Sunday, May 3, 2020

शस्त्र और शास्त्र के अनूठे समन्वयक भगवान परशुराम:

शस्त्र और शास्त्र के अनूठे समन्वयक भगवान परशुराम:

भगवान परशुराम का समूचा जीवन अनुपम प्रेरणाओं व उपलब्धियों से परिपूर्ण है। वे न सिर्फ ब्रह्मास्त् समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में पारंगत थे, बल्कि शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र की रचना उन्होंने ही की थी.



इस धराधाम पर अवतरित भगवान परशुराम ऐसी ही अमर विभूति हैं जिनके प्रतिपादित सिद्धांत आज भी अपनी प्रासंगिकता रखते हैं। अपने युग की सबसे बड़ी धार्मिक क्रांति के पुरोधा भगवान परशुराम की मान्यता थी कि स्वस्थ समाज की संरचना के लिए ब्रह्मशक्ति और शस्त्र शक्ति दोनों का समन्वय आवश्यक है। पौराणिक परंपरा के अष्ट चिरंजीवियों (अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, भगवान परशुराम तथा महर्षि मार्कण्डेय) की कड़ी में गिने जाने वाले महर्षि परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है।
 भृगुकुल शिरोमणि परशुराम जी ऋषियों के ओज और क्षत्रियों के तेज दोनों का अद्भुत संगम माने जाते हैं। इनके माता-पिता ऋषि जमदग्नि व रेणुका दोनों ही विलक्षण गुणों से सम्पन्न थे। जहां जमदग्नि जी को आग पर नियंत्रण पाने का वरदान प्राप्त था, वहीं माता रेणुका को पानी पर नियंत्रण पाने का। देवराज इंद्र्र के वरदान के फलस्वरूप ऋषि दम्पती की पांचवीं संतान के रूप में बैसाख माह की तृतीया को जन्मे परशुराम जी का प्रारंभिक नाम 'राम' था जो कालान्तर में महादेव से परशु प्राप्त होने के बाद परशुराम हो गया। राम बालपन से ही बेहद साहसी, पराक्रमी, त्यागी व तपस्वी स्वभाव के थे। उन्होंने बहुत कम आयु में अपने पिता से धनुर्विद्या सीख ली थी। कहते हैं, महादेव शिव के प्रति विशेष श्रद्धा भाव के चलते एक बार बालक राम भगवान शंकर की आराधना करने कैलाश जा पहुंचे। वहां देवाधिदेव ने उनकी भक्ति और शक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अनेक अस्त्र-शस्त्रों सहित दिव्य परशु प्रदान किया। इस अमोघ परशु को धारण करने के बाद बालक राम 'परशुराम' के नाम से विख्यात हो गये।
परशुराम जी की गणना महान पितृभक्तों में होती है। श्रीमद्भागवत में एक दृष्टान्त है कि एक बार माता रेणुका स्नान करने व हवन हेतु जल लाने गंगा तट गयीं। उस वक्त वहां गन्धर्वराज चित्ररथ अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे। रेणुका उनकी जलक्रीड़ा देखने में ऐसी निमग्न हो गयीं कि उन्हें समय का बोध ही न रहा। जमदग्नि ऋषि को जब अपनी पत्नी के उस मर्यादा विरोधी आचरण का पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर अपने पुत्रों को मां का शीश काटने की आज्ञा दी। प्रथम चारों पुत्रों ने पिता की आज्ञा नहीं मानी, किन्तु परशुराम ने पिता की आज्ञा पालन कर मां का सिर काट दिया। कहते हैं कि अपनी आज्ञा की अवहेलना से क्रोधित हो जमदग्नि ने जहां अपने चार पुत्रों को जड़ हो जाने का श्राप दिया, वहीं परशुराम से प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा। तब परशुराम ने पिता से वरदान में माता तथा अपने चारों भाइयों का पुनर्जीवन मांग कर न सिर्फ अपने हृदय की विशालता का परिचय दिया अपितु अपने पिता को भी उनकी भूल का भान करा दिया।



परशुराम जी का समूचा जीवन अनुपम प्रेरणाओं व उपलब्धियों से परिपूर्ण है। वे न सिर्फ ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में पारंगत थे अपितु योग, वेद और नीति तथा तंत्र कर्म में भी निष्णात थे। शिव पंचचत्वारिंशनाम स्तोत्र की रचना परशुराम जी ने ही की थी। कहते हैं, वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे, खूंखार वन्यजीव उनके स्पर्श मात्र से ही उनके मित्र बन जाते थे। इन्हें श्रेष्ठ राजनीति के मूल्यों का प्रतिष्ठाता माना गया है जो शासन में मानवीय गरिमा की सर्वोच्चता के पक्षधर थे। अन्याय के विरुद्ध आवेशपूर्ण आक्रामकता के विशिष्ट गुण के कारण उन्हें भगवान विष्णु के 'आवेशावतार' की संज्ञा दी गयी है। न्याय के प्रति उनका समर्पण इतना था कि उन्होंने हमेशा अन्यायी को खुद ही दंडित किया। दुनिया भर में शस्त्रविद्या के महान गुरु के नाम से विख्यात भगवान परशुराम ने महाभारत युग में भी अपने ज्ञान से कई महारथियों को शस्त्र विद्या प्रदान की थी।
जिस प्रकार देवनदी गंगा को धरती पर लाने का श्रेय राजा भगीरथ को जाता है ठीक उसी प्रकार पहले ब्रह्मकुंड (परशुराम कुंड) से और फिर लौहकुंड (प्रभु कुठार) पर हिमालय को काटकर ब्रह्मपुत्र जैसे उग्र महानद को धरती पर लाने का श्रेय परशुराम जी को ही जाता है। यह भी कहा जाता है कि गंगा की सहयोगी नदी रामगंगा को वे अपने पिता जमदग्नि की आज्ञा से धरा पर लाये थे। तमाम पौराणिक उद्धरणों के अनुसार केरल, कन्याकुमारी व रामेश्वरम की संस्थापना भगवान परशुराम ने ही की थी। उन्होंने जिस स्थान पर तपस्या की थी, वह स्थान आज तिरुअनंतपुरम के नाम से प्रसिद्ध है। केरल में आज भी पुरोहित वर्ग संकल्प मंत्र में परशुराम क्षेत्र का उच्चारण कर उक्त समूचे क्षेत्र को परशुराम की धरती की मान्यता देता है। विदेहराज जनक की राजसभा में सीता स्वयंवर के दौरान श्रीराम द्वारा शिवधनुष तोड़ने पर परशुरामजी का क्रोध व राम के अनुज लक्ष्मण से उनका संवाद सनातनधर्मियों में सर्वविदित है; मगर उनकी महानता इस बात में है कि ज्यों ही उन्हें अवतारी श्रीराम के शौर्य, पराक्रम व धर्मनिष्ठा का बोध हुआ और उनको योग्य क्षत्रिय कुलभूषण प्राप्त हो गया तो उन्होंने स्वत: दिव्य परशु सहित अपने समस्त अस्त्र-शस्त्र राम को सौंप दिये और महेन्द्र पर्वत पर तप करने के लिए चले गये। कांवड़ यात्रा का शुभारंभ परशुराम जी ने किया था। अंत्योदय की बुनियाद भी परशुराम जी ने ही डाली थी। समाज सुधार और समाज के शोषित-पीडि़त वर्ग को कृषिकर्म से जोड़कर उन्हें स्वावलंबन का पाठ पढ़ाने में भी परशुराम जी की महती भूमिका रही है।


                                     पाप संहारक परशुराम

सर्वविदित है कि परशुराम जी का क्षत्रियों के विरुद्ध अस्त्र उठाना उनकी उस अन्याय के विरुद्ध प्रबल प्रतिक्रिया थी जो महिष्मती राज्य के उस काल के हैहयवंशीय क्षत्रिय शासक आम प्रजा पर कर रहे थे, निर्दोष पिता की हत्या ने उनकी क्रोधाग्नि में घी का काम किया।

कहते हैं, उन दिनों महिष्मती राज्य का हैहय क्षत्रिय कार्तवीर्य सहस्रार्जुन राजमद में मदान्ध था। समूची प्रजा उसके क्रूर अत्याचारों से त्राहि-त्राहि कर कर ही थी। भृगुवंशीय ब्राह्मणों (परशुरामजी के वंशजों) ने जब उसे रोकने का प्रयत्न किया तो अहंकार में भरे सहस्रार्जुन ने उनके आश्रम पर धावा बोलकर उसे तहस-नहस कर दिया। इस पर भी क्रोध शांत न हुआ तो उसने परशुराम जी के पिता ऋषि जमदग्नि पर हमला बोलकर उन्हें 21 स्थानों से काटकर मार डाला। तब परशुराम जी ने अपने परशु से कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन को उसके समूचे कुल समेत मृत्युलोक पहुंचा दिया। 

                           संग्रह का नहीं, दान का महापर्व

अक्षय तृतीया को ईश्वरीय तिथि माना जाता है। इस दिन बिना पंचाग देखे कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। भविष्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन सतयुग एवं त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ था। भगवान विष्णु के 24 अवतारों में भगवान परशुराम, नर-नारायण एवं हयग्रीव आदि तीन अवतार अक्षय तृतीया के दिन ही प्रकट हुए थे। तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के पट भी अक्षय तृतीया को खुलते हैं। वृंदावन के बांके बिहारी के चरण दर्शन केवल अक्षय तृतीया को होते हैं। तृतीया तिथि मां गौरी की तिथि है जो बल-वुद्धिवर्धक मानी गयी है। जीवन में सुख, शांति, सौभाग्य तथा समृद्धि हेतु इस दिन शिव-पार्वती और नर-नारायण का पूजन शुभ फलदायी माना गया है।
भारतीय मनीषियों की मान्यता है कि वैशाख मास के शुक्लपक्ष की तृतीया में ऐसी दिव्य ऊर्जा है कि इस दिन किया जाने वाला जप-तप, दान, हवन, तीर्थस्थान का पुण्यफल 'अक्षय' हो जाता है। वैशाख मास में भगवान सूर्य की तेज धूप तथा प्रचंड गर्मी से प्रत्येक जीवधारी भूख-प्यास से व्याकुल हो उठता है इसलिए प्यासे को पानी पिलाना व यथा सामर्थ्य दान-पुण्य करना इस तिथि का सर्वप्रथम संदेश है।

भारतीय जीवनशैली को अपनाकर जिया जा सकता है सुखी जीवन:

भारतीय जीवनशैली को अपनाकर जिया जा सकता है सुखी जीवन:

हिन्दू संस्कृति की परंपराएं वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं। ऐसे में उसके अनुसार जीवन व्यतीत करना हर पक्ष से वैज्ञानिकता एवं तार्किकता से परिपूर्ण है। लेकिन आधुनिकीकरण एवं मशीनीकरण ने धरती को बहुत अस्त व्यस्त किया। उसी का परिणाम है कि समय-समय पर दुष्परिणाम के रूप में भयानक महामारियां और त्रासदी हमारे सामने आती हैं

namaskar _1  H

आज विश्व भर में फैले कोरोना वायरस के कहर ने लोगों को हिन्दू संस्कृति में निहित मान्यताओं की ओर उन्मुख किया है। वे जाने-अनजाने भारतीय संस्कृति से वह सबक ले रहे हैं, जिनके माध्यम से उन्हें लगता है कि वे स्वयं को इस भयानक संक्रमण से बचा सकते हैं। कोरोना के चलते आज स्थितियां ऐसी बनी हैं कि लोग अपने सारे काम छोड़कर घरों में बैठने के लिए मजबूर हुए हैं। प्राथमिक रूप से इसका जो इलाज निकलकर आया है वह है सामाजिक दूरी।
इसके माध्यम से इससे बचा जा सकता है। लेकिन इस दौरान ध्यान देने वाली बात यह है कि कोरोना के डर से लोग जिन नियमों का पालन कर रहे हैं, वे हमें हमारी प्राचीन वैदिक संस्कृति की याद दिलाते हैं। हिन्दू धर्म में परस्पर नमस्ते करने का प्रचलन रहा है। हाथ मिलाना व गले मिलने का कल्चर पश्चिम से आया। सनातन हिन्दू धर्म सादा जीवन, उच्च विचार जैसी मान्यताओं को प्रश्रय देता है। लेकिन पाश्चात्य सभ्यता एवं जीवनशैली की चकाचैंध में लोगों ने अपनी संस्कृति को छोड़कर पश्चिम की संस्कृति को अपनाया था। लोग हाथ जोड़कर नमस्ते करने के बजाए हाथ बढ़ा कर हाथ मिलाने एवं गले लगाने को ज्यादा सभ्य समझने लगे थे। जबकि हाथ जोड़ने के वैज्ञानिक पहलू पर उनका कभी ध्यान नहीं गया। हाथ जोड़कर नमस्ते करने पर जब दोनों हाथ की उंगलियां एक साथ मिलती हैं तब नसों में आपस में एक दबाव बनता है, जो एक्यूपंचर का काम करता है।
इससे स्मरण शक्ति तीव्र होती है तथा यह आंख, नाक एवं कान के लिए भी लाभप्रद होती है। हिन्दू परिवारों में सदैव बाहर से आने के बाद हाथ पैर धो कर ही घर के भीतर घुसने और जमीन पर सुखासन में बैठकर खाने की परंपरा रही है। सुखासन में बैठ कर खाने से पाचन संबंधित परेशानियां कम होती हैं। आज के समय में कोरोना से बचाव के लिए बार-बार साबुन से हाथ धोने की बात की जा रही है। जबकि पहले के समय घरों का निर्माण भी कुछ इस प्रकार होता था कि दरवाजे से घुसते ही नल और पानी की व्यवस्था रहती थी जिससे व्यक्ति हाथ, पैर व मुुंह अच्छे से धोकर ही घर में प्रवेश करता था। लेकिन आज के आधुनिक समाज में कन्क्रीट के जंगल तैयार हो रहे हैं। ऊंची इमारतें की वजह से धूप और शुद्ध हवा की बहुत कम गुंजाइश बची है। आधुनिक जीवनशैली का अनुसरण कर लोग जूते चप्पल पहन कर ही भोजन आदि करने बैठ जाते हैं। हाथ धोने की जगह टिशू का प्रयोग करते हैं। ऐसे में इस तरह की आदतें व्यक्ति को बीमार बनाने के लिए काफी हैं।

यज्ञ-हवन से होती शुद्धि
namaskar _1  H
शहरों में बढ़ती आबादी के कारण, जहां एक ओर मोटर गाड़ियों की संख्या बढ़ रही है, वहीं तेजी से पेड़ों को काटा जा रहा है। इससे वायु प्रदूषण की दर, साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। जबकि हमारी परंपरा में दैनिक यज्ञ को अत्यधिक महत्व दिया गया है। हवन में आहुति देने के लिए जिस हवन सामग्री का प्रयोग होता है उसमें गुग्गुल, लोबान, कपूर आदि का सम्मिश्रण रहता है जो वातावरण को शुद्ध करने और उसमें उपस्थित हानिकारक कीटाणुओं एवं जीवाणुओं को नष्ट करने में सहायक सिद्ध होता है। पूजा-अर्चना के समय नियमित रूप से घी का दीपक जलाना एवं आरती करना धार्मिक क्रिया के साथ ही वैज्ञानिक तथ्यों की पुष्टि भी करती है। यह प्रक्रिया भी हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने मंे सहायक होती है। सनातन धर्म में प्रातः एवं सायंकाल मंदिरों तथा घरों में घण्टे और शंख बजाने की परम्परा रही है। ये ध्वनियां वातावरण में उपस्थित अनेकानेक विषाणुओं को खत्म करने में सहायक सिद्ध होती हैं।
रोग प्रतिरोधक क्षमता को जगाने की जरूरत
आज कोरोना वायरस के संक्रमण से लोग भयाक्रांत हैं। पाश्चात्य जीवनशैली से खोखले हो चुके मनुष्य शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता क्षीण सी हो गयी है। भारतीय संस्कृति को भूलकर लोग आधुनिक बनने की होड़ में लगे हुए हैं। जबकि हमारे यहां सूर्योदय पूर्व जागरण के पश्चात स्नान कर, उदय होते सूर्य को जल देने का नियम था। उदित होते सूर्य की किरणों का शरीर पर पड़ना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। मशीनी जीवनशैली को जीने वाले ज्यादातर लोग या तो सुबह देर से उठते हैं या फिर उठकर योग-व्यायाम करने की अपेक्षा जिमखाना जाना अधिक पसन्द करते हैं। प्रातःकाल खुले वातावरण में बैठ कर योग-व्यायाम एवं ध्यान करने से शरीर, मन, बुद्धि तथा आत्मा की शुद्धि होती है। व्यक्ति स्वस्थ एवं निरोगी रहता है। सकारात्मकता का अनुभव करता है। बन्द जिमखानों में एक ही मशीन पर तमाम लोग पसीना बहाते हैं और अशुद्ध हवा का सेवन करते हैं। इससे कई तरह की बीमारियों और संक्रमण का खतरा पैदा हो जाता है। पश्चिम की ये नकल कितनी नुकसानदायक है ये समझना बहुत आवश्यक है।

वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक: आदि शंकराचार्य

आद्य शंकराचार्य जयंती- वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक:

आदि शंकराचार्य का आगमन ऐसे समय हुआ, जब विदेशी आक्रांताओं के हमलों और षड्यंत्रों के कारण सनातन संस्कृति अपना ओज खो रही थी। ऐसे में उन्होंने न केवल वैदिक धर्म-संस्कृति की रक्षा की, बल्कि राष्ट्रीय भावना को मुखरित और जाग्रत करने के लिए चार धामों की स्थापना भी की

a_1  H x W: 0 x
  
आदि शंकराचार्य का आगमन उस समय हुआ, जब विदेशी आक्रांताओं के षड्यंत्रों के कारण सनातन धर्म-संस्कृति खतरे में थी। 32 वर्ष की अल्पायु में वैदिक चिंतन और संस्कृति की रक्षा के लिए उन्होंने जो प्रयास किए उससे न केवल देश में राष्ट्रीय भावना मुखरित व जाग्रत हुई, बल्कि उन्होंने देश के चार कोनों में चार धामों– ब्रदीनाथ (उत्तर), रामेश्वरम (दक्षिण), जगन्नाथपुरी (पूरब) और द्वारिका (पश्चिम) की स्थापना कर देश में सांस्कृतिक जागरण का अपना दायित्व निभाया। साथ ही, राष्ट्रवाद की भावना को भी बलवती बनाया। इन धामों की स्थापना के पीछे उनका उद्देश्य राष्ट्र और संस्कृति को बचाना था।
शंकराचार्य का जन्म करीब 1200 साल पहले केरल के एक ब्राह्मण परिवार में बैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ था। उनके पिता शिवगुरु तैतरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। महज तीन-चार वर्ष की आयु में ही शंकराचार्य की बौद्धिक प्रतिभा दिखने लगी थी। सात वर्ष की आयु में वह कई शास्त्रों के ज्ञाता बन गए। उस युग के ख्यातिनाम ज्योतिषियों ने कुंडली देख कर बताया कि बालक अत्यंत दुर्लभ महापुरुष होगा, लेकिन इसकी आयु बहुत कम होगी। यह सुनकर शंकर की मां चितिंत हो गईं। एक ओर बालक शंकर अपना जीवन देश को अर्पित करने को तत्‍पर थे तो दूसरी ओर मां बेटे को अपने से अलग नहीं होने देना चाहती थी। बालक शंकर ने युक्ति से काम लिया। एक दिन वह मां के साथ नदी स्नान करने गए। तैरते-तैरते वह बीच नदी में पहुंच गए और चिल्लाने लगे,‘‘मां, मगरमच्छ ने मुझे पकड़ लिया है। अब केवल भगवान शंकर ही मेरी रक्षा कर सकते हैं। यदि तू मुझे उनको अर्पित कर दे तो मेरी जान बच सकती है।’’ मां के पास बेटे की बात मानने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। इस तरह, मात्र आठ वर्ष में घर त्याग कर वह मीलों का कष्टकारी सफर तय कर वेदांत के प्रकांड विद्वान महायोगी गोविंदपाद के पास पहुंचे। उनसे गुरु दीक्षा व संन्यास ग्रहण किया और दो वर्ष में ही अपनी शिक्षा पूरी कर ली।
इसके बाद गुरु आज्ञा से अपने वयोवृद्ध गुरु भाइयों के साथ काशी में जब उन्होंने वेदांत के गूढ़ रहस्यों पर प्रवचन दिया तो वहां हलचल मच गई। उन्होंने बड़े-बड़े पंडितों की शंकाओं का समाधान कर वेदांत-मत का प्रतिपादन किया। उस समय उनकी आयु 11 वर्ष थी। काशी प्रवास के दौरान ही उनका छुआछूत पर अहंकार भी टूटा था। हुआ यूं कि एक दिन शंकराचार्य प्रात:काल नदी में स्नान कर लौट रहे थे कि एक चांडाल से छू गए। चांडाल पर अपवित्र करने का आरोप लगाते हुए उसे भला-बुरा कहने लगे। इस पर चांडाल ने हंसते हुए कहा, ‘‘महाराज! संन्यास लेकर संत तो बन गए। वेद पढ़कर पंडित भी बन गए, पर तुच्छ देह का अभिमान नहीं गया। सबके शरीर में एक ही आत्मा का निवास है, इस सत्य को जाने बिना आपका संन्यास दिखावा है।’’ उसकी बातों ने शंकाराचार्य की आंखें खोल दीं।
शंकराचार्य के समय में महात्मा बुद्ध का दिव्य तत्व दर्शन अपना मूल स्वरूप खो चुका था। सीमाओं पर म्लेच्छों की दृष्टि थी। ऐसे संक्रमण काल में देश में विलुप्त वैदिक संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा करना उनकी राष्ट्र निर्माण योजना का एक महत्वपूर्ण अंग था। उन्होंने देशभर में वैदिक धर्म के प्रचार के लिए चिद्विलास, विष्णुगुप्त, हस्तामलक, समित पाणि, ज्ञानवृन्द, भानु गर्भिक, बुद्धि विरंचि, त्रोटकाचार्य, पद्मनाम, शुद्धकीर्ति, मंडन मिश्र, कृष्ण दर्शन आदि विद्वानों को संगठित कर उनके सहयोग से वेद धर्मानुयायियों की एक विशाल धर्म सेना बनाई और पूरे भारत में धर्म सुधार किया। इससे पूरे देश में फिर से वैदिक धर्म का शंखनाद गूंजने लगा। भगवान बुद्ध ने धर्म में आए गतिरोध व कुरीतियों को दूर करने के लिए बौद्ध मत की स्थापना की थी, लेकिन बौद्ध मतावलंबी ही जब हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने लगे और बौद्ध मठ वामाचार के केंद्र बनने लगे तो शंकराचार्य ने पूरे देश में पदयात्रा कर वैदिक धर्म का पुनरुद्धार किया। बौद्धों को शास्त्रार्थ में परास्त करने के बाद उन्होंने वैदिक धर्म के उत्कर्ष के लिए पाशुपत, शाक्त, तांत्रिक, शैव, माहेश्वर, वैष्णव आदि संप्रदायों के मठाधीशों को चुनौती दी, जिन्होंने धार्मिक कुरीतियों का प्रचार कर लोगों को कुमार्गी बना दिया था। उन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैतरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्य उपनिषद के भाष्य लिखकर नई विचार क्रांति को जन्म दिया। मंडन मिश्र और कुमारिलभट जैसे समकालीन बौद्ध विद्वानों से धर्म की उपादेयता पर शास्त्रार्थ कर वैदिक धर्म का पुनरुद्धार किया। इसके बाद उन्होंने जगन्नाथपुरी, उज्जयिनी, द्वारिका, कश्मीर, नेपाल, बल्ख, कांबोज तक पदयात्रा की और वैदिक धर्म का जयघोष किया।
बौद्ध धर्म के प्रकांड विद्वान आचार्य मंडन मिश्र के साथ भी उनका शास्त्रार्थ हुआ। शर्त थी कि शास्त्रार्थ में मंडन मिश्र पराजित हुए तो उन्हें संन्यास ग्रहण करना पड़ेगा, जबकि शंकराचार्य पराजित होते तो उन्हें गृहस्थ जीवन स्वीकार करना था। शास्त्रार्थ में निर्णायक की भूमिका मंडन मिश्र की पत्नी उभय भारती ने निभाई। एक रोचक घटनाक्रम में शंकराचार्य विजयी हुए और मंडन मिश्र को संन्यास लेना पड़ा। इस तरह शंकराचार्य ने वैदिक ज्ञान की सर्वोच्चता साबित की। देश भ्रमण के दौरान जब वह बद्रीनाथ धाम पहुंचे तो उन्हें मूर्तिविहीन देवालय की दुर्दशा का पता चला। बौद्धों ने नारद कुंड में मूर्ति फेंक दी थी। उन्होंने स्वयं नारद कुंड से देव प्रतिमा निकाली, पर विग्रह का एक पांव खंडित था। पंडितों ने खंडित विग्रह की स्थापना का विरोध किया, पर शंकराचार्य के तर्कों से वे निरुत्तर हो गए। अंतत: मूर्ति जोड़कर पुन: उसकी प्रतिष्ठा की गई। जीवन के अंत समय तक शंकराचार्य धर्म को प्रतिष्ठित करने में लगे रहे और अल्पायु में जगद्गुरु की पदवी पााई।

                        ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या के प्रतिपादक

अद्वैत वेदांत के प्रणेता आदि शंकराचार्य का चिंतन आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित है। इसके अनुसार, परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण, दोनों ही स्वरूपों में विद्यमान रहता है। उन्होंने वेदों को ईश्वर की वाणी कहा और पूरे देश में उसका प्रचार-प्रसार किया। उनके अनुसार सत्य वही है जो जैसा है वैसा ही दिखे। इसी आधार पर उन्होंने ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या बताया। उनका कहना था कि संसार में सब कुछ बदलता रहता है। नहीं बदलता है तो केवल आत्मा और ब्रह्म। उन्होंने पांच अद्भुत सूत्र दिए- सेवा, साधना, सत्कर्म, स्वाध्याय और परमात्मा के प्रति समर्पण भाव। उन्होंने कहा कि जन्म से हर आदमी शूद्र है, उसकी जाति का निर्धारण कर्मानुसार होता है।

             शंकराचार्य मंदिर: कला-संस्कृति की अनुपम धरोहर

जम्मू-कश्मीर स्थित भव्य शंकराचार्य मंदिर कला-संस्कृति व पुरातात्विक दृष्टि से भी अति विशिष्ट है। श्रीनगर में डल झील के पास पहाड़ी पर स्थित हजारों साल पुराने इस अष्टकोणीय मंदिर को प्रस्तर वास्तु शिल्प का नायाब नमूना माना जाता है। इस शिव मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा कश्मीर के राजा गोपादित्य ने ई.पू. 371 में कराई थी और इसकी देखरेख व पूजापाठ का जिम्मा स्थानीय अग्रवर्ती ब्राह्मणों को सौंपा था। शुरू में इस मंदिर का नाम गोपादारी मंदिर था जो बाद में शंकराचार्य मंदिर हो गया। कहते हैं कि पदयात्रा के क्रम में शंकराचार्य कश्मीर भी गए थे और श्रीनगर के इस पहाड़ी शिव मंदिर में भगवान शिव की आराधना की थी। उस समय अग्रवर्ती ब्राह्मणों से उनका शास्त्रार्थ भी हुआ था। शास्त्रार्थ में जीतने के बाद अग्रवर्ती ब्राह्मणों ने पारितोषिक के तौर पर मंदिर ही शंकराचार्य को समर्पित कर दिया।

Monday, April 13, 2020

Saturday, April 11, 2020

ज्ञान और गुण जिनके भीतर "महासागर" की भांति विद्यमान हैं वही हनुमान हैं :

ज्ञान और गुण जिनके भीतर "महासागर" 
की भांति विद्यमान हैं वही हनुमान हैं :



गोस्वामी तुलसीदासजी ने जब हनुमान चालीसा की रचना की तो बजरंग बलि का वर्णन "ज्ञान गुन सागर"कहकर किया। ज्ञान और गुण जिनके भीतर "महासागर" की भांति विद्यमान है वही "महावीर हनुमान" हैं। गोस्वामीजी ने आखिर ज्ञान और गुणों का महासागर हनुमानजी को ही क्यों कहा, हम इस पर ही विचार करेंगे।
महासागर के सात लक्षण हैं। सागर गहन है, विशाल है, गंभीर है, उसमें खारा जल है, वह सदैव मर्यादा में रहता है। सागर में बहुमूल्य रत्न होते हैं और सबसे बड़ी बात, भगवान नारायण समुद्र में अपने शेषशैया पर सदा विराजमान रहते हैं। महासागर के ये सातों लक्षण बजरंगबलि में देखे जा सकते हैं।
1) गहनता : गहन अर्थात गहराई, घना। महासागर में गहन जलराशि है, उसकी गहराई को कोई माप नहीं सकता। इसी तरह वीर हनुमान की कर्तव्यनिष्ठा गहन है। श्रीराम का कार्य ही उनके जीवन का उद्देश्य है। सीता की खोज हो या हिमालय से संजीवनी लाने का कार्य, नागपाश से राम-लखन को बंधनमुक्त करना हो या फिर पाताल लोक में जाकर अहिरावण को मारकर राम-लक्ष्मण को सुरक्षित वापस लाना। कठिन से कठिन, विशाल और असम्भव कार्य को सम्भव बनाना हनुमानजी की विशेषता है। प्रत्येक चुनौती का समाधान करने के लिए वे सदैव तत्पर रहते हैं। प्रत्येक कार्य को निपुणता से पूर्ण करने के लिए वे गहनता से विचार करते हैं।
2) विशालता : विशालता अर्थात व्यापकता,विस्तार। महासागर इतना विशाल होता है कि संसार की सारी नदियां उसमें आकर समा जाती हैं। महासागर तो एक ही है, उसकी सीमा की थाह पाना असम्भव है, इसलिए वह असीम है! अनेक देशों की सीमाएं सागर से लगकर है। महासागर तो एक ही है पर विभिन्न देशों में फैले उसके विस्तार को भिन्न-भिन्न नाम दे दिए गए। जैसे अपने यहां दक्षिण में हिन्द (हिन्दू) महासागर, पश्चिम में सिंधु (अरब) सागर और पूर्व में गंगा (बंगाल की खाड़ी) सागर। इसी तरह कहीं प्रशान्त महासागर (Pacific Ocean), अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean), दक्षिणध्रुवीय महासागर (Southern Ocean) तथा उत्तरध्रुवीय महासागर (Arctic Ocean) आदि।
हनुमानजी भी विशाल हैं। जब सीताजी की खोज के लिए श्रीरामजी की वानर सेना निकल पड़ी तो वे दक्षिण में सागर तट पर पहुंचे। सागर के उस पार लंका जाना है। हनुमानजी भी चुपचाप बैठे थे। तब जाम्बवन्त ने कहा,
“कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥”
जाम्बवन्त के इस कथन के कहते ही हनुमानजी का आकार विशालकाय हो गया। इतना ही नहीं तो वे परवातों के राजा की तरह दिख रहे थे और वे गरजकर कहते हैं कि मैं इस खारे समुद्र को खेल-खेल में लांघ सकता हूं।
कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहु अपर गिरिन्ह कर राजा।।
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहीं नाषउँ जलनिधि खारा।।
हनुमानजी का हृदय भी विशाल है। वे सुग्रीव की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे। अंगद का कल्याण चाहते थे। यहां तक कि विभीषण जो शत्रुदल से आए हैं। श्रीराम पूछते हैं कि क्या किया जाए हनुमान? हनुमानजी कहते हैं कि विभीषण को अपना लीजिए। हनुमानजी के कथन पर श्रीरामजी ने विभीषण को अपना मित्र बनाया। बजरंगबलि की व्यापकता और उनपर जनमानस की श्रद्धा को रेखांकित करते हुए हनुमान चालीसा में तुलसीदासजी बहुत सुंदर वर्णन करते हैं। “और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेई सर्ब सुख करई।।”अर्थात हे हनुमानजी! आपकी वंदना करने से सब प्रकार के सुख मिलते हैं। फिर किसी देवता की पूजा करने की आवश्यकता नहीं रहती।
3) गम्भीरता : गम्भीरता यानी गाम्भीर्य (सीरियस), शान्त, धीर। महासागर का यह तीसरा लक्षण है। वैज्ञानिक मानते हैं कि पृथ्वी का 71 प्रतिशत भाग समुद्र से घिरा है जिसमें खारा पानी और बर्फ की चट्टानें हैं, शेष 29 प्रतिशत हिस्सा भूभाग है। इसके बावजूद समुद्र गहन होने के साथ ही गम्भीर है। यदि वह गंभीर नहीं होता तो शेष भूभाग को अपने तेज थपेड़ों से बर्बाद कर देता। शक्ति होने पर भी वह उसे प्रगट नहीं करता। हनुमानजी भी कार्य को लेकर गम्भीर रहते हैं। कहीं भी लड़कपन, हंसी-मजाक या फूहड़ता उनमें नहीं है। वे श्रीराम की आज्ञा का पालन यथावत करते हैं। श्रीसीता के मिलने पर उन्हें या अंगूठी देने की बात श्रीराम ने हनुमानजी से कही थी। हनुमानजी लंका गए, लंका-दहन कर लौट आए। और जब श्रीराम के समीप आए तब उन्होंने लंका में अपने द्वारा किए गए पराक्रम का वर्णन नहीं किया। वे चिंतन करने लगे कि श्रीराम को माता जानकी का सन्देश किन शब्दों में देना चाहिए। लंका दहन का प्रसंग पहले कहूं या माँ सीता का धैर्य का वर्णन? पर‘बुद्धिमतां वरिष्ठं’ महावीर ने वाणी के संयम और तप का महान आदर्श प्रस्तुत किया। हनुमान ने श्रीराम से कहा, “दृष्टवा-देखि”, यानी मैंने माता सीता के दर्शन किए। हनुमान के मुख से निकले इस पहले वाक्य को सुनते ही श्रीराम की विरह वेदना समाप्त हो गई, उनके अंतःकरण में मची खलबली समाप्त हो गई। यह हनुमानजी के गाम्भीर्य का एक उदाहरण है।
4) खारा जल : सागर खारे जल से भरा है। हनुमानजी का भला खारे जल से क्या सम्बन्ध? ऐसा प्रश्न हमारे मन में उठ सकता है। आँसू खारा ही होता है। माता जानकी को अशोक वाटिका में व्याकुल देखकर हनुमानजी की आँखों से आँसू आते हैं, वे श्रीराम के सीता-वियोग की पीड़ा को समझते हैं। सदा रामभक्ति में लीन होकर वे अश्रुपूरित अंखियों से श्रीराम का भजन करते हैं।
5) मर्यादा : समुद्र की लहरें बहुत तेज होती हैं। पर सागर तबाही नहीं मचाता। उसकी लहरें आती हैं और किनारे से होकर लौट जाती हैं। “मर्यादा” समुद्र का पांचवा लक्षण है। मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के परमभक्त हनुमानजी का चरित्र श्रेष्ठतम है। वे अपने इन्द्रियों के स्वामी हैं। सदैव “मर्यादा” का पालन करते हैं। रामकथा में अनेक स्थानों पर रामकाज में सर्वाधिक अग्रेसर हनुमानजी ही हैं। श्रीराम की विजयगाथा में हनुमानजी के पराक्रम और सुझबुझ का अद्वितीय स्थान है। पर हनुमानजी में तनिक भी अहंकार नहीं है, वे सदा ही विनम्रता से श्रीराम के चरणों में बैठते हैं। संसार में जहां भी श्रीराम का मंदिर देखेंगे तो वहां पाएंगे कि महावीर हनुमान की मूर्ति श्रीराम के चरणों के समीप है।
स्वामी विवेकानन्द की महान शिष्या भगिनी निवेदिता अपनी पुस्तक “रिलिजन एंड धर्म”में लिखती हैं कि, “सीता की खोज, लंका-दहन, द्रोणगिरि के लाने आदि जितने भी कठिन कार्य आए, हनुमान सबसे आगे रहे, पर राज्याभिषेक के पश्चात् राज्यसभा में जब प्रभु रामचन्द्र सबको पारितोषिक वितरण करने लगे तो वे एक ओर रामनाम स्मरण में तल्लीन थे। ऐसे पवनसुत हनुमान सेवकों के आदर्श हैं।...यही स्वयंसेवक वृत्ति प्रत्येक कार्यकर्ता में होनी चाहिए।”

6) बहुमूल्य रत्न :सागर का छठा लक्षण है “बहुमूल्य रत्न”। हिन्दू पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन से ही संसार को रत्न मिले हैं तथापि समुद्र रत्नों की खान है। समुद्र तल में मोती आदि बहुमूल्य रत्न पाए जाते हैं। हनुमानजी की दृष्टि में सांसारिक धन व्यर्थ है। वे “रामरतन” धन से परिपूर्ण हैं। हनुमान की पहचान यह रामधन ही है। रामभक्ति ऐसी कि जिनकी वे पूजा करते हैं वे स्वयं श्रीराम उनको अपने हृदय से लगाते हैं।
7) नारायण का वास :पुराणों के अनुसार, क्षीरसागर में भगवान नारायण लक्ष्मीजी के साथ शेषनाग पर विराजित हैं। इसका तात्पर्य है कि भगवान विष्णु समुद्र में विराजमान हैं। हनुमानजी के हृदय में सदैव भगवान श्रीराम विराजमान रहते हैं। अयोध्या में श्रीराम-जानकी के सम्मुख हनुमानजी ने अपना हृदय चीरकर भरी सभा में“सीता सहित राम-लखन” का दर्शन करवाया। इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है।
सचमुच महावीर हनुमान ज्ञान-गुण सागर हैं। उन्हें ज्ञान है कि वे कौन हैं? वे जानते हैं कि उनके जीवन का क्या उद्देश्य है? श्रीराम चरणों में सदा समर्पित, श्रीराम के आदेश का पालन करना यही उनका जीवन है। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि महावीर को आदर्श मानो। 
स्वामीजी कहते हैं :

 “तुम्हें महावीर के चरित्र को आदर्श के रूप में अपने सामने रखना होगा। देखो, किस प्रकार से रामचंद्र की आज्ञा पर समुद्र को लांघ गए। उन्होंने अपने जीवन या मृत्यु की तनिक चिंता नहीं की। वे अपनी इंद्रियों के पूर्ण स्वामी थे और अदभुत प्रज्ञा से संपन्न थे। तुम्हें व्यक्तिगत सेवा के इस महान् आदर्श के नमूने पर अपने जीवन का निर्माण करना होगा। उसके द्वारा अन्य समस्त आदर्श भी जीवन में स्वतः धीरे-धीरे प्रकट होंगे। गुरु की आज्ञा का आँख मूंद कर पालन करो। ब्रह्मचर्य का निष्ठापूर्वक आचरण ही सफलता का मूल मंत्र है। हनुमान जहां एक ओर सेवा के आदर्श के प्रतीक हैं, वहीं दूसरी ओर वे समस्त संसार को आतंकित कर देने वाले सिंहवत् साहस के भी प्रतीक हैं। राम के हित के लिए उन्हें अपने प्राणों का बलिदान करने में तनिक भी संकोच नहीं है। राम के सेवा के अतिरिक्त प्रत्येक चीज की ओर से विरक्त हैं। यहां तक कि विश्व के महान् देवता ब्रह्मा अथवा विष्णु के स्थान को प्राप्त करने की लालसा भी नहीं है। उनके जीवन का एक ही व्रत है- राम की प्रत्येक इच्छा को क्रियान्वित करना। ऐसी ही पूर्ण-समर्पणकारी भक्ति चाहिए।”
 हनुमानजी भक्ति, सेवा, बल, बुद्धि, विवेक, मर्यादा, संगीत और ज्ञान-गुण के प्रतीक हैं। आज संसार में फैले आसुरी शक्ति और अनैतिकता से लड़ने के लिए हनुमत शक्ति की आवश्यकता है। स्वामी विवेकानन्दजी के विचारों के अनुसार “महावीर हनुमान का आदर्श” हमें अपनाना ही होगा। श्रीराम मंदिर निर्माण की प्रतीक्षा देशभर श्रीराम भक्त कर रहे हैं। आइए, रामकाज के लिए हनुमानजी के आदर्श को अंगीकृत करें।

बलूचिस्तान स्थित हिंगलाज माता की महिमा:

हिंगलाज की महिमा:

अरविन्द :-

बलूचिस्तान में हिंगलाज की पहाड़ियों पर स्थित हिंगलाज माता का मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। इसकी महिमा ऐसी है कि यहां मुसलमान भी सिर नवाते हैं। कहते हैं कि यहां माता सती का शीश गिरा था I

a_1  H x W: 0 x

बलूचिस्तान स्थित माता हिंगलाज मंदिर। 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है
ओरमारा (हिंगलाज) से इफ्तिखार
 बलूचिस्तान की धरती पर हिंदुओं का एक बड़ा तीर्थ है-हिंगलाज मंदिर। यहां हिन्दुस्थान से बड़ी संख्या में हिंदू श्रद्धालु माता के दर्शनार्थ आते हैं। यह माता सती से जुड़े 51 शक्तिपीठों में से एक है। हिंगलाज माता को मनोकामना पूर्ण करने वाली देवी माना जाता है। यहां मुसलमान भी बड़ी संख्या में जियारत करने आते हैं।
 बलूचिस्तान की सबसे लंबी नदी है हिंगोल। 358 मील लंबी इस नदी का उद्गम सुराब घाटी के मुहाने से होता है जो लासबेला जिले के मकरान के उत्तर-पूर्व भाग तक जाती है। इसके बाद यह जमीन के अंदर के तमाम माध्यमों के जरिए अरब सागर में जाकर मिल जाती है।
 अरब सागर के इसी इलाके में है हिंगोल नेशनल पार्क। हिंगलाज मंदिर इसी पार्क में है। हिंगोल नदी को अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है। हिंगलाज मंदिर के पास से गुजरने पर यह अघोर कहलाती है। मंदिर के दोनों ओर हजार फुट ऊंची हारा की पहाड़ियां हैं। इन्हीं पहाड़ियों की बीच मिट्टी की प्राकृतिक गुफा में यह मंदिर स्थित है।
 यहां खास तौर से हर साल मार्च-अप्रैल में लोग दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर की बार्इं ओर पक्के मुसाफिरखाने हैं, जहां लोगों के ठहरने की व्यवस्था है। माता के दर्शन कर चुके लासबेला के भक्त दास कहते हैं, ‘‘सती के आत्मदाह करने के व्यथित और क्रोधित भगवान शिव उनके शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे। तब दुनिया को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने शिव का मोह भंग करने के लिए सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए थे। तब माता का सिर यहीं गिरा था। यहां माता विग्रह रूप में हैं।
हिंदुओं के लिए यह बहुत बड़ा तीर्थ है और सभी शक्तिपीठों में यहां की मान्यता सबसे अधिक है। नवरात्र के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है। प्रकृति की सुरम्यता के बीच स्थित इस मंदिर में अलौकिकता का अनुभव होता है। माता हिंगलाज का ऐसा प्रताप है कि सच्चे दिल से जो भी मांगो, वे उसे पूरा करती हैं।’’ पहले मन्नत मांगने का तरीका थोड़ा अलग था। श्रद्धालुओं को मंदिर के सामने जलते अंगार पर चलते हुए मन्नत मांगनी होती थी।
 इस शक्तिपीठ को मुसलमान ‘नानी का मंदिर’ कहते हैं। माता हिंगलाज को ‘नानी’ कहने के पीछे वजह शायद ईरान से इसका जुड़ाव है। बहुत पहले ईरान के लोग ‘ननईया’ नामक पीर की इबादत करते थे, जिनकी तस्वीर ईरान के सिक्कों पर मिलती है। वैसे भी, पुराने बलूचिस्तान का एक तिहाई हिस्सा ईरान में पड़ता है। इसलिए ईरान से सटे होने के कारण इन इलाकों का एक-दूसरे की परंपराओं पर काफी असर था।
 भक्त दास बताते हैं कि मंदिर परिसर में ही एक ब्रह्मकुंड है। इसमें पानी कहां से आता है, कोई नहीं जानता। मान्यता है कि कुंड में नारियल फेंकने पर पानी में जो तरंग उठती है, उससे व्यक्ति के जीवन में आने वाले सुख-दुख का पता चलता है। गोलाकार तरंग का दायरा जितना बड़ा होगा, नारियल फेंकने वाले व्यक्ति के जीवन में उतनी ही अधिक खुशियां होंगी। लेकिन दायरा जितना छोटा होगा, उसके जीवन में उतना ही दुख होगा।
 इस मंदिर के बारे में एक और मान्यता प्रचलित है। कहते हैं कि ‘नानी मंदिर’ में दर्शन के लिए आने वाले व्यक्ति की नीयत साफ होनी चाहिए, नहीं तो उसके साथ ऐसी कोई न कोई घटना घट जाती है जिससे उसे अपनी गलती का एहसास हो जाता है। मलिन मन के साथ आने वाले लोगों के साथ क्या-क्या हुआ, इससे भी जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। वे कहते हैं कि यह मंदिर औरतों का सम्मान करने का संदेश भी देता है।
 भक्त दास कहते हैं, ‘‘बहुत साल पहले यहां एक रियासत थी। रियासत का राजा औरतों पर बहुत अत्याचार करता था। लेकिन वह देवी का बहुत बड़ा भक्त था। उसने अपनी भक्ति से देवी को प्रसन्न किया। जब देवी प्रकट हुर्इं तो उसने अमरता का वरदान मांगा, लेकिन देवी ने ऐसा वरदान देने से इनकार करते हुए कहा कि तुम ऐसा वर मांग सकते हो कि तुम्हारी मौत मुश्किल से आए।
तब उसने कहा कि मां मुझे ऐसा वर दो कि मेरी मृत्यु ‘नानी’ के हाथों ही हो, वह भी ऐसी जगह जहां रोशनी न पहुंचती हो। बाद में उसके अत्याचार से औरतों को बचाने के लिए ‘नानी’ ने एक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धरा। एक दिन राजा की निगाह उस रूपसी पर पड़ी और वह उसका पीछा करने लगा। देवी उसे एक गुफा में ले गर्इं और उसका वध कर दिया। इसी तरह, हिंगलाज माता से जुड़ी कई कथाएं और किंवदंतियां प्रचलित हैं। यह ऐसा जागृत तीर्थस्थल है जो न केवल लोगों की मनोकामनाएं पूरी करता है, बल्कि उनकी सोच को भी पवित्र करता है।’
 हिंगलाज माता मंदिर कितना पुराना है, इस बारे में कोई ठोस प्रमाण तो नहीं है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इसकी मान्यता बहुत अधिक है। एक स्कूल शिक्षक मेहराब बेजेन्जो कहते हैं, ‘‘प्रकृति ने बलूचिस्तान को भरपूर संपदा से नवाजा है। यही नहीं, यहां हजारों साल पहले भी जो लोग रहते थे, वे भी सभ्य थे। मेहरगढ़ का इलाका बलूचिस्तान में ही है। यहां हुए उत्खनन से साबित हो चुका है कि आज से तकरीबन सात हजार साल पहले भी यह इलाका आबाद था।
 यानी यहां की सभ्यता हड़प्पा और मोएंजोदरो से भी पुरानी है। इसी तरह, हिंगलाज माता का मंदिर कितना पुराना है, इसके बारे में हमने पता लगाने की कभी कोशिश नहीं की। आज हमारे पास तमाम नए तरीके हैं जिनसे किसी भी जगह के बारे में काफी-कुछ जाना जा सकता है। लेकिन जिस मुल्क में जहालत का ऐसा आलम हो कि हुकूमत बलूचिस्तान की संस्कृति को खत्म करने पर आमादा हो, वहां क्या उम्मीद की जा सकती है?’’
 मंदिर में मुसलमानों के जियारत करने के बारे में मेहराब कहते हैं,‘‘बात जब हजारों साल पहले की हो तो जाहिर है, इसका मतलब यह इस्लाम के वजूद में आने से पहले से है। बुतपरस्ती को हराम बताने वाले लोग अगर नानी मंदिर में सिर नवाते हैं, लाल कपड़े बांधते हैं, चिराग रोशन करते हैं। इसकी जड़ें इस्लाम से पहले की उनकी रवायतों तक जाती हैं।
 मुस्लिम शासकों ने तो कई बार इस मंदिर को नष्ट करने की कोशिशें कीं, लेकिन बलूचिस्तान के लोगों ने इसका विरोध किया और हर बार इसे नष्ट होने से बचाया।’’ बलूचिस्तान की धरती ने सभी का स्वागत किया है, चाहे वह किसी भी मत-पंथ या मजहब का हो। हिंगलाज माता मंदिर उसी संस्कृति का नमूना है। यह आईना है उस दौर का जब इस इलाके में रहने वाले अलग-अलग कबीलों के लोगोंके बीच यह एक-दूसरे की पहचान को बनाए रखने का एक विशेष स्थान था।

Friday, April 10, 2020

Bhish­­­ma, the Virtuous:

Bhish­­­ma, the Virtuous:

What curse for 18 days due to Bhishma had to sleep on a bed of arrows

 KK Shanmukhan:

 
Devrata has been observing the change of mood of his father. He summoned the ministers and the charioteer and questioned them. The prince rode his chariot alone and went straight to the Dasara king. He sought the hands of Satyavati for his father.
 
“I am very glad to be the father-in-law of the king. I had already told the king of my condition that the son born of my daughter should be the king after Santhanu. But…” He paused and said, “You being the first son the crown will naturally go to you.” “No,” said Devavrata vehemently. “I renounce my right as the heir apparent.”
 
The enthralled Dasara said, “Son, you are a real hero. Very few on the earth can make such sacrifice as you do here.” He continued, “But there is still one more hurdle.”
 
“And what is that?”
 
“It is this.” Said the king of the fisher-folks. “Your sons will naturally be as formidable as you are. If they came to claim the kingdom by force, no one can resist them. It is this that torments me.”
 
“No,” said Devavratha. “I shall remain unmarried throughout my life.” The fisherman hugged Devavratha with tears of joy and said, “You are a great soul! You are a rare example among men. Please lead my daughter to the king yourself. For this unparalleled stance of yours, you will be known as Bhishma.”
 
The gods from above poured showers of flowers on his head. Bhishma brought Satyavati home and offered her to his father. King Santhanu could not control his emotions. He hugged his son and with filled heart blessed him to be “Swachantha Mrithyu”, one who can accept death at his will. King Santhanu had two sons from Satyavati – Chitrangada and Vichitraveera. After king Santhanu’s demise, Chitrangada was crowned as king. Although he ruled the kingdom laudably, he could not live longer. In an encounter with a Gandharva of his same name, Chitrangada was annihilated and eventually Vichitraveera became king.
 
King of Kashi had three daughters of marriageable age – Amba, Ambika and Ambalika. They were very popular among the young princes all over Bharata for their beauty and grace. The king of Kashi fixed their ‘Swayamvara’. All the princes desirous of marrying the damsels would assemble there and the princesses can choose their husbands of their choice. Bhishma decided to bring the girls by force and get Vichitraveera to marry them.
 
The assembly of princes and the marriageable girls mocked at Bhishma who had proclaimed his celibacy and has come now at this advanced stage of age to seek brides. They scorned him loudly. The enraged Bhishma got up and challenged the entire assembly. The princes under the leadership of prince Salva opposed him. Bhishma fought them all single-handedly and defeated them. Collecting the three princesses he rode over to Hastinapura.
 
The wedding of the princesses with Vichitraveera was fixed. Amba, the eldest among them came to Bhishma and told him that she was in love with Salva. Bhishma instantly made arrangements for her return to Salva and got the other girls married with Vichitraveera.
 
Salva did not receive Amba. He was humiliated and defeated by Bhishma in the assembly as also dragged Amba by force. Now there is no question of any rethinking and compromise. She could select her way.
 
Amba went back to Bhishma. Vichitraveera had no mind to accept her. She had already chosen someone else as her husband. She approached Bhishma. Neither could he help her because he was a sworn celibate. She went to Parasurama, Bhishma’s Acharya in archery. Hearing her pathetic story Parasurama summoned Bhishma and asked him to marry her. This somehow did not work out. There ensued a fight between Parasurama and Bhishma in which the former had to acknowledge peace. Amba meditated on the lord and seeking a blessing for being the cause of death of Bhishma in her next birth, immolated herself in her yogic pyre. Amba was reborn as Sikhandin, a eunuch.
 
On the tenth day of the Mahabharata war, this unrivalled hero fell down on the battle field struck by Arjuna’s arrows all around. He did not resist Arjuna because Sikhandin, the eunuch was placed in front of Arjuna. It was against the attitude and principle of Bhishma to fight someone, born as a woman. The wrong attitude and the right principle caused Bhishma’s fall! n