Friday, April 2, 2021

चुनौती से बढ़ी चिंता:

बरसों से वामपंथी, सेकुलर बुद्धिजीवी और लीगी कट्टरवादी  तत्व बेरोकटोक भारतीय संस्कृति और साहित्य पर निरंतर चोट करते रहे थे। अब उन्हें  थोड़ी चुनौती मिलने लगी है तो कहने लगे हैं कि देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उभार हो रहा है


सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और साहित्य पर कुछ लिखने से पहले वामपंथी पत्रिका ‘पहल’ के अंक 106 में प्रस्थापित इस मत का खंडन करना आवश्यक है कि मोदी सरकार के आने के बाद सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर चर्चा तेज हो गई है। ‘सोशल मीडिया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ लेख में जगदीश्वर चतुर्वेदी ने इस चर्चा के मूल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देखा है और उनकी स्थापना है कि यह काल्पनिक धारणा है, भिन्नता और वैविध्य का अभाव है तथा एक असंभव विचार है।

यह सारा विचार एवं निष्कर्ष तथ्यों-तर्कों के विरुद्ध है और वामपंथी विचारों की भारत-विरोधी, हिंदू-विरोधी तथा सांस्कृतिक-विरोधी अवधारणाओं को उजागर करता है। वामपंथी न तो भारत राष्ट्र को समझते हैं, न संस्कृति को और न देश की सांस्कृतिक एकता को। वे उस इतिहास को भी नहीं जानते और न जानना चाहते हैं, जिसमें वैदिककाल से आज तक, हजारों वर्षों से एक सांस्कृतिक धारा का निरंतर प्रवाह हो रहा है और भारत की सनातन हिंदू संस्कृति ने देश को एकसूत्र में बांधा हुआ है। भारत को समझने तथा उसकी हिंदू संस्कृति तथा राष्ट्रभाव को समझने के लिए वेद, उपनिषद्, पुराण, रामायण, महाभारत के साथ संपूर्ण संस्कृत साहित्य, मध्ययुग के भक्ति आंदोलन तथा आधुनिक युग के जागरण काल के इतिहास से गुजरना होगा और तभी देश के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मर्म से साक्षात्कार हो सकेगा। यहां विस्तार से संस्कृत साहित्य की चर्चा तो संभव नहीं है, पर इतना कहा जा सकता है कि राष्ट्र की पहली कल्पना संस्कृत साहित्य से मिलती है और हमारी सांस्कृतिक अवधारणा का स्वरूप भी उसी समय में निर्मित हो चुका था।

भारत एक भू-सांस्कृतिक राष्ट्र है, एक सांस्कृतिक अवधारणा है तथा राजनीतिक रूप से एक इकाई न होने पर भी सांस्कृतिक रूप से हमेशा एक राष्ट्र रहा है। भारत हिंदू राष्ट्र है और हिंदुत्व और भारतीयता पर्यायवाची शब्द हैं। हिंदू धर्म का कोई एक पैगम्बर तथा कोई एक ग्रंथ नहीं है। वह बहुलतावादी है, किंतु यह बहुलता एकत्व में अंतर्भूत है। ईश्वर ने भौगोलिक रूप में एक राष्ट्र बनाया है और यहां का सांस्कृतिक जीवन एक रूपात्मक है। अत: यह कहने में कोई गलती नहीं है कि इस एकता में बहुलता और विविधता समाई है।


