Monday, April 11, 2022

धैर्य से अवश्य सिद्ध होगा हमारा लौटने का संकल्प

 

कश्मीरी नववर्ष उत्सव ‘नवरेह’ के अवसर पर कश्मीरी हिन्दू समुदाय को संबोधित किया। संजीवनी शारदा केन्द्र, जम्मू द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में सरसंघचालक ने स्पष्ट कहा कि धारा 370 हटने के बाद अब कश्मीरी हिन्दुओं का बहुत जल्द घाटी में अपने घरों को लौटना तय है। लेकिन तब तक संकल्प पक्का रखते हुए उद्यम करते जाना होगा


3 अप्रैल को रा. स्व. संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने वचुर्अल माध्यम से कश्मीरी नववर्ष उत्सव ‘नवरेह’ के अवसर पर कश्मीरी हिन्दू समुदाय को संबोधित किया। संजीवनी शारदा केन्द्र, जम्मू द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में सरसंघचालक ने स्पष्ट कहा कि धारा 370 हटने के बाद अब कश्मीरी हिन्दुओं का बहुत जल्द घाटी में अपने घरों को लौटना तय है। लेकिन तब तक संकल्प पक्का रखते हुए उद्यम करते जाना होगा, यहां श्री भागवत के उसी संबोधन के संपादित अंश प्रस्तुत हैं

नवरेह समारोह एक नये पर्व के प्रारंभ का द्योतक है। यह एक संकल्प का भी दिवस है। तीन दिन के इस समारोह में हम अपने पूर्वजों, महापुरुषों के व्यक्तित्व-कृतित्व का स्मरण करते हैं। उससे प्रेरणा लेते हैं। उससे कुछ बोध प्राप्त करके आगे बढ़ने का संकल्प करते हैं। इसीलिए इसे आज एक नया नाम दिया गया है-शौर्य दिवस। इस महोत्सव के आखिरी दिन को यह एकदम उचित नाम दिया गया है। हमने संकल्प लिया है तो इसकी पूर्ति के लिए कुछ शौर्य, कुछ उद्यम हमको करना ही पड़ता है। हमारे पास उद्यम है, साहस है, धैर्य है। जब हम बुद्धि, शक्ति और पराक्रम को समन्वित करके शौर्य दिखाते हैं तब दैवीय सहायता भी प्राप्त होती है। जीवन में सब प्रकार की परिस्थितियां आती हैं। परिस्थितियां आती हैं, तो जाती भी हैं। परिस्थितियों को लेकर हमारी एक कसौटी होती है जिसको पार करके हमारी क्षमता में और वृद्धि होती है। इसलिए उस परिस्थिति में अपने उद्यम, पराक्रम, धैर्य, साहस का महत्व होता है। उसी के आधार पर उस परिस्थिति को हम पार भी करते हैं।

संकल्प की शक्ति
आज हम एक ऐसी ही परिस्थिति में हैं। हम अपने ही देश में, अपने घर से विस्थापित होने का दंश झेल रहे हैं। लेकिन, यह परिस्थिति आज की नहीं है, यह पिछले तीन-चार दशकों से लगातार चली आ रही परिस्थिति है। परंतु आखिर इसमें से उपाय क्या है? पहला उपाय है कि हम इस परिस्थिति के सामने हारें नहीं। हमने इस परिस्थिति को पार करके विजय पाने का संकल्प लिया है। यह संकल्प महत्व की बात है। संकल्प लिया है कि अगले वर्ष अपने घर में, अपने प्रदेश में होंगे। यह संकल्प शक्ति बहुत महत्वपूर्ण है। आप जानते हैं कि अपनी भूमि से बिछडकर इज्राएल के लोग भी परिस्थिति के चलते दुनिया भर में बिखर गए थे। परंतु उनका भी एक त्योहार होता है ‘पासओवर’, जिस दिन वे संकल्प लेते हैं कि अगले वर्ष यरुशलम में होंगे। इस संकल्प को उन्होंने 1800 वर्ष तक जाग्रत रखा। पहले 1700 वर्ष तो केवल संकल्प रहा। उस संकल्प के आधार पर आगे कुछ होने की बात ही नहीं थी। कुछ होगा, ऐसा लगता भी नहीं था। लेकिन सौ साल में उन्होंने फिर से उसी भूमि में एक स्वतंत्र इज्राएल को स्थापित किया और अगले 30 वर्ष में सब बाधाओं का शाश्वत इलाज करके वह इज्राएल आज दुनिया के अग्रणी राष्ट्रों में से एक बना है।

हम विस्थापित होकर दुनियाभर में बिखरे तो हैं परंतु हमारे पास एक भूमि और है-हमारा कश्मीर, जो कि भारतवर्ष का अंग है। वह भारतवर्ष अपने पास है और केवल अपने पास है, ऐसा नहीं। पूरा भारतवर्ष हम लोगों के साथ है। उस साथ के चलते परिस्थितियां बदल भी रही है। उसका साक्ष्य फिर से हाल में मिला है

समय लगता है। प्रयास करने पड़ते हैं। लेकिन समय आने पर फल भी मिलता है। आज वह समय आया है। हमें धैर्यपूर्वक अपना उद्यम जारी रखना है। हम अपनी शर्तों पर वहां जाकर बसें, इसके लिए जो जो प्रयास करने हैं, वे करने ही हैं। इस प्रयास में सारा देश आपके साथ है। आपको केवल वहां बसना नहीं है, फिर से ऐसे उजड़ने की नौबत न आए इसलिए संपूर्ण भारत का अभिन्न अंग बनकर संपूर्ण भारत की मजबूत और जाग्रत सुरक्षा की छाया में हमको रहना है।

एक फिल्म आई है। विस्थापन की विभीषिका का सच संपूर्ण दुनिया में सामने लाने वाली फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’। उसकी चर्चा चल रही है। अब उसका विश्लेषण करके बहुत सारी बारीकियां खंगालकर कुछ लोग उसके पक्ष में, कुछ उसके विपक्ष में, कुछ लोग ‘आधा मानो-आधा बदलो’ बोलने वाले दिखते हैं। परंतु भारतवर्ष का सामान्य जनमानस यह कह रहा है कि इस विदारक सत्य को फिर से सारी दुनिया के सामने लाकर इस फिल्म ने न केवल कश्मीर के विस्थापित लोगों की व्यथा हमारे सामने रखी, बल्कि हमको झकझोर कर जगाया है। हमको कितना सजग रहना चाहिए, इसका भान हुआ है। हम सबक कर्तव्य है कि इस अन्याय का परिमार्जन हो। इस प्रकार की भावनाएं आज सारे भारत में हैं। जब ऐसा भाव है, तब नि:संदेह अगले वर्ष हम अपने घर में होंगे। अपनी भूमि पर रहेंगे। जहां हमारा घर-बार था, वहां वह फिर से होगा। यह जो अपना संकल्प है उसकी पूर्ति में अब बहुत दिन बाकी नहीं हैं। वह संकल्प निश्चित ही पूर्ण होने वाला है और शीघ्र पूर्ण होने वाला है।

उद्यम का ही महत्व
परंतु कोई संकल्प अपने आप पूर्ण नहीं होता है। इसके पूर्ण होने तक सतत परिश्रम करना पड़ता है। समुद्र मंथन का एक वर्णन है। उसमें कितने ही रत्न प्राप्त हुए, लेकिन उन रत्नों के कारण देवों ने अपना प्रयास बंद नहीं किया। उनको चाहिए था अमृत। उसके बिना समाधान नहीं था। इसके पहले उन्हें दुनिया के अलौकिक रत्न मिले, लेकिन उससे वे संतुष्ट नहीं हुए। सारी दुनिया को जलाकर भस्म कर दे, इस प्रकार का भयंकर हलाहल भी उसमें से निकला। लेकिन भय के मारे देवों ने अपना उद्यम बंद नहीं किया। देवों में ही एक साक्षात् शिवजी ने उस हलाहल को अपने कंठ में धारण करके सारे विश्व को उसके दाह से बचा लिया। लेकिन मंथन चलता रहा। अमृत के बिना विश्राम नहीं था, क्योंकि जो धैर्यशाली होते हैं, जो धीर होते हैं, वे अपने संकल्प की प्राप्ति के बाद ही विश्राम करते हैं। ऐसा शीघ्र होगा, लेकिन हमको प्रयास जारी रखना है। अब बात है कि वह प्रयास कैसे होगा? उसका मार्गदर्शक है हमारे पूर्वजों का चरित्र। बुद्धि, शक्ति, पराक्रम अपनी क्षमताएं हैं, जो हमारे पास हैं। ये हमने एक बार नहीं, हजार बार सिद्ध की हैं। इस विस्थापन के कारण अपनी भूमि से उखड़कर संपूर्ण दुनिया में फैलने के बाद भी हम लोगों का बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से अपने आपको जीवन में स्थिर करने का प्रयास अयशस्वी नहीं है। हमने उसको अभी तक तात्कालिक रूप से जारी रखा है। इसलिए कि हमको फिर से वापस जाना है।

