प्रचारित करने से बच रहा है , उसे डर है कि उसके जवानों की जो दुर्गति हुई है उसके देश में लोगों तक वह खबर पूरी सत्यता के साथ ना पहुंचे।

वैसे भी चीन इस सूचना या अपनी बदहाली को को कभी भी नहीं मानेगा कि उसके इतनी बड़ी संख्या में उद्दंड जवान मारे गए हैं ।

क्योंकि वह खबरों को छुपाने मैं हमेशा से ही चलाक और शातिर रहा है।

अभी युद्ध की संभावना आरंभिक दौर में हैं अभी भविष्य में क्या होगा कुछ भी कहना मुश्किल है आज चीन कह रहा है भारत की तरफ से हमें प्रताड़ित किया जा रहा है और भारत लाइन ऑफ कंट्रोल का उल्लंघन कर रहा है।
यह हास्यास्पद है।

गलवान घाटी विवाद

1962 के युद्ध में नेहरू सरकार के अल्हड़ निर्णय के कारण भारतीय फौजियों को अपमानित होना पड़ा ,चीन की 80000 चीनी फौजों ने भारत के 10 से 15 हजार सैनिकों को बुरी तरह घेरा ,एक तरह से नरसंहार ही किया था ,क्योंकि उस समय की नेहरू सरकार ने भारतीय फौजों के साजो सामान आधुनिक हथियार ,सेना की वर्दी कपड़े यहां तक कि -30 डिग्री में कड़ाके की सर्दी में लड़ने के लिए जूते तक नहीं थे, । भारतीय जवानों को आवश्यक

युद्ध संसाधनों से वंचित रखा।

नतीजा यह निकला पूर्वी तिब्बत के अक्साई चीन का 38000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ,चीन ने अपने कब्जे में ले लिया और गलवान नदी का उद्गम क्षेत्र भी अक्साई चीन ही है जो तिब्बत के रास्ते होते हुए श्योक नदी में जाकर मिलती है।

केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के अध्यक्ष डॉ लोबसांग सांगे ने कहा गलवान शब्द ही लद्दाख की पृष्ठभूमि से आया है। चीनी प्रशासन का तो वहां पर वैसे भी कोई दावा बनता ही नहीं है।

तिब्बत पर 1954 में चीन ने पूर्ण रूप कब्जा किया लिया था ,वह इसकी योजना चीन 1950 से ही बना रहा था ।
क्योंकि तत्कालीन तिब्बत में चीन के खिलाफ लगातार आंदोलन चलते रहते थे ,अपनी स्वाधीनता स्वतंत्रता को लेकर।

तिब्बत की आजादी का आंदोलन आज भी चल रहा है। तिब्बत चीन के लिए दुखती रग है,

संपूर्ण तिब्बत को घेरने के लिए चीन ने शिंजियांग तिब्बत राजमार्ग जिसकी कुल लंबाई 2743 किलोमीटर है उसने इस राजमार्ग मार्ग का निर्माण 1950 में ही प्रारंभ कर दिया था ।

तत्कालीन भारतीय सरकार सोती रही और चीन पूर्वी लद्दाख (अक्साई चीन) के अंदर ही घुस कर के वह अपने राजमार्ग बना रहा था । भारत को वह हमेशा इस राजमार्ग से दूर रखने का प्रयास करता रहा है ।

मुझे इसका एक कारण यह भी लगता है लद्दाख और तिब्बत का संबंध सांस्कृतिक धार्मिक रूप से बहुत करीब रहा हैं । उदाहरण के लिए जैसे भारत का मिथिला क्षेत्र नेपाल के मिथिला क्षेत्र से सांस्कृतिक रूप से बहुत ज्यादा घुला मिला है लेकिन मिथिला का क्षेत्र दो हिस्सों में बटा हुआ है 52% नेपाल में है और 48% भारत में है,

भारत 1947 में आजाद हुआ आजादी के बाद से ही जवाहरलाल नेहरू हिंदी चीनी भाई भाई करते रहे और चीन की सेना ने 1962 में गलवान घाटी के आसपास बहादुर भारतीय फौजों का नरसंहार किया ,क्योंकि भारतीय जवानों के पास हौसला तो था लेकिन जरूरत के अनुसार ना भोजन था ना हथियार थे ना युद्ध नीति थी और युद्ध में कोई बैकअप भी नहीं था ।

देशवासियों को समझना होगा 1962 में नहीं चीन ने अक्साई चीन यानी पूर्वी लद्दाख के भारतीय क्षेत्र पर 1950 में ही कब्जा कर लिया था ।

भारत की तत्कालीन अल्हड़ सरकार को इसकी जानकारी ही नहीं लगी। मेरा शरीर सिहर उठता है तत्कालीन 1950 के आसपास कितने अनावश्यक और मस्तिष्क के कोढ़ी लोगों के पास भारतीय सरकार की कमान थी। परम पूजनीय बालासाहेब देवरस की पुस्तक सामाजिक "समरसता और हिंदुत्व" पुस्तक के 33 पृष्ठ पर श्री सीडी देशमुख जो अंग्रेजों के समय में आई सी एस अधिकारी रह चुके थे और प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू के कालखंड में वित्त मंत्री थे उन्होंने अपना आत्म चरित्र लिखा है और उसके कुछ पंक्तियां इस पुस्तक में आदरणीय बाला साहब देव रस जी ने उसका उल्लेख किया है उन्हें आज देश की जनता को समझना अत्यधिक जरूरी है ।

श्री सीडी देशमुख अपने आत्म चरित्र में लिखते हैं खासकर नौकरशाही के विषय को उन्होंने स्पष्ट किया है उन्होंने कहा कि अंग्रेज अपने शासनकाल में नौकरशाही का उपयोग स्वाधीनता आंदोलन को दबाने के लिए तो अवश्य करते थे ,लेकिन इतना होते हुए भी इस बात की चिंता करते थे कि प्रशासन कि मशीनरी भ्रष्ट ना हो । वह ईमानदार रहे परिश्रमी रहे किंतु देश के स्वाधीन होने के बाद जो लोग कुर्सी पर आकर बैठे हैं उन्होंने कुर्सी के लिए या व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए अथवा अपने दल के लिए सरकारी बाबू ओं का गलत काम करवाने की शुरुआत कर दी है ,इसलिए इन सरकारी नौकरशाही और प्रशासन की आदतें बिगड़ती जा रही है। श्री देशमुख के अनुसार कांग्रेस का भ्रष्ट आचरण उसकी सरकारों का नौकरशाही के लिए गलत इस्तेमाल 1962 में भारत की पराजय का मुख्य कारण बनी।

गलवान घाटी में 1962 में युद्ध का कारण भी शिनजियांग और तिब्बत का राजमार्ग था और आज भी चीन गलवान घाटी में बेहतर पोजीशन के लिए भारतीय सेनाओं से झड़प करता रहता है ।

यानी कि मैं यह प्रमाणित रुप से कह सकता हूं गलवान घाटी का विवाद तत्कालीन नासमझ अल्हड़ अक्षम सरकार ने 1950 से ही उत्पन्न कर लिया था। जिसे आज तक हम भुगत रहे हैं।

चीन 1950 से ही तिब्बत पर कब्जे की योजना बनाने के साथ-साथ भारतीय लद्दाख क्षेत्र में भी अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा था ,जिसकी सूचना उस समय की तत्कालीन सरकार को कई वर्षों तक लगी ही नहीं, क्योंकि भारतीय सेना को पेट्रोलिंग की कोई आवश्यकता ही नहीं है ऐसा सरकार मान कर के बैठी थी ।

भारतीय सेना कुछ करना चाहती थी तो सेना के पास अपने संसाधन ही नहीं थे। उनकी इस नासमझी का बहुत बड़ा खामियाजा हमें आज तक भुगतना पड़ रहा है। उसके पश्चात जब जब कांग्रेस की सरकारें रहीं 5000 वर्ग किलोमीटर जमीन और चीन द्वारा कबजा ली गई ,यानी कि अब लगभग 43000 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन के कब्जे में है। चीन भारतीय सीमा पर इतना आक्रमक क्यों है इसे समझने की जरूरत है ऑस्ट्रेलिया ने चीन के लिए कहा कि उसकी जांच होनी चाहिए कि चीन की तरफ से जानबूझकर कोरोना को पूरे विश्व में फैलाया गया है और भारत ने इसका समर्थन कर दिया। साथ ही क्रोना का खौफ पूरे चीन में फैल गया साथ ही विश्व के कई प्रमुख देशों ने चीन के साथ अपने आर्थिक संबंध तोड़ने का ऐलान जब प्रारंभ किया ,तो चीन में जितनी विदेशी कंपनियां थी उनमें हड़कंप मच गया और वह भारत खासकर उत्तर प्रदेश की ओर रुख करने पर ज्यादा विचार करने लगी स्वाभाविक है इससे चीन को बौखलाहट रही होगी ।

रक्षा विशेषज्ञ और मेजर जनरल पीके सहगल से बातचीत हुई उन्होंने बताया आज भारतीय सेना विश्व की एक बेहद व्यवहारिक ,,अनुशासित ,संगठित सेना है। अब यूपीए की सरकार नहीं है जो अक्सर सीपीएम के दबाव में रहती थी और सीपीएम का चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ क्या रिश्ता है यह विश्व की बिरादरी और भारतीय लोग अच्छी तरह से जानते हैं।

1962 के युद्ध में भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी चीन के समर्थन में खड़ी हुई थी। बकौल पीके सहगल के अनुसार विश्व की किसी भी बेहतरीन सेना के पास युद्ध लड़ने के लिए दो तरफा क्षेत्रों में लगभग 40 दिन का बैकअप साजो समान हथियार गोला बारूद, बेहतरीन मारक क्षमता वाले एयरक्राफ्ट, बैलेस्टिक मिसाइलें, तोपे ,हथियार सप्लाई लाइन ,बेहतरीन हथियारों की तकनीक और शानदार सूचना तकनीक होनी चाहिए। लेकिन जब जब कांग्रेस की और यूपीए की सरकार रही तो सेना के पास 2 दिन का भी बैकअप युद्ध का साजो सामान आदि नहीं बचा था ।
इस तथ्य की पुष्टि सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में भी की थी इसका अर्थ है प्रमाणिक रूप से कहा जा सकता है कि यूपीए सरकार के समय में भारतीय सेना का मनोबल अत्यधिक और लगातार तोड़ा गया था।

यूपीए कांग्रेस की सरकार थी तब मात्र बोफोर्स तोप के अलावा कोई भी युद्ध हेतु साजो सामान का सौदा नहीं किया गया कितना हास्यास्पद था ।

2014 एनडीए की सरकार आने के बाद फ्रांस ,इजरायल ,और रूस के साथ कई तरह के सैन्य साजो समान हथियारों का सौदा किया गया अपाचे हेलीकॉप्टर ,रफाएल लड़ाकू विमान का सौदा , M777 अत्यधिक त्रिव मारक क्षमता वाले अमेरिकी विमान आदि के सौदा नई एनडीए की सरकार में ही हुए। सरकार और प्रधानमंत्री की भूमिका भारतीय सरकार और भारतीय सेना पर हमें गर्व होना चाहिए पूरी तरीके से सेना के साथ खड़ी हुई भारत की सरकार सेना का हौसला बढ़ाने के लिए पूरी तत्परता से कार्य कर रही है। स्वाधीनता के बाद लगभग हमें पांच युद्ध लड़ने पड़े हैं

बालासाहेब देवराज अपनी पुस्तक सामाजिक समरसता और हिंदुत्व में कहते हैं अगर युद्ध लड़ने का प्रसंग राष्ट्र के ऊपर आता है तो राष्ट्र को पूरी शक्ति के साथ युद्ध लड़ना चाहिए और विजय प्राप्त करनी चाहिए उसके कारण से अगर किसी दल या व्यक्ति के जीवन में कोई तनाव आता है तो उसे सहज सहर्ष सहन करना चाहिए ।यह राष्ट्र के प्रति के प्रत्येक दल और व्यक्ति का नागरिक कर्तव्य है।

अक्साई चीन से लेकर अरुणाचल तक भारतीय फौज में पूरी तरीके से चौकन्ना युद्ध की स्थिति तैयार हैं उन्होंने हाय अलर्ट किया हुआ है। भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने देश को और सर्वदलीय बैठक में संपूर्ण विपक्ष को विश्वास दिलाया है भारतीय सीमा पर चीनी घुस नहीं पाए भारतीय फौजों ने बहादुरी से इसका जवाब दिया।

प्रधानमंत्री मोदी ने कई बार चीन का नाम लेकर स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत का राष्ट्र हित सर्वोपरि है पीएम
मोदी ने कहा जिन क्षेत्रों में पहले हमारी नजर नहीं होती थी वहां पर हमारी नजर है जल, थल ,नभ में हम पूरी तरह से तैयार हैं। भारतीय सेना में आज जैसा शौर्य और चैतन्य है वह बहुत ही प्रशंसनीय है क्योंकि वर्तमान सरकार सेना के कार्य योजना और तकनीकी दृष्टि से भारतीय सेना को मजबूत दिशा की ओर सकारात्मक रूप से बढ़ाती हुई नजर आ रही है।

निष्ठा ,लक्ष्य ,निर्धारित कर्म अनुशासन ,एकाग्रता कृतज्ञता, कुशाग्रता कुछ खास प्रवृत्ति के ही राजनेताओं में एक साथ विद्यमान होते हैं। इसे किसी व्यक्ति को दिया गया ईश्वर का उपहार ही कहेंगे। भारत सरकार और प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक जागरूकता कुशल रणनीति का प्रयोग ठीक से समय काल का अवलोकन करते हुए चीन जैसे दुस्साहसही शैतान को भी अपनी हाराकरी योजना को बदलते हुए अपने कदम को पीछे लेना पड़ा।

कांग्रेस पार्टी और विपक्ष की भूमिका

रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने कहा भारतीय सेना का मनोबल ऊंचा उठाने की आवश्यकता है। विपक्ष को सरकार पर ऐसे मामलों में सवाल नहीं खड़ा करना चाहिए। आखिर जब प्रधानमंत्री कुछ कहते हैं तो उनके पास अपने सेना के श्रेष्ठ सूचना के केंद्र इंफॉर्मेशन के रिसोर्सेज होते हैं सेना है इंटेलिजेंस के आधार पर वह कोई बयान देते हैं

अगर विपक्षी दल खासकर कांग्रेस इस समय सरकार पर सवाल खड़ा करते हैं तो एक तरह से वह दुश्मनों को फायदा पहुंचाने का काम कर रहे हैं और सीपीएम और कांग्रेस के बयानों को चीन मीडिया उठाती है और उसका इस्तेमाल मनोवैज्ञानिक युद्ध के लिए करती है।

लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह के अनुसार 15 जून और 16 जून की रात्रि भारतीय आर्मी का साहस शौर्य के बलिदान पर विपक्ष सवाल ना खड़ा करें हमारी फौजों ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को विश्व में एक्सपोज कर दिया है ।

भारत की आज की बेहतरीन विदेश नीति सैन्य नीति के कारण चीन को अपने सैनिकों को लगभग 2 किलोमीटर पीछे अपने स्थानों पर ले जाना पड़ा अपने टेंट हटाने पड़े।

प्रधानमंत्री मोदी की कुशल रणनीति के कारण अमेरिका के पेसिफिक ओशन में नेवी को अलर्ट कर दिया। फ्रांस
इंग्लैंड ऑस्ट्रेलिया ताइवान को अपने खेमे की तरफ लाकर प्रधानमंत्री मोदी ने एक वैश्विक नेता की छवि को बनाया है। और विश्व बिरादरी में चीन के साथ सिर्फ कंगाल पाकिस्तान खड़ा रह गया।

भारत के प्रधानमंत्री की चीन के लिए आर्थिक नाकेबंदी ,विदेश नीति कूटनीति, यह भारत की विजय है। देश की जनता का देशव्यापी ,चीन के उत्पादों को खिलाफ रोष बढ़ता जा रहा है सरकार को उसे ठीक से समझने की और उस विषय पर और क्या बेहतर कर सकते हैं विचार करने की आवश्यकता है।

भारत की सबसे पुरानी दो पार्टियां कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मानसिक रोगी की तरह इनके नेता व्यवहार कर रहे हैं।

राहुल गांधी के ट्वीट बार-बार भारतीय सेना का मनोबल ही नहीं तोड़ते अपितु चीन को वह मनोवैज्ञानिक लाभ देने का प्रयास करते हैं।

आखिर 2008 के बीजिंग ओलंपिक में राहुल और सोनिया गांधी चाइना गए थे वहां की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ उनका आखिर क्या समझौता हुआ था ।

यह हमें भी जानने का हक है। रही बात भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की तो भारतीय लोकतंत्र में अंतिम सांसे लेती हुई वह चीन के कम्युनिस्ट जूतों को अपने सर पर पीटने के अलावा कुछ नहीं कर सकती है।
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Saturday, July 11, 2020

दक्षिण भारत में सांस्कृतिक सूर्योदय :

दक्षिण भारत में सांस्कृतिक सूर्योदय :

तमिलनाडु सरकार ने उन स्थानों के नाम बदल दिए हैं, जिनके प्राचीन नाम को अंग्रेजों ने परिवर्तित कर दिए थे। अपनी संस्कृति को सहेजने की दिशा में इसे एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यह सांस्कृतिक सूर्योदय भारतीयता के लिए कल्याणकारी है

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कोयम्बटूर’ को अब ‘कोयंपुत्थथूर’ के नाम से जाना जाएगा। यहां के रेलवे स्टेशन के बाहर सांस्कृतिक जागरण के लिए ऐसे चित्र पहले से ही बने हुए हैं। 

गत दिनों तमिलनाडु सरकार ने एक महनीय कार्य करते हुए प्रदेश के 1,018 स्थानों का नाम परिवर्तित कर दिया है। उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों के दीर्घकालिक शासन के दौरान राज्य के बहुत सारे स्थलों के नाम उनके मूल तमिल रूप से बहुत अधिक परिवर्तित हो गए थे। अत: ये बदले हुए नाम हमें अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन व्यवस्था की याद दिलाते थे। राज्य सरकार ने इन सभी के मूलनामों को पुनस्स्थापित करके राज्य की भाषिक और सांस्कृतिक भावना को मजबूत करने का कार्य किया है।
तमिलनाडु में राज्य की राजधानी के पास एक स्थान है- ‘तिरुवालिकेन्नी’ जिसका तात्पर्य है ‘कमल से युक्त सरोवर।’ अंग्रेजी शासन के दौरान इस स्थान का नाम ‘ट्रिप्लीकेन’ रख दिया गया था। यह नाम इस स्थान से किसी भी प्रकार का कोई सार्थक संबंध नहीं स्थापित करता था। सरकार ने इस स्थान का नाम पुन: ‘तिरुवालिकेन्नी’ रख दिया है।

इस प्रकार वहां की स्थानीय जनता उच्चारण के स्तर पर इस स्थान से अधिक भावनात्मक रूप में जुड़ सकी है। इसी प्रकार से उच्चारण के स्तर पर भिन्नता वाले एक और स्थल ‘कांदलूर’ का नाम बदलकर अब ‘कांतलूर’ कर दिया गया है, क्योंकि तमिल में अंग्रेजी के ‘दा’ का उच्चारण एक भिन्न प्रकार से ‘ता’ रूप में होता है। इसी प्रकार से ‘कोयम्बटूर’ को अब ‘कोयंपुत्थथूर’, ‘मयलापोर’ को अब ‘मयलापपरो’ तथा ‘वेल्लोर’ को अब ‘वेल्लूर’ कहा जाएगा। तमिल भाषा और साहित्य के प्राचीन ग्रंथों और अभिलेखों में इन स्थानों के नाम इसी प्रकार वर्णित किए गए हैं। यह तमिलभाषी लोगों के स्थान विशेष से रागात्मक लगाव तथा भूमि के प्रति उनके भाव संबंधों को अधिक मजबूत बनाएगा।

नाम परिवर्तन के सांस्कृतिक संदर्भ
किसी भी व्यक्ति, स्थान, मत व क्षेत्र का नाम उसकी समग्र सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है। अतएव नाम विशिष्टार्थव्यंजक होने के साथ-साथ व्यक्ति या स्थान को परिवेशगत विराटता प्रदान करता है। दर्शनशास्त्र ‘नाम’ को एक अमूर्त तत्व कहता है, तो भाषाविज्ञान की शब्दावली में नाम एक यादृच्छिक संज्ञा है। अर्थात् नाम को व्यक्ति या स्थान पर आरोपित किया जाता है या मान लिया जाता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति या स्थान में नाम का कोई विशेष चिन्ह होना आवश्यक नहीं। अत: नाम एकसमष्टिबोधक भाव है, जो किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थिति या स्थान को विराट बनाता है। नाम का महत्व समाजसापेक्ष होता है। अत: नाम को समाज के द्वारा माना जाना अनिवार्य है। यदि व्यक्ति अपने नाम के द्वारा अपना वैशिष्ट्य निरूपित करने का प्रयास करे, किन्तु समाज द्वारा व्यक्ति को मान्यता प्राप्त न हो, समाज उसको उसके नाम के द्वारा विशिष्टता प्रदान न करे तो वह नाम अनुमन्य नहीं होगा। अत: नाम व्यक्ति अथवा वस्तुवैशिष्ट्य बोधक होने के साथ-साथ समाजप्रेक्षा भी रखता है।

वे आक्रांता केवल कलाभंजक, मूर्तिभंजक, शिल्पभंजक ही नहीं थे, अपितु वे सौन्दर्यभंजक तथा सद्धर्मभंजक भी थे। यदि हमें अपने सद्धर्म और सौंदर्य की पुनर्प्राप्ति सुनिश्चित करनी है तो अपने ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक प्रबोध की पुनस्स्थापना के लिए भी पुन: प्रयत्न करने होंगे।

-पं.दीनदयाल उपाध्याय (काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर की भग्न चारदीवारी के संदर्भ में)


भारतीय संस्कृति में नाम का अपना एक अलग ही महत्व है। प्रकृति, तीर्थ, देव तथा लोक का विशिष्टार्थ उनका नाम ही है। आदियुगीन समय से लेकर आज तक विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों स्थानों, कार्यों एवं समाजों के नामों की एक अनन्त सूची हमें प्राप्त होती है। दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहां देवाराधन के लिए ‘सहस्रनामस्तोत्र’ की रचना की गई। नाम के द्वारा विशिष्टता का बोध होता है, अत: सहस्रनामोच्चारण के द्वारा देवता की स्तुति तो होगी ही, इसके साथ-साथ उपासना की एक नई पद्धति ‘नामसाधना’ का भी विकास होगा।

प्राचीन काल में व्यक्ति के जीवन में नाम का बहुत अधिक महत्व होता था। इसी कारण से हमारे यहां सोलह प्रधान संस्कारों में एक नामकरण नामक संस्कार का भी प्रावधान है। व्यक्ति की जन्मलग्नस्थ राशि के अनुसार ही उसका नाम रखा जाता था। इन नामों में वंश, जाति, कुल अथवा गोत्र की विशिष्टता समाविष्ट होती थी। उदाहरण के लिए कश्यप के पुत्र को काश्यप, हिमालय की पुत्री को गिरिजा तथा दिति के पुत्र को दैत्य कहा जाता था। रावण के तीन अन्य नामों में पौलस्त्य-उसके कुल अथवा गोत्र का सूचक है, दशानन- उसकी अपनी शारीरिक विशिष्टता का सूचक तथा लंकेश-उसके अधिकारों और शासन वैशिष्ट्य का सूचक है। कभी-कभी व्यक्ति से जुड़ी वस्तुओं की विशिष्टता भी उस व्यक्ति के नाम के लिए प्रयुक्त होती थी। जैसे राजा दशरथ का रथ दसों दिशाओं में समान गति से प्रविष्ट होने में सक्षम था, अत: यह राजा के नाम का वैशिष्ट्य बन गया। गोस्वामी तुलसीदास ने नाम के प्रभाव को वर्णित करते हुए लिखा है-

नाम प्रभाउ जानि सिव नीके।
कालकूट फल दीन अमी के।।
राजा दशरथ के चारों राजकुमारों का नामकरण सभी के गुण-वैशिष्टय के अनुरूप ही होता है।
तुलसीदास लिखते हैं-
बिस्व भरन पोसन कर जोई।
ताकर नाम भरत अस होई।।

तात्पर्य यह है कि हमारे यहां नाम की सामाजिक एवं सांस्कृतिक सार्थकता रही है। यहां नाम उस प्रकार नहीं रखे जाते हैं जैसे कि यूरोप और पश्चिमी देशों की शब्दावलियों में रखे गए हैं। हमारे यहां नाम की सोद्देश्यता उसे सुन्दर, सुष्ठु और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।

शायद यही कारण था कि जब हमारे देश में विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किए तो उन्होंने यहां के विभिन्न स्थानों के नाम परिवर्तित किए। नाम परिवर्तन की यह पूरी प्रक्रिया एक योनाबद्ध तरीके से हुई। सूफियों, औलियाओं और अनेक मुल्ले-मौलवियों के कहने पर विभिन्न बादशाहों ने इस नाम परिवर्तन की प्रक्रिया को बखूबी अंजाम दिया। हिन्दू समाज को गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर इन सारे परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए बरगलाया गया। नाम परिवर्तन की इस सुनियोजित रणनीति का शिकार हमारे यहां के सांस्कृतिक और धार्मिक स्थल तो हुए ही, साथ ही साथ समाज में निहित उन अनेकानेक स्थलों के स्मृतिबोध को भी नष्ट करने का प्रयास किया गया।

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                  ‘ट्रिप्लीकेन’ को अब ‘तिरुवालिकेन्नी’ कहिए।

पौराणिक काल में हमारे यहां के प्रसिद्ध नगर ‘इन्द्रप्रस्थ’ को ‘दिल्ली’ बना दिया गया। ‘इन्द्रप्रस्थ’ नाम के पीछे पूरी एक गौरवमयी ऐतिहासिक परंपरा रही है। खाण्डवप्रस्थ नामक वन को पांडवों ने साफ करके मय दानव के सहयोग से ‘इन्द्रप्रस्थ’ नामक भव्य नगर का निर्माण किया था। अत: ‘इन्द्रप्रस्थ’ नाम के पीछे देव, मनुष्य और दानवों की एकीकृत सर्जनशीलता और सांस्कृतिक ऐक्यभाव का निहितार्थ समाहित है। किन्तु इस नाम को विकृत करके दिल्ली बना देने के पीछे एक ही उद्देश्य है- हमारे गौरवशाली सांस्कृतिक वैभव की परंपरा को तमावर्त में तिरोहित कर देना। आज के समय में राजस्थान में स्थित ‘अजमेर’ को कभी प्राचीनकाल में ‘अजयमेरु’ कहा जाता था। सूफी-औलियाओं का ठिकाना बनने के कारण इसे ‘अजमेर’ कहा जाने लगा। ‘अजमेर’ फारसी के ‘आजमी’ से ध्वन्यात्मक तुलना करता है, अत: ‘अजमेर’ मुसलमानों की परंपरा के अधिक करीब है। राजस्थान के अन्य नगरों के साथ यह नहीं हुआ है, क्योंकि वहां के मुसलमान आक्रांताओं ने अपना स्थायी ठिकाना नहीं बनाया था।
‘कांदलूर’ का नाम बदलकर अब ‘कांतलूर’ कर दिया गया है, क्योंकि तमिल में अंग्रेजी के ‘दा’ का उच्चारण एक भिन्न प्रकार से ‘ता’ रूप में होता है। इसी प्रकार से ‘कोयम्बटूर’ को अब ‘कोयंपुत्थथूर’, ‘मयलापोर’ को अब ‘मयलापपरो’ तथा ‘वेल्लोर’ को अब ‘वेल्लूर’ कहा जाएगा। तमिल भाषा और साहित्य के प्राचीन ग्रंथों और अभिलेखों में इन स्थानों के नाम इसी प्रकार वर्णित किए गए हैं।

हमारे देश में ज्ञान केन्द्रों की एक समृद्ध परंपरा रही है। नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय हमारी आदर्श शिक्षण परंपरा के मूर्तिमान स्तंभ थे। तेरहवीं शताब्दी के पहले दशक में बख्तियार खिलजी ने नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया तथा हजारों बौद्ध भिक्षुओं की हत्या कर दी। नालंदा विश्वविद्यालय के अत्यंत विशाल ‘धर्मयज्ञ’ नामक पुस्तकालय को जला दिया गया। लेकिन आज कितने शर्म की बात है कि हमने इन आक्रान्ताओं के नाम से विभिन्न नगरों का निर्माण किया है। बिहार में एक स्थान का नाम ‘बख्तियारपुर’ रखा गया है।

मुगलिया सल्तनत कायम होने से पूर्व ही हमारे देश में कई प्राचीन स्थलों के नाम बदले जा चुके थे। देश के वामपंथी इतिहासकारों ने बड़ी चालाकी से इस पूरी प्रक्रिया को सांस्कृतिक मेल-मिलाप बताया। नाम परिवर्तन की इस प्रक्रिया में हम एक बात प्रधान रूप से पाते हैं कि अधिक कट्टर और जिहादी मानसिकता वाले आक्रांताओं और शासकों ने इन कार्यों में अधिक रुचि ली है। मुहम्मद बिन तुगलक ने राजधानी परिवर्तन करते समय ‘दौलताबाद’ नामक नगर बसाया। सिकन्दर लोदी ने ‘आगरा’ की स्थापना की। यह वही सिकन्दर लोदी था जिसने नगरकोट के ज्वालामुखी मंदिर को तोड़कर उसकी मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे और उन्हें कसाइयों को मांस तौलने के लिए दे दिया था।

दिल्ली के मुगल शासक अकबर ने अपने ‘दीन-ए-इलाही’ को लोकप्रिय बनाने की सनक में भारत के अत्यंत प्राचीन एवं पवित्र तीर्थस्थल ‘प्रयागराज’ का नाम बदलकर ‘इलाहाबाद’ कर दिया था। इसी प्रकार उसके वंशज शाहजहां ने अपने आपको अमर बनाने की इच्छा से राजधानी ‘दिल्ली’ में ‘शाहजहानाबाद’ नामक नगर बसा दिया था।

महाराष्टÑ की धरती छत्रपति संभाजी महाराज के अप्रतिम शौर्य, त्याग और बलिदान की साक्षी रही है। वहां पर उन्हीं के निर्दयी हन्ता औरंगजेब के नाम पर ‘औरंगाबाद’ नामक नगर बसाया गया। ये सारे कृत्य हमारे गौरवशाली स्मृतिबोध को नष्ट करने और हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए किए गए।


जब हमारे देश में विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किए तो उन्होंने यहां के विभिन्न स्थानों के नाम परिवर्तित किए। नाम परिवर्तन की यह पूरी प्रक्रिया एक योनाबद्ध तरीके से हुई। सूफियों, औलियाओं और अनेक मुल्ले-मौलवियों के कहने पर विभिन्न बादशाहों ने इस नाम परिवर्तन की प्रक्रिया को बखूबी अंजाम दिया। हिन्दू समाज को गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर इन सारे परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए बरगलाया गया।

देश के मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इसे खूब महिमामंडित किया लेकिन हमारी स्मृतियों में इन सभी स्थलों की पूर्व परंपरा सदैव विद्यमान रही। ऐसा ही षड्यंत्र भगवान राम की जन्मस्थली ‘अयोध्या’ के साथ किया गया जिसका नाम मुस्लिम पद्धति के अनुसार ‘फैजाबाद’ रख दिया गया। यथासंभव ऐसे प्रत्येक स्थल जो विशेष रूप से हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े रहे हैं, इन आक्रांताओं के विशेष निशाने पर रहे। उन्होंने वहां की कला, शिल्प, वास्तु-सौन्दर्य को तो नष्ट किया ही, सामूहिक रूप से कन्वर्जन भी कराया और इनके प्राचीन नामों को भी बदल दिया। आज जब हम अपने अतीत की ओर देखते हैं तो हमें अपनी सप्तपुरियों, अष्टादश महाजनपद आदि के कोई भी चिन्ह नजर नहीं आते। बहुत सारे लोग आज इनके नाम भी भुला चुके हैं।

किसी भी राष्टऔर धर्म, संस्कृति और समाज की यथावत रक्षा तभी संभव है, जब हम उसके प्राचीन गौरव और स्मृतिबोध को पुन: स्थापित करें। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने इसी बोध की पुनस्स्थापना की बात अपनी पुस्तक ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’  में की है। काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर की भग्न चारदीवारी को देखकर वे कहते थे, ‘‘वे आक्रांता केवल कलाभंजक, मूर्तिभंजक, शिल्पभंजक ही नहीं थे, अपितु वे सौन्दर्यभंजक तथा सद्धर्मभंजक भी थे। यदि हमें अपने सद्धर्म और सौंदर्य की पुनर्प्राप्ति सुनिश्चित करनी है तो अपने ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक प्रबोध की पुनस्स्थापना के लिए भी पुन: प्रयत्न करने होंगे।’’ स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत देश की सत्ताओं ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि देश में लोकतंत्र की स्थापना के साथ ही अवसरवादी राजनीति और तुष्टीकरण की परंपरा की शुरुआत हो गई।

महाराष्ट की धरती छत्रपति संभाजी महाराज के अप्रतिम शौर्य, त्याग और बलिदान की साक्षी रही है। वहां पर उन्हीं के निर्दयी हन्ता औरंगजेब के नाम पर ‘औरंगाबाद’ नामक नगर बसाया गया। ये सारे कृत्य हमारे गौरवशाली स्मृतिबोध को नष्ट करने और हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए किए गए।

देश के कर्णधारों ने सेकुलरवाद के नाम पर मजहब विशेष को खूब तुष्ट करने के प्रयत्न किए। जो काम बहुत पहले हो जाने चाहिए थे, उनकी शुरुआत आज के समय में हो रही है। इस प्रक्रिया की शुरुआत औरंगजेब नामक अन्यायी और मजहबी  शासक के नाम पर बनी रोड का नाम परिवर्तित करके महान वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर रखने के साथ हुई। इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए हरियाणा सरकार ने ‘गुड़गांव’ का तत्समीकरण किया और इसका नाम ‘गुरुग्राम’ रखा। वस्तुत: इन्हीं नामों और प्रतीकों से हम ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जीवनदर्शन और अपनी गौरवशाली परंपरा का प्रबोध प्राप्त कर सकते हैं।

परिवर्तन की इस प्रक्रिया में उत्तर प्रदेश स्थित हमारे दो अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व धार्मिक महत्व के स्थल ‘प्रयागराज’ और ‘अयोध्या’ के नामों को सरकारी मान्यता प्रदान की गई। कुंभ मेला के अवसर पर देश के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालु प्रयागराज आते हैं। अब उन्हें ग्लानिपूर्वक नहीं कहना पड़ेगा कि वे अपने तीर्थस्थल ‘इलाहाबाद’ जा रहे हैं। इसी प्रकार ‘फैजाबाद’ को ‘अयोध्या’ के रूप में स्थापित करना प्रकारान्तर से हमारे द्वारा अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ों की ओर लौटने की ही प्रक्रिया है।

नाम परिवर्तन के इन सारे प्ररिप्रेक्ष्यों को जानते और समझते हुए हमें इसे राजनीतिक चश्मे से मुक्त होकर देखने की आवश्यकता है। अत: आज हमको अपने सांस्कृतिक परिपार्श्व का संधान करने की आवश्यकता है। हम अपनी भूमि, अपने क्षेत्र को जड़ तत्व न मानते हुए उसे अपनी विराट संस्कृति का चेतन भाग मानें, उससे जुड़ें- भावना और बुद्धि के दोनों स्तरों पर।

Saturday, July 4, 2020

संघीय ढांचे के समक्ष उभरती चुनौतियां:

संघीय ढांचे के समक्ष उभरती चुनौतियां:

संघीय ढांचे को संविधान की अपेक्षा के अनुसार बनाये रखना राष्ट्रहित में है। यह संतोष की बात है कि गत कुछ वर्षोें से संघीय ढांचा पुन: दृढ़ हो रहा है, परन्तु विदेशी मानसिकता और संबद्धता के कारण इसको कमजोर करने वाली राजनीतिक शक्तियां इस ढांचे को हानि पहुंचा रही हैं

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स्वतंत्रता एवं संविधान की प्राप्ति का महत्व कुछ लोग उत्तरोत्तर कम आंकते जा रहे हैं। इसका प्रमुख कारण है कि उन्होंने ठीक से भारत का समग्र इतिहास नहीं पढ़ा है। जिन्होंने स्वतंत्रता का संग्राम लड़ा और अपना जीवन मां भारती को अर्पित कर दिया, हमने उनकी शहादत का भी आदर नहीं किया है। इस राष्ट्र में प्राथमिक कक्षाओं से लेकर उच्च शिक्षा तक के पाठ्यक्रम में क्रमोत्तर विकास के सिद्धांत से भारतीय संस्कृति, औपनिवेशिक काल तथा स्वतंत्रता के इतिहास को अनिवार्य ज्ञानपुंज के रूप में पाठ्यक्रम में तो रखना ही चाहिये था, जो मजबूत इच्छाशक्ति के साथ अभी तक नहीं हो पाया है। एक-दो राष्ट्रीय पर्वों पर स्वरयंत्रों के माध्यम से हम ‘ऐ मेरे वतन के लोगों...’ जैसे मर्मस्पर्शी गानों को सुन तो लेते हैं, लेकिन प्रण के साथ प्राणशक्ति में लेकर हृदयंगम नहीं कर पाते हैं। भारत की वर्तमान लोकतंत्रात्मक संघीय राज्य व्यवस्था लाखों-लाख लोगों के बलिदान के प्रतिफल के रूप में मिली है। आज स्वतंत्रता के 73 वर्ष बाद तथा संविधान को विधिवत आत्मार्पित करने के 70 वर्ष बाद यह मूल्यांकन करना समीचीन प्रतीत होता है कि क्या संघीय ढांचा अपेक्षित दशा में है? क्या यह उचित दिशा में बढ़ रहा है? यदि है, तो संतोष की बात है, परन्तु क्या वर्तमान समय में संविधान में इंगित एवं अपेक्षित संघीय ढांचे के समक्ष कुछ चुनौतियां भी उभरी हैं? हम इसी प्रश्न का उत्तर ढूंढने का प्रयास करेंगे।

संविधान का मर्म समझें
कुछ लोग बिना गंभीर विमर्श के कह देते हैं कि भारत का संविधान तो मात्र कुछ राष्ट्रों के संविधानों का मिश्रण है। संविधान को मात्र एक पुस्तक के रूप में सरसरी निगाह से देखने पर ऐसा कहा जाता है। परन्तु भारत के संविधान को बनाने में एक विशद् बौद्धिक प्रक्रिया संविधान-सभा द्वारा अपनायी गयी थी। स्वतंत्रता संग्राम में घोर यातनाओं को सहने वाले त्यागी बौद्धिकों की राष्ट्रीय स्तर की संविधान सभा ने बड़े ही परिश्रम, तन्मयता, दूरदर्शिता, स्वातंत्र्य आंदोलन की मौलिक अपेक्षाओं की अनुभूति को ध्यान में रखकर इस संविधान को वर्तमान स्वरूप प्रदान किया। आज विश्व परिदृश्य में भारत का संविधान सारभर्मित एवं सुपारभाषित है। इसी को हमने 26 जनवरी 1950 को अपने संघीय गणराज्य का आधार माना तथा संवैधानिक शपथ ली।

आज आधुनिक नागर समाज के लिए सर्वमान्य संविधान अपरिहार्य है। भारत का संविधान भारतीय जनमानस के सम्यक् विकास के लिए समर्थ शास्त्र एवं शस्त्र है। रही बात इसके उपयुक्त प्रयोग की तो यह तो हम सभी नागरिकों का नैतिक दायित्व है कि हम अपना प्रत्येक आचरण संविधान की आत्मा के अनुरूप ही करें। आज जब हम नागरिक हो गये हैं तो अपने हमने मौलिक कर्तव्य वाले अनुच्छेदों को तो पढ़ लिया है, परन्तु मौलिक कर्तव्य का बोध भी नहीं रखना चाहते। भारत के संविधान का मस्तिष्क है इसकी मूलपीठिका (प्रिएम्बल)। इसी मूल मंतव्य को प्राप्त करने के लिए ‘राज्य’ बनाया गया। राज्य व्यवस्थाओं के अध्येता यह जानते हैं कि दुनिया में लोकतंत्रात्मक राज्य व्यवस्था धीरे-धीरे आयी है तथा इसको प्राप्त करने में अनगिनत प्राणों की आहुति देनी पड़ी है। अत: यह सर्वमान्य है कि लोकतंत्र दुनिया की सर्वाधिक सुसंगत और श्रेष्ठतम राज्य व्यवस्था है। भारत विविधताओं वाला देश प्रारम्भ से ही रहा है। यह विविधता उत्तरोत्तर बढ़ती ही गयी। इसी विविधता में एकता के दार्शनिक तत्व की सामाजिक-राजनीतिक अपरिहार्यता को दृष्टिगत रखते हुए संविधान निर्माताओं ने संविधान की मूलात्मा की घोषणा में यह स्पष्ट उद्घोषणा की है-‘‘हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा; और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत्, दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।’’

उपरोक्त उद्देशिका के सूक्ष्म अवलोकन से यह स्पष्ट है कि हम भारतवासियों ने अपने संविधान में समानता (समता), स्वतंत्रता, न्याय एवं भ्रातृत्व (बंधुता) को आदर्श जीवन मूल्य के रूप में स्वीकार करने की शपथ ली है। इन्हीं मूल्यों की प्राप्ति हेतु राज्य व्यवस्था के रूप में लोकतंत्रात्मक गणराज्य की अभिकल्पना रची है तथा संघीय संरचना के माध्यम से भारतीय जनमानस को विकास के पथ पर अग्रसर करने की आकांक्षा की है। संविधान की मौलिक मान्यता के रूप में हमारी पहचान के विभिन्न आयाम हैं और रहेंगे भी, परन्तु सर्वोच्च पहचान एक नागरिक के रूप में ही होनी चाहिए। इसके अनुपालन के अभिभावक के रूप में भारतीय गणराज्य के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति, संसद एवं उच्चतम न्यायालय सर्वोच्च हैं। राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी विपथन को रोकने तथा शुचितापूर्ण संवैधानिक मर्यादाओं का अनुसरण इन्हीं अभिभावक संस्थाओं द्वारा सुनिश्चित होता है। लेकिन क्या वर्तमान संघीय लोकतंत्रात्मक व्यवस्था ठीक प्रकार से संचालित हो रही है?

वर्तमान भारत कई प्रकार की आंतरिक एवं बाह्य विरोधी शक्तियों से जूझ रहा है। शहीदों के बलिदान के उपरान्त मिली स्वतंत्रता की जो समझ स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के शुरुआती वर्षों में थी, उसमें शिथिलता आयी है। अति स्वच्छंदता की प्रवृत्ति बढ़ी है। विघटनकारी क्षेत्रीय दलों ने अविवेकपूर्ण एवं स्वार्थपरक समझौते किये हैं। आज एकतरफ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) है, तो दूसरी तरफ संयुक्त प्रगतिशील संगठन (संप्रग)। भारत की जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया ही है। संघीय ढांचे को संविधान की अपेक्षा के अनुसार बनाये रखना राष्ट्रहित में है। यह संतोष की बात है कि गत कुछ वर्षों से संघीय ढांचा पुन: दृढ़ हो रहा है, परन्तु विदेशी मानसिकता और संबद्धता के कारण इसको कमजोर करने वाली राजनीतिक शक्तियां इस ढांचे को हानि पहुंचा रही हैं। ये शक्तियां निजी स्वार्थ, परिवारवाद एवं वैदेशिक कूटनीति के उपकरण बन जाने के कारण ऐसा कर रही हैं।

संघीय ढांचे के विपरीत आचरण
संघीय ढांचे एवं संविधान के विपरीत आचरण करने वालों ने एक आम नागरिक होने की नैतिकता को भी ताक पर रख दिया है। ‘वन्दे-मातरम्’ नहीं गायेंगे, ‘राष्ट्रगान’ के समय सावधान की मुद्र्रा में खड़े नहीं होंगे, संविधान की प्रति जलायेंगे, धारा 370 एवं 35ए के निरस्तीकरण का विरोध करेंगे, राष्ट्रीय जनसंख्या पंजिका नहीं बनने देंगे आदि जैसे आचरण किसी भी व्यक्ति, समूह, सम्प्रदाय अथवा राजनीतिक दल द्वारा किये जा रहे हैं तो यह उसी संविधान की घोर अवमानना एवं उपेक्षा है जिसके अंतर्गत उन्हें (हमें) नागरिकता, मूल अधिकार एवं मूल कर्तव्य प्राप्त हुए हैं। 

स्वतंत्रता से पूर्व ही विदेशी शासक अपने कूटनीतिक चातुर्य के अंतर्गत ‘फूट डालो राज करो’ की नीति को और विद्रुुप बनाते हुए विभेदकारी कारकों के प्रति उकसाने लगे थे, जिसका अवांछनीय रूप अब अधिक दिख रहा है। स्वतंत्र भारत में प्रांतों के बीच सीमा विवाद, जल संसाधन जैसे प्राकृतिक संसाधनों के बंटवारे का विवाद, भाषा विवाद आदि को अनुचित प्रोत्साहन दिया जाने लगा। केन्द्र की सरकार हो अथवा प्रान्त की सरकारें, सबका गठन तो संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत ही हुआ है, परन्तु दुर्भाग्य है कि जिस संविधान की मर्यादाओं के आलोक में एक ग्राम प्रधान से लेकर राष्ट्र प्रधान तक शपथ लेता है, कुछ दल अथवा ताकतें उसी संविधान की धज्जी उड़ाते हुए संविधान के विपरीत आचरण करने लगी हैं। प्रांत की सरकारों का केन्द्र से टकराव की स्थिति में आना उचित कैसे कहा जा सकता है? यह बड़ी साजिश प्रतीत होती है। अति तुष्टीकरण एवं वैदेशिक साठ-गांठ का कहीं न कहीं इसमें योगदान है।

भारतीय चुनाव आयोग के समक्ष राजनीतिक दलों द्वारा प्रस्तुत किये गये अनुबन्ध-पत्रों को एक उच्चस्तरीय समिति द्वारा परखना चाहिए कि दल द्वारा घोषित नीति, वक्तव्य एवं कार्यक्रम भारतीय संविधान के अनुरूप हैं अथवा नहीं। इसी आधार पर किसी दल को मान्यता मिलनी चाहिए। संघीय लोकतंत्रात्मक सम्प्रभु राष्ट्र के लिए यह मूलमंत्र है। राष्ट्र के प्रतीकों, संवैधानिक पर्वों एवं संकल्पों को एक स्वर में आदर के साथ सहर्ष स्वीकार करना चाहिए, तभी हम प्रगति के पथ पर आगे बढ़ेंगे। वास्तव में संघीय ढांचे की मूल अवधारणा चार स्तम्भों वाली राज्य व्यवस्था पर आधरित है जो गांव, जनपद, प्रांत और राष्ट्र में स्तरीकृत है, न कि विघटित अथवा विभाजित। इस संघीय ढांचे में सबकी समान सहभागिता होनी चाहिए। इसकी चार प्रमुख विशेषताएं सदैव परखी जानी चाहिए-यथा एकता, आंतरिक सुदृढ़ता, समन्वय एवं सामाजिक समरसता। व्यापक संवैधानिक अनुशासनहीनता की स्थिति में केन्द्र्र को कठोर कदम भी अवश्य उठाना चाहिए। 

आवश्यक है कि हम जीवन्तता (जन), गणराज्यबोध (गण) और मनस्विता (मन) की त्रयी को ठीक से आत्मसात करें। तभी संघीय लोकतंत्रात्मक संस्कृति को प्राणवान बना सकेंगे।

आपातकाल एक काला अध्याय: स्वयंसेवकों ने जेल काटी पर झुके नहीं:

आपातकाल एक काला अध्याय: स्वयंसेवकों ने जेल काटी पर झुके नहीं:

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 में उस समय एक काला अध्याय जुड़ गया, जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने सभी संवैधानिक व्यवस्थाओं, राजनीतिक शिष्टाचार तथा सामाजिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर मात्र अपना राजनीतिक अस्तित्व और सत्ता बचाने के लिए देश में आपातकाल थोप दिया



आपातकाल के दौरान गिरफ्तार बालासाहेब

उस समय इंदिरा गांधी की अधिनायकवादी नीतियों, भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा और सामाजिक अव्यवस्था के विरुद्ध सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में ‘समग्र क्रांति आंदोलन’ चल रहा था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ तथा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्ण समर्थन मिल जाने से यह आंदोलन एक शक्तिशाली, संगठित देशव्यापी आंदोलन बन गया। 

उन्हीं दिनों श्रीमति इंदिरागांधी के खिलाफ चुनाव में ‘भ्रष्ट तौर तरीके’ अपनाने के आरोप में चल रहे एक केस में उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट की इलाहाबाद खंडपीठ ने इंदिरा जी को सजा देकर छह वर्षों के लिए राजनीति से बेदखल कर दिया था। कोर्ट के फैसले से बौखलाई इंदिरा गांधी ने बिना केन्द्रीय मंत्रिमंडल की सहमति एवं कांग्रेस कार्यकारिणी की राय लिए सीधे राष्ट्रपति महोदय से मिलकर सारे देश में इमरजेंसी लागू करवा दी। इस एकतरफा तथा निरंकुश आपातकाल के सहारे देश के सभी गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों, कई सामाजिक संस्थाओं, राष्ट्रवादी शैक्षणिक संस्थाओं, सामाचार पत्रों, वरिष्ठ पत्रकारों/नेताओं को काले कानून के शिकंजे में जकड़ दिया गया। डीआईआर (डिफेंस ऑफ इंडिया रूल) तथा मीसा (मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट) जैसे सख्त कानूनों के अंतर्गत लोकनायक जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, चौधरी चरण सिंह, प्रकाश सिंह बादल, सामाजवादी नेता सुरेन्द्र मोहन और संघ के हजारों अधिकारियों और कार्यकर्ताओं को 25 जून 1975 की रात्रि को गिरफ्तार करके जेलों में बंद कर दिया गया। न्यायपालिका को प्रतिबंधित तथा संसद को पंगू बनाकर प्रचार के सभी माध्यमों पर सेंसरशिप की क्रूर चक्की चला दी गई। आम नागरिकों के सभी मौलिक अधिकारों को एक ही झटके में छीन लिया गया।

इस समय देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही एकमात्र ऐसी संगठित शक्ति थी, जो इंदिरा गांधी की तानाशाही के साथ टक्कर लेकर उसे धूल चटा सकती थी। इस संभावित प्रतिकार के मद्देनजर इंदिरा गांधी ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। मात्र दिखावे के लिए और भी छोटी मोटी 21 संस्थाओं को प्रतिबंध की लपेट में ले दिया गया। किसी की ओर से विरोध का एक भी स्वर न उठने से उत्साहित हुई इंदिरा गांधी ने सभी प्रांतों के पुलिस अधिकारियों को संघ के कार्यकर्ताओं की धरपकड़ तेज करने के आदेश दे दिये गए। संघ के भूमिगत नेतृत्व ने उस चुनौती को स्वीकार करके समस्त भारतीयों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने का बीड़ा उठाया और एक राष्ट्रव्यापी अहिंसक आंदोलन के प्रयास में जुट गए। थोड़े ही दिनों में देशभर की सभी शाखाओं के तार भूमिगत केन्द्रीय नेतृत्व के साथ जुड़ गए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भूमिगत नेतृत्व (संघचालक, कार्यवाह, प्रचारक) एवं संघ के विभिन्न अनुषांगिक संगठनों जनसंघ, विद्यार्थी परिषद, विश्व हिन्दू परिषद एवं मजदूर संघ इत्यादि लगभग 30 संगठनों ने भी इस आंदोलन को सफल बनाने हेतु अपनी ताकत झोंक दी। संघ के भूमिगत नेतृत्व ने गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों, निष्पक्ष बुद्धिजीवियों एवं विभिन्न विचार के लोगों को भी एक मंच पर एकत्र कर दिया। सबसे बड़ी शक्ति होने पर भी संघ ने अपने संगठन की सर्वश्रेष्ठ परम्परा को नहीं छोड़ा। संघ ने नाम और प्रसिद्धी से दूर रहते हुए राष्ट्रहित में काम करने की अपने कार्यपद्धति को बनाए रखते हुए यह आंदोलन लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा घोषित ‘लोक संघर्ष समिति’ तथा ‘युवा छात्र संघर्ष समिति’ के नाम से ही चलाया। संगठनात्मक बैठकें, जन जागरण हेतु साहित्य का प्रकाशन और वितरण, सम्पर्क की योजना, सत्याग्रहियों की तैयारी, सत्याग्रह का स्थान, प्रत्यक्ष सत्याग्रह, जेल में गए कार्यकर्ताओं के परिवारों की चिंता/सहयोग, प्रशासन और पुलिस की रणनीति की टोह लेने के लिए स्वयंसेवकों का गुप्तचर विभाग आदि अनेक कामों में संघ के भूमिगत नेतृत्व ने अपने संगठन कौशल का परिचय दिया।


इस आंदोलन में भाग लेकर जेल जाने वाले सत्याग्रही स्वयंसेवकों की संख्या डेढ़ लाख से ज्यादा थी। सभी आयुवर्ग के स्वयंसेवकों ने गिरफ्तारी से पूर्व और बाद में पुलिस के लॉकअप में यातनाएं सहीं। उल्लेखनीय है कि पूरे भारत में संघ के प्रचारकों की उस समय संख्या 1356 थी, अनुषांगिक संगठनों के प्रचारक इसमें शामिल नहीं हैं, इनमें से मात्र 189 को ही मात्र पुलिस पकड़ सकी, शेष भूमिगत रहकर आंदोलन का संचालन करते रहे। विदेशों में भी स्वयंसेवकों ने प्रत्यक्ष वहां जाकर इमरजेंसी को वापस लेने का दबाव बनाने का सफल प्रयास किया। विदेशों में इन कार्यकर्ताओं ने ‘भारतीय स्वयंसेवक संघ’ तथा ‘फ्रेंड्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ के नाम से विचार गोष्ठियों तथा साहित्य वितरण जैसे अनेक कामों को अंजाम दिया।

जब देश और विदेश दोनों जगह संघ की अनवरत तपस्या से आपातकालीन सरकारी जुल्मों की पोल खुलनी शुरु हुई और इंदिरा गांधी का सिंहासन डोलने लगा तब चारों ओर से पराजित इंदिरा गांधी ने संघ के भूमिगत नेतृत्व एवं जेलों में बंद नेतृत्व के साथ एक प्रकार की राजनीतिक सौदेबाजी करने का विफल प्रयास किया था -‘‘संघ से प्रतिबंध हटाकर सभी स्वयंसेवकों को जेलों से मुक्त किया जा सकता है, यदि संघ इस आंदोलन से अलग हो जाए’’ परंतु संघ ने आपातकाल हटाकर लोकतंत्र की बहाली से कम कुछ भी स्वीकार करने से मना कर दिया। इंदिरा जी के पास स्पष्ट संदेश भेज दिया गया -‘‘देश की जनता के इस आंदोलन का संघ ने समर्थन किया है, हम देशवासियों के साथ विश्वासघात नहीं कर सकते, हमारे लिए देश पहले है, संगठन बाद में’’। इस उत्तर से इंदिरा गांधी के होश उड़ गए।

अंत में देश में हो रहे प्रचंड विरोध एवं विश्वस्तरीय दबाव के कारण आम चुनाव की घोषणा कर दी गई। इंदिरा जी ने समझा था कि बिखरा हुआ विपक्ष एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़ सकेगा, परन्तु संघ ने इस चुनौती को भी स्वीकार करके सभी विपक्षी पार्टियों को एकत्र करने जैसे अति कठिन कार्य को भी कर दिखाया। संघ के दो वरिष्ठ अधिकारियों प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैय्या) और दत्तोपंत ठेंगडी ने प्रयत्नपूर्वक चार बड़े राजनीतिक दलों को अपने दलगत स्वार्थों से ऊपर उठकर एक मंच पर आने को तैयार करा लिया। सभी दल जनता पार्टी के रूप में चुनाव के लिए तैयार हो गए।

चुनाव के समय जनसंघ को छोड़कर किसी भी दल के पास कार्यकर्ता नाम की कोई चीज नहीं थी, सभी के संगठनात्मक ढांचे शिथिल पड़ चुके थे, इस कमी को भी संघ ने ही पूरा किया। लोकतंत्र की रक्षा हेतु संघर्षरत स्वयंसेवकों ने अब चुनाव के संचालन का बड़ा उत्तरदायित्व भी निभाया। ‘द इंडियन रिव्यू’ के संपादक एम.सी. सुब्रह्मण्यम ने लिखा था -‘‘जिन लोगों ने आपात काल के दौरान संघर्ष को वीरतापूर्वक जारी रखा उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों का विशेष उल्लेख करना आवश्यक है। उन्होंने अपने व्यवहार से न केवल अपने राजनीतिक सहयोगी कार्यकर्ताओं की प्रसंशा प्राप्त की वर्ना जो कभी उनके राजनीतिक विरोधी थे उनसे भी आदर प्राप्त कर लिया'।

प्रसिद्ध पत्रकार एवं लेखक दीनानाथ मिश्र ने लिखा था -‘‘भूमिगत आंदोलन किसी न किसी विदेशी सरकार की मदद से ही अक्सर चलते हैं, पर भारत का यह भूमिगत आंदोलन सिर्फ स्वदेशी शक्ति और साधनों से चलता रहा। बलात नसबंदी, पुलिसिया कहर, सेंसरशिप, तथा अपनों को जेल में यातनाएं सहते देखकर आक्रोशित हुई जनता ने अधिनायकवाद की ध्वजवाहक इंदिरा गांधी का तख्ता पलट दिया। जनता विजयी हुई और देश को पुनः लोकतंत्र मिल गया। जेलों में बंद नेता छूटकर सांसद व मंत्री बनने की होड़ में लग गए, परंतु संघ के स्वयंसेवक अपने राष्ट्रीय कर्तव्य की पूर्ति करके अपनी शाखा में जाकर पुनः संगठन कार्य में जुट गए"।

सच्चाई के लिए लड़ते हुए ही मेरा अंतिम समय आए: श्यामाप्रसाद मुखर्जी

श्यामाप्रसाद मुखर्जी कहते थे सचाई के लिए लड़ते हुए ही मेरा अंतिम समय आए:

श्यामाप्रसाद मुखर्जी शायद अपने दौर के उन नेताओं में से थे जिन्होंने बहुत कम उम्र में राष्ट्रीय राजनीति में स्थान बना लिया था। मात्र 46 वर्ष की आयु में वह स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में उद्योग और आपूर्ति मंत्री बने थे
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कुल 52 साल के छोटे से जीवन में भी डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की उपलब्धियां बहुत अधिक थीं। उनके जीवन की सबसे ऐतिहासिक पहल थी आज की भारतीय जनता पार्टी के पूर्ववर्ती संगठन, भारतीय जन संघ, की स्थापना जिसने कई दशकों की यात्रा के बाद भारतीय राजनीति के तौर-तरीकों को बदल दिया है। उनकी दूरदर्शिता की झलक देने वाले इस लक्ष्य को मूर्त रूप देने के लिए वे लंबे समय तक बौद्धिक रूप से सक्रिय रहे थे। घोर तिरस्कार और प्रतिरोध के बीच मात्र 10 लोगों को साथ लेकर उन्होंने जिस विचार का बीज बोया था, वह आज कई दशकों के निरंतर संघर्ष के बाद भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित होकर 11 करोड़ सदस्यों की भागीदारी वाला ताकतवर धारा में बदल चुका है।

श्यामाप्रसाद मुखर्जी शायद अपने दौर के उन नेताओं में से थे जिन्होंने बहुत कम उम्र में राष्ट्रीय राजनीति में स्थान बना लिया था। मात्र 46 वर्ष की आयु में वह स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में उद्योग और आपूर्ति मंत्री बने थे। इसी के साथ, वह अपने दौर में भविष्य की बातों को पहले ही जान सकने वाले ऐसे व्यक्ति भी थे जिसने हमेशा भारत के राष्ट्रीय हितों और उसकी एकता व अखंडता को अपनी राजनीति में सर्वोच्च महत्व दिया। कोलकाता समेत बंगाल के एक हिस्से को पश्चिमी बंगाल के रूप में भारत का अंग बनाए रखना सुनिश्चित करने के लिए उनका महान और युगांतरकारी प्रयास ऐसी महागाथा है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। बंगाली हिंदुओं को भारत के एक हिस्से में सुरक्षा और गरिमा के साथ जीने का अवसर देने के इस प्रयास में उन्हें तत्कालीन बंगाल के सभी बुद्धिजीवियों तथा सभी राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े नेताओं का व्यापक समर्थन मिला था। जदुनाथ सरकार, आरसी मजूमदार, उपेंद्रनाथ बनर्जी, सुनीति कुमार चटर्जी, और राधाकुमुद मुखर्जी जैसे उस युग के दिग्गज विचारकों, इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों और सार्वजनिक हस्तियों ने बंगाल के एक हिस्से को भारत में बचाने रखने के लिए श्यामा प्रसाद के प्रयासों को आगे बढ़ कर एक स्वर से समर्थन दिया था।

इससे उनके लिए व्यापक समर्थन का पता तो चलता ही है, काफी आगे तक का सोच पाने की उनकी क्षमता तथा उनकी राजनीति की व्यावहारिकता का भी पता चलता है। अगस्त 1946 में जिन्ना की सीधे हमले (‘डायरेक्ट ऐक्शन’) की योजना को कोलकाता में अमली जामा पहनाने वाले बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री एचएस सुहरावर्दी के प्रस्ताव पर जब शरत चंद्र बोस जैसे नेता भी एक 'संप्रभु संयुक्त बंगाल' के लुभावने सपने के जाल में फंस गए थे, तब भी श्यामा प्रसाद यह साफ समझ पा रहे थे कि यह बात बंगाली हिंदुओं को फंसाने और अंततः पूरे बंगाल को पाकिस्तान को सौंपने की शरारती चाल भर थी। निरंतर चले राजनीतिक और बौद्धिक आंदोलन के माध्यम से श्यामा प्रसाद ने सुहरावर्दी की योजना को उलट दिया और एक तरह से पाकिस्तान को विभाजित कर दिया। एक बार नेहरू पर किए उनके इस कटाक्ष की बहुत चर्चा हुई थी कि ‘आपने भारत का विभाजन कराया था, जबकि मैंने पाकिस्तान का।’ पश्चिम बंगाल के लोगों को ही नहीं, भारत भर के बंगालियों को इस बात पर निरंतर चिंतन करना चाहिए कि यदि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बलपूर्वक और साहसपूर्वक पश्चिम बंगाल बनाने के अभियान को आगे बढ़ाते हुए सफलता न पाई होती तो उनके भविष्य का क्या हुआ होता।

डॉ. मुखर्जी का एक अन्य महान प्रयास था जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ एकीकरण। इस अभियान में वे जीवित नहीं बच सके थे। उन्होंने पहले ही स्पष्ट रूप से समझ लिया था कि अगर इस राज्य को औरों से अलग रहने की अनुमति जारी रही, तो यह अलगाववाद के कुत्सित सिद्धांत को फैलाने वाले केंद्र के रूप में विकसित होगा और भारत के राष्ट्रीय हितों और अखंडता के प्रति शत्रुभाव रखने वाली ताकतों के खेल का मैदान बन जाएगा। श्यामा प्रसाद ने यह भविष्यवाणी भी की थी कि पाकिस्तान और अन्य ताकतों द्वारा विभाजन और चरमपंथ की आग को हवा देने के चलते देश के एक प्रमुख क्षेत्र का ढीलाढाला एकीकरण भविष्य में अलगाव की मांग को भी जन्म देगा। भारत की नियति में उनका दृढ़ विश्वास था और इसीलिए, उन्होंने भारत के एकीकरण के लिए व्यक्तिगत रूप से संघर्ष करने का निर्णय किया। इसी संघर्ष के क्रम में भारत सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था और गिरफ्तारी के ही दौरान उनकी मृत्यु हुई हो गई थी। उनके बलिदान ने अलगाववाद, उग्रवाद और अंततः आतंकवाद की चुनौतियों को भारत के लोगों के सामने रखते हुए उन्हें इनके खतरों और इनके कारण भविष्य में आने वाले खतरों के बारे में आगाह कर दिया था। यह उनके बलिदान, अदम्य साहस, अपने दृष्टिकोण पर डटे रहने और भारत की संप्रभुता की रक्षा के मामले में किसी तरह का समझौता करने के लिए तैयार न होने के कारण ही संभव हुआ था कि जम्मू-कश्मीर का महत्वपूर्ण तथा सामरिक और सभ्य हिस्सा आज भी भारत में है। बलिदान की आग में अपनी आहुति देकर ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी सुनिश्चित कर सके थे कि भारत की एकता हमेशा अक्षत रहे। उनकी मृत्यु वीरोचित थी और वह शायद खुद ऐसा ही चाहते थे। एक बार उन्होंने अत्यंत मार्मिकता से लिखा था कि 'मेरी उत्कट इच्छा है कि सचाई के लिए लड़ते हुए ही मेरा अंतिम समय आए।' श्री गुरुजी गोलवलकर उन्हें 'अपनी मातृभूमि के लिए लड़ने वाले उस सच्चे सेनानी के रूप में देखते थे जिसकी मृत्यु ‘कश्मीर के एकीकरण की लड़ाई के अग्रिम मोर्चे पर हुई थी।' वीर सावरकर उन्हें भारत का 'अग्रणी राष्ट्रभक्त, राजनीतिज्ञ और एक जन्मजात सांसद' मानते थे और उन्होंने भारतीय गणतंत्र में कश्मीर के पूर्ण एकीकरण के लिए संघर्ष जारी रखने का आह्वान भी किया था। लेकिन प्रख्यात शिक्षाविद, सार्वजनिक व्यक्तित्व, विचारक, कुछ समय तक संविधान सभा के सदस्य और स्वराज पार्टी के नेता एमआर जयकर की श्रद्धांजलि शायद सबसे अधिक हृदयस्पर्शी और झिंझोड़ने वाली थी। उन्होंने श्री मुखर्जी को श्रद्धांजलि देते हुए लिखा, ' अपने ही देश की स्वदेशी सरकार और सरकार में साथी रहे लोगों द्वारा कैद कर जेलखाने में रखा जाना और मृत्यु को प्राप्त करना एक लड़ाकू जीवन के लिए बिलकुल उपयुक्त समाप्ति हैं... उम्मीद की जानी चाहिए कि यह घटना भारत सरकार को उसके व्यवहार की अतियों तथा सभ्य सरकारों द्वारा स्वीकार की जाने वाले निष्पक्षता और न्याय के सभी मानकों की अनदेखी का अनुभव करवाएगी।'

आज, उनकी मृत्यु के 67 साल बाद डॉ. मुखर्जी की अंतिम लड़ाई जीती जा चुकी है। उनके अंतिम संघर्ष का फल तब मिला जब अगस्त 2019 में प्रधान मंत्री मोदी के दृढ़ निश्चय तथा गृहमंत्री अमित शाह द्वारा अत्यंत बुद्धिमत्ता एवं कुशलता से संचालित संसदीय रणनीति के परिणामस्वरूप अनुच्छेद 370 अंततः समाप्त कर दिया गया। मई 2020 में जम्मू और कश्मीर अधिवास अधिनियम के पारित होने से इस एकता को और मजबूती मिली है। यह डॉ. मुखर्जी की दृष्टि और इस क्षेत्र समेत पूरे भारत के लिए उनकी भावना के प्रति श्रद्धांजलि भी है। जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में पूर्ण और अंतिम एकीकरण के लिए डॉ. मुखर्जी का संघर्ष किसी राजनीतिक लाभ के संकीर्ण जोड़-घटाव पर आधारित नहीं था। उनका दृढ़ मत भारत के संविधान में उनके दृढ़ विश्वास तथा इस तथ्य पर आधारित था कि यह संविधान सभी भारतीयों के लिए समान रूप से लागू होना चाहिए और देश के एक कोने से दूसरे कोने तक कहीं भी निवास करने वाले भारतीय को संविधान-प्रदत्त संभावनाओं का समान रूप से लाभ मिलना चाहिए। उनकी लड़ाई समता, न्याय और सभी क्षेत्रों के लोगों के लिए समान अवसरों के लिए थी। घाटी में कुछ राजनीतिक दलों द्वारा दशकों तक चलाई गई पीड़ित होने और भय की जिस राजनीति के खिलाफ प्रजा परिषद का अंदोलन खड़ा हुआ था और जिसका नेतृत्व डॉ. मुखर्जी ने किया था अंततः अपनी अंतिम परिणति पा गया है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लोग अब वास्तव में एक नई दृष्टि के साथ हुई ताजा शुरुआत के परिणाम पाने को उत्सुक हैं।

यद्यपि भारत की असंदिग्ध एकता के सत्य के पक्ष में संघर्ष ने डॉ. श्यामा प्रसाद को शारीरिक रूप से समाप्त कर दिया था, तथापि इसी लड़ाई ने अनंतकाल से चले आ रहे भारत की रक्षा और उसके पोषण के लिए प्रयासरत लोगों की स्मृति में उन्हें अमर बना दिया। 23 जून 1953 को भौतिक रूप से समाप्त हो जाने के 67 साल बाद भी डा. श्यामाप्रसाद हमें निस्वार्थ क्रियाशीलता के लिए प्रेरित करते हैं।

Saturday, June 13, 2020

काकोरी कांड के नायक पंडित रामप्रसाद बिस्मिल

काकोरी कांड के नायक पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को शत शत नमन

पंडित रामप्रसाद का जन्म 11 जून , 1897 को शाहजहांपुर , उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनके पिता श्री मुरलीधर शाहजहाँपुर नगरपालिका में कर्मचारी थे। पर आगे चलकर उन्होंने नौकरी छोड़कर निजी व्यापार शुरू कर दिया। रामप्रसाद जी बचपन से महर्षि दयानन्द तथा आर्य समाज से बहुत प्रभावित थे। शिक्षा के साथ साथ वे 
यज्ञ ,सन्ध्या वन्दन , प्रार्थना आदि भी नियमित रूप से करते थे



स्वामी दयानन्द द्वारा विरचित ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश ’ पढ़कर उनके मन में देश और धर्म के लिए कुछ करने की प्रेरणा जगी। इसी बीच शाहजहाँपुर आर्य समाज में स्वास्थ्य लाभ करने के लिए स्वामी सोमदेव नामक एक संन्यासी आये। युवक रामप्रसाद ने बड़ी लगन से उनकी सेवा की। उनके साथ वार्तालाप में रामप्रसाद को अनेक विषयों में वैचारिक स्पष्टता प्राप्त हुई। रामप्रसाद जी ‘बिस्मिल ’ उपनाम से हिन्दी तथा उर्दू में कविता भी लिखतेे थे।

1916 में भाई परमानन्द को ‘लाहौर षड्यन्त्र केस ’ में फांसी की सजा घोषित हुई। बाद में उसे आजीवन कारावास में बदलकर उन्हें कालापानी भेज दिया गया। इस घटना को सुनकर रामप्रसाद बिस्मिल ने प्रतिज्ञा कर ली कि वे ब्रिटिश शासन से इस अन्याय का बदला अवश्य लेंगे। इसके बाद वे अपने जैसे विचार वाले लोगों की तलाश में जुट गये।

लखनऊ में उनका सम्पर्क क्रान्तिकारियों से हुआ। मैनपुरी को केन्द्र बनाकर उन्होंने प्रख्यात क्रान्तिकारी गेंदालाल दीक्षित के साथ गतिविधियां शुरू कीं। जब पुलिस ने पकड़ धकड़ शुरू की , तो वे फरार हो गये। कुछ समय बाद शासन ने वारंट वापस ले लिया। अतः ये घर आकर रेशम का व्यापार करने लगे। पर इनका मन तो कहीं और लगा था। उनकी दिलेरी ,सूझबूझ देखकर क्रान्तिकारी दल ने उन्हें अपने कार्यदल का प्रमुख बना दिया।

क्रान्तिकारी दल को हथियार मंगाने तथा अपनी गतिविधियों के संचालन के लिए पैसे की बहुत आवश्यकता पड़ती थी। अतः बिस्मिल जी ने ब्रिटिश खजाना लूटने का सुझाव रखा। यह बहुत खतरनाक काम था। पर जो डर जाये , वह क्रान्तिकारी ही कैसा ? पूरी योजना बना ली गयी और इसके लिए नौ अगस्त , 1925 की तिथि निश्चित हुई।

निर्धारित तिथि पर दस विश्वस्त साथियों के साथ पंडित रामप्रसाद बिस्मिल ने लखनऊ से खजाना लेकर जाने वाली रेल को काकोरी स्टेशन से पूर्व दशहरी गांव के पास चेन खींचकर रोक लिया। गाड़ी रुकते ही सभी साथी अपने-अपने काम में लग गये। रेल के चालक तथा गार्ड को पिस्तौल दिखाकर चुप करा दिया गया। सभी यात्रियों को भी गोली चलाकर अन्दर ही रहने को बाध्य किया गया। कुछ साथियों ने खजाने वाले बक्से को घन और हथौड़ों से तोड़ दिया और उसमें रखा सरकारी खजाना लेकर सब फरार हो गये।

परन्तु आगे चलकर चन्द्रशेखर आजाद को छोड़कर इस कांड के सभी क्रान्तिकारी पकड़े गये। इनमें से रामप्रसाद बिस्मिल , रोशन सिंह , अशफाक उल्ला खां तथा राजेन्द्र लाहिड़ी को फांसी की सजा सुनायी गयी। रामप्रसाद जी को गोरखपुर जेल में बन्द कर दिया गया। वे वहाँ फाँसी वाले दिन तक मस्त रहे। अपना नित्य का व्यायाम , पूजा , सन्ध्या वन्दन उन्होंने कभी नहीं छोड़ा।

19 दिसम्बर , 1927 को बिस्मिल को गोरखपुर , अशफाक उल्ला को फैजाबाद तथा रोशन सिंह को प्रयाग में फांसी दे दी गयी।

Saturday, May 23, 2020

गीता प्रेस की पुस्तकें अब ‘एप’ पर उपलब्ध :

गीता प्रेस की पुस्तकें अब ‘एप’ पर :

गीता प्रेस अभी तक लोगों को लागत से भी कम मूल्य पर पुस्तकें उपलब्ध कराती आई है। लेकिन अब इसने गीता सेवा ट्रस्ट एप पर अपने द्वारा प्रकाशित व अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ पढ़ने के लिए उपलब्ध कराये हैं। गीता प्रेस ने 15 भाषाओं में 1700 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित की हैं। ये सभी एप पर उपलब्ध होंगे 

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गीता प्रेस सदैव से लागत से कम मूल्य पर भक्ति ग्रंथों और अन्य आध्यात्मिक रुचि की पुस्तकों का प्रकाशन करती आ रही है। ये पुस्तकें लागत से भी कम मूल्य पर पाठकों को उपलब्ध कराई जाती हैं। लेकिन अब नये ‘एप’ के जरिए ये पुस्तकें जनसाधारण को मुफ्त में उपलब्ध कराई जा रही हैं। गीता सेवा ट्रस्ट का यह एप है- https://gitaseva.org/app जिसे दुनिया के किसी भी कोने में एंड्रायड फोन, लैपटाप या टैबलेट में डाउनलोड किया जा सकता है। इस एप को डाउनलोड करने के बाद कोई भी गीता प्रेस की पुस्तकें मुफ्त में पढ़ सकता है। फिलहाल इस एप पर हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, तमिल, बांग्ला और कन्नड़ भाषाओं में 213 पुस्तकें उपलब्ध हैं। अभी इस एप पर अन्य भारतीय भाषाओं की पुस्तकें भी उपलब्ध कराई जाएंगी।

गीता प्रेस की 1700 से अधिक पुस्तकें हैं। ये पुस्तकें हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, तमिल, बांग्ला, उर्दू, कन्नड़, असमिया, मलयालम, उड़िया, मराठी, गुजराती, पंजाबी, तेलुगु और नेपाली भाषाओं में हैं। इन सभी पुस्तकों को गीता सेवा ट्रस्ट के एप पर अपलोड किया जाएगा। यह काम बहुत बड़ा है और धीमी रफ्तार से चल रहा है, इसलिए इसमें काफी समय लग सकता है। इस एप पर गीता पाठ, सुन्दरकाण्ड, रामकथा, वाल्मीकि रामायण, भजन, कीर्तन, आरती, आदि भी हैं। अब तक 1600 से अधिक आॅडियो सामाग्री एप पर अपलोड हो चुकी है। गीता प्रेस के संस्थापक ब्रह्मलीन श्री जयदयाल गोयंदकाजी (1885-1965), ‘कल्याण’ के आदिसंपादक ब्रह्मलीन श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार उपाख्य भाईजी (1892-1971) और ब्रह्मलीन स्वामी रामसुखदासजी (1904-2005) के प्रवचन भी इस एप पर हैं।

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गीता प्रेस द्वारा हिन्दी अनुवाद के साथ छापे गये कूर्म पुराण के आरंभिक पृष्ठ।

गीता प्रेस 1926 से हिन्दी मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ का प्रकाशन कर रहा है। हर वर्ष ‘कल्याण’ का एक विशेषांक निकलता है। अब तक इसके 94 विशेषांक निकल चुके हैं। इनमें से 50 से अधिक विशेषांक ऐसे हैं, जिनका पुन:प्रकाशन आज भी किया जाता है। लगभग सभी विशेषांक 500 से 800 पृष्ठों के है। साथ ही, हर वर्ष गीता प्रेस की अंग्रेजी मासिक पत्रिका ‘कल्याण-कल्पतरु’ के भी विशेषांक निकलते हैं। इन सभी को भी गीता सेवा ट्रस्ट के एप पर अपलोड किया जाना है। 2021 में ‘कल्याण-कल्पतरु’ का विशेषांक उपासना-विषय पर होगा।


एप पर उपलब्ध हैं ये पुस्तकें
हिन्दी और संस्कृत भाषा में पुस्तकें

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      गीता सेवा ट्रस्ट मोबाइल एप

श्रीमद्भगवद्गीता: श्रीमद्भगवद्गीता (भाषा टीका सहित), श्रीमद्भगवद्गीता (महात्म्य हिंदी-टीका सहित), श्रीमद्भगवद्गीता (मूल), श्रीमद्भगवद्गीता पदच्छेद, श्रीमद्भगवद्गीता तत्व विवेचनी, गीता ज्ञान प्रवेशिका, गीता प्रबोधनी, श्रीमद्भगवद्गीता साधक संजीवनी, गीता चिन्तन।

तुलसी साहित्य: श्रीरामचरितमानस (मूल), सुन्दरकाण्ड (मूल), श्रीरामचरितमानस (सटीक), सुन्दरकाण्ड (सटीक), बरवै रामायण, गीतावली, वैराग्य संदीपनी, कवितावली, हनुमान बाहुक, जानकी मंगल , पार्वती मंगल, रामाज्ञा प्रश्न, श्रीकृष्ण गीतावली, विनय पत्रिका।

दैनिक पूजा-पाठ: श्रीदुर्गा सप्तशती (हिन्दी अनुवाद सहित) शिवमहिम्न: स्तोत्र, श्रीनारायणकवच, संध्योपासन विधि और तर्पण एवं बलिवैश्वदेव विधि, सन्ध्या, सन्ध्या गायत्री का महत्त्व और ब्रह्मचर्य, तर्पण विधि, अमोघ शिव कवच, रामरक्षा स्तोत्रम्, बलिवैश्वदेव विधि, गजलगीता, श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् (नामावलि: सहित), आरती संग्रह, श्रीहनुमान चालीसा, मनुस्मृति:, नित्यकर्म प्रयोग, श्रीदुर्गासप्तशती (मूल), श्रीरामकृष्णलीला भजनावली, भजन संग्रह, शतनामस्तोत्र संग्रह, चेतावनी पद संग्रह, स्तोत्ररतनावली, हरेरामभजन (16 माला), श्रावणमासमहात्म्य, नित्यस्तुति: गजेन्द्रमोक्ष, संतानगोपालस्तोत्र (संतान प्राप्ति के शास्त्रीय उपाय), श्रीदुर्गा चालीसा एवं, श्रीविन्ध्येश्वरी चालीसा, श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम (मूलमात्रम), भीष्मस्तवराज:, श्रीशिवचालीसा, आदित्यहृदयस्तोत्रम। पुराण: श्रीमद्भागवत महापुराणम (मूलमात्रम्)

सूरदास साहित्य: सूर विनय पत्रिका, अनुराग पदावली, सूर रामचरितावली, विरह पदावली।
हनुमान प्रसाद पोद्दार साहित्य: पद रत्नाकर, गीता चिन्तन, साधन पथ, प्रार्थना, सुखी बनने के उपाय, अमृत कण, मानव जीवन का लक्ष्य, ईश्वर की सत्ता और महत्ता, श्रीरामरितमानस (सटीक), सुन्दरकाण्ड (सटीक)।
जयदयाल गोयन्दका साहित्य: श्रीमद्भगवद्गीता तत्त्व विवेचनी, गीता के परम प्रचारक, ध्यानावस्था में प्रभु से वार्तालाप, उद्धार कैसे हो?, साधन-कल्पतरु, शीघ्र कल्याण के सोपान, स्त्रियों के लिए कर्तव्य शिक्षा, सच्ची सलाह, अमूल्य वचन, आत्मोद्धार के साधन, ईश्वर और संसार, महत्त्वपूर्ण चेतावनी, नल दमयन्ती, श्रीप्रेम भक्ति प्रकाश, कर्मयोग का तत्त्व, तत्त्व चिन्तामणि, भगवत्प्रेम की प्राप्ति कैसे हो?, मनुष्य का परम कर्तव्य, परम साधन।

स्वामी रामसुखदास साहित्य: साधन सुधा सिन्धु, गीता ज्ञान प्रवेशिका, मानवमात्र के कल्याण के लिए, सार संग्रह, क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं?, गीता माधुर्य, एक संत की वसीयत, सत्संग के अमृत कण, गीता प्रबोधनी, श्रीमद्भगवद्गीता साधक संजीवनी, शिखा (चोटी) धारण की आवश्यकता, कल्याणकारी प्रवचन।

बाल कल्याण हेतु पुस्तकें: सच्चे और ईमानदार बालक , गुरु और माता-पिता के भक्त बालक, लघु सिद्धान्त कौमुदी, बड़ों के जीवन से शिक्षा, एक लोटा पानी, परलोक और पुनर्जन्म की सत्य घटनाएं, पिता की सीख , बाल अमृत वचन, सती द्रौपदी, उपयोगी कहानियां, वीर बालक।

भक्त चरित्र: भक्त सप्तरत्न, भक्त रत्नाकर, भक्त नारी, भक्त कुसुम, भक्तराज ध्रुव, भक्त दिवाकर, श्रीश्रीचैतन्य चरितावली, भक्त सौरभ, श्रीजैमिनीयाश्वमेधपर्व, प्रेमी भक्त, प्राचीन भक्त, भक्त बालक, भक्त सरोज, भक्त नारी, भक्त सप्तरत्न, भक्त महिलारत्न, भक्त सौरभ, भक्त पंचरत्न, भक्त सुमन, भक्त कुसुम, भक्त सुधाकर, भक्तराज हनुमान, प्रेमी भक्त उद्धव, सत्यप्रेमी हरिश्चन्द्र, श्रीभीष्मपितामह।
(इनके अतिरिक्त एप पर तमिल भाषा में 17 पुस्तकें, कन्नड़ में 39, बांग्ला में 2 और अंग्रेजी में 24 पुस्तकें हैं।)


एप की आवश्यकता क्यों पड़ी?
संचार तकनीक में लगातार से तेजी से बदलाव आ रहे हैं। नई पीढ़ी बहुत सी चीजें अब आॅनलाइन ही पढ़ना पसंद करती है। साथ ही, लोगों के घर भी छोटे होते जा रहे हैं। घर में मोटी-मोटी पुस्तकों को सुरक्षित रखने की भी समस्या होती है।
इस समय देश के 50 से अधिक रेलवे प्लेटफार्मों पर गीता प्रेस के बुक स्टॉल हैं। इसके अतिरिक्त देश के 20 से अधिक शहरों में गीता प्रेस की निजी दुकानें या शाखाएं हैं। नेपाल में भी एक शाखा है। फिर भी देश के ग्रामीण इलाकों में लोगों को गीता प्रेस की पुस्तकें खरीदने में समस्या होती है। गीता सेवा ट्रस्ट का यह एप इन समस्याओं का निदान है। आज गांवों तक स्मार्ट फोन और इंटरनेट की पहुंच हो गई है। इसके कारण गांवों में साक्षरता भी बढ़ रही है। इसके अलावा, विदेशों में भी गीता प्रेस की पुस्तकों की मांग बनी रहती है। मोटी-मोटी किताबें विदेश भेजने में पुस्तक के मूल्य से ज्यादा डाक खर्च आ जाता है। अब यदि किसी को विदेश या देश में गीता, रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण, हनुमान चालीसा, हनुमान बाहुक आदि पढ़ना है तो वह सीधे इस एप के माध्यम से पढ़ सकता है। हनुमान चालीसा की तरह हनुमान बाहुक भी गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार गोस्वामीजी की भुजा में अत्यंत पीड़ा थी। वह इस पीड़ा से बहुत परेशान थे। दर्द के निवारण के लिए उन्होंने
ईश्वर से प्रार्थना की। भगवान से उनकी यही प्रार्थना हनुमान बाहुक में है। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि गीता सेवा ट्रस्ट एप के बावजूद भी गीता प्रेस अपनी सभी पुस्तकों का मुद्रण जारी रखेगी, क्योंकि अब भी देश और विदेश की बहुत बड़ी आबादी, खासतौर से बुजुर्ग किताबें पढ़ने के अभ्यस्त हैं। उन्हें मोबाइल फोन पर पढ़ना पसन्द नहीं है। औसतन प्रतिदिन गीता प्रेस में 50,000 पुस्तकें मुद्रित होती हैं।

1923 में हुई एक छोटी सी शुरुआत
1920 के आसपास की बात है। श्री जयदयाल गोयंदकाजी (1885-1965) कोलकाता में सत्संग करवाते थे। उन दिनों सत्संग के लिए न कोई मंच बनता था और न ही कोई प्रचार होता था। धीरे-धीरे सत्संगियों की संख्या बढ़ती गई और सभी को स्वाध्याय के लिए श्रीमद्भगवद् गीता अर्थात गीता की अवश्यकता हुई। परन्तु शुद्ध पाठ और सही अर्थ की गीता सुलभ नहीं हो पा रही थी। सुलभता से ऐसी गीता मिल सके, इसके लिए श्री गोयंदकाजी ने कोलकाता के वणिक प्रेस में 5,000 प्रतियां छपवार्इं। लेकिन ये प्रतियां बहुत जल्दी खत्म हो गईं। दोबारा 6,000 प्रतियों का दूसरा संस्करण छपवाया गया, पर उसमें अशुद्धियों को ठीक करने में बहुत दिक्कत हो रही थी। तब श्री गोयंदकाजी ने अपना प्रेस लगाने की सोची। गोरखपुर के दो कर्मठ मित्रों, घनश्याम दासजी जालान और महावीर प्रसादजी पोद्दार ने उन्हें सुझाव दिया कि प्रेस उनके शहर में खोली जाए जिससे प्रेस की देखभाल भी करेंगे। उनके भरोसे पर 1923 में गोरखपुर में करीब 10 रुपये में एक छोटा सा घर किराए पर लिया गया। उस घर में एक हैंडप्रेस लगायी गयी और गीता प्रेस की स्थापना हुई। लेकिन हैंडप्रेस में छपाई का काम बहुत धीरे-धीरे होता था। हैंडप्रेस में तीन कुशल व्यक्ति एक घंटे में मुश्किल से 100 पृष्ठ ही छाप सकते थे। समय के साथ प्रेस का विस्तार होता गया। श्री जयदयाल गोयंदकाजी (सेठजी) और श्री हनुमान प्रसाद पोद्दारजी (भाईजी) द्वारा लिखित पुस्तकें, गीता (हिन्दी अनुवाद सहित) और रामचरितमानस आदि वहां से प्रकाशित होने लगीं। सेठजी, भाईजी, स्वामी रामसुखदासजी तथा कुछ अन्य लोगों के निष्काम सहयोग और समर्पण से धीरे-धीरे गीता प्रेस सनातन धर्म साहित्य का विश्व का सबसे बड़ा प्रकाशन केंद्र बन गया।

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श्री वेंकटेश्वर मुद्रणालय में छपे कूर्म पुराण का एक पृष्ठ। 

गीता प्रेस लागत से कम मूल्य पर पाठकों को पुस्तकें उपलब्ध कराती है। गीता प्रेस की स्थापना के पहले गीता की पुस्तक मिलनी दुर्लभ थीं। मिलती भी तो उसमें काफी अशुद्धियां होती थीं और उसका मूल्य चुकाना सर्वसाधारण के लिए सुलभ नहीं था। हिन्दू धर्म की तमाम पुस्तकें संस्कृत में है। तब महाभारत का मूलसहित हिन्दी अनुवाद भी उपलब्ध नहीं था। हमारे कई पुराण भी तब हिन्दी में उपलब्ध नहीं थे। गीता प्रेस ने इन सभी पुस्तकों का न केवल हिन्दी में अनुवाद कराया, बल्कि इसका प्रकाशन कर सस्ती दर पर सर्वसाधारण को सुलभ कराया। गीता प्रेस की स्थापना के पहले वाल्मीकि रामायण, रामचरित मानस, आदि हिन्दू धर्म की कुछ पुस्तकें बाजार में थीं, परन्तु उनका मूल्य इतना ज्यादा होता था कि लोग इसे खरीद नहीं पाते थे। इसके अतिरिक्त उन पुस्तकों की छपाई, बाइंडिंग आदि उतनी अच्छी नहीं थी जितनी कि गीता प्रेस की थी।

मुंबई में श्री वेंकटेश्वर स्टीम मुद्रणालय था। उसकी स्थापना 1871 में हुई थी। इसने भी बड़ी संख्या में हिन्दू धार्मिक पुस्तकें छापीं, लेकिन वह एक व्यापारिक प्रेस थी। इसका उद्देश्य लाभ कमाना था। वह गीता प्रेस की तरह सनतान धर्म को समर्पित नहीं था। इसके अलावा श्री वेंकटेश्वर स्टीम मुद्रणालय की कुछ पुस्तकों को पढ़ने में भी दिक्कत होती थी। जैसे- एक श्लोक में चार पद होते हैं। पहली पंक्ति में दो पद लिखे जाते हैं और दूसरी पंक्ति में आगे के दो पद लिखे जाते हैं। इस प्रकार एक श्लोक को दो पंक्तियों में लिखा जाना चाहिए, परंतु उनकी पुस्तकों में कभी-कभी उसे एक ही पंक्ति में लिखने का प्रयास होता था। इससे छपाई में लगने वाला कागज तो बच जाता था, परंतु पुस्तक को पढ़ने में दिक्कत होती थी। दूसरी ओर गीता प्रेस ने देवी-देवताओं के मनमोहक चित्रों के साथ अपनी पुस्तकें पाठकों तक पहुंचाईं। इस कारण भी वे ज्यादा लोकप्रिय हुईं। गीता प्रेस की पुस्तकों में देवी-देवताओं के जो चित्र हैं, उनमें से अधिकतर श्री बी.के. मित्रा, श्री भगवान और श्री जगन्नाथ नामक चित्रकारों ने बनाए हैं। यहां यह बता देना भी जरूरी है कि ‘कल्याण’ के प्रारंभिक अंकों की लगभग एक वर्ष तक छपाई श्री वेंकटेश्वर मुद्रणालय में ही हुई थी। बाद में इसकी छपाई गोरखपुर में होने लगी।

इंटरनेट की दुनिया में गीता सेवा ट्रस्ट एप लाना एक महत्वपूर्ण कदम है। सबसे विशेष बात यह है कि यह एप ‘यूजर फ्रेंडली’ है। इसमें किसी भी पुस्तक, भजन या प्रवचन को आसानी से ढूंढा जा सकता है। धीरे-धीरे जब इस एप पर विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित गीता प्रेस की सभी पुस्तकें अपलोड हो जाएंगी, तब सनातन धर्म को समर्पित कुछ अन्य संस्थाओं की पुस्तकें, प्रवचन आदि भी अपलोड होंगे। एप में प्रस्तुत सामग्री में सजीवता लाने के लिए एनीमेशन तकनीक का भी प्रयोग किया जाएगा।