Tuesday, May 4, 2021

आज 4 मई 2021 को नहीं रहे हमारे बीच महामना जगमोहनजी : 1990 में आतंकियों की आखिरी साजिश को विफल कर घाटी को बचाया था

 जगमोहन जी ने कश्मीरी पंडितों को घाटी से सुरक्षित निकलने का मौका मुहैया कराया, जिसके लिए पंडित उन्हें आज भी मसीहा मानते हैं। अरुण शौरी ने 2004 में यूँ ही नहीं कहा था, "यह जगमोहन ही रहे, जिन्होंने भारत के लिए घाटी को बचाया।"


जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन का निधन हो गया है। वे 94 साल के थे। दो बार जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल की जिम्मेदारी सँभालने वाले जगमोहन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री भी रहे थे। कड़क नौकरशाह रहे जगमोहन के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक जताया है।

उनका पूरा नाम जगमोहन मल्होत्रा था। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद बीजेपी ने जब संपर्क अभियान शुरू किया था तो अमित शाह और मौजूदा बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा उनसे मिलने उनके घर पहुँचे थे। जगमोहन को पहली बार राज्यपाल बनाकर जम्मू-कश्मीर 1984 में कॉन्ग्रेस ने भेजा था। उस समय वह 1989 तक इस पद पर रहे। दूसरी बार वीपी सिंह की सरकार ने उन्हें जनवरी 1990 में राज्यपाल बनाकर भेजा और मई 1990 तक वे पद पर रहे।

जगमोहन ने दूसरी बार 1990 में 19 जनवरी की उसी शाम राज्यपाल पद की शपथ ली थी, जिस मनहूस रात घाटी की हर मस्जिद से एक ही आवाज आ रही थी कि हमें कश्मीर में हिंदू औरतें चाहिए, लेकिन बिना किसी हिंदू मर्द के। वह रात जब हिंदुओं को केवल तीन विकल्प दिए गए थे। पहला, कश्मीर छोड़कर भाग जाओ। दूसरा, धर्मांतरण कर लो। तीसरा, मारे जाओ। वह रात जिसने मानवीय इतिहास के सबसे बड़ी पलायन त्रासदियों में से एक का दरवाजा खोला। जिसके कारण करीब 4 लाख कश्मीरी हिंदू जान बचाने के लिए अपना घर, अपनी संपत्ति अपने ही देश में छोड़कर भागने को मजबूर हुए।

उस दिन को लेकर जगमोहन ने ‘कश्मीर: समस्या और समाधान’ में लिखा है, “अचानक विमान झटके के साथ नीचे झुका। ऐसा बाहरी हवा में दबाव के अन्तर के कारण हुआ। सीमा सुरक्षा बल का वह छोटा सा विमान उसे आसानी से झेल नहीं सकता था। पूरा विमान काँप उठा और उसके साथ मेरी विचारधारा भी। शायद इसने मुझे संस्मरण दिलाया कि मैं ऐसे राज्य में जा रहा हूँ जो अशांति और दहशत में फँसा है। यह 19 जनवरी 1990 की दोपहर थी। मैं विमान द्वारा दूसरी बार जम्मू-कश्मीर जा रहा था।”

उस रात क्या हुआ इससे हम सब परिचित हैं। जगमोहन ने खुद लिखा है कि पहले ही दिन आतंकवादियों, पाकिस्तान समर्थित तत्वों, कट्टरपं​थी और सांप्रदायिक तत्वों तथा राजनीतिक और शासकीय निहित तत्वों ने अपने-अपने तरीके से उन्हें कमजोर और पंगु बनाने का निर्णय कर लिया था। लेकिन, जगमोहन की असली चुनौती 26 जनवरी 1990 को इंतजार कर रही थी।

असल में उस साल की 26 जनवरी जुमे के दिन थी। ईदगाह पर 10 लाख लोगों को जुटाने की योजना बनाई गई थी। मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से लोगों को छोटे-छोटे समूह में ईदगाह पहुँचने को उकसाया जा रहा था। श्रीनगर के आसपास के गाँव, कस्बों से भी जुटान होना था। योजना थी कि जोशो-खरोश के साथ नमाज अता की जाएगी। आजादी के नारे लगाए जाएँगे। आतंकवादी हवा में गोलियाँ चलाएँगे। राष्ट्रीय ध्वज जलाया जाएगा। इस्लामिक झंडा फहाराया जाएगा। विदेशी रिपोर्टर और फोटोग्राफर तस्वीरें लेने के लिए वहाँ जमा रहेंगे। उससे पहले 25 की रात टोटल ब्लैक आउट की कॉल थी।

आतंकियों को कामयाबी का पूरा गुमान था। वे जानते थे कि गणतंत्र दिवस होने के कारण आवाजाही पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा। नेता और अधिकारी जम्मू में सलामी लेने में व्यस्त होंगे। स्थानीय अधिकारी कोई काम नहीं करेंगे। इस्लामी झंडा लहराते ही उनका सरेंडर करवाया जाएगा। तैयारियाँ पूरी थी और साजिश पर गुप्त तरीके से अमल हो रहा था। अंतिम वक्त में हैरान कर देने के मॅंसूबे थे। 14 अगस्त 1989 को वे इसका एक प्रयोग कर चुके थे। तब कुछ आतंकियों ने परेड की सलामी ली थी। पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। अखबारों में उस जश्न की ख़बरें और तस्वीरें छपी थीं। अगले दिन भारत के स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे को सार्वजनिक रूप से जलाया गया था।

26 जनवरी से दो दिन पहले अफवाह फैलाई गई कि अर्धसैनिक बलों ने कश्मीर आर्म्ड फोर्सेस के चार जवानों को मार गिराया है। ‘खून का बदला खून’ का आह्वान किया गया। 25 जनवरी की सुबह श्रीनगर में भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना और तीन अन्य अफसर की आतंकियों ने निर्मम हत्या कर दी। हत्या उस समय की गई जब वे ड्यूटी पर जाने के लिए अपनी दफ्तर की गाड़ी का इंतजार कर रहे थे। आतंकियों ने संदेश दे दिया था।

आतंकियों के लिए आज़ादी बस कुछ घंटे दूर थी। उन्हें लग रहा था कि इस साजिश की भनक जगमोहन को नहीं लगेगी। लगी भी तो 10 लाख लोगों पर बल प्रयोग का जोखिम नहीं उठाया जाएगा। लेकिन, मजहबी उन्मादियों को घुटने पर लाने का प्लान पहले से तैयार था। उन्हें चौंकाते हुए जगमोहन ने 25 जनवरी की दोपहर ही कर्फ्यू लगा दिया। अपने कुछ विश्वस्त सहयोगियों को उसी शाम बता दिया कि वे सलामी लेने जम्मू नहीं जाएँगे। श्रीनगर में ही डेरा डाले रहेंगे। सभी सरकारी विभागों को आदेश दिए कि हर हाल में दफ्तरों में लाइटें जलनी चाहिए। हर हाल में स्ट्रीट लाइट ऑन रहनी चाहिए। इसके लिए पीडब्ल्यूडी और बिजली विभाग को विशेष आदेश दिए गए। शाम हुई तो बिजली जल उठी। बकौल जगमोहन, आप इसे अथॉरिटी का सम्मान कहिए या डर, कर्मचारियों ने इसका पालन किया।


इन लाइटों की रोशनी से जो गर्माहट पैदा हुई वह इस्लामिक आतंकवाद पर भारत की पहली मनोवैज्ञानिक जीत थी। इसने तय कर दिया कि जीतना भारत को ही है। कश्मीर को संविधान के आईन में ही चलना है, न कि किसी मजहबी उन्माद में जलना है। 1990 के जनवरी के आखिरी दिनों में जगमोहन ने राष्ट्रपति को लिखे पत्र में भी इस घटना का जिक्र किया था। जो कुछ इस तरह था,

आदरणीय राष्ट्रपति जी,
ठीक दस दिन पहले मैंने अपना कार्यभार संभाला था। तब से अब तक मैं एक छोटी रिपोर्ट लिखने के लिए दस मिनट का समय भी ​नहीं निकाल सका। स्थिति इतनी गंभीर और संकटपूर्ण थी।
… यह वाकई चमत्कार था कि 26 जनवरी को काश्मीर बचा लिया गया और हम राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी उठाने से बच गए। इस दिन की कहानी लम्बी है और यह बाद में पूरे ब्यौरे के साथ बताई जानी चाहिए।
… मैंने 26 जनवरी को हुई घटनाओं में अपनी भूमिका पूरी तरह अदा की है और मुझे इसका गर्व है। लेकिन अपना काम जारी रखना मेरे लिए कठिन हो जाएगा यदि यह प्रभाव बना रहा कि जनता में मुझे पूरा समर्थन नहीं प्राप्त है। पहले से ही मुझे एक टूटा और बिखरा प्रशासन मिला है। यदि कमांडर पर ही हर रोज छिप कर वार किया जाए तो सफलता का क्या अवसर रह जाता है इसकी कल्पना की जा सकती है।
… कामचलाऊ समाधानों या सुगम रास्तों का सहारा लेना आत्मघाती नहीं तो गलत जरूर होगा। विष महत्वपूर्ण अंशों तक पहुॅंच चुका है। जब तक कि उसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाता, हम एक संकटपूर्ण स्थिति से दूसरी में ही लड़खड़ाते रहेंगे।
आपका
-जगमोहन

वैसे जगमोहन को पहली बार जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल इंदिरा गाँधी की सरकार ने ही बनाया था। लेकिन यह भी छिपा नहीं कि बाद के वर्षों में वे कॉन्ग्रेस को खटकते रहे। उनका नाम लेकर कॉन्ग्रेस अपने शीर्ष परिवार की कश्मीर नीतियों की नाकामी को छिपाने की कोशिश करता रहा।

अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद उस समय राज्यसभा में विपक्ष के नेता रहे गुलाम नबी आजाद ने कहा था, “पिछले दिनों में जो घटनाएँ हुई हैं उससे जम्मू-कश्मीर और लेह-लद्दाख के लोग डरे हुए हैं। इससे 1990 की यादें ताजा हो गई हैं, जब वीपी सिंह की सरकार में बीजेपी ने जगमोहन को कश्मीर का राज्यपाल बनवाया था और फिर घाटी से कश्मीरी पंडितों को बसों में भर कर बाहर निकाला गया जो आज तक एक कलंक की तरह है।”

पत्रकार आदित्य राज कौल ने ट्वीट कर उस समय कहा था, “2014 में वाराणसी में एक साक्षात्कार के दौरान ने गुलाम नबी आजाद ने मुझे जगमोहन के बारे में सवाल पूछने को कहा था ताकि वे भाजपा पर निशाना साध सकें।” कश्मीरी पंडितों के मसीहा जगमोहन को खलनायक साबित करने के लिए एक अन्य कॉन्ग्रेसी और केन्द्र में मंत्री रह चुके सैफुद्दीन सोज तो बकायदा एक किताब ‘Kashmir: Glimpses of History and the Story of Struggle’ भी लिख चुके हैं।

यह सही है कि दूसरी बार, 1990 में जब जगमोहन को कुछ महीनों के लिए जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया गया तो केन्द्र में वीपी सिंह की सरकार थी और वह भाजपा के समर्थन से चल रही थी। यह भी सच है कि उनके इस कार्यकाल में कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। लेकिन, इसका दूसरा पहलू यह भी है कि उनके राज्यपाल बनने से पहले 1987-88 से ही पंडितों ने घाटी छोड़ना शुरू कर दिया था। 14 सितंबर 1989 को भाजपा नेता पंडित टीका लाल टपलू की निर्मम हत्या कर दी गई थी। इसके कुछ समय बाद ही जज नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई। गंजू ने जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल भट्ट को मौत की सजा सुनाई थी। जुलाई से नवंबर 1989 के बीच 70 अपराधी जेल से रिहा किए गए थे। घाटी में हमें पाकिस्तान चाहिए। पंडितों के बगैर, पर उनकी औरतों के साथ जैसे नारे लग रहे थे।

ऐसे माहौल में श्रीनगर पहुँचे जगमोहन ने कश्मीरी पंडितों को घाटी से सुरक्षित निकलने का मौका मुहैया कराया, जिसके लिए पंडित उन्हें आज भी मसीहा मानते हैं। अरुण शौरी ने 2004 में यूँ ही नहीं कहा था, “यह जगमोहन ही रहे, जिन्होंने भारत के लिए घाटी को बचाया।”

शत शत नमन इस महायोद्धा को, ईश्वर उनकी पुण्यात्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दे 🙏

Thursday, April 22, 2021

काशी विश्वनाथ: यहां कंकर-कंकर में बसते हैं विश्वेश्वर

पौराणिक मान्यता है कि वाराणसी में पवित्र गंगा नदी में स्नान के बाद अगर बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर लिए जाएं तो जीवन सफल हो जाता है और प्राणी आवागमन के बंधन से छूट कर शिवलोक पहुंच जाता है


काशी विश्वनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर  हजारों वर्ष से वाराणसी में स्थित है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, संत एकनाथ, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्वामी तुलसीदास जैसी विभूतियां पधारी थीं।  यहीं पर संत एकनाथजी ने वारकरी सम्प्रदाय का महान ग्रंथ ‘श्रीएकनाथी भागवत’ लिखकर पूरा किया और काशी नरेश तथा अन्य विद्वतजनों द्वारा उस ग्रंथ को हाथी पर रखकर खूब धूमधाम से शोभायात्रा निकाली गई। महाशिवरात्रि के मध्य रात्रि पहर में अन्य प्रमुख मंदिरों से भव्य शोभायात्रा ढोल, नगाड़े इत्यादि के साथ बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर तक जाती है।

पौराणिक मान्यता है कि प्रलयकाल में भी इस मंदिर का लोप नहीं होता। उस समय भगवान शंकर इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि काल आने पर इसे नीचे उतार देते हैं। यही नहीं, यही भूमि आदि सृष्टि स्थली भी बतायी जाती है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने की कामना से तपस्या करके आशुतोष को प्रसन्न किया था और फिर उनके शयन करने पर उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिन्होंने सारे संसार की रचना की। अगस्त्य मुनि ने भी विश्वेश्वर की बड़ी आराधना की थी और उन्हीं की अर्चना से श्री वशिष्ठ जी तीनों लोकों में पूजित हुए तथा राजर्षि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाए। यही कारण है कि प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहां पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए आते हैं।

धार्मिक महत्व के अलावा यह मंदिर वास्तुकला की दृष्टि से भी अनुपम है। इसका भव्य प्रवेश द्वार देखने वालों की दृष्टि में मानो बस जाता है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार इंदौर की महारानी अहिल्या  बाई होल्कर के स्वप्न में भगवान शिव आए। वे भगवान शिव की भक्त थीं और इसलिए उन्होंने 1780 में यह मंदिर बनवाया।

विश्वनाथ खण्ड को पुराना शहर भी कहा जाता है, जो दशाश्वमेध घाट और गोदौलिया के बीच मणिकर्णिका घाट के दक्षिण और पश्चिम तक नदी की उत्तर दिशा में वाराणसी के मध्य में स्थित है। यह पूरा क्षेत्र घूमने योग्य है। बाबा विश्वनाथ मंदिर के शिखर पर स्वर्ण लेपन होने के कारण इसे स्वर्ण मंदिर भी कहते हैं। यहां स्थापित शिवलिंग चिकने काले पत्थर से बना हुआ है और इसे ठोस चांदी के आधार पर रखा गया है। यहां भक्तजन आकर संकल्प करते हैं और पंच तीर्थयात्रा शुरू करने से पहले अपने मन की भावना यहां व्यक्त करते हैं। वाराणसी को एक ऐसा स्थान कहा जाता है जहां प्रथम ज्योतिर्लिंग है।

सर्वतीर्थमयी एवं सर्वसंतापहारिणी मोक्षदायिनी काशी की महिमा ऐसी है कि यहां प्राणत्याग करने से ही मुक्ति मिल जाती है। मान्यता है कि भगवान भोलेनाथ मरते हुए प्राणी के कान में तारक-मंत्र का उपदेश फूंकते हैं, जिससे वह जीवन और मृत्यु के आवागमन से छूट जाता है, चाहे मृत-प्राणी कोई भी क्यों न हो। मत्स्यपुराण का मत है कि जप, ध्यान और ज्ञान से रहित एवं दुखों से पीड़ित जन के लिए काशीपुरी ही एकमात्र गति है। विश्वेश्वर के इस आनंद-कानन में पांच मुख्य तीर्थ हैं- दशाश्वमेध, लोलार्ककुण्ड, बिन्दुमाधव,    केशव और मणिकर्णिका। और इन्हीं से युक्त यह अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है।

काशी विश्वनाथ मंदिर की महिमा आप इस बात से ही समझ लीजिए कि द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से सबसे प्रमुख इसी स्थान को प्रथम लिंग माना गया है। ऐसा माना जाता है कि साक्षात् भगवान शंकर माता पार्वती के साथ इस स्थान पर विराजमान हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास अनादि काल से माना जाता है। यहां तक कि कई उपनिषदों और महाकाव्य ‘महाभारत’ में इसका वर्णन मिलता है।

हालांकि अनेक आक्रमणों के बावजूद, तमाम कुत्सित प्रयासों के बाद भी काशी विश्वनाथ की महिमा उसी तरह से बरकरार रही, जिस प्रकार से ईसा पूर्व राजा हरिश्चंद्र, सम्राट विक्रमादित्य जैसे महान शासकों ने इस मंदिर की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाए थे। एक तरफ जहां मंदिर तोड़ने वाले थे, वहीं दूसरी तरफ राजा टोडरमल जैसे महान व्यक्तियों ने इसके पुनरुद्धार का कार्य किया। मराठों ने इसकी मुक्ति के लिए जान की बाजी लगा दी थी। अहिल्याबाई होल्कर और महाराणा रणजीत सिंह जैसे शासकों ने इस मंदिर की महिमा को हमेशा बरकरार रखा और उसमें वृद्धि ही की। विश्वनाथ मंदिर के बारे में एक बात और प्रचलित है कि जब यहां कि मूर्तियों का शृंगार होता है, तो सभी मूर्तियों का मुख पश्चिम दिशा की तरफ रहता है।

मानव को सिखाई मर्यादा : मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम

भगवान श्रीराम का पूरा जीवन प्रेरणादायी है। एक आदर्श राजा, आदर्श पति, आदर्श पुत्र, आदर्श भाई के रूप में उनका उदाहरण दिया जाता है। उनकी सत्यता, न्यायप्रियता, क्षमाशीलता और सदाचारिता की तो कोई सीमा नहीं है





इन दिनों अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का कार्य चल रहा है। इससे समस्त भारतीय प्रसन्न हैं। श्रीराम इस देश की बहुसंख्यक आबादी के आराध्यदेव हैं। वे न सिर्फ हिंदुओं अथवा भारतवासियों के लिए परम पूजनीय हैं, बल्कि दुनिया के अनेक देशों के लोग भी उन्हें भगवान और मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में मान्यता प्रदान करते हुए पूजते रहे हैं। वे भारत की पहचान और राष्ट्रीयता के प्रतीक हैं। दरअसल, श्रीराम के आदर्श, उनका अनुकरणीय और आज्ञापालक चरित्र तथा रामायण काल के अन्य सभी पात्रों की अपार निष्ठा, भक्ति, प्रेम, त्याग एवं समर्पण अपने आप में अनुपम है

भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में प्रतिवर्ष चैत्र मास की शुक्ल पक्ष नवमी को रामनवमी का त्योहार समूचे भारत में अपार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में उत्सवों का विशेष आयोजन होता है, जिनमें भाग लेने के लिए देशभर से हजारों भक्तगण अयोध्या पहुंचते हैं तथा वहां स्थित सरयू नदी में पवित्र स्नान कर पंचकोसी की परिक्रमा करते हैं। समूची अयोध्या नगरी इस दिन पूरी तरह राममय नजर आती है और हर तरफ भजन-कीर्तन तथा रामायण के अखंड पाठ की गूंज सुनाई पड़ती है। देशभर में अन्य स्थानों पर भी जगह-जगह इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत, उपवास, यज्ञ, दान-पुण्य आदि विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता है। हालांकि इस वर्ष फिर से बढ़ते कोरोना संक्रमण के चलते ऐसे आयोजनों के ज्यादा धूमधाम से मनाए जाने की संभावना कम ही रहेगी, लेकिन भीड़-भाड़ से बचकर लोग अपने घर में भी अपने आराध्यदेव के जन्मोत्सव को श्रद्धापूर्वक मना सकते हैं।

श्रीराम का जन्म नवरात्र के अवसर पर नवदुर्गा के पाठ के समापन के पश्चात् हुआ था और उनके शरीर में मां दुर्गा की नौवीं शक्ति जाग्रत थी। मान्यता है कि त्रेता युग में इसी दिन अयोध्या के महाराज दशरथ की पटरानी महारानी कौशल्या ने श्रीराम को जन्म दिया था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, ‘‘भगवान श्रीराम चंद्रमा के समान अति सुंदर, समुद्र के समान गंभीर और पृथ्वी के समान अत्यंत धैर्यवान थे तथा इतने शील संपन्न थे कि दुखों के आवेश में जीने के बावजूद कभी किसी को कटु वचन नहीं बोलते थे। वे अपने माता-पिता, गुरुजन, भाइयों, सेवकों, प्रजाजन अर्थात् हर किसी के प्रति अपने स्नेहपूर्ण दायित्वों का निर्वाह किया करते थे। माता-पिता के प्रति कर्तव्य पालन एवं आज्ञा पालन की भावना तो उनमें कूट-कूटकर भरी थी। उनकी कठोर से कठोर आज्ञा के पालन के लिए वे हर समय तत्पर रहते थे।’’

 श्रीराम का चरित्र बेहद उदार प्रवृत्ति का था। उन्होंने उस अहिल्या का भी उद्धार किया, जिसे उसके पति ने एक बार पतित घोषित कर पत्थर की मूर्ति बना दिया था। जिस अहिल्या को निर्दोष मानकर किसी ने नहीं अपनाया, उसे श्रीराम ने अपनी छत्रछाया प्रदान की। लोगों को गंगा नदी पार कराने वाले एक मामूली से नाविक केवट की अपने प्रति अपार श्रद्धा व भक्ति से प्रभावित होकर भगवान श्रीराम ने उसे अपने छोटे भाई का दर्जा दिया और मोक्ष प्रदान किया। अपनी परम भक्त शबरी नामक भीलनी के झूठे बेर खाकर उसका कल्याण किया।

महारानी केकैयी ने महाराजा दशरथ से जब राम को 14 वर्ष का वनवास दिए जाने और अपने लाड़ले पुत्र भरत को राम की जगह राजगद्दी सौंपने का वचन मांगा तो दशरथ गंभीर धर्मसंकट में फंस गए थे। वे बिना किसी कारण राम को 14 वर्ष के लिए वनों में भटकने के लिए भला कैसे कह सकते थे और श्रीराम में तो वैसे भी उनके प्राण बसते थे। दूसरी ओर वचन का पालन करना रघुकुल की मर्यादा थी। ऐसे में जब श्रीराम को माता केकैयी के यह वचन मांगने और अपने पिता महाराज दशरथ के इस धर्मसंकट में फंसे होने का पता चला तो उन्होंने खुशी-खुशी उनकी यह कठोर आज्ञा भी सहज भाव से शिरोधार्य की और उसी समय 14 वर्ष का वनवास भोगने तथा छोटे भाई भरत को राजगद्दी सौंपने की तैयारी कर ली। श्रीराम के लाख मना किए जाने पर भी उनकी पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण भी उनके साथ वन को निकल पड़े।

वनवास की शुरुआत श्रृंगवेरपुर नामक स्थान से प्रारंभ कर वहां से वे भरद्वाज मुनि के आश्रम में चित्रकूट पहुंचे। उसके बाद विभिन्न स्थानों की यात्रा के दौरान पंचवटी में उन्होंने अपनी कुटिया बनाने का निश्चय किया। यहीं पर रावण की बहन शूर्पणखा की नाक काटे जाने की घटना हुई। उसी घटना के कारण वहां खर-दूषण सहित 14,000 राक्षस राम-लक्ष्मण के हाथों मारे गए। यहीं से श्रीराम व लक्ष्मण की अनुपस्थिति में लंका का राजा रावण माता सीता का अपहरण कर उन्हें अपने साथ लंका ले गया।

कहा जाता है कि जब सीता का विरह श्रीराम से नहीं सहा गया तो उन्होंने साधारण मनुष्य की भांति विलाप किया, लेकिन हिम्मत न हारते हुए सीता जी की खोज में राम-लक्ष्मण जंगलों में भटकने लगे। इसी दौरान उनकी भेंट अपने अनन्य भक्त हनुमान से हुई, जिन्होंने राम-लक्ष्मण को वानरराज बाली के छोटे भाई सुग्रीव से मिलवाया, जो उस समय बाली के भय से यहां-वहां छिपता फिर रहा था। श्रीराम ने बाली का वध करके सुग्रीव तथा बाली के पुत्र अंगद को किष्किंधा का राज्य सौंपा और उसके बाद सुग्रीव की वानर सेना की सहायता से लंका पर आक्रमण किया और रावण का वध कर सीता को उसके बंधन से मुक्त कराया और लंका पर खुद अपना अधिकार न जमाकर वहां शासन रावण के छोटे भाई विभीषण को सौंप दिया तथा वनवास की अवधि समाप्त होने पर भैया लक्ष्मण, सीता जी व हनुमान सहित अयोध्या लौट आए।

वास्तव में विधि के विधान के अनुसार राम को दुष्ट राक्षसों का विनाश करने के लिए ही वनवास मिला था। उन्होंने अपने मानव अवतार में न तो भगवान श्रीकृष्ण की भांति रासलीलाएं कीं और न ही कदम-कदम पर चमत्कारों का प्रदर्शन किया, बल्कि सृष्टि के समक्ष अपने क्रियाकलापों के जरिए ऐसा अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसकी वजह से उन्हें ‘मर्यादापुरुषोत्तम’  कहा गया।

जहां तक राम-रावण के बीच हुए भीषण युद्ध की बात है तो वह सिर्फ दो राजाओं के बीच का सामान्य युद्ध नहीं था, बल्कि दो विचारधाराओं का संघर्ष था, जिसमें एक मानव संस्कृति थी तो दूसरी राक्षसी। एक ओर क्षमादान की भावना को महत्व देने वाले व जनता के दुख-दर्द को समझने एवं बांटने वाले वीतरागी भाव थे, तो दूसरी ओर दूसरों का सब कुछ हड़प लेने की राक्षसी प्रवृत्ति। रावण अन्याय, अत्याचार और अनाचार का प्रतीक था, तो श्रीराम सत्य, न्याय एवं सदाचार के। यही नहीं, सीता जी के अपहरण के बाद भी श्रीराम ने अपनी मर्यादा को कभी तिलांजलि नहीं दी। उन्होंने इसके बाद भी रावण को एक महाज्ञानी के रूप में सदैव सम्मान दिया और यह इससे साबित भी हुआ कि रावण की मृत्यु से कुछ ही क्षण पूर्व श्रीराम ने लक्ष्मण को रावण के पास ज्ञानार्जन के लिए भेजा था।

श्रीराम में सभी के प्रति प्रेम की अगाध भावना कूट-कूटकर भरी थी। उनके प्रजा वात्सल्य, न्यायप्रियता और सत्यता के कारण ही उनके शासन को आज भी ‘आदर्श’ शासन की संज्ञा दी जाती है और आज भी अच्छे शासन को ‘रामराज्य’ कहकर परिभाषित किया जाता है। ‘रामराज्य’ यानी सुख, शांति एवं न्याय का राज्य। रामनवमी पर्व वास्तव में मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की गुरु सेवा, माता-पिता की सेवा व आज्ञापालन, जात-पात के भेदभाव को मिटाने, क्षमाशीलता, भ्रातृप्रेम, पत्नीव्रता, न्यायप्रियता आदि विभिन्न महान आदर्शों एवं गुणों को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है

Friday, April 2, 2021

वैदिक सूर्योपासना का वैश्विक प्रसार :

आज भी ऐसे अनेक शिलालेख उपलब्ध हैं जो सिद्ध करते हैं कि पश्चिम एशिया के मुस्लिम देशों तक में सूर्योपासना का चलन था:



विश्व में सूर्य की उत्तरायण संक्रान्ति के प्रसार पर चर्चा के उपरान्त इस अंक में वैदिक देवता सूर्य अर्थात् मित्र के वैश्विक रूपांकन व उपासना परम्पराओं की समीक्षा की जा रही है। ईसा व इस्लाम पूर्व काल की प्राचीन सभ्यताओं में वैदिक देवता सूर्य अर्थात् मित्र या मिस्र की उपासना के पुरावशेष विश्व के सभी भागों में प्रचुरता में उपलब्ध हैं।

प्राचीन मेसोपोटामिया में इन्द्र, वरुण, अग्नि, सूर्य की पूजा की परम्परा: सिन्धुघाटी की सभ्यता के पश्चिम में ईराक, मिस्र, सीरिया व टर्की (तुर्की) आदि प्राचीन मेसोपोटामिया के भाग रहे हैं। इस क्षेत्र में 6000 वर्ष ईसा पूर्व काल में वैदिक आर्यों की कई सभ्यताएं रही हैं। ईसापूर्व 1400-1900 के बीच वैदिक आर्यों  के दो ऐतिहासिक राज्य हित्ती (हिट्टाइट) व मितान्नी रहे हैं। इनके बीच ईसा पूर्व 1380 अर्थात् 3400 वर्ष पूर्व हुए युद्घ के बाद हित्ती व मितान्नी राजाओं ‘सिपिलियमियम’ और ‘शत्तिवाज’ के बीच 4000 वर्ष पूर्व हुई सन्धि में वैदिक देवताओं मित्र अर्थात् सूर्य, वरुण, इन्द्र, नसत्य अर्थात् अश्विनी कुमारों और अग्नि के आवाहन हैं। जर्नल आॅफ इण्डो-यूरोपियन स्टडीज के 2010 के एक अंक में प्रकाशित लेख ‘अबाउट दि मित्तानी आर्यन गॉड्स (1-2:26.40 पृष्ठ)’ में वैदिक देवताओं के नामों और वैदिक अंकों एक, पांच, सात आदि के विवरण हैं।

कई सहस्रब्दियों के प्राचीन मितान्नी राजाओं के हिन्दू नाम यथा वृहदाश्व, प्रीयाश्व, प्रियामेघ, तुषारार्थ (दशरथ का अपभ्रंश), सुबन्धु आदि और रंगों के भी संस्कृत नाम बभ्रु पिंगल आदि एवं अयनान्त संक्रान्तियों के पर्वों के सन्दर्भ 4000 वर्ष प्राचीन शिलालेखों में प्रचुरता में मिल रहे हैं। (देखें, हेडलबर्ग-जर्मनी के मनफ्रेड मयर्होफर के पुरातात्विक अध्ययन, प्राचीन मेसापोटामिया वर्तमान इराक, कुवैत, टर्की व सीरिया के क्षेत्रों से युक्त क्षेत्र) में 3500 से 4000 वर्ष प्राचीन मित्तानी साम्राज्य के भारतीय आर्यों के नाम युक्त राजाओं के शिलालेखों में एक की प्रति चित्र क्रमांक 1 में है। प्राचीन ईराकी ‘बेंबीलोन’ की सभ्यता में भी सूर्य पर प्रचुर साहित्य रहा है।

इजिप्ट में परमात्मा के रूप में सूर्य अर्थात् एटन या एटेन: भारत में जिस प्रकार सूर्य की मार्तण्ड, भास्कर आदि अनेक नामों से पूजा होती है, उसी प्रकार मिस्र अर्थात् इजिप्ट में सूर्य की ‘रे’ व एटन या एटेन आदि कई नामों से 3000 ईसा पूर्व से पूजा होती रही है। मिस्र के राजा अखेनाटोन, महारानी नेफेरतिति और उनकी तीन पुत्रियों को सूर्य से  आशीर्वाद की याचना करते हुए ईसा पूर्व मध्य 14वीं सदी अर्थात् ईसा के 1450 वर्ष पहले अर्थात् आज से 3470 वर्ष प्राचीन एक नक्काशीपूर्ण वेदिका में दिखाया गया है। (देखें, चित्र क्रमांक 2) इस वेदिका के चित्र जर्मनी में बर्लिन संग्रहालय फोटो मारबर्ग एवं न्यूयॉर्क के आर्ट रिसोर्स संग्रहालय में उपलब्ध हैं। सभी सूर्योपासक सम्प्रदायों में सूर्य को जीवन का आधार एवं सत्य व न्याय का पोषक और सभी प्रकार के ज्ञान का स्रोत माना जाता है। भारत की ही भांति प्रात:कालीन बाल सूर्य, मध्यान्ह कालीन पूर्ण प्रकाशमान सूर्य व अस्ताचलगामी सन्ध्याकालीन सूर्य के भिन्न-भिन्न नाम क्रमश: खेपेर, रे और एटुम रहे हैं। राजा अखेनाटोन के काल के शिलालेखों में सूर्य  को वैदिक साहित्य के अनुरूप पृथ्वी का नियामक बतलाया गया है। ईराक स्थित सुमेर व ईरान के एक भाग में अक्कोडियन रही प्राचीन सभ्यताओं में भी वेदों की भांति सूर्य शीर्ष देवताओं में है, जो रोग रहित बनाता है।

लेबनान में सूर्योपासना

पश्चिम एशिया स्थित इस्लामी देश लेबनान के मन्दिरों के नगर बालबेक की विगत कैलाश पर्वत के सन्दर्भ में चर्चा की जा चुकी है, जहां इस बालबेक नामक प्राचीन नगर का नाम ही सूर्य नगरी अर्थात् हीलियोपॉलिस रहा है।

चीन में सूर्योपासना

चीन के सिंक्यांग प्रान्त की ‘तिआन शान’ पहाड़ियों में हिमालयीन ऋषियों की 334 किजिल गुफाएं प्राचीन सिल्क मार्ग पर भारत, ईरान, रोम व चीन की प्राचीन सौर सभ्यताओं के मध्यवर्ती स्थित हैं, इनमें 100 से अधिक में बौद्घ युग के शैलचित्र हैं। इन गुफाओं के मन्दिरों की रेडियों कार्बन डेटिंग के अनुसार ये चौथी से सातवीं सदी के हैं। इनमें कई गुफाओं में खडेÞ बुद्ध के साथ सूर्य, चन्द्र, गरुड़, नाग, वायुदेव आदि के चित्र भी हैं। बौद्ध मत में बुद्ध को सूर्य- बन्धु मानने के कारण पालि भाषा में बुद्ध का एक विशेषण ‘आदिक्कबन्धु’ पाया जाता है जो संस्कृत शब्द आदित्य-बन्धु का ही पालि में भाषान्तर है। बौद्ध जातक ‘वेस्सान्तर जातक’ में मिस्र अर्थात् सूर्य को न्याय का सृजक बतलाया है। चौथी सदी में किजिल की इन प्राचीन गुफाओं में वैदिक देवताओं व रथारूढ़ सूर्य व बुद्ध का संयुक्त रूपांकन उस काल में बौद्ध व वैदिक संस्कृतियों में समन्वय की परम्परा का द्योतक है।

विश्व के सभी भागों में सूर्योपासना

विश्व के सभी भागों में इण्डोनेशिया सहित दक्षिण पूर्व एशिया, हमारे पड़ोसी देशों बांग्लादेश, नेपाल, तिब्बत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका व म्यांमार  के अतिरिक्त ईरान, ईराक, लेबनान, सीरिया व तुर्की, मिस्र अरब प्रायद्वीप में भी प्राचीन सूर्योपासना के प्रमाण आज भी विद्यमान हैं। यूरोपीय ग्रीको-रोमन क्षेत्र में 5वीं सदी पर्यन्त मित्र देवता का प्रसार रहा है। चीन, जापान, अंटार्कटिक, आॅस्ट्रेलिया और अमेरिकी महाद्वीपों सहित सर्वत्र सौर उपासना के प्रचुर पुरावशेष विद्यमान हैं

विकास की आस :

आज बंगाल के गरीब को विकास की आस है। वह विकास की राह में दीदी के अड़ंगा लगाने से भी वाकिफ है। इसीलिए वह खुलकर पूछ रहा है कि उसे आयुष्मान भारत के तहत मुफ्त इलाज की सुविधा क्यों नहीं मिली? किसान पूछ रहे हैं कि उन्हें किसान सम्मान निधि के हजारों रुपये क्यों नहीं मिले:


दीदी ( ममता बनर्जी ) कहती हैं कि ‘खेला होबे’ तो पश्चिम बंगाल की जनता कह रही है कि ‘खेला खत्म होबे, विकास होबे। विकास आरंभ होबे’। जैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए पश्चिम बंगाल का विकास होबे का नारा बुलंद किया, लाखों लोगों की भीड़ ने प्रधानमंत्री के सुर में सुर मिलाते हुए विकास होबे का समर्थन किया। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री जब मंच से केंद्र सरकार की पश्चिम बंगाल को दी गई विकास योजनाओं का जिक्र करते हैं तो लोग उनकी बात को गौर से सुनते हैं और जब वे आंकड़ों और तर्कों के साथ यह बताते हैं कि कैसे वामदलों के शासन में पश्चिम बंगाल विकास के मामले में पिछड़ा और ममता के राज में कैसे नौजवानों का राज्य से पलायन हुआ तो इसे सुन कर लोग गंभीर हो उठते हैं।


तथ्यों से तिलमिलाई तृणमूल

भाजपा का ‘विकास होबे’ नारा लोगों को इसलिए भी लुभा रहा है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी सहित भाजपा के दूसरे नेता केंद्र सरकार के पश्चिम बंगाल के लिए किए गए विकास के कार्यों का ब्यौरा जनता के सामने रखते हुए यह भी बता रहे हैं कि ममता बनर्जी सरकार ने राज्य के लिए केंद्र सरकार की कौन-कौन सी विकास योजनाओं में अड़ंगा लगाया। लिहाजा आज बंगाल का गरीब पूछ रहा है कि उसे आयुष्मान भारत योजना के तहत मुफ्त इलाज की सुविधा का लाभ क्यों नहीं मिला? तो बंगाल का किसान पूछ रहा है कि उसे किसान सम्मान निधि के हजारों रुपये क्यों नहीं मिले। यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि केंद्र की इन दोनों योजनाओं को लेकर ममता सरकार ने उदासीन रवैया अपनाया। उसने केद्र की योजनाओं को लेकर इसलिए भी राजनीति की ताकि राज्य की जनता को मोदी सरकार की विकास और कल्याणकारी योजनाओं का पता न चले। सवाल उठता है क्या ममता सरकार की इस प्रकार की नकारात्मक राजनीति से पश्चिम बंगाल का भला हुआ?



असल में तृणमूल कांग्रेस और वामदल—कांग्रेस गठबंधन की तुलना में भाजपा के वादे और दावे इसलिए भी लोगों को लुभा रहे हैं क्योंकि पश्चिम बंगाल की जनता तृणमूल कांग्रेस, वामदल और कांग्रेस तीनों का ही शासन देख चुकी है जबकि भाजपा पहली बार राज्य में विकल्प के रूप में उभरी है। इतना ही नहीं, पश्चिम बंगाल सहित पूर्वी भारत के विकास को लेकर केंद्र की मोदी सरकार अपने कार्यों का दृष्टिकोण राज्य की जनता के सामने लगातार रखती रही है। मसलन, प्रधानमंत्री कहते हैं कि ‘बंगाल पहले जितना आगे था, अगर बीते दशकों में उसकी वह गति और बढ़ी होती, तो आज कहां से कहां पहुंच गया होता।’


पिछड़ता गया बंगाल

‘आजादी से पहले पूर्वी भारत के दो शहर कोलकाता और चट्टोग्राम (अब बांग्लादेश) न सिर्फ प्रमुख व्यापारिक केंद्र थे, बल्कि इनके माध्यम से शेष भारत जुड़ा हुआ था। लेकिन पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के विभाजन के बाद जल मार्ग के बाधित होने से अगरतला और कोलकाता के बीच की दूरी 550 किमी से बढ़कर 1600 किमी हो गई। इस विभाजन से पूर्वोत्तर राज्यों का संपर्क टूट-सा गया था जो इस क्षेत्र की आर्थिक, राजनैतिक और स्थानीय पहचान से जुड़े संकट की एक बड़ी वजह था। आजादी के वक्त औद्योगिक क्षेत्र में बंगाल की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत थी जो अब 3.5 प्रतिशत है। रोजगार 27 प्रतिशत से 4 प्रतिशत तक पहुंच गया है। प्रति व्यक्ति आय 1960 में महाराष्ट्र की प्रति व्यक्ति आय से दोगुनी थी और अब महाराष्ट्र से आधी भी नहीं रह गई है। 1960 में बंगाल भारत के सबसे अमीर राज्यों में था पर आज बहुत नीचे चला गया है। एक जमाना था कि बंदरगाहों की आवाजाही 42 प्रतिशत थी और आज 10 प्रतिशत रह गई है। 1950 में देश की फार्मा इंडस्ट्री में इसका 70 प्रतिशत हिस्सा था जो अब 7 प्रतिशत रह गया है। बंगाल का जूट उद्योग महत्वपूर्ण था, आज बहुत सारी मिलें सिर्फ कागजों पर चल रही हैं। राजस्व वृद्धि में 2011-12 और 2019-20 के बीच 31 राज्यों में बंगाल 16वें नंबर पर है। 2020-21 में लिये गए कर्ज की बात करें तो आज राज्य में हर बच्चा 50,000 रु. के कर्ज के साथ पैदा होता है। सड़क है कि गड्ढा, पता ही नहीं चलता। बिजली की सेवा भी खस्ताहाल है। एफडीआई में 2011 में बंगाल की हिस्सेदारी एक प्रतिशत थी और अभी भी 1 प्रतिशत ही है। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में 36 प्रतिशत की कमी, तो अस्पतालों में बिस्तरों की कमी है। इस क्षेत्र में राज्य 23वें नंबर पर है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों के 39 प्रतिशत तो सर्जन के 87 प्रतिशत स्थान खाली हैं। शहरी विकास के लिए केन्द्र ने जो राशि भेजी है, वह भी खर्च नहीं हो पा रही। 56 प्रतिशत स्कूलों में शौचालय नहीं है। एक लाख की संख्या पर 13 डिग्री कॉलेज हैं।

आयुष्मान योजना को लेकर राजनीति

केंद्र सरकार की ओर से आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को पांच लाख रुपये तक मुफ्त इलाज के लिए आयुष्मान भारत नामक स्वास्थ्य बीमा योजना चलाई जा रही है। देश के करीब 50 करोड़ लोगों को इस योजना का लाभ देने का लक्ष्य है। पश्चिम बंगाल में केंद्र की इस योजना को लागू करने के मामले में भी ममता सरकार पर राजनीति करने का आरोप लगा।

अबतक की  सरकारों पर प्रश्नचिन्ह

भाजपा के नेता जब पश्चिम बंगाल की यह तस्वीर लोगों के सामने रखते हैं तो वामदल,कांग्रेस और ममता बनर्जी सरकारों को लेकर कई सवाल उभर आते हैं। गृह मंत्री अमित शाह आंकड़ों के जरिए बंगाल का पिछड़ापन गिनाते हैं। वे कहते हैं कि आजादी के वक्त देश की जीडीपी में बंगाल का एक तिहाई हिस्सा था। तीन दशक के कम्युनिस्ट और एक दशक के तृणमूल शासन में यह ग्राफ गिरता गया है। न कांग्रेस विकल्प है और न तृणमूल। हम भाजपा के लोग बंगाल को एक बार फिर से शोनार बांग्ला बनाएंगे। वैसे पश्चिम बंगाल लंबे समय से पलायन का दंश सह रहा है। पहले भी काम और रोजगार के लिए बड़ी संख्या में पश्चिम बंगाल से देश के दूसरे राज्यों की तरफ मजदूरों का पलायन होता रहा है, लेकिन ममता बनर्जी के राज में यह और बढ़ा। 2011 की जनगणना के मुताबिक 2001 से 2011 के बीच बंगाल से 5.8 लाख लोगों का पलायन हुआ, जो टीएमसी के राज में करीब-करीब दुगुना बढ़कर 11 लाख से ज्यादा हो गया है और बंगाल पलायन के मामले में देश भर में चौथे नंबर पर पहुंच गया है।

बंगाल के लिए नई दृष्टि

दरअसल पश्चिम बंगाल एक राज्य का नाम भर नहीं, बल्कि एक ‘जिबोनधारा’ (जीवनधारा) है। प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में कहा जाए कि, ‘बंगाल जो आज सोचता है, वही कल भारत सोचता है, इसी से प्रेरणा लेते हुए हमें आगे बढ़ना है।’ 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही भाजपा सरकार के एजेंडे में पश्चिम बंगाल सहित पूर्वी भारत का विकास प्राथमिकता में रहा है और इसका असर बंगाल की भूमि पर देखने को मिल रहा है। मसलन, पश्चिम बंगाल का प्रमुख व्यापारिक और औद्योगिक केंद्र हल्दिया न सिर्फ आत्मनिर्भर भारत का केंद्र बिंदु बन रहा है, बल्कि विश्व मानचित्र पर छाने को तैयार है। बीती फरवरी में ऊर्जा गंगा परियोजना की 348 किमी लंबी डोभी-दुर्गापुर प्राकृतिक गैस पाइपलाइन को राष्ट्र को समर्पित किया गया। गैस आधारित अर्थव्यवस्था का केंद्र बनने जा रहे हल्दिया और पश्चिम बंगाल के विकास की इस तस्वीर को इससे भी समझा जा सकता है कि करीब दो साल पहले खाद्य और पेय पदार्थ से जुड़ी एक नामचीन कंपनी का माल हल्दिया से ही अंतर्देशीय जलमार्ग के जरिए उत्तर प्रदेश के बनारस पहुंचा था। आजादी के बाद यह पहला अवसर था कि जब भारत अपने नदी मार्ग को व्यापार के लिए इस्तेमाल करने में सक्षम हुआ। कंटेनर वेसल चलने से पूर्वी भारत न सिर्फ जलमार्ग के जरिए बंगाल की खाड़ी से जुड़ चुका है, बल्कि लघु उद्योगों, किसानों के उत्पाद, कच्चा माल मंगाने से लेकर उसे तैयार करना और वापस भेजना इस क्षेत्र के लिए सुगम हो गया है। हल्दिया-बनारस के बीच के इस जलमार्ग ने पूर्वी भारत के लोगों के जीवन और कारोबार का तरीका ही बदल दिया है। जीवन और व्यवसाय की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए रेल, सड़क, हवाई अड्डे, बंदरगाहों, जलमार्गों में सूचीबद्ध कार्य के अलावा बंद हो रहे उद्योगों को भी पुनर्जीवित किया जा रहा है। गैस की कमी से इस क्षेत्र में उद्योग बंद हो रहे हैं, इसलिए पूर्वी भारत को पूर्वी और पश्चिमी बंदरगाहों से जोड़ने का निर्णय लिया गया है।


प्रधानमंत्री ऊर्जा गंगा पाइपलाइन, जिसका एक बड़ा हिस्सा फरवरी में राष्ट्र को समर्पित किया गया, से न सिर्फ पश्चिम बंगाल बल्कि बिहार और झारखंड के 10 जिले लाभान्वित होंगे। इस पाइपलाइन के निर्माण कार्य से स्थानीय लोगों को 11 लाख मानव दिवस रोजगार प्रदान किया गया है। यह रसोईघरों को पाइप द्वारा स्वच्छ तरल पेट्रोलियम गैस-एलपीजी प्रदान करेगी और स्वच्छ कम्प्रैस्ड प्राकृतिक गैस-सीएनजी वाहनों को भी सक्षम करेगी। इससे सिंदरी और दुर्गापुर उर्वरक कारखानों को निरंतर गैस की आपूर्ति हो सकेगी। उज्ज्वला योजना के कारण पूर्वी क्षेत्र में एलपीजी की खपत और मांग दोनों अधिक हैं, इसलिए एलपीजी बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए काम चल रहा है। पश्चिम बंगाल में जिन 90 लाख महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिए गए, उनमें एससी / एसटी वर्ग की 36 लाख से अधिक महिलाएँ शामिल हैं। इस योजना का ही असर है कि पिछले छह वर्षों में पश्चिम बंगाल में एलपीजी का उपयोग 41 फीसदी से बढ़कर 99 फीसदी तक पहुंच गया है। अब केंद्र सरकार ने आम बजट में उज्ज्वला योजना के तहत 1 करोड़ से अधिक मुफ्त गैस कनेक्शन प्रदान करने का प्रस्ताव किया है। ऐसे में हल्दिया का एलपीजी आयात टर्मिनल ऊंची मांग को पूरा करने में बड़ी भूमिका निभाएगा। इससे पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर में करोड़ों परिवारों को फायदा होगा क्योंकि यहां से 2 करोड़ से अधिक लोगों को गैस मिलेगी। इन लाभार्थियों में से 1 करोड़ लोग उज्ज्वला योजना के लाभार्थी होंगे।


परिवर्तन की बयार बनी पहचान

दरअसल परिवर्तन की यह बयार नए भारत की पहचान बनकर उभरी है। यह पश्चिम बंगाल को पूर्वी भारत के विकास का केंद्र बिंदु बनाने की दिशा में हो रहे काम का ही परिणाम है कि नेशनल हाईवेज-वाटरवेज, हवाई मार्ग, बंदरगाहों और गांव-गांव तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी की दिशा में लगातार काम हो रहा है। लेकिन किसी भी क्षेत्र के विकास में वहां के स्थानीय लोगों का सशक्तीकरण अनिवार्य पहलू होता है। ऐसे में केंद्र सरकार की योजनाओं से लोगों का जीवन भी सुगम (ईज आॅफ लिविंग) हो रहा है। पश्चिम बंगाल में आवास योजना के तहत 30 लाख गरीबों को घर, जनधन योजना में 4 करोड़ गरीबों के बैंक खाते, जल जीवन मिशन के जरिए 4 लाख घरों में पाइप से साफ पानी पहुंचाना और कनेक्टिविटी सुधार के लिए लगातार काम हो रहा है। कोलकाता में ईस्ट-वेस्ट मेट्रो कॉरिडोर के लिए 8,500 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। यह कॉरिडोर देश में नदी के भीतर चलने वाली पहली मेट्रो सेवा होगा। असल में भाजपा को इस बात का बखूबी अहसास है कि विकास का मुद्दा ही ऐसा मुद्दा है जो वाम दलों, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस, तीनों को कठघरे में खड़ा करता है। इसलिए भाजपा इस बात पर जोर दे रही है कि अगर बंगाल में डबल इंजन की सरकार बनेगी तो विकास रफ़्तार पकड़ेगा, गरीबों का भला होगा। केंद्र की योजनाएं लागू की जाएंगी।


उद्योग विरोधी हैं ममता

खड़गपुर की रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ममता सरकार ने राज्य में उद्योग नहीं लगाए, बल्कि वहां एक ही उद्योग चलता है— माफिया उद्योग। दीदी ने बंगाल को बीते दस साल में लूट-मार दी, कुशासन दिया। उन्होंने कहा कि बंगाल में मजदूर-गरीबों को भी कट मनी देना पड़ता है। असल में ममता बनर्जी की छवि एक उद्योग विरोधी नेता के तौर पर उभरी है। ममता भले ही नंदीग्राम से इस तर्क के साथ चुनाव लड़ रही हैं कि 2007 में उन्होंने वहां किसानों की जमीन का अधिग्रहण किए जाने के खिलाफ बड़ा मोर्चा खोला था और चुनाव में उन्हें इसका फायदा मिलेगा। लेकिन ममता विरोधियों की दलील है कि उस समय अगर नंदीग्राम में हजारों एकड़ में पेट्रोलियम, केमिकल और पेट्रोकेमिकल हब विकसित हो जाता, तो क्षेत्र के लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलता। उस समय पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री थे और वे उद्योग विरोधी होने की लेफ़्ट की छवि को सुधारना चाहते थे।

वर्ष 2005 में जब केंद्र सरकार ने देश भर में केमिकल हब बनाने की योजना पर विचार किया, तो बुद्धदेव ने पश्चिम बंगाल में इसके लिए पहल की और तय किया गया कि हल्दिया बंदरगाह के पास नंदीग्राम में विशेष आर्थिक क्षेत्र विकसित कर पेट्रोलियम हब बनाया जाए। तत्कालीन राज्य सरकार ने इसके लिए इंडोनेशिया के एक बड़े उद्योग समूह सलीम ग्रुप के साथ निवेश की बात भी पक्की कर ली। लेकिन योजना परवान चढ़ती, इससे पहले ही 2007 में बुद्धदेव के सियासी विरोधियों ने जमीन अधिग्रहण को लेकर किसानों में भ्रम पैदा किया और इसके खिलाफ हिंसक आंदोलन शुरू हो गया। आखिरकार सरकार को फैसला वापस लेना पड़ा। करीब-करीब उसी समय टाटा मोटर्स के पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा नैनो कार प्लांट को लेकर विरोध शुरू हुआ।


टाटा मोटर्स करीब एक हजार एकड़ जमीन पर प्लांट लगाने वाली थी, जिसकी अनुमति तत्कालीन लेफ़्ट सरकार ने दे दी थी लेकिन उसके खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया और ममता बनर्जी ने इसमें मुख्य भूमिका निभाई। आखिरकार 2008 में टाटा मोटर्स ने सिंगूर की बजाए गुजरात में प्लांट लगाने का फैसला कर लिया। इसका श्रेय गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को ही जाता है। अगर सिंगूर में नैनो कार प्लांट लग जाता, तो क्षेत्र के लोगों के लिए रोजगार की व्यापक संभावनाएं बन सकती थीं। ममता विरोधी अब ये बातें छेड़कर तृणमूल कांग्रेस को विकास विरोधी करार दे रहे हैं। जाहिर है, पश्चिम बंगाल के इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने विकास को मुद्दा बनाकर राज्य में सत्तारूढ़ ममता सरकार और वर्षो शासन करने वाले वाम दलों और कांग्रेस गठबंधन की जबरदस्त घेराबंदी कर दी है।

पश्चिम बंगाल में केंद्र सरकार का काम

     - केंद्र सरकार की योजनाओं से लोगों का जीवन हुआ सुगम

     - बंगाल में आवास योजना के तहत 30 लाख गरीबों को घर

     - उज्ज्वला के तहत 90 लाख महिलाओं को मुफ्त कनेक्शन

     - जनधन योजना में 4 करोड़ गरीबों के बैंक खाते

     - जल जीवन मिशन के जरिए 4 लाख घरों में पाइप से साफ पानी पहुंचाने का काम

     - कनेक्टिविटी सुधार के लिए लगातार काम

     - कोलकाता में ईस्ट-वेस्ट मेट्रो कॉरिडोर के लिए 8,500 करोड़ रुपये मंजूर

     - एलपीजी गैस की कवरेज 99 प्रतिशत से ज्यादा

     - डोभी-दुगार्पुर प्राकृतिक गैस पाइपलाइन राष्ट्र को समर्पित

     - वित्त वर्ष 2021-22 के केंद्रीय बजट में असम और पश्चिम बंगाल के चाय बागानकर्मियों खासकर                      महिलाओं और उनके बच्चों के कल्याण के लिए एक हजार करोड़ रुपये का प्रस्ताव

     - पश्चिम बंगाल में कोलकाता-सिलीगुड़ी के लिए नेशनल हाइवे प्रोजेक्ट का ऐलान

     - बंगाल में राजमार्ग पर 25,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे

     - बंगाल में 675 किमी राजमार्ग का निर्माण

     - प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना पर राजनीति

     - पीएम-किसान योजना के तहत, लघु और सीमांत किसान परिवारों को तीन बराबर किस्तों में                        प्रति वर्ष छह हजार रुपये की सहायता राशि प्रदान की जाती है। बंगाल सरकार ने केंद्र की इस                      योजना को राज्य में लागू करने से इनकार कर दिया था जिसके चलते यहां के लाखों किसान                       केंद्रीय मदद से वंचित रहे।पूरे देश में यह योजना पहले से ही लागू थी, केवल बंगाल में इसे लागू                     नहीं किया जा सका।

चुनौती से बढ़ी चिंता:

बरसों से वामपंथी, सेकुलर बुद्धिजीवी और लीगी कट्टरवादी  तत्व बेरोकटोक भारतीय संस्कृति और साहित्य पर निरंतर चोट करते रहे थे। अब उन्हें  थोड़ी चुनौती मिलने लगी है तो कहने लगे हैं कि देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उभार हो रहा है


सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और साहित्य पर कुछ लिखने से पहले वामपंथी पत्रिका ‘पहल’ के अंक 106 में प्रस्थापित इस मत का खंडन करना आवश्यक है कि मोदी सरकार के आने के बाद सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर चर्चा तेज हो गई है। ‘सोशल मीडिया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ लेख में जगदीश्वर चतुर्वेदी ने इस चर्चा के मूल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देखा है और उनकी स्थापना है कि यह काल्पनिक धारणा है, भिन्नता और वैविध्य का अभाव है तथा एक असंभव विचार है।

यह सारा विचार एवं निष्कर्ष तथ्यों-तर्कों के विरुद्ध है और वामपंथी विचारों की भारत-विरोधी, हिंदू-विरोधी तथा सांस्कृतिक-विरोधी अवधारणाओं को उजागर करता है। वामपंथी न तो भारत राष्ट्र को समझते हैं, न संस्कृति को और न देश की सांस्कृतिक एकता को। वे उस इतिहास को भी नहीं जानते और न जानना चाहते हैं, जिसमें वैदिककाल से आज तक, हजारों वर्षों से एक सांस्कृतिक धारा का निरंतर प्रवाह हो रहा है और भारत की सनातन हिंदू संस्कृति ने देश को एकसूत्र में बांधा हुआ है। भारत को समझने तथा उसकी हिंदू संस्कृति तथा राष्ट्रभाव को समझने के लिए वेद, उपनिषद्, पुराण, रामायण, महाभारत के साथ संपूर्ण संस्कृत साहित्य, मध्ययुग के भक्ति आंदोलन तथा आधुनिक युग के जागरण काल के इतिहास से गुजरना होगा और तभी देश के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मर्म से साक्षात्कार हो सकेगा। यहां विस्तार से संस्कृत साहित्य की चर्चा तो संभव नहीं है, पर इतना कहा जा सकता है कि राष्ट्र की पहली कल्पना संस्कृत साहित्य से मिलती है और हमारी सांस्कृतिक अवधारणा का स्वरूप भी उसी समय में निर्मित हो चुका था।

भारत एक भू-सांस्कृतिक राष्ट्र है, एक सांस्कृतिक अवधारणा है तथा राजनीतिक रूप से एक इकाई न होने पर भी सांस्कृतिक रूप से हमेशा एक राष्ट्र रहा है। भारत हिंदू राष्ट्र है और हिंदुत्व और भारतीयता पर्यायवाची शब्द हैं। हिंदू धर्म का कोई एक पैगम्बर तथा कोई एक ग्रंथ नहीं है। वह बहुलतावादी है, किंतु यह बहुलता एकत्व में अंतर्भूत है। ईश्वर ने भौगोलिक रूप में एक राष्ट्र बनाया है और यहां का सांस्कृतिक जीवन एक रूपात्मक है। अत: यह कहने में कोई गलती नहीं है कि इस एकता में बहुलता और विविधता समाई है।


भारत की सांस्कृतिक एकता तथा एक राष्ट्रीयता का स्वरूप स्पष्ट एवं व्यापक है, लेकिन आश्चर्य होता है कि भारत को बहुराष्ट्रीय महाद्वीप मानने वाले यूरोपियों, वामपंथी इतिहासकारों तथा पंथनिरपेक्षतावादियों को वह दिखाई नहीं देता। असल में ये उसे देखना ही नहीं चाहते, क्योंकि इस सत्य को स्वीकार करते ही भारत को तोड़ने की उनकी दुरभिसंधि का पर्दाफाश हो जाएगा। मानसिक गुलामी तथा औपनिवेशिक आधुनिकता ने उन्हें एक प्रकार से राष्ट्र एवं संस्कृति-द्रोही बना दिया है, उन्हें इतिहास बोध खो चुका है, सांस्कृतिक स्मृतियां एवं भारत अनुराग क्षीण हो गया है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक एकता ने भारत की हस्ती को मिटने नहीं दिया और यथासमय उसका ज्वार, उसका आंदोलन तथा उसकी जागृति होती रही है। आप भक्तिकाल का साहित्य और संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल  की पुस्तक ‘भारत की संत परंपरा और सामाजिक समरसता’ को देखें तो पता चलेगा कि भक्ति आंदोलन ने कैसे हिंदू समाज को भक्ति, अध्यात्म, समरसता तथा जीवनमूल्यों से जोड़े रखा तथा कैसे उन्होंने अत्याचारी मुसलमान शासकों के विरुद्ध संघर्ष किया।

भक्ति ने संपूर्ण देश में हिंदू धर्म को जीवित रखा और इस्लाम के विरुद्ध एक आध्यात्मिक सुरक्षा कवच का निर्माण किया। इस ग्रंथ में देश की 18 भाषाओं के संत साहित्य का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला गया है कि भक्ति आंदोलन ने हिंदू समाज का परिष्कार किया, उसके श्रेष्ठ जीवन-मूल्यों एवं उसकी सनातनता को चिरंजीवी बनाया। यदि हम आधुनिक युग के जागरण काल को देखें तो उसी प्रकार का राष्ट्रीय जागरण मुख्यत: हिंदू जागरण था तथा एक प्रकार से सांस्कृतिक जागरण था, देश की सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के उन्नयन का ही आंदोलन था। राजा राममोहन राय से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक के इतिहास में देश के चारों ओर एक सांस्कृतिक चेतना का तेजी से प्रसार होता है और देश की अस्मिता, स्वतंत्रता, सांस्कृतिक एकता आदि के विचार जनता को मथने लगते हैं।

सारा देश एक तरह से सोचता है, देश में राष्ट्र-भाव उत्पन्न होकर यह विचार उत्पन्न होता है कि हम क्या थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी। इस सांस्कृतिक जागरण में पंथ, जाति, क्षेत्र, भाषा आदि सभी विभेद गायब हो जाते हैं और राम, कृष्ण, शिवाजी, प्रताप, गुरु गोविंद सिंह, गीता, भारतमाता, वंदेमातरम् आदि सभी के लिए प्रेरणास्रोत बन जाते हैं। गांधी तो राम को प्रेरणा पुरुष मानते हैं और राम राज्य की स्थापना करना चाहते हैं।

विवेकानंद हों या तिलक या गांधी या भगत सिंह, सभी गीता से शक्ति ग्रहण करते हैं और स्वामी दयानंद वैदिक संस्कृति की स्थापना करते हैं। आप सोचें, टैगोर ने शिवाजी पर कविता लिखी, सुब्रह्मण्यम भारती ने गुरु गोविंद सिंह पर तथा प्रेमचंद ने राणा प्रताप एवं स्वामी विवेकानंद पर लेख लिखे। हिंदी के एक लेखक ने हिंदी, हिंदू, हिन्दुस्थान का विचार प्रस्तुत किया और जयशंकर प्रसाद ने भारतीय इतिहास से आख्यान लेकर देशभक्ति तथा दासता से मुक्ति का भाव उत्पन्न किया और मैथिलीशरण गुप्त तो हिंदू संस्कृति तथा राष्ट्रीयता के ही आख्यान काव्य लिख रहे थे। ये कुछ उदारहण हैं कि हम भारतीय एक हैं, अनेक होकर भी एक हैं, हमारी संस्कृति, चिंतन, अध्यात्म मूल्य आदि सभी एक हैं और हमारे आदर्श राम, कृष्ण, शिव, चाणक्य, प्रताप, शिवाजी, विक्रमादित्य, शंकराचार्य, तुलसी, कबीर, गांधी आदि राष्ट्रीय महानायक हैं।

भारत के स्वाधीनता संग्राम के मूल में मुख्यत: हिंदू धर्म, संस्कृति, दर्शन साहित्य के समुच्चय से निर्मित भारतीय अवधारणा तथा पुरातन भारत को आधुनिक रूप में रूपायित करने का संघर्ष था। गांधी के स्वराज्य और राम-राज्य में भारतीय तत्व ही थे, जिसमें सनातन भारतीय संस्कृति एवं जीवन दृष्टि का गहरा प्रभाव था, परंतु स्वतंत्र भारत में नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के कारण स्वाधीनता संग्राम में जो भारत का भावी स्वरूप था, वह परिदृश्य से अदृश्य हो गया और पश्चिम एवं साम्यवादी जीवन दर्शन का प्रभुत्व हो गया। इस कालखंड में भारत, भारतीयता, राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक एकता, हिंदू, हिंदू धर्म आदि शब्द तिरस्कृत और अपमानित बना दिए गए और वामपंथी इतिहासकार, कथित सेकुलर और लीगी कट्टरवादी तत्वों ने देश के सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय आधार पर आक्रमण शुरू कर दिए।

स्वतंत्र भारत के इस भारतीय संस्कृति तथा राष्ट्रीयता के विरोधी वातावरण में हिंदू शब्द का अर्थ ‘सांप्रदायिक’ तथा ‘कट्टर’ के रूप में प्रचारित किया गया और बहुसंख्यक समाज की दशा अल्पसंख्यक समाज से भी गई-गुजरी हो गई। देश के प्रगतिशील लेखकों को राजाश्रय के साथ रूस का आश्रय मिला और देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों, अकादमियों, पुरस्कारों आदि पर इनका कब्जा हो गया। इन प्रगतिशीलों ने साहित्य की मुख्यधारा, जो सांस्कृतिक राष्टÑीयता की धारा थी, जो वैदिक काल से निरंतर प्रभावित होकर भारतेंदु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचंद और दिनकर तक बनी हुई थी, उसे प्रगतिशील साहित्य धारा के रूप में बदल दिया और अब रामविलास शर्मा, नामवर सिंह, मुक्तिबोध, नागार्जुन, धूमिल, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन आदि ही साहित्य की मख्यधारा के संस्थापक साहित्यकार बन गए।

इन प्रगतिशीलों की मुख्य धारा में वाल्मीकि, तुलसी, भूषण, मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्राकुमारी चौहान, श्यामनारायण पांडेय, रामकुमार वर्मा, दिनकर, महादेवी, पंत, प्रसाद, अज्ञेय आदि अनेक राष्ट्रीय साहित्यकारों को गायब कर दिया गया। इन वामपंथियों ने तुलसीदास तक को पाठ्यक्रमों से हटा दिया और भक्तिकाल के सांस्कृतिक एवं साहित्यिक जागरण को केवल कबीर तक सीमित कर दिया। इससे बड़ा राष्ट्रद्रोह क्या होगा कि देश की नई पीढ़ी को भारत की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों तथा सांस्कृतिक उत्कर्ष राष्ट्रीय अवधारणा से ही अलग-थलग कर दिया जाए! खैर, अब उन्हें लग रहा है कि चुनौती मिलने लगी है

Friday, January 15, 2021

कन्याकुमारी और स्वामी विवेकानंद जी का नवोन्मेष !

स्वामी जी के लेखों और भाषणों ने अनेक सुशिक्षित हिंदुओं पर गहरी छाप छोड़ी थी। उस दौर में पुलिस जब भी किसी क्रांतिकारी के घर की तलाशी लेने जाती थी तो वहां उसे वहां स्वामी विवेकानंद जी की पुस्तकें अवश्य मिलती थीं



मां जगदम्बा की तपोस्थली कन्याकुमारी निःसंदेह अद्भुत है। हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के सागरों की सम्मिलित उत्ताल तरंगें इस पुण्य भूमि की उस पावन श्रीपाद शिला को नित्य पखारती हैं जहां देवाधिदेव महादेव को पति रूप में पाने के लिए मां आदिशक्ति ने कन्या रूप में घोर तपस्या की थी। मुख्य मंदिर से दूर समुद्र के मध्य स्थित इस श्रीपाद शिला पर अंकित मां के चरण चिह्न शताब्दियों से उनकी दुर्धर्ष तपश्चर्या के साक्षी बने हुए हैं। इसी पावन धरती पर स्वामी विवेकानंद ने सर्वप्रथम भारत के नव निर्माण का स्वप्न देखा था।

लोकप्रिय उपन्यासकार नरेन्द्र कोहली की स्वामी विवेकानंद के जीवन पर लिखे अप्रतिम उपन्यास ‘न भूतो न भविष्यति’ में स्वामी विवेकानंद को कन्याकुमारी में हुई अद्भुत अनुभूतियों का अत्यंत मनोमुग्धकारी वर्णन मिलता है- ‘’ अदृश्य का आकर्षण, संस्कारों की सांकल अथवा नियति का विधान उन्हें उस ओर इंगित कर रहे थे। संभव है कि पहले कभी यहां मंदिर रहा हो परंतु अभी तो सागर की लहरों ने श्रीपाद शिला को मुख्य भूमि से अलग कर दिया था। युवा संन्यासी ने मंदिर में मां के विग्रह को प्रणाम किया और फिर मंदिर से बाहर निकलकर उस शिला की ओर देखने लगे। वहां तक पहुंचने के लिए उनके पास कोई साधन न था। पास में सागर तट पर कुछ लोग अपने नौकाओं के साथ थे अवश्य परंतु उन्हें देने के लिए उनके पास पैसा न था और बिना पैसे के उन्हें भला कोई क्यों ले जाता। वे अपने प्राणों में मां की पुकार को आकुलता से अनुभव कर रहे थे और यह त्वरा तीव्र से तीव्रतम होती जा रही थी। सहसा मन में यह विचार कौंधा कि जिसकी सृष्टि है, जिसका सागर है, जिसके सभी समुद्री जलचर और महामत्स्य हैं; जब वही मां मुझे बुला रही हैं तब फिर प्रतीक्षा किसकी और अवरोध कैसे! यदि ये नाविक बिना पैसे के उन्हें उनके गंतव्य तक ले जाने को तैयार नहीं हो रहे हैं तो न सही; भला मां से बड़ा कोई नाविक है क्या! और इस निश्चय के साथ वे पास की एक चट्टान पर चढ़े और उस अथाह जलराशि में कूद पड़े। ‘छपाक’ की ध्वनि से लोगों का ध्यान उधर गया। तट पर खड़े लोगों ने देखा कि एक युवक संन्यासी सागर में तैरता हुआ श्रीपाद शिला की दिशा में बढ़ रहा था। सागर बेहदअशांत था। लहरों के तेज थपेड़े संन्यासी को उसके दुस्साहस के लिए चेतावनी दे थे। बाहर सागर में घोर अशांति थी लेकिन उनके अंदर असीम शांति। उनके मन में जगन्माता से मिलने की विचित्र सी उत्कंठा थी। जैसे वे प्रकृति से कोई रोचक खेल खेल रहे हों। वह मां से जल्द मिलना चाहते थे पर प्रकृति मार्ग में तमाम बाधाएं बिछाए बैठी थी। यूं समुद्र तो उन्होंने अनेक बार देखे थे तथा लहरों से क्रीड़ा तो वे सदा करते आए थे पर लहरों ने इस तरह अजगर बनकर उनको इस प्रकार पहले कभी न बांधा था.... आज का सा समुद्र का महागर्जन, लहरों के इतने विशालकाय पर्वत उन्होंने पहले कभी न देखे थे.... पर महासागर की इन तूफानी लहरों के बीच अठखेलियां करते भयावह महामत्स्यों और मानवभक्षी शार्कों के बीच भी वे पूरी तरह शांत व निर्भीक थे। यूं भी विषम परिस्थितियों में घबराना व विवश होना उन्होंने कभी सीखा ही न था। वे भलीभांति जानते थे कि उनकी मां उनके निकट ही हैं और उनके साथ लीला कर रही हैं। उन्हें प्रगाढ़ अनुभूति हो रही थी कि यदि उन्होंने जगन्माता को खोज लिया तो ठीक अन्यथा वेस्वयं ही उन्हें अपनी गोद में उठा लेंगी। जगन्माता की अदृश्य कृपा का यह अभेद्य कवच उन्हें उनके गंतव्य की ओर तेजी से अग्रसर कर रहा था। अचानक उन्हें पानी के कम होने का एहसास हुआ और उन्होंने अनुभव किया कि वे श्रीपाद शीला के निकट पहुंच गये हैं। तभी सहसा उन्हें पावों के नीचे उन्हें पाषाण का ठोस आधार अनुभव किया। उन्होंने दृष्टि उठाई तो सामने अलौकिक दृश्य उपस्थित था- सागर और आकाश मिलकर एक हो रहे थे। मानो सारी प्रकृति जैसे एक रूप हो गयी हो। नजरों के सामने श्रीपाद शिला को देख उनकी आंखों में आंसू छलक उठे। उन्होंने मस्तक रखकर प्रणाम किया और स्वतः ही कह उठे- हे मां ! तुम्हारी तपस्या से पाषाण तक पिघल गए थे तभी तो तुम्हारे चरण चिह्न यहां अंकित हो सके। प्रार्थना की उस स्थिति में उन्हें भुवन मोहिनी जगत व्यापिनी मां जगदम्बा की प्रत्यक्ष उपस्थिति का भान होने लगा और वे ध्यानस्थ हो गए।

ध्यान की गहराइयों में उतरते हुए उनका ध्यान भारत के वर्तमान और भविष्य पर केंद्रीभूत हो गया। उस दिव्य दर्शन में महापंडित भारत की उपलब्धियां नक्षत्रों के समान उनके हृदय आकाश में प्रकाशपूर्ण हो उठीं। उन्होंने न सिर्फ भारतीय संस्कृति के स्वर्णिम स्वरूप के सत्य को अपने मनःपटल पर साकार होते देखा। उन्होंने देखा कि भारतमाता की धमनियों में दौड़ने वाला रक्त प्रवाह प्रवाह और कुछ नहीं बस ‘अध्यात्म’ था। इसी अध्यात्म पथ से विमुख होने के कारण ही देश का पतन हुआ। आद्यशक्ति जगदम्बा उन्हें अनुभव करा रही थीं कि उसी सर्वोच्च स्थिति की पुनर्प्राप्ति के लिए भारत की आध्यात्मिक चेतना की नव प्रतिष्ठा अनिवार्य है और यह संभव होगा उपनिषदों के चिंतन को पुनः अमली जामा पहनाने से। इसके लिए जात-पात, ऊंच-नीच, भाषा क्षेत्र के भेद को भुलाकर राष्ट्र की अखंडता की साधना करनी होगी तथा भक्ति, श्रद्धा, ज्ञान, विवेक से जन-जन को पोषित करना होगा।

तीन दिन की इस अविराम ध्यान साधना के साथ वह युवा संन्यासी एक राष्ट्र निर्माता, विश्व शिल्पी स्वामी विवेकानंद के रूप में परिणत हो गया। यह उनका नूतन जन्म था। उनकी आत्मा करुणा से पिघल कर सर्वव्यापी हो गयी थी। आज उनके सामने उनका कर्तव्य पथ प्रशस्त हो गया था तथा उनके वर्षों के आत्मचिंतन को एक नव निष्कर्ष मिल गया था। अब उन्हें भारत के भविष्य को साकार मात्र करना था, उनके लिए यही जगन्माता का संकेत और आदेश था।

राष्ट्रमंत्र के अद्भुत उद्घोषक

भारतभूमि के प्रति जो अगाध प्रेम स्वामी विवेकानंद जी ने देशवासियों में संचालित किया था, वही स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य प्रेरणा बना। नवजीवन प्रकाशन कोलकाता से प्रकाशित भूपेंद्र नाथ दत्ता की पुस्तक ‘पैट्रियोट प्रॉफिट स्वामी विवेकानंद’ में उल्लेख है कि अपनी फ्रांसीसी शिष्या जोसेफाईन मैक्लियाड से स्वामी जी ने कहा था कि क्या निवेदिता नहीं जानती है कि मैंने स्वतंत्रता के लिए प्रयास किया किंतु देश अभी तैयार नहीं है, इसलिए छोड़ दिया। भारत भ्रमण के दौरान देशभर के राजाओं को जोड़ने का प्रयत्न भी इस उद्देश्य से स्वामी जी ने किया था। स्वामी विवेकानंद की भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से कोई भागीदारी भले ही नहीं थी परन्तु फिर भी आजादी के आंदोलन के सभी चरणों पर उनका व्यापक प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के पुरोधा थे स्वामी विवेकानंद। उन्होंने अपनी प्रचंड तपश्चर्या से सूक्ष्म जगत को इतना मथ डाला था कि भारत की प्रसुप्त आत्मा जाग उठी थी। इसी का परिणाम था कि जन-जन में स्वतंत्रता की ज्वाला धधक उठी थी। युवाओं में स्वतंत्रता के लिए आत्माहुति के पीछे उनकी ही प्रेरणा थी। सूक्ष्म स्थूल का आधार होता है। जो सूक्ष्म में घटित होता है वही कालांतर में स्थूल में परिवर्तित हो जाता है। इसी आधार पर स्वामी विवेकानंद ने भारतीय स्वतंत्रता के लिए सूक्ष्म जगत को उद्वेलित किया था।

भगिनी निवेदिता के अनुसार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर स्वामी विवेकानंद का प्रभाव फ्रांसीसी क्रांति पर रूसो के प्रभाव अथवा रूसी व चीनी क्रांति पर कार्ल मार्क्स के प्रभाव से किसी भी तरह से कम नहीं था। कोई भी स्वतंत्रता आंदोलन राष्ट्रव्यापी चेतना के पृष्ठभूमि तैयार किए बिना आकार नहीं ले सकता। सभी समकालीन स्रोतों से स्पष्ट हो जाता है कि भारत में राष्ट्रीयता की भावना की जागरण में विवेकानंद का प्रभाव सबसे सशक्त था। वे नींव के निर्माण में लगने वाले पुरोधा ही नहीं, राष्ट्रीय जीवन के अनन्य प्रतीक भी थे।

अपनी मित्र व स्वामी विवेकानंद की अनुयायी श्रीमती एरिक हेमंड को भेजे पत्र में भगनी निवेदिता ने इस बात का उल्लेख करते हुए लिखा था कि अंग्रेज उनके प्रति आशंकित हैं। अल्मोड़ा में पुलिस अपने जासूसों के द्वारा स्वामी जी पर दृष्टि रही है। यद्यपि स्वामी जी इस बात को गंभीरता से नहीं लेते हैं पर यदि ब्रिटिश सरकार स्वामी जी के खिलाफ कोई अनुचित कदम उठाएगी तो उसका विरोध करने वाली राष्ट्रवादी ताकतों में वे भी पूर्ण निष्ठा से शिरकत करेंगी।

गौरतलब हो कि स्वामी जी के लेखों और भाषणों ने अनेक सुशिक्षित हिंदुओं पर गहरी छाप छोड़ी थी। उस दौर में पुलिस जब भी किसी क्रांतिकारी के घर की तलाशी लेने जाती थी तो वहां उसे वहां स्वामी विवेकानंद जी की पुस्तकें अवश्य मिलती थीं। प्रसिद्ध देशभक्त क्रांतिकारी ब्रह्मबांधव उपाध्याय और अश्विनी कुमार दत्त का कहना था कि स्वामी जी ने उन्हें बंगाली युवाओं की अस्थिओं से एक ऐसा शक्तिशाली हथियार बनाने को कहा था जो भारत को स्वतंत्र करा सके। इसी तरह चर्चित बंगाली लेखक कालीचरण घोष अपनी प्रेरणादायी रचना ‘’दि रोल ऑफ ऑनर एनेक्टोड ऑफ इंडियन मार्टियर्स’’ में बंगाल के युवा क्रांतिकारियों के मन पर स्वामी जी के प्रभाव के बारे में विस्तार से लिखते हैं कि स्वामी जी की वाणी ने न सिर्फ बंगाली युवाओं के मन में राष्ट्रभक्ति की भावना भरी वरन उनमें राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय होने की प्रवृत्ति भी विकसित की। स्वामी विवेकानंद के बौद्धिक जगत पर पड़ा प्रभाव उनके देहावसान के बाद बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन के रूप में श्री अरविंद के उद्भव के रूप में सामने आया।