भारत की सांस्कृतिक एकता तथा एक राष्ट्रीयता का स्वरूप स्पष्ट एवं व्यापक है, लेकिन आश्चर्य होता है कि भारत को बहुराष्ट्रीय महाद्वीप मानने वाले यूरोपियों, वामपंथी इतिहासकारों तथा पंथनिरपेक्षतावादियों को वह दिखाई नहीं देता। असल में ये उसे देखना ही नहीं चाहते, क्योंकि इस सत्य को स्वीकार करते ही भारत को तोड़ने की उनकी दुरभिसंधि का पर्दाफाश हो जाएगा। मानसिक गुलामी तथा औपनिवेशिक आधुनिकता ने उन्हें एक प्रकार से राष्ट्र एवं संस्कृति-द्रोही बना दिया है, उन्हें इतिहास बोध खो चुका है, सांस्कृतिक स्मृतियां एवं भारत अनुराग क्षीण हो गया है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक एकता ने भारत की हस्ती को मिटने नहीं दिया और यथासमय उसका ज्वार, उसका आंदोलन तथा उसकी जागृति होती रही है। आप भक्तिकाल का साहित्य और संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल  की पुस्तक ‘भारत की संत परंपरा और सामाजिक समरसता’ को देखें तो पता चलेगा कि भक्ति आंदोलन ने कैसे हिंदू समाज को भक्ति, अध्यात्म, समरसता तथा जीवनमूल्यों से जोड़े रखा तथा कैसे उन्होंने अत्याचारी मुसलमान शासकों के विरुद्ध संघर्ष किया।

भक्ति ने संपूर्ण देश में हिंदू धर्म को जीवित रखा और इस्लाम के विरुद्ध एक आध्यात्मिक सुरक्षा कवच का निर्माण किया। इस ग्रंथ में देश की 18 भाषाओं के संत साहित्य का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला गया है कि भक्ति आंदोलन ने हिंदू समाज का परिष्कार किया, उसके श्रेष्ठ जीवन-मूल्यों एवं उसकी सनातनता को चिरंजीवी बनाया। यदि हम आधुनिक युग के जागरण काल को देखें तो उसी प्रकार का राष्ट्रीय जागरण मुख्यत: हिंदू जागरण था तथा एक प्रकार से सांस्कृतिक जागरण था, देश की सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के उन्नयन का ही आंदोलन था। राजा राममोहन राय से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक के इतिहास में देश के चारों ओर एक सांस्कृतिक चेतना का तेजी से प्रसार होता है और देश की अस्मिता, स्वतंत्रता, सांस्कृतिक एकता आदि के विचार जनता को मथने लगते हैं।

सारा देश एक तरह से सोचता है, देश में राष्ट्र-भाव उत्पन्न होकर यह विचार उत्पन्न होता है कि हम क्या थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी। इस सांस्कृतिक जागरण में पंथ, जाति, क्षेत्र, भाषा आदि सभी विभेद गायब हो जाते हैं और राम, कृष्ण, शिवाजी, प्रताप, गुरु गोविंद सिंह, गीता, भारतमाता, वंदेमातरम् आदि सभी के लिए प्रेरणास्रोत बन जाते हैं। गांधी तो राम को प्रेरणा पुरुष मानते हैं और राम राज्य की स्थापना करना चाहते हैं।

विवेकानंद हों या तिलक या गांधी या भगत सिंह, सभी गीता से शक्ति ग्रहण करते हैं और स्वामी दयानंद वैदिक संस्कृति की स्थापना करते हैं। आप सोचें, टैगोर ने शिवाजी पर कविता लिखी, सुब्रह्मण्यम भारती ने गुरु गोविंद सिंह पर तथा प्रेमचंद ने राणा प्रताप एवं स्वामी विवेकानंद पर लेख लिखे। हिंदी के एक लेखक ने हिंदी, हिंदू, हिन्दुस्थान का विचार प्रस्तुत किया और जयशंकर प्रसाद ने भारतीय इतिहास से आख्यान लेकर देशभक्ति तथा दासता से मुक्ति का भाव उत्पन्न किया और मैथिलीशरण गुप्त तो हिंदू संस्कृति तथा राष्ट्रीयता के ही आख्यान काव्य लिख रहे थे। ये कुछ उदारहण हैं कि हम भारतीय एक हैं, अनेक होकर भी एक हैं, हमारी संस्कृति, चिंतन, अध्यात्म मूल्य आदि सभी एक हैं और हमारे आदर्श राम, कृष्ण, शिव, चाणक्य, प्रताप, शिवाजी, विक्रमादित्य, शंकराचार्य, तुलसी, कबीर, गांधी आदि राष्ट्रीय महानायक हैं।