हमारी क्षमता है कि दुनिया में कहीं भी बस सकते हैं। लेकिन हमारा संकल्प है कि हम अपनी भूमि में ही बसेंगे। इसलिए बुद्धि, शक्ति, पराक्रम की जो हमारी क्षमता है उसका लोहा तो सारी दुनिया ने माना है। परंतु उद्यम आवश्यक है। आनंद की बात है कि पिछले बार शिवरात्रि में मैं आपके बीच था, तब मैंने कहा था कि आपको देखकर मुझे हिम्मत मिलती है। आपने जो अपने जीवन में उद्यम किया है, अपने जीवन में प्रसन्नता कायम रखकर आगे बढ़ने के लिए आपका जो सतत् प्रयास है उसके लिए मैंने आपका अभिनंदन किया था। मैंने यह कहा था कि समस्या का हल व्यापक जनजागण से होगा। इसमें बाधा बनने वाली अनुच्छेद 370 हटाना पड़ेगा। और देखिए, 2011 के बाद 11 वर्षों में हम सब लोगों द्वारा मिलकर किये गये प्रयासों के कारण आज अनुच्छेद 370 नहीं रहा है और आज हमारे वापस जाने का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। यह हमारा उद्यम है जो हमको जारी रखना पड़ेगा। उसके लिए साहस से चूकना नहीं है। परंतु मुख्य बात है धैर्य, जो हमें बनाए रखना है।

ध्येय भूलें नहीं
परिस्थितियां हर वक्त सामान्य नहीं होतीं। सभी परिस्थितियों में हमारा बल भी सामान्य नहीं होता। इसलिए जिस परिस्थिति में हम हैं, उस परिस्थिति में किस प्रकार से अपने बल का प्रयोग करें, वह बल किस स्थिति में है, यह देखकर उसका प्रयोग करना पड़ता है। यहां श्री भट्ट का नाम लिया गया, श्री गुरु तेगबहादुर जी का नाम लिया गया। भट्ट जी पराक्रमी थे। परंतु उनके समय में उनकी जो स्थिति थी, उसमें लड़ना संभव नहीं था। लेकिन उसके कारण उन्होंने अपना ध्येय छोड़ नहीं दिया। उन्होंने वैदिक ज्ञान में अपनी कुशलता का प्रयोग करके जिस शक्ति को हम परास्त नहीं कर सकते, उस शक्ति को प्रसन्न कर लिया। उसकी प्रसन्नता के आधार पर विस्थापित हुए अपने सभी बंधुओं को सम्मानपूर्वक फिर से बसाने का रास्ता खोल दिया। अपनी कला और कुशलता का उपयोग उन्होंने अपने स्वार्थ के लिए नहीं किया। उन्होंने उसके बदले में अपने बंधुओं के हित को सबसे ऊपर माना। अपने देश के हित को ऊपर रखा।

हम संघ में पहले एक कथा सुनते थे-इतिहास की घटना है। शाहजहां की लड़की बीमार थी। उपचार नहीं हो रहा था, तो वहां एक ब्रिटिश डॉक्टर से दवाई लेने के बाद वह ठीक हो गई। शाहजहां ने उस डॉक्टर से पूछा, मांगो क्या चाहिए, मैं दूंगा। लेकिन उस डॉक्टर ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा। मांगता तो मालामाल हो जाता। डॉक्टरी बंद करके तीन पीढ़ी तक आराम से रह सकता था। परंतु उसने यह सब नहीं मांगा। उसने बादशाह से कहा, जो अंग्रेज व्यापारी इस देश में आते हैं उनके लिए आप जकात को माफ कर दो। टैक्स को माफ कर दो। अंग्रेजों के व्यापार को यहां और अधिक फैलाने के लिए, अपने देश के अर्थतंत्र को बढ़ाने के लिए जो चाहिए था, वही उसने मांगा था। हमको अपने बच्चों को ये कथा सुनाने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि हमारे इतिहास में भट्ट जी की कथा है। उन्होंने अपनी कुशलता का उपयोग करके अपने भूमि से उखड़े बंधुओं को फिर से वहां स्थापित करने का काम किया।

सबको संगठित करने वाले ललितादित्य
राजा ललितादित्य के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। जिन महापुरुषों के इतिहास से स्फूर्ति पाकर अपने देश के लिए पराक्रम करके प्राणों तक की बलि चढ़ाने वाले वीर योद्धा तैयार होते हैं, उनमें अग्रपंक्ति में राजा ललितादित्य का नाम है। उनके समय में अपने देश पर अरबों के आक्रमण का खतरा आया था। उनके सामने सिंध परास्त हो गया था और राजा दाहिर की मृत्यु हो गयी थी। राजा दाहिर के पुत्र ने प्राण भय से विधर्म को स्वीकार किया, लेकिन वह अरबी शासकों की प्रताड़ना झेलता रहा था। सिंध विजय के कारण उत्साहित हुए वे अरब पंजाब को, राजा ललितादित्य के साम्राज्य कश्मीर को डरा रहे थे। उनकी सीमाओं पर दस्तक दे रहे थे। यह निश्चित था कि वे आक्रमण करेंगे। गुजरात की तरफ, राजस्थान की तरफ, पंजाब की तरफ, हिमाचल, कश्मीर और आज जिसको अफगानिस्तान कहते हो, उस तरफ अपने पैर पसारने का उनका इरादा बिल्कुल साफ था। उन्होंने वारदातें करनी शुरू कर दी थीं। उस समय के तिब्बत के शासक के मन में भी अपने साम्राज्य विस्तार की आकांक्षा थी। वे पूरब में चीन के पश्चिम में हिमाचल से लगे अपने सीमावर्ती राज्यों को धमका रहे थे। मगध तक जीतने की उनकी इच्छा थी। ऐसी स्थिति में राजा ललितादित्य मुक्तपीड़ ने क्या किया? उन्होंने भारत के राजाओं का संघ तैयार किया। कोई औपचारिक सभा करके नहीं, लेकिन दूत भेजकर वार्ता हुई और उन्होंने लोगों में अपने राष्ट्रीय हित को जगाया।

सभी विविधताओं को स्वीकार करने वाले, सभी पूजाओं का सम्मान करने वाले, मनुष्य की स्वतंत्रता से लेकर राष्ट्रों की स्वतंत्रता तक का सम्मान करते हुए। मानवता का हित करने वाले इस देश को, इसकी संस्कृति को, विविधता को इसकी सीमाओं के बाहर रहने वाले कट्टरपंथी स्वीकार नहीं करते। ऐसी ताकतों से खतरा है। इसलिए अपना-अपना अभियान करते समय हम परस्पर पूरक होकर चलें और इन ताकतों को भारत की सीमाओं के परे खदेड़ दें। इस विचार को उनके समकालीन राजाओं के में दिल में बैठाने में ललितादित्य सफल हुए थे।

ललितादित्य का विचार सत्य था जो आज भी सत्य है। आज भी हमारा वही विचार है। हम ऐसे देश हैं जो विविधता का स्वीकार करते हैं। व्यक्ति से लेकर राष्ट्रों तक की स्वतंत्रता मान्य करते हुए संपूर्ण पृथ्वी को कुटुम्ब बनाना चाहते हैं। हम ऐसी उदात्त सनातन प्राचीन हिन्दू संस्कृति को मानने वाले लोग हैं। इसलिए दुनिया की कट्टरपंथी ताकतें हमको बार-बार धमकाती हैं। लेकिन उन पर विजय पाना और दुनिया को उनके चंगुल से मुक्त कराना, यह ईश्वर प्रदत्त कर्तव्य है। यही विचार ललितादित्य ने उस समय की भाषा में तत्कालीन भारतीय राजाओं को समझाया था।

उनकी संगठन कुशलता, विचारशीलता स्पष्ट दिखती है। सत्य पर जमकर खड़े होने की प्रवृत्ति दिखती है। वे डरे नहीं। उन्होंने संधि नहीं की। ‘मुसलमान बन जाओ, हमारा प्रभुत्व स्वीकार करो तो बचोगे’, ऐसा खुली चुनौती सभी को दी गई थी। ललितादित्य ने ऐसा नहीं किया, अन्य लोगों को भी इस खतरे से बचाया। राजा दाहिर के पुत्रों के मुसलमान बनने के बाद भी उन्हें अरब सत्ता सताने लगी। उनका अपमान करने लगी। ललितादित्य ने सभी राजाओं में स्वाभिमान जगाया, स्व का बोध जगाया। इन सब लोगों को जो दिग्विजयी ज्ञान हुआ उसका प्रमुख बल राजा ललितादित्य और उनकी सेना ही बनी थी। उन्होंने इन सब लोगों के अपने-अपने अभियान पूरक बनाकर उसके आघात से इन शत्रुओं को सीमापार भगाने का काम किया।

राजा ललितादित्य का भारत के इतिहास में यह बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। संपूर्ण एशिया के इतिहास में इसने एक प्रभाव पैदा किया है। हमारे पराक्रम का यह इतिहास हमारे लिए अत्यंत प्रेरणादायक है। इसके कारण पूरा सिंध स्वतंत्र हुआ और कट्टरपंथियों के आक्रमण से मुक्त हुआ। उनको काबूल-जाबूल के पार खदेड़ दिया गया। उसके बाद अरब लोगों को आक्रमण करने का जल्दी साहस नहीं हुआ।

उन्होंने चीन की सहायता लेकर तिब्बत के सम्राज्यवादी मंसूबों की काट की। इस दिग्विजय से इधर चीन से लेकर पश्चिम में ग्रीस तक के हमारे व्यापार के पांचों मार्गों को उन्होंने मुक्त करा लिया था। लेकिन कहीं आगे चलकर आक्रमकों में फिर से ऐसी आकांक्षा न जाग्रत हो, इसलिए उसे सुनिश्चित करते हुए वे फिर से पामिर के पहाड़ तक गए।

ललितादित्य का राज्य और उनका प्रशासन सुशासन का एक आदर्श था। प्रचंड साम्राज्य था उनका। उस समय जिसको मध्य क्षेत्र कहते थे, भारत में कन्नौज के राजा यशोवर्मन, उनका साम्राज्य और पूरा उत्तर क्षेत्र ललितादित्य के आधिपत्य में था। ललितादित्य लगभग सारी उम्र लड़ते रहे। उन्होंने अपने राज्य के बाहर जाकर दूर देशों में लड़ाइयां लड़ीं। लेकिन ऐसा होने पर भी उनके अपने राज्य में किसी प्रकार की अव्यवस्था नहीं थी

शिवाजी महाराज, राणा प्रताप के राज सुशासन और पराक्रम के आधार पर विजय और राष्ट्रीय दृष्टि के आदर्श हैं। वे अखिल भारतीय दृष्टि के आदर्श हैं। ललितादित्य उस परंपरा में इन दोनों के पूर्वज थे। उनके चरित्र से हमें प्रेरणा मिलती है कि किसी विषय पर सोचना कैसे है, उसे करना कैसे है। उनसे हमें एक आदर्श मिलता है। ऐसे थे हमारे पूर्वज। हमें इसका स्मरण रखना चाहिए। हमें उन गुणों को अपने में लाने का प्रयास करना चाहिए


शिवाजी महाराज, राणा प्रताप के भी राज ऐसे ही सुशासन और पराक्रम के आधार पर विजय और राष्ट्रीय दृष्टि के आदर्श हैं। वे अखिल भारतीय दृष्टि के आदर्श हैं। ललितादित्य उस परंपरा में इन दोनों के पूर्वज थे। उनके चरित्र से हमें प्रेरणा मिलती है कि किसी विषय पर सोचना कैसे है, उसे करना कैसे है। उनसे हमें एक आदर्श मिलता है। ऐसे थे हमारे पूर्वज। हमें इसका स्मरण रखना चाहिए। हमें उन गुणों को अपने में लाने का प्रयास करना चाहिए।

हमने गुरु तेगबहादुर जी महाराज का नाम लिया। वे परहित के लिए, देशहित के लिए, हिन्दू हित के लिए परम त्याग का आदर्श हैं। वे हिन्द की चादर थे। परंतु उसके पीछे एक विचार भी था। यह विचार था, सबके प्रति अपनेपन का, कट्टरपन का नहीं। यही धर्म है। उस धर्म के लिए उन्होंने औरंगजेब का आह्वान स्वीकार किया। कश्मीरी पंडितों की विनती को स्वीकार किया और उनको बचाने के लिए स्वयं दिल्ली गए। उन्होंने वहां अमानवीय तत्वों का सामना करते हुए सिर दे दिया, लेकिन सार नहीं दिया। अपने स्वयं के प्राणों की बलि चढ़ाकर उन्होंने भारत के प्राणों की रक्षा की। यह त्याग, यह धैर्य, यह साहस और पराक्रम, इसके साथ हमारी बुद्धि-शक्ति का संयोग हो और हम सतत् प्रयास में लगे रहें। इस प्रयास की आवश्यकता है।

पूरी तैयारी से हो वापसी का प्रण
आज एक जनजागरण हुआ है। भारत के लगभग सब सामान्यजन कश्मीर के विस्थापित बंधुओं के दुख-दर्द को जानते हैं। उनके साथ सहानुभूति रखते हैं। इसके लिए यह जनजागरण हुआ है। नीतियां चलेंगी, लेकिन एक बात और हमको ध्यान में रखनी है। हम अगले साल जाएंगे या उसके अगले साल जाएंगे। लेकिन हमको यह संकल्प भी रखना होगा अब जाएंगे तो ऐसे जाएंगे कि वहां पर जाकर बसने के बाद फिर से कश्मीर में ऐसी विभीषिका हमारे नसीब में नहीं आएगी। हम आठवीं बार बाहर आए हैं। हमको उसी कट्टरपन के कारण बाहर आना पड़ा है। अब जाएंगे तो हिन्दू बनकर, भारत भक्त बनकर, अपनी सुरक्षा के प्रति पूर्ण और स्वयं सन्नद्ध होकर जाएंगे। हम वहां अपनी आजीविका सुख से चला सकें। सबके साथ घुलें- मिलें। अपने विकास में सबका विकास साध सकें, ऐसे बसेंगे और ऐसे रहेंगे कि फिर से हमको कोई वहां से विस्थापित नहीं कर सकेगा। फिर से अगर कोई मन में दुराशा लेकर आए तो उसका अत्यंत कटु फल उसको चखना पड़ेगा। उसके पाप को उसे भुगतना पड़ेगा। इस प्रकार वहां की व्यवस्था हो। जिनके साथ हम पहले रहते थे, ऐसे लोग वहां पर अभी भी हैं। जिनके मन में हमारी प्रति द्वेष रहता था, वह शायद कम हो गया हो, पता नहीं। लेकिन उस द्वेष का पूर्ण निष्कासन होना चाहिए। उनको लगना चाहिए कि हमारे रहते हुए भी इन भाइयों को इतने वर्ष अपने ही देश में विस्थापित होकर कष्ट झेलने पड़े। उन्हें महसूस होना चाहिए कि हां, वह बहुत गलत हुआ। इसका समर्थन नहीं किया जा सकता। आइए, हम मिलकर रहेंगे, इसका परिमार्जन करेंगे। ऐसी मन:स्थिति बनानी पड़ेगी

इसके लिए समय लगता है। प्रयास करने पड़ते हैं। लेकिन समय आने पर फल भी मिलता है। 2011 में भी हमने यह संकल्प किया था। 2011 में भी जनजागरण हुआ था। कश्मीर किसी को देने की बात किसी भी तरह मानी नहीं जा सकती। लेकिन तब हमारे प्रयासों के फल खाने का समय नहीं आया था। वह समय अब आया है। धैर्यपूर्वक अपना उद्यम जारी रखना है। हम अपनी शर्तों पर वहां जाकर बसें, इसके लिए जो जो प्रयास करने हैं, वे करने ही हैं। इस प्रयास में सारा देश आपके साथ है। आपको केवल वहां बसना नहीं है, फिर से ऐसे उजड़ने की नौबत न आए इसलिए संपूर्ण भारत का अभिन्न अंग बनकर संपूर्ण भारत की मजबूत और जाग्रत सुरक्षा की छाया में हमको रहना है।

अब कश्मीर से लोग उजड़ेंगे और भारत के लोगों को पता ही नहीं होगा, ऐसा फिर से नहीं होगा। इतनी जाग्रति भी लानी पड़ेगी। ये सारे काम चल रहे हैं। आगे बढ़ रहे हैं। संकल्प पूर्ति का समय निकट है। अंतिम क्षण पर हड़बड़ी करने से काम नहीं बनता। कश्यप ऋषि की दो पत्नियां थीं-एक विनता, दूसरी कद्रू। कश्यप ऋषि ने संतान के लिए तपस्या की तो भगवान ने प्रसन्न होकर उनसे पूछा, कहो, कैसे पुत्र चाहिए? उन्होंने दोनों पत्नियों को बुलाया और पूछा कि भगवान पूछ रहे हैं, बताओ कैसे पुत्र चाहिए? माता के नाते आपकी क्या आकांक्षा है? कद्रू ने कहा, मुझे ढेर सारे पुत्र चाहिए। मैं अधिक से अधिक पुत्रों की माता बनूं। विनता ने कहा कि मुझे तो एक पुत्र भी चलेगा, लेकिन वह गुणवान होना चाहिए। पहली की ज्यादा संख्या की आकांक्षा थी तो उन्हें हजार पुत्र यानी ऐसा कहते हैं कि भगवान ने उन्हें हजार अंडे दिये और बोले कि इनको तोड़ो, इसमें से तुम्हारे पुत्र निकलेंगे। उसके हजार पुत्र निकले, लेकिन वे गुणवान नहीं थे, गुणहीन थे

हमारी क्षमता है कि दुनिया में कहीं भी बस सकते हैं। लेकिन हमारा संकल्प है कि हम अपनी भूमि में ही बसेंगे। इसलिए बुद्धि, शक्ति, पराक्रम की जो हमारी क्षमता है उसका लोहा तो सारी दुनिया ने माना है। परंतु उद्यम आवश्यक है। हम सब लोगों के द्वारा मिलकर किये गये प्रयासों के कारण आज अनुच्छेद 370 नहीं रहा है। आज हमारे घाटी में वापस जाने का मार्ग प्रशस्त हो रहा है

रेंगकर चलते थे। मिट्टी की ओर मुंह रहता था उनका। कोई उच्च आकांक्षा जीवन में नहीं थी। जिस धरती में पैदा हुए, उन्हें उसी में लिपटकर रहने का शौक था। ऊपर उठने की कोई आकांक्षा नहीं थी। वे सर्प कहलाए। और विनता के लिए दो अंडे दिये। वह उनको छह साल तक देखती रही उससे कोई बाहर नहीं आया। तो विनता का धैर्य चुक गया। उसने एक अंडे को तोड़ दिया। उसमें से तेजस्वी पुत्र निकला। अग्नि समान तेजस्वी वर्ण वाला। परंतु समय से पहले जन्मने के कारण उसके दोनों पैर नहीं थे। उसका नाम था अरुण। इसके बावजूद तेजस्वी होने की वजह से वह सूर्य के रथ का सारथी तो बना, लेकिन पंगु रहा। कारण, विनता का धैर्य टूटना। उस अरुण ने कहा, देखो मां, तुम्हारे कारण मैं बिना पैर के जन्मा और इसके फलस्वरूप तुमको दासत्व भुगतना पड़ेगा। लेकिन अब मेरे बाद जो दूसरा आएगा उसके लिए जल्दी मत करना। उसको अपने आप समय से आने दो। वह पूरा निखरकर आएगा और वही दासत्व से मुक्ति दिलाएगा। वह दूसरा अंडा बारह साल बाद फूटा। उसमें से गरुड़ बाहर आया। वही गरुड़ अमृत लाया और अपनी माता को दासत्व से मुक्त कराया।

कश्यप ऋषि की यह कहानी हमें बताती है कि हड़बड़ी नहीं करनी है। हमें वहां वापस पहुंचना है, लेकिन वैसे जैसे हम चाहते हैं। हमें वैसे ही बसना है जैसे हम चाहते हैं। हमें फिर से विस्थापित नहीं होना है। एक दूसरे के प्रति हमारे मन में आशंका न हो, उसका समूल विनाश हो जाए। तब हमको जाना है। इसको ध्यान में रखकर हम इस उद्यम में साथ-साथ प्रयास करें। संकल्प पूर्ति का समय निकट है। यह कोई भविष्यवाणी नहीं है। 

मुझे सारे आकलन के बाद ऐसा लगता है। इसलिए वह दिन शीघ्रातिशीघ्र हमारे देखने में आए, ऐसी शुभकामना करता हूं

Monday, January 17, 2022

जिन उद्यमों के प्राण-प्रणेता थे श्यामा प्रसाद जी, वहां हुए विस्मृत

भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक चैतन्य यशस्वी व्यक्तित्वों का प्रकाट्य हुआ है। इन्हीं कीर्तिवान महान पुरुषों में भारत केसरी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम सश्रद्ध लिया जाता है। इसके मुख्य कारण थे 'भारत में राजनीतिक संकट के दौरान उनका उदय और उनकी देशहितैषी प्रभावशाली भूमिका।'

भारतीय आर्ष परंपरा में एक शाश्वत तथ्य स्थापित है-'कीर्तिर्यस्य स जीवति' अर्थात सत्कृत्यों से कीर्तिवान व्यक्ति चिरंजीवी होते हैं। ऐसे कीर्तिवान व्यक्ति अपनी विलक्षणता से सृजनमंडल को जीवंत और ऊर्जान्वित भी करते हैं। औरों के लिये जीवन जीना ही उनके जीवन का सुंदर लक्ष्य और उपदेश होता है। निस्संदेह भारतवर्ष का इतिहास गौरवमयी और स्वाभिमानी परंपरा का इतिहास है, परंतु इसे जगजाहिर होने से रोकने के लिए षड्यंत्र रचा गया और सनातनी सांस्कृतिक विरासत को विरूपित करने के निरंतर प्रयास किए गए। हमारे मेलबंधन को हर संभव मिटाने के परोक्ष रूप में कुचक्र चलाया गया। हमें छिन्न-भिन्न किया जाता रहा, लेकिन यह मानना होगा कि कोई न कोई शक्ति है, जो हमारी अक्षुण्ण हिंदू संस्कृति की रक्षा करती आई है। गंभीरता से चिंतन मनन करने पर वह शक्ति 'एकत्वमयी चेतना' के रूप में परिलक्षित होती है। 

भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक चैतन्य यशस्वी व्यक्तित्वों का प्रकाट्य हुआ है। इन्हीं कीर्तिवान महान पुरुषों में भारत केसरी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम सश्रद्ध लिया जाता है। इसके मुख्य कारण थे 'भारत में राजनीतिक संकट के दौरान उनका उदय और उनकी देशहितैषी प्रभावशाली भूमिका।' भारत 15 अगस्त 1947 को स्वाधीन हुआ। देश की आजादी के बाद तत्कालीन कांग्रेस नेता 'पंडित जवाहरलाल नेहरू' प्रधानमंत्री बने और देश चलाने के लिए अनुवर्ती राष्ट्रीय मंत्रिमंडल का गठन किया। कैबिनेट की इस बैठक में उन्होंने कुछ प्रतिपक्ष के नेताओं से मंत्रालय संभालने का अनुरोध किया, उनमें से एक डॉ. श्यामाप्रसाद भी थे। इन तमाम गतिविधियों को सफल बनाने में जवाहर लाल नेहरू ने विशेष रूप से महात्मा गांधी की सलाह ली थी। तत्पश्चात इस कैबिनेट में पंडितजी ने श्यामाप्रसाद जी को 'उद्योग और आपूर्ति मंत्री' नियुक्त किया। भारत कई सदियों से मुगलों व ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन था। सदियों के परतांत्रिक कारणों से चतुर्दिक 'विकास की अवहेलना' हुई थी। भारतीय उद्योग धंधों के आधारभूत ढांचे शिथिल पड़ चुके थे। औद्योगिक प्रतिष्ठानों में गिने चुने प्रतिष्ठान बचे हुए थे, जैसे महाराष्ट्र के कुछ कपड़े उद्योग, जमशेदपुर व बर्नपुर के टाटा स्टील और इंडियन आयरन तथा बंगाल के जूट उद्योग। 

कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि 'केन्द्रीय औद्योगिक मंत्रालय के प्रति यथोचित तत्परता एवं बहुआयामी सोच में नगण्यता थी।' मूलतः कहा जाय तो इच्छाशक्ति में कमी थी। श्यामा प्रसाद जी ने उन सभी रुग्ण मान्यताओं व तौर तरीकों को बदल दिया और उन्होंने सबसे पहले उद्योग और आपूर्ति विभाग का कार्यभार संभालने के साथ-साथ बुनियादी ढांचे के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया। प्रबंधनगत कौशल एवं योग्यता में संपन्न श्यामा प्रसाद जी का मानना ​​था कि 'अक्षय विकास के लिए बुनियादी ढांचों का होना पहली आवश्यकता है। इसके आधार पर ही स्वावलंबन-मूलक विकास का ज्वार लाया जा सकता है।' आधारभूत संरचनाओं का सृजन करते हुए उन्होंने सबसे पहले परिवहन व्यवस्था को सुदृढ़ करने का निश्चय किया। तत्कालीन भारत में रेलवे की लंबाई केवल 54000 किमी थी। स्टीम इंजन की मदद से भारत में ट्रेनें चलती थीं। ऐसे में इंजन विदेशों में बनाए जाते थे। स्टीम इंजन मूल रूप से कनाडा, इंग्लैंड व अमेरिका से आयात किए जाते थे। इन इंजनों के रखरखाव और मरम्मत भी उन्हीं विदेशी कंपनियों द्वारा किया जाता था। इन सभी मामलों में क्रमशः विदेशी निर्भरता को कम करते हुए उसे समाप्त करने के दिशा में श्यामा प्रसाद जी ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए। भारत में ही 'लोकोमोटिव विनिर्माण' की प्रक्रिया के लिए योजना बनाई गई। वे किसी भी लोकहितकारी योजना के निरूपण में सर्वदा तत्पर रहा करते थे। उन्होंने सर्वप्रथम स्टीम लोकोमोटिव उद्योग की स्थापना के लिए पूर्वी रेलवे के अंतर्गत आने वाले मिहिजाम क्षेत्र का चयन किया था, जो तत्कालीन बिहार राज्य का हिस्सा था। श्यामा प्रसाद जी पश्चिम बंगाल में भी एक कारखाना लगाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने बिहार सरकार से उद्योग हेतु आवश्यक जमीन मांगी। सफल भी रहे। उसके बाद उसे पश्चिम बंगाल में शामिल करवा लिया। इस तरह अत्यंत सामंजस्यपूर्ण ढंग से दोनों राज्यों के निकटवर्ती स्थान का चयन किया गया। संतुलित विकास और संसाधनों की उपलब्धता के आलोक में उन्होंने सुंदर 'लोक प्रशासकीय दक्षता' को दर्शाया। 1948 के जनवरी महीने में लोकोमोटिव कारखाने की आधारशिला रखी गई। श्यामा प्रसाद जी ने इस 'आधारशिला स्थापन कार्य' को अत्यंत आग्रहपूर्वक चित्तरंजन दास की धर्मपत्नी बसंती देवी द्वारा संपन्न करवाया।

26 जनवरी 1950 भारत के इतिहास में एक यादगार दिन है। इस दिन लोकतान्त्रिक प्रणाली के साथ 'भारत का पवित्र संविधान' लागू किया गया। श्यामा प्रसाद जी की अभूतपूर्व उद्यम व दूरदर्शिता के फलस्वरूप इसी दिन ही चित्तरंजन के लोकोमोटिव कारखाने से पहला इंजन बनाया गया और राष्ट्र की सेवा में समर्पित किया गया। उस दिन भारतीय रेलवे में एक नई संपदा जोड़ी गई थी। 'भारतीय रेलवे' रेल इंजन निर्माण और रखरखाव में आत्मनिर्भर हो गई। श्यामा प्रसाद जी के 'सपनों की परियोजना' न केवल भारत में ही बल्कि, विदेशों में भी इंजन बनाने में सिद्धहस्त और नामदार साबित हुई, लेकिन आश्चर्य है श्यामा प्रसाद जी जिन उद्यमों व प्रकल्पों के प्राण-प्रणेता हैं, वहां पर वे विस्मृत-से हो गये हैं। उनकी यादें मद्धिम हो गई हैं। उनके द्वारा स्थापित 'उद्यमों व योजनाओं के शहर' उनकी उपलब्धियों के प्रति संजीदा नहीं दिखते हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद जी की स्मृति में न तो कोई समुचित झलक या स्मारक संजोया गया है और न ही नामकरण की गई है। यह विस्मृति सोची समझी और दुर्भाग्यपूर्ण लगती है।  चितरंजन लोकोमोटिव के अलावा चित्तरंजन के पास अवस्थित 'दामोदर घाटी निगम' के साथ 'मैथन बांध परियोजना' भी बनाई गई थी और इसे श्यामा प्रसाद जी के मातहत (केंद्रीय मंत्री रहते हुए) परिकल्पित व सफल रूपायन भी किया गया था। उन्होंने अनेक बार इन क्षेत्रों में प्रवास किया, लेकिन किन्हीं अज्ञात कारणों व मंशा के प्रभाव से उनकी यादें सिमट कर रह गई हैं। उनके सम्मान में न तो समुचित स्मृति-चिह्न दिखते हैं और न कोई वैसा यादगार ही दिखता है। यह एक बड़ा सवाल है यह ऐतिहासिक भूल है या राष्ट्रीय भूल ? इसे सुधारेगा कौन?

राष्ट्रीय अस्मिता को चुनौती, फिरोजपुर घटना के निहितार्थ

विगत 5 जनवरी को पंजाब के फिरोजपुर जिले में योजनाबद्ध तरीके से प्रधानमंत्री की सुरक्षा को खतरे में डालने की घटना ने यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित कर दिया है कि भारतीय राजनीति में ऐसे तत्व प्रभावी रूप से मौजूद हैं, जो राजनीतिक लाभ के लिए देश-द्रोही शक्तियों से हाथ मिलाने से नहीं सकुचाते हैं।


भारतीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री का पद संवैधानिक मर्यादा के साथ-साथ राष्ट्रीय अस्मिता का भी प्रतीक होता है। विगत 5 जनवरी को पंजाब के फिरोजपुर जिले में योजनाबद्ध तरीके से प्रधानमंत्री की सुरक्षा को खतरे में डालने की घटना ने यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित कर दिया है कि भारतीय राजनीति में ऐसे तत्व प्रभावी रूप से मौजूद हैं, जो राजनीतिक लाभ के लिए देश-द्रोही शक्तियों से हाथ मिलाने से नहीं सकुचाते हैं। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के समय और अब वापस लिए जा चुके कृषि कानूनों के विरोध के समय भी एक ऐसी दुरभिसंधि के संकेत मिले थे, जिसमें राजनीति की मुख्य-धारा के तत्व भारत के विघटन की आकांक्षा रखने वाली शक्तियां एक साथ दिखीं, लेकिन फिरोजपुर की घटना ने मर्यादा की अंतिम सीमाओं को भी लांघ दिया। यह पूरा घटनाक्रम भारतीय समाज के लिए अनेक प्रश्नों को सामने लाता है।

 

इस घटना के बाद कुछ विकृत मानसिकता के लोगों द्वारा जश्न मनाने और आनंद लेने जैसे स्पष्ट संकेत दिए गये। ऐसा करने वालों में देश में सबसे लम्बे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी के नेतागण, कुछ तथाकथित बौद्धिक माने जाने वाले लोग, सिविल सोसाइटी एक्टिविस्ट एवं कुछ पत्रकार भी शामिल थे। अब सबसे पहला प्रश्न तो यही उठता है कि इन सभी लोगों का मंतव्य क्या था? और दूसरा प्रश्न यह है कि इन सभी अलग-अलग क्षेत्र से संबंध रखने वाले लोगों का एक जैसा मंतव्य कैसे हो सकता है? जिस स्थान पर प्रधानमंत्री के वहां को एक पुल पर अचानक रुकना पड़ा, वह स्थान पाकिस्तान की सीमा से बहुत अधिक दूर नहीं था। सड़क मार्ग से विमानतल की ओर जाते प्रधानमंत्री के मार्ग की जानकारी प्रदर्शनकारियों के पास होना, अचानक पंजाब के मुख्यमंत्री का बीमार होकर घर बैठ जाना, स्थानीय प्रशासन और पुलिस का प्रधानमंत्री की सुरक्षा को लेकर असहयोगी रवैया अपनाना आदि संकेत इतना तो प्रमाणित करते हैं कि यह सब पूर्व नियोजित था। ठीक उसी प्रकार जैसे 26 जनवरी को लाल किले पर तिरंगे का अपमान पूर्व नियोजित था और उसी तरह से जैसे शाहीन बाग पूर्व नियोजित था। जो प्रश्न उठे हैं उनका उत्तर ढूढ़ने के लिए हमको देश के वर्तमान परिदृश्य पर दृष्टि डालनी होगी। भारत इस समय विकास के मोर्चे पर एक सकारात्मक लहर के दौर से गुज़र रहा है। अनुच्छेद 370 जैसे अनावश्यक कानून के हटने से और सर्वसम्मति से अयोध्या में राममंदिर का निर्माण होने से भारतीय समाज का आत्म-विश्वास भी ऊंचा है। कोरोना जैसी अभूतपूर्व चुनौती से उबर कर देश आर्थिक विकास के लिए पुख्ता-अधोसंरचना तैयार कर रहा है। सामरिक मोर्चे पर देखें तो पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक करना, दोक्लम तथा गलवान में चीन पर भारी पड़ना तथा अनेक लोक-कल्याणकारी योजनाओं से देश के वंचित तबके तक लाभ पहुंचाना आदि राष्ट्रीय शक्ति के जागरण कि तरफ ले जा रहा है।

 

भारत का एक सबल राष्ट्र के रूप में बढ़ना विश्व-समुदाय के लिए तो हर्ष का विषय होता है क्योंकि भारत का उत्कर्ष सबके लिए समृद्धि और कल्याण लाता है, परन्तु दुनिया पर बलपूर्वक तानाशाही करने का सपना पालने वाली शक्तियां भारत के मजबूत होने से विचलित होने लगती हैं। अमेरिका और सोवियत रूस ने पिछले 100 वर्षों में भारत के भीतरी मामलों में अनेक अवसरों पर योजनाबद्ध हस्तक्षेप करके हमारी राष्ट्रवादी शक्तियों को कमज़ोर किया है। इन हस्तक्षेपों के पीछे पूंजीवादी लाभ, सामरिक बढ़त और विचारधारा के आधार पर कब्ज़ा करने जैसे कारण रहे हैं। पिछले कुछ दशकों से चीन जैसी निरंकुश विस्तारवादी शक्ति भी भारत में आतंरिक विप्लव के अनेक षड़यंत्र रच रही है। अपने निर्माण के बाद से ही भारत विरोध के ईंधन से चलने वाला देश पाकिस्तान तो भारत में अनेक प्रकार की अस्थिरता लाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहता है।  भारत एक पारदर्शी लोकतंत्र और बहुलतावाद की संस्कृति का राष्ट्र होने के कारण विदेशी भूमि पर रचे गये प्रपंचों का शिकार होता रहा है। विशेष रूप से भारत के सीमावर्ती राज्यों को घुसपैठ, विदेशी धन, प्रोपगंडा आदि इत्यादि के प्रयोगों से सदैव अस्थिर रखने का प्रयास होता है। जम्मू-कश्मीर, पंजाब, पूर्वोत्तर में नागालैंड एवं मणिपुर जैसे राज्य हथियारबंद आतंकवाद का शिकार रहे हैं। आज जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में आतंकवाद पर लगाम लगी है। संभवतः राष्ट्र-विरोधी शक्तियों का सारा ध्यान पंजाब में समस्या फैला कर सम्पूर्ण भारत को तंग करने पर चला गया है।

  

हमारा पंजाब 1980 के दशक में खालिस्तानी आतंकवाद से बुरी तरह त्रस्त था। यह खालिस्तानी अलगाववाद भी भारत में सत्ता कि राजनीति में मदांध लोगों द्वारा पाला पोसा गया था, हालांकि इसका बीज सीमा पार से पाकिस्तान ने बोया था। खालिस्तान कि मांग उससे राजनीतिक लाभ कमाने वाले नेताओं के लिए भस्मासुर साबित हुई। इसी क्रम में भारत ने अपनी सम्मानित प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कि दुर्भाग्यपूर्ण हत्या भी देखी। पांच जनवरी का प्रकरण देश की प्रतिष्ठा को वैश्विक जगत में धूमिल करने वाला है। यह प्रकरण देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती का पूर्वसूचक भी है। यह इसलिए भी चिंतनीय है की पूर्व में हम इसी प्रकार की आतंकी और अलगाववादी घटनाओं में अपने दो प्रधानमंत्री खो चुके है। आज भले ही कांग्रेस के लोग भी इस राष्ट्रविरोधी कृत्य में खुशी मना रहे होंगे, परंतु उनको यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने इस आग में अपने पार्टी के कई नेताओं को झुलसते देखा है। पंजाब में आतंक के विनाश के लिए कार्य करने के लिए ख्याति कमाने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री सरदार बेअंत सिंह को भी देश ने खोया है। देश को यह समझना पड़ेगा कि पंजाब-केन्द्रित यह सब घटनाक्रम सामान्य नहीं है, इसके निहितार्थ को देखना और उसको स्वीकार करना आवश्यक है। यह सब एक दीर्घकाल से चली आ रही देश तोड़ने के षडयंत्र का हिस्सा है। पंजाब देश के लिए आर्थिक, राजनीतिक, सुरक्षा, रणनीति तथा पंथिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। अरबी और मध्य-एशियाई आक्रान्ताओं की बर्बरता हो, अंग्रेजी शासन का अत्याचार हो या भारत विभाजन का दंश हो अथवा स्वाधीनता के बाद लगातार विदेशी ताकतों का षडयंत्र हो, सब पंजाब को ही निशाना बनते रहे हैं। पंजाब अब एक बार फिर से मुखर रूप से राष्ट्र विरोधी तत्वों के लक्ष्य पर आ गया है।


गत 5 दशक से पंजाब में आतंकी, अलगाववादी, खालिस्तानी के साथ उग्र-वामपंथी, नक्सली तत्व एवं नशे का व्यापार करने वाले तत्व सभी मिलकर पंजाब को अशांत बनाने में जुटे हुए हैं। रिफ्रेंडम २०२० जैसा अलगाववादी एजेंडा हो या एक बार फिर भिंडरावाले के नाम को प्रचलित करना हो। यह सारा काम विदेशी पैसे और विदेशी साजिश के दम पर हो रहा है। किसान आंदोलन की आड़ में विदेशी फंडिंग कि अनेक रिपोर्ट सामने आयी थी। देश विरोधी सोच को पोषित करते हुए खालिस्तान बनाने कि मुहिम पूरे पंजाब और सिख समुदाय को बदनाम करने का षडयंत्र कर रही है। इसमें वे सारे लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल हैं, जो प्रधानमंत्री की सुरक्षा के खतरे में पड़ने पर जश्न मानते हैं। कुछ राजनीतिक दल और उनके नेता सत्ता प्राप्ति के लिए देश-विरोधी शक्तियों से हाथ मिला चुके हैं। वहीं, मीडिया और सिविल सोसाइटी में भी उन्होंने एक ऐसे वर्ग को तैयार कर लिया है, जो अपने निजी हित के लिए देश-हित को नुकसान पंहुचा रहा है। इन सबका मंतव्य देश को आघात पहुंचाकर राजनीतिक लाभ कमाना है। पंजाब की जनता विशेषकर सिख समाज को इन सब षड्यंत्रों को और इसके दूरगामी परिणाम को समझना पड़ेगा और इसके प्रतिकार के लिए आगे आना पड़ेगा, क्योंकि यह किसी भी प्रकार से सिख पंथ, पंजाब, लोकतंत्र या राष्ट्र के हित में नहीं है। इस पंजाब कि महान भूमि ने समाज को जोड़ने वाली सिखी परंपरा को जन्म दिया। वेदों में इस  भूमि को ब्रह्मवर्त कहा गया है। यहां भिंडरावाला के मंसूबों के लिए कोई स्थान नहीं है। विदेशी प्रोपगंडा और विदेशी धन से तैयार हुए मुठ्ठी भर अलगाववादी कुछ समय तक अशांति ज़रूर फैला सकते हैं, लेकिन वे अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकते। 


आज पंजाब सहित पूरे देश के राष्ट्र-भक्त नागरिकों को आगे आकर संगठित होकर खालिस्तानी अलगाववाद कि साजिशों को नाकाम करना होगा। सज्जन शक्तियों का संगठित प्रयास ही देश पर आये इस प्रकार के खतरों से लड़ने का हथियार है। सज्जन शक्तियों का संगठन करने के लिए हमे दशम गुरु गोबिंद सिंह जी के दिखाए रास्ते पर चलना होगा। हमें उन सनातन मूल्यों को याद करना होगा, जिनके लिए गुरु गोबिंद सिंह जी औरंगजेब के खिलाफ लड़े। हमें भारतीय समाज की रक्षा और राष्ट्र की एकता के लिए अपने वंश का बलिदान करने वाले योद्धा संत गुरु गोबिंद सिंह जी की शिक्षाओं को ध्यान में रखते हुए पूर्ण मनोयोग से अपना योगदान देना चाहिए।

Wednesday, December 15, 2021

गीता जयंती पर विशेष : संसार की समस्त शुभता का सागर

 कुरुक्षेत्र के मैदान में गीतोपदेश देते भगवान श्रीकृष्ण


भगवद्गीता एक धर्मग्रंथ व एक पुस्तक न होकर एक जीवनशैली है, जो हर उम्र को अलग संदेश और हर सभ्यता को अलग अर्थ समझाती है। संसार की समस्त शुभता इसी में विद्यमान है।

भगवान् श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में मोहग्रस्त अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया। कर्म का वह महामंत्र प्रदान किया जो मानव जाति के लिए कल्याणकारी और पथ-प्रदर्शक है। श्रीकृष्ण ने गीता में नश्वर भौतिक शरीर और नित्य आत्मा के मूलभूत के अंतर को समझाया है। कहा है कि आत्मा अजर और अमर है। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रें को छोड़कर नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, उसी प्रकार आत्मा जीर्ण शरीर को त्यागकर नए शरीर में प्रवेश करती है। अतः मनुष्य को कल की चिंता किए बिना कर्तव्य का पालन करना चाहिए। सफलता और असफलता के प्रति समान भाव रखकर कार्य करना ही श्रेयस्कर है। यही कर्मयोग है। श्रीकृष्ण के उपदेश गीता के अमृत वचन हैं। उनके उपदेश से ही कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े बंधु-बांधवों से अर्जुन का मोह दूर हुआ। तदोपरांत ही वे अधर्मी और दुर्बल हृदय वाले कौरवों को पराजित करने में सफल हुए। कौरवों की हार महज पांडवों की विजय भर नहीं, बल्कि धर्म की अधर्म पर, न्याय की अन्याय पर और सत्य की असत्य पर जीत है। श्रीकृष्ण ने गीता में धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य और न्याय-अन्याय को सुस्पष्ट किया है। उन्होंने धृतराष्ट्र पुत्रों को अधर्मी, पापी और अन्यायी तथा पांडु पुत्रों को पुण्यात्मा कहा है। उन्होंने संसार के लिए क्या ग्राह्य और क्या त्याज्य है उसे भलीभाँति समझाया है। श्रीकृष्ण के उपदेश ज्ञान, भक्ति और कर्म का सागर है। भारतीय चिंतन और धर्म का निचोड़ है। सारे संसार और मानव जाति के कल्याण का मार्ग है। विश्व के महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा भी है कि श्रीकृष्ण के उपदेश अद्वितीय हैं। उन्हें पढ़कर ही मनुष्य को ज्ञान हुआ कि इस दुनिया का निर्माण कैसे हुआ। महात्मा गांधी ने भी कहा है कि जब मुझे कोई परेशानी घेर लेती है, मैं गीता के पन्नों को पलटता हूं। महान दार्शनिक श्री अरविंदो ने कहा कि भगवद्गीता एक धर्मग्रंथ व एक पुस्तक न होकर एक जीवनशैली है, जो हर उम्र को अलग संदेश और हर सभ्यता को अलग अर्थ समझाती है। संसार की समस्त शुभता इसी में विद्यमान है। उनके उपदेश जगत् कल्याण का सात्विक मार्ग हैं। श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में खड़े अर्जुन रूपी जीव को धर्म, समाज, राष्ट्र, राजनीति और कूटनीति की शिक्षा दी है। प्रजा के प्रति शासक के आचरण-व्यवहार और कर्म के ज्ञान को उद्घाटित किया है। श्रीकृष्ण के उपदेश कालजयी और संसार के लिए कल्याणकारी हैं। युद्ध और विनाश के मुहाने पर खड़े संसार को संभलने का संबल है। अत्याचार और राजनीतिक कुचक्र को किस तरह सात्विक बुद्धि से हराया जाता है महाभारत उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन का सारथी बनकर सत्य का पक्ष लिया। श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन अत्याचार और अहंकार के विरुद्ध एक संघर्ष है। बाल्यावस्था से ही वे अलौकिक थे। किंतु उनकी अलौकिकता में जगतकल्याण की भावना निहित है। श्रीकृष्ण उन बंधी-बंधाई धारणाओं और परंपराओं को, जो राष्ट्र-समाज के लिए अहितकर हैं उन्हें तोड़ने में हिचक नहीं दिखाते हैं। वे तत्कालीन निरंकुश शासकों की भोगवादी और वर्चस्ववादी जीवनशैलियों के विरुद्ध आवाज बुलंद करते हैं। जनता को अत्याचार से लड़ने का संदेश देते हैं। इसके साथ ही सभी मनुष्यों और प्राणियों के प्रति उनका एकात्मभाव देखते ही बनता है। उनकी हर क्रिया में जगत् का कल्याण निहित है। उन्होंने संसार को संदेश दिया है कि दुर्योधन, कर्ण, विकर्ण, जयद्रथ, कृतवर्मा, शल्य, अश्वथामा जैसे अहंकारी और अत्याचारी जीव राष्ट्र-राज्य के लिए शुभ नहीं होते। वे सत्ता और ऐश्यर्य के लोभी होते हैं। धृतराष्ट्र केवल जन्म से ही अंधा नहीं था, बल्कि वह आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टि से भी अंधा था। उसका सत्तामोह और पुत्र के प्रति आसक्ति का परिणाम रहा कि हस्तिानापुर विनाश को प्राप्त हुआ। धृतराष्ट्र तथा उसके स्वार्थी-अभिमानी पुत्रें में ये सभी अवगुण विद्यमान थे। श्रीकृष्ण ने विष देने वाला, घर में अग्नि लगाने वाला, घातक हथियार से आक्रमण करने वाला, धन लूटने वाला, दूसरों की भूमि हड़पने वाला और पराई स्त्री का अपहरण करने वाले राजाओं को अधम और आतातायी कहा है। धृतराष्ट्र के पुत्र ऐसे ही थे। सत्ता में बने रहने के लिए वे सदैव पांडु पुत्रों के विरुद्ध षड्यंत्र रचा करते थे। अनेक बार उनकी हत्या के प्रयत्न किए। श्रीकृष्ण ने ऐसे पापात्माओं और नराधमों को वध के योग्य बताया है। समाज को प्रजावत्सल शासक चुनने का संदेश दिया है। अहंकारी, आततायी, भोगी और संपत्ति संचय में लीन रहने वाले आसुरी प्रवृत्ति के शासकों को राष्ट्र के लिए अशुभ और आघातकारी माना है। कहा है कि ऐसे शासक प्रजावत्सल नहीं सिर्फ प्रजाहंता होते हैं।

Thursday, December 9, 2021

स्वराज मिला, स्वतंत्रता नहीं

अमृत महोत्सव आयोजन समिति, काशी हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा किया गया था। उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र में स्वतंत्रता के लिए कार्य हुआ। महामना जी ने विश्वविद्यालय रूपी तीर्थ बनाया है। यह भी शिक्षा के क्षेत्र में स्वतंत्रता संग्राम है।

27 नवंबर को काशी मेंस्वाधीनता से स्वतंत्रता की ओर कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस अवसर पर प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक श्री जे. नंदकुमार ने कहा कि 1947  की मध्य रात्रि में स्वराज मिला, स्वतंत्रता नहीं मिली। भारत के सभी लोग अपने दायित्व का निर्वहन राष्ट्रहित में करें, स्वाधीनता अवश्य प्राप्त होगी।

कार्यक्रम का आयोजन अमृत महोत्सव आयोजन समिति, काशी हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा किया गया था। उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र में स्वतंत्रता के लिए कार्य हुआ। महामना जी ने विश्वविद्यालय रूपी तीर्थ बनाया है। यह भी शिक्षा के क्षेत्र में स्वतंत्रता संग्राम है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के कार्यवाह डॉ. वीरेंद्र जायसवाल ने कहा कि प्राचीन समय में न्यायशास्त्र हमारा धर्म हुआ करता था।

सिकंदर जो भारत में प्रवेश नहीं कर पाया, उसे कुछ लोग विश्व विजेता बताते हैं। वर्तमान में भी हम बातचीत, पहनावे, संस्कार में पराधीन हैं। इस अवसर परएक मंच-एक स्वर का आयोजन किया गया। इस दौरान डॉ. ज्ञानेश चंद्र पांडेय एवं प्रो. बाला लखेंद्र के संयुक्त संयोजन में एक मंच पर एक स्वर में संगीत एवं मंच कला संकाय के 75 विद्यार्थियों द्वारा कुलगीत एवं वन्देमातरम् की प्रस्तुति दी गई।


Saturday, November 20, 2021

प्रधानमंत्री ने तीनों सेनाओं को देश में डिजाइन और विकसित हथियार सौंपे

स्वदेशी रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए रक्षा उद्योग गलियारा परियोजना का शिलान्यास किया, उत्तर प्रदेश डिफेंस कॉरिडोर में टैंकरोधी लक्षित मिसाइलों का उत्पादन संयंत्र तैयार किया जाएगा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'राष्ट्रीय रक्षा समर्पण पर्व' के मौके पर शुक्रवार को झांसी (उत्तर प्रदेश) में तीनों सेनाओं को देश में ही डिजाइन और विकसित हथियार सौंपे। इसमें सबसे प्रमुख स्वदेश निर्मित लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर (एलसीएच) है। उन्होंने स्वदेशी रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए 400 करोड़ रुपये की उत्तर प्रदेश रक्षा उद्योग गलियारा परियोजना का भी शिलान्यास किया। यह परियोजना भारत डायनेमिक लिमिटेड को सौंपी गई है। इसके अंतर्गत टैंकरोधी लक्षित मिसाइलों का उत्पादन संयंत्र तैयार किया जाएगा।

'आजादी का अमृत महोत्सव' समारोह के हिस्से के रूप में यह पर्व उत्तर प्रदेश सरकार के साथ मिलकर आयोजित किया गया। समारोह में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि लंबे समय से भारत को दुनिया के सबसे बड़े हथियार खरीदार देशों में गिना जाता रहा है लेकिन आज देश का मंत्र 'मेक इन इंडिया-मेक फॉर वर्ल्ड' है। आज भारत अपनी सेनाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम कर रहा है। आज हमारी सेनाओं की ताकत बढ़ने के साथ ही भविष्य में देश की रक्षा के लिए सक्षम युवाओं के लिए जमीन भी तैयार हो रही है। इसी मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने देश को आश्वस्त किया कि वह दिन जल्द आएगा, जब 90 प्रतिशत रक्षा उपकरण भारत में बनेंगे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय वायु सेना के प्रमुख वीआर चौधरी को हल्के वजन वाले लड़ाकू हेलीकॉप्टर का मॉडल सौंपा। एलसीएच दुनिया का एकमात्र अटैक हेलीकॉप्टर है जो हथियारों और ईंधन के काफी भार के साथ 5,000 मीटर (16,400 फीट) की ऊंचाई पर लैंडिंग और टेक ऑफ कर सकता है। हेलीकॉप्टर 20 एमएम बुर्ज गन, 70एमएम रॉकेट लॉन्चिंग सिस्टम, एयर टू ग्राउंड और एयर टू एयर लॉन्चिंग मिसाइल सिस्टम से लैस है। एलसीएच दो इंजन वाला हेलीकॉप्टर 5-8 टन वर्ग का लड़ाकू हेलीकॉप्टर है। एलसीएच में प्रभावी लड़ाकू भूमिकाओं के लिए उन्नत तकनीकों को शामिल किया गया है। इसे दुश्मन की वायु रक्षा, काउंटर विद्रोह, खोज और बचाव, टैंक विरोधी, काउंटर सर्फेस फोर्स ऑपरेशंस इत्यादि जैसी भूमिकाओं को पूरा करने के लिए डिजाइन किया गया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने नौसेना प्रमुख करमबीर सिंह को एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट 'शक्ति' सौंपा। इसे रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) की हैदराबाद में स्थित इलेक्ट्रॉनिक्स अनुसंधान प्रयोगशाला (डीएलआरएल) ने डिजाइन और विकसित किया है। यह प्रणाली भारतीय नौसेना की पिछली पीढ़ी के ईडब्ल्यू सिस्टम की जगह लेगी। मिसाइल हमलों के खिलाफ भारतीय नौसेना के जहाजों की रक्षा के लिए इस सिस्टम को वाइडबैंड इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ईएसएम) और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर मेजर (ईसीएम) के साथ एकीकृत किया गया है। शक्ति ईडब्ल्यू प्रणाली समुद्री युद्ध के मैदान में आधुनिक रडार और जहाज-रोधी मिसाइलों के खिलाफ रक्षा की एक इलेक्ट्रॉनिक परत प्रदान करेगी। पहली शक्ति प्रणाली आईएनएस विशाखापत्तनम पर स्थापित की गई है और इसे स्वदेशी विमान वाहक आईएनएस विक्रांत पर भी स्थापित किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल चंडी प्रसाद मोहंती को स्वदेश में विकसित 'स्विच 1.0 यूएवी' ड्रोन सौंपा। लगभग 2 घंटे की सहनशक्ति वाला स्विच 1.0 यूएवी भारत की सीमाओं पर दिन और रात की निगरानी के लिए कठोर वातावरण और उच्च ऊंचाई के तहत भारतीय सेना के सबसे अधिक मांग वाले निगरानी अभियानों का समर्थन करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वदेश में विकसित 'एमआर-20' हेक्साकॉप्टर ड्रोन भी सौंपा। इससे आगे के क्षेत्रों में ऊंचाई पर तैनात सैनिकों के लिए भोजन, आवश्यक वस्तुओं, आपातकालीन चिकित्सा सहायता, गोला-बारूद और हथियारों की 20 किलोग्राम तक की आपूर्ति की जा सकेगी। उन्होंने कहा कि भारत का ड्रोन उद्योग सशस्त्र बलों की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए अत्याधुनिक समाधान विकसित करने पर काम कर रहा है।


प्रधानमंत्री ने तीनों सेनाओं को देश में डिजाइन और विकसित हथियार सौंपे,

स्वदेशी रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए रक्षा उद्योग गलियारा परियोजना का शिलान्यास किया, उत्तर प्रदेश डिफेंस कॉरिडोर में टैंकरोधी लक्षित मिसाइलों का उत्पादन संयंत्र तैयार किया जाएगा