भारत के स्वाधीनता संग्राम के मूल में मुख्यत: हिंदू धर्म, संस्कृति, दर्शन साहित्य के समुच्चय से निर्मित भारतीय अवधारणा तथा पुरातन भारत को आधुनिक रूप में रूपायित करने का संघर्ष था। गांधी के स्वराज्य और राम-राज्य में भारतीय तत्व ही थे, जिसमें सनातन भारतीय संस्कृति एवं जीवन दृष्टि का गहरा प्रभाव था, परंतु स्वतंत्र भारत में नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के कारण स्वाधीनता संग्राम में जो भारत का भावी स्वरूप था, वह परिदृश्य से अदृश्य हो गया और पश्चिम एवं साम्यवादी जीवन दर्शन का प्रभुत्व हो गया। इस कालखंड में भारत, भारतीयता, राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक एकता, हिंदू, हिंदू धर्म आदि शब्द तिरस्कृत और अपमानित बना दिए गए और वामपंथी इतिहासकार, कथित सेकुलर और लीगी कट्टरवादी तत्वों ने देश के सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय आधार पर आक्रमण शुरू कर दिए।

स्वतंत्र भारत के इस भारतीय संस्कृति तथा राष्ट्रीयता के विरोधी वातावरण में हिंदू शब्द का अर्थ ‘सांप्रदायिक’ तथा ‘कट्टर’ के रूप में प्रचारित किया गया और बहुसंख्यक समाज की दशा अल्पसंख्यक समाज से भी गई-गुजरी हो गई। देश के प्रगतिशील लेखकों को राजाश्रय के साथ रूस का आश्रय मिला और देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों, अकादमियों, पुरस्कारों आदि पर इनका कब्जा हो गया। इन प्रगतिशीलों ने साहित्य की मुख्यधारा, जो सांस्कृतिक राष्टÑीयता की धारा थी, जो वैदिक काल से निरंतर प्रभावित होकर भारतेंदु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचंद और दिनकर तक बनी हुई थी, उसे प्रगतिशील साहित्य धारा के रूप में बदल दिया और अब रामविलास शर्मा, नामवर सिंह, मुक्तिबोध, नागार्जुन, धूमिल, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन आदि ही साहित्य की मख्यधारा के संस्थापक साहित्यकार बन गए।

इन प्रगतिशीलों की मुख्य धारा में वाल्मीकि, तुलसी, भूषण, मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्राकुमारी चौहान, श्यामनारायण पांडेय, रामकुमार वर्मा, दिनकर, महादेवी, पंत, प्रसाद, अज्ञेय आदि अनेक राष्ट्रीय साहित्यकारों को गायब कर दिया गया। इन वामपंथियों ने तुलसीदास तक को पाठ्यक्रमों से हटा दिया और भक्तिकाल के सांस्कृतिक एवं साहित्यिक जागरण को केवल कबीर तक सीमित कर दिया। इससे बड़ा राष्ट्रद्रोह क्या होगा कि देश की नई पीढ़ी को भारत की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों तथा सांस्कृतिक उत्कर्ष राष्ट्रीय अवधारणा से ही अलग-थलग कर दिया जाए! खैर, अब उन्हें लग रहा है कि चुनौती मिलने लगी है

Friday, January 15, 2021

कन्याकुमारी और स्वामी विवेकानंद जी का नवोन्मेष !

स्वामी जी के लेखों और भाषणों ने अनेक सुशिक्षित हिंदुओं पर गहरी छाप छोड़ी थी। उस दौर में पुलिस जब भी किसी क्रांतिकारी के घर की तलाशी लेने जाती थी तो वहां उसे वहां स्वामी विवेकानंद जी की पुस्तकें अवश्य मिलती थीं



मां जगदम्बा की तपोस्थली कन्याकुमारी निःसंदेह अद्भुत है। हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के सागरों की सम्मिलित उत्ताल तरंगें इस पुण्य भूमि की उस पावन श्रीपाद शिला को नित्य पखारती हैं जहां देवाधिदेव महादेव को पति रूप में पाने के लिए मां आदिशक्ति ने कन्या रूप में घोर तपस्या की थी। मुख्य मंदिर से दूर समुद्र के मध्य स्थित इस श्रीपाद शिला पर अंकित मां के चरण चिह्न शताब्दियों से उनकी दुर्धर्ष तपश्चर्या के साक्षी बने हुए हैं। इसी पावन धरती पर स्वामी विवेकानंद ने सर्वप्रथम भारत के नव निर्माण का स्वप्न देखा था।

लोकप्रिय उपन्यासकार नरेन्द्र कोहली की स्वामी विवेकानंद के जीवन पर लिखे अप्रतिम उपन्यास ‘न भूतो न भविष्यति’ में स्वामी विवेकानंद को कन्याकुमारी में हुई अद्भुत अनुभूतियों का अत्यंत मनोमुग्धकारी वर्णन मिलता है- ‘’ अदृश्य का आकर्षण, संस्कारों की सांकल अथवा नियति का विधान उन्हें उस ओर इंगित कर रहे थे। संभव है कि पहले कभी यहां मंदिर रहा हो परंतु अभी तो सागर की लहरों ने श्रीपाद शिला को मुख्य भूमि से अलग कर दिया था। युवा संन्यासी ने मंदिर में मां के विग्रह को प्रणाम किया और फिर मंदिर से बाहर निकलकर उस शिला की ओर देखने लगे। वहां तक पहुंचने के लिए उनके पास कोई साधन न था। पास में सागर तट पर कुछ लोग अपने नौकाओं के साथ थे अवश्य परंतु उन्हें देने के लिए उनके पास पैसा न था और बिना पैसे के उन्हें भला कोई क्यों ले जाता। वे अपने प्राणों में मां की पुकार को आकुलता से अनुभव कर रहे थे और यह त्वरा तीव्र से तीव्रतम होती जा रही थी। सहसा मन में यह विचार कौंधा कि जिसकी सृष्टि है, जिसका सागर है, जिसके सभी समुद्री जलचर और महामत्स्य हैं; जब वही मां मुझे बुला रही हैं तब फिर प्रतीक्षा किसकी और अवरोध कैसे! यदि ये नाविक बिना पैसे के उन्हें उनके गंतव्य तक ले जाने को तैयार नहीं हो रहे हैं तो न सही; भला मां से बड़ा कोई नाविक है क्या! और इस निश्चय के साथ वे पास की एक चट्टान पर चढ़े और उस अथाह जलराशि में कूद पड़े। ‘छपाक’ की ध्वनि से लोगों का ध्यान उधर गया। तट पर खड़े लोगों ने देखा कि एक युवक संन्यासी सागर में तैरता हुआ श्रीपाद शिला की दिशा में बढ़ रहा था। सागर बेहदअशांत था। लहरों के तेज थपेड़े संन्यासी को उसके दुस्साहस के लिए चेतावनी दे थे। बाहर सागर में घोर अशांति थी लेकिन उनके अंदर असीम शांति। उनके मन में जगन्माता से मिलने की विचित्र सी उत्कंठा थी। जैसे वे प्रकृति से कोई रोचक खेल खेल रहे हों। वह मां से जल्द मिलना चाहते थे पर प्रकृति मार्ग में तमाम बाधाएं बिछाए बैठी थी। यूं समुद्र तो उन्होंने अनेक बार देखे थे तथा लहरों से क्रीड़ा तो वे सदा करते आए थे पर लहरों ने इस तरह अजगर बनकर उनको इस प्रकार पहले कभी न बांधा था.... आज का सा समुद्र का महागर्जन, लहरों के इतने विशालकाय पर्वत उन्होंने पहले कभी न देखे थे.... पर महासागर की इन तूफानी लहरों के बीच अठखेलियां करते भयावह महामत्स्यों और मानवभक्षी शार्कों के बीच भी वे पूरी तरह शांत व निर्भीक थे। यूं भी विषम परिस्थितियों में घबराना व विवश होना उन्होंने कभी सीखा ही न था। वे भलीभांति जानते थे कि उनकी मां उनके निकट ही हैं और उनके साथ लीला कर रही हैं। उन्हें प्रगाढ़ अनुभूति हो रही थी कि यदि उन्होंने जगन्माता को खोज लिया तो ठीक अन्यथा वेस्वयं ही उन्हें अपनी गोद में उठा लेंगी। जगन्माता की अदृश्य कृपा का यह अभेद्य कवच उन्हें उनके गंतव्य की ओर तेजी से अग्रसर कर रहा था। अचानक उन्हें पानी के कम होने का एहसास हुआ और उन्होंने अनुभव किया कि वे श्रीपाद शीला के निकट पहुंच गये हैं। तभी सहसा उन्हें पावों के नीचे उन्हें पाषाण का ठोस आधार अनुभव किया। उन्होंने दृष्टि उठाई तो सामने अलौकिक दृश्य उपस्थित था- सागर और आकाश मिलकर एक हो रहे थे। मानो सारी प्रकृति जैसे एक रूप हो गयी हो। नजरों के सामने श्रीपाद शिला को देख उनकी आंखों में आंसू छलक उठे। उन्होंने मस्तक रखकर प्रणाम किया और स्वतः ही कह उठे- हे मां ! तुम्हारी तपस्या से पाषाण तक पिघल गए थे तभी तो तुम्हारे चरण चिह्न यहां अंकित हो सके। प्रार्थना की उस स्थिति में उन्हें भुवन मोहिनी जगत व्यापिनी मां जगदम्बा की प्रत्यक्ष उपस्थिति का भान होने लगा और वे ध्यानस्थ हो गए।

ध्यान की गहराइयों में उतरते हुए उनका ध्यान भारत के वर्तमान और भविष्य पर केंद्रीभूत हो गया। उस दिव्य दर्शन में महापंडित भारत की उपलब्धियां नक्षत्रों के समान उनके हृदय आकाश में प्रकाशपूर्ण हो उठीं। उन्होंने न सिर्फ भारतीय संस्कृति के स्वर्णिम स्वरूप के सत्य को अपने मनःपटल पर साकार होते देखा। उन्होंने देखा कि भारतमाता की धमनियों में दौड़ने वाला रक्त प्रवाह प्रवाह और कुछ नहीं बस ‘अध्यात्म’ था। इसी अध्यात्म पथ से विमुख होने के कारण ही देश का पतन हुआ। आद्यशक्ति जगदम्बा उन्हें अनुभव करा रही थीं कि उसी सर्वोच्च स्थिति की पुनर्प्राप्ति के लिए भारत की आध्यात्मिक चेतना की नव प्रतिष्ठा अनिवार्य है और यह संभव होगा उपनिषदों के चिंतन को पुनः अमली जामा पहनाने से। इसके लिए जात-पात, ऊंच-नीच, भाषा क्षेत्र के भेद को भुलाकर राष्ट्र की अखंडता की साधना करनी होगी तथा भक्ति, श्रद्धा, ज्ञान, विवेक से जन-जन को पोषित करना होगा।

तीन दिन की इस अविराम ध्यान साधना के साथ वह युवा संन्यासी एक राष्ट्र निर्माता, विश्व शिल्पी स्वामी विवेकानंद के रूप में परिणत हो गया। यह उनका नूतन जन्म था। उनकी आत्मा करुणा से पिघल कर सर्वव्यापी हो गयी थी। आज उनके सामने उनका कर्तव्य पथ प्रशस्त हो गया था तथा उनके वर्षों के आत्मचिंतन को एक नव निष्कर्ष मिल गया था। अब उन्हें भारत के भविष्य को साकार मात्र करना था, उनके लिए यही जगन्माता का संकेत और आदेश था।

राष्ट्रमंत्र के अद्भुत उद्घोषक

भारतभूमि के प्रति जो अगाध प्रेम स्वामी विवेकानंद जी ने देशवासियों में संचालित किया था, वही स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य प्रेरणा बना। नवजीवन प्रकाशन कोलकाता से प्रकाशित भूपेंद्र नाथ दत्ता की पुस्तक ‘पैट्रियोट प्रॉफिट स्वामी विवेकानंद’ में उल्लेख है कि अपनी फ्रांसीसी शिष्या जोसेफाईन मैक्लियाड से स्वामी जी ने कहा था कि क्या निवेदिता नहीं जानती है कि मैंने स्वतंत्रता के लिए प्रयास किया किंतु देश अभी तैयार नहीं है, इसलिए छोड़ दिया। भारत भ्रमण के दौरान देशभर के राजाओं को जोड़ने का प्रयत्न भी इस उद्देश्य से स्वामी जी ने किया था। स्वामी विवेकानंद की भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से कोई भागीदारी भले ही नहीं थी परन्तु फिर भी आजादी के आंदोलन के सभी चरणों पर उनका व्यापक प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के पुरोधा थे स्वामी विवेकानंद। उन्होंने अपनी प्रचंड तपश्चर्या से सूक्ष्म जगत को इतना मथ डाला था कि भारत की प्रसुप्त आत्मा जाग उठी थी। इसी का परिणाम था कि जन-जन में स्वतंत्रता की ज्वाला धधक उठी थी। युवाओं में स्वतंत्रता के लिए आत्माहुति के पीछे उनकी ही प्रेरणा थी। सूक्ष्म स्थूल का आधार होता है। जो सूक्ष्म में घटित होता है वही कालांतर में स्थूल में परिवर्तित हो जाता है। इसी आधार पर स्वामी विवेकानंद ने भारतीय स्वतंत्रता के लिए सूक्ष्म जगत को उद्वेलित किया था।

भगिनी निवेदिता के अनुसार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर स्वामी विवेकानंद का प्रभाव फ्रांसीसी क्रांति पर रूसो के प्रभाव अथवा रूसी व चीनी क्रांति पर कार्ल मार्क्स के प्रभाव से किसी भी तरह से कम नहीं था। कोई भी स्वतंत्रता आंदोलन राष्ट्रव्यापी चेतना के पृष्ठभूमि तैयार किए बिना आकार नहीं ले सकता। सभी समकालीन स्रोतों से स्पष्ट हो जाता है कि भारत में राष्ट्रीयता की भावना की जागरण में विवेकानंद का प्रभाव सबसे सशक्त था। वे नींव के निर्माण में लगने वाले पुरोधा ही नहीं, राष्ट्रीय जीवन के अनन्य प्रतीक भी थे।

अपनी मित्र व स्वामी विवेकानंद की अनुयायी श्रीमती एरिक हेमंड को भेजे पत्र में भगनी निवेदिता ने इस बात का उल्लेख करते हुए लिखा था कि अंग्रेज उनके प्रति आशंकित हैं। अल्मोड़ा में पुलिस अपने जासूसों के द्वारा स्वामी जी पर दृष्टि रही है। यद्यपि स्वामी जी इस बात को गंभीरता से नहीं लेते हैं पर यदि ब्रिटिश सरकार स्वामी जी के खिलाफ कोई अनुचित कदम उठाएगी तो उसका विरोध करने वाली राष्ट्रवादी ताकतों में वे भी पूर्ण निष्ठा से शिरकत करेंगी।

गौरतलब हो कि स्वामी जी के लेखों और भाषणों ने अनेक सुशिक्षित हिंदुओं पर गहरी छाप छोड़ी थी। उस दौर में पुलिस जब भी किसी क्रांतिकारी के घर की तलाशी लेने जाती थी तो वहां उसे वहां स्वामी विवेकानंद जी की पुस्तकें अवश्य मिलती थीं। प्रसिद्ध देशभक्त क्रांतिकारी ब्रह्मबांधव उपाध्याय और अश्विनी कुमार दत्त का कहना था कि स्वामी जी ने उन्हें बंगाली युवाओं की अस्थिओं से एक ऐसा शक्तिशाली हथियार बनाने को कहा था जो भारत को स्वतंत्र करा सके। इसी तरह चर्चित बंगाली लेखक कालीचरण घोष अपनी प्रेरणादायी रचना ‘’दि रोल ऑफ ऑनर एनेक्टोड ऑफ इंडियन मार्टियर्स’’ में बंगाल के युवा क्रांतिकारियों के मन पर स्वामी जी के प्रभाव के बारे में विस्तार से लिखते हैं कि स्वामी जी की वाणी ने न सिर्फ बंगाली युवाओं के मन में राष्ट्रभक्ति की भावना भरी वरन उनमें राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय होने की प्रवृत्ति भी विकसित की। स्वामी विवेकानंद के बौद्धिक जगत पर पड़ा प्रभाव उनके देहावसान के बाद बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन के रूप में श्री अरविंद के उद्भव के रूप में सामने आया।

Sunday, December 27, 2020

संघ के चिंतन में सदैव ‘राष्ट्र’ रहता है':l

 अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत के  प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित भाषणों के संकलन 'यशस्वी भारत' का लोकार्पण जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी के करकमलों से संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल की गरिमामय उपस्थिति में भारत के पूर्व नियंत्रक व महाले खापरीक्षक श्री राजीव महर्षि के विशिष्ट आतिथ्य में संपन्न हुआ।

अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत के  प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित भाषणों के संकलन 'यशस्वी भारत' का लोकार्पण जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी के करकमलों से संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल की गरिमामय उपस्थिति में भारत के पूर्व नियंत्रक व महाले खापरीक्षक श्री राजीव महर्षि के विशिष्ट आतिथ्य में संपन्न हुआ।

1960 के बाद विश्व के सबसे विशाल संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी  सरसंघचालक के भाषणों का यह पहला संकलन है। इससे पूर्व तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ के भाषणों का संकलन प्रकाशित हुआ था। 'यशस्वी भारत' की प्रस्तावना संघ के पूर्व अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख, प्रखर चिंतक-विचारक, कई पुस्तकों के रचयिता,  मा गो वैद्य ने लिखी है। 

इस अवसर पर संघ के सह-सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल ने इस बात को रेखांकित किया कि हमें संपन्न, सामर्थ्यवान, शक्तिशाली तो बनना है लेकिन इससे आगे भारत को यशस्वी बनना है। उन्होंने कहा कि यश तब आता है जब कोई परमार्थ करता है। प्राचीन भारत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हम 18वीं शताब्दी तक दुनिया की आर्थिक महाशक्ति थे, शक्तिशाली भी थे लेकिन हमारी प्रतिष्ठा सर्वे भवन्तु  सुखिनः की हमारी नीति और सभी को ईश्वर का अंश मानने के हमारे भाव के कारण थी। साथ ही उन्होंने मिस्र, बेबीलोन, स्पार्टा आदि देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि बर्बर, हिंसक और क्रूर सभ्यताएँ सौम्य सभ्यताओं का नाश कर देती हैं। भारत के विषय में उन्होंने कहा कि हमने कोई हजार वर्षों तक ऐसे आक्रमणों से स्वयं को भी बचाया और धर्म की भी रक्षा की। उन्होंने कहा कि मोहन भागवतजी के सभी उद्बोधनों का मूल स्वर यही है कि कैसे हम सब भारतीय जाति-धर्म-भाषा के भेद मिटाकर भारत की यशस्विता और सर्वांगीण समेकित विकास में सहभागी बन सकें। हम अपने गौरवशाली अतीत का स्मरण करें जब भारत ‘विश्वगुरु’ था और एक नायक की भाँति विश्व का नेतृत्व करता था। अब भारत पुन: अँगड़ाई ले रहा है और अपनी खोई अस्मिता व प्रतिष्ठा अर्जित करने के पथ पर अग्रसर है।

जूनापीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी ने कहा कि स्थितियाँ बदल रही हैं। जाति की जकड़, स्त्रियों की स्थिति, समाज के चिंतन में बदलाव आया है। संन्यास परंपरा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अब तथाकथित छोटी जातियों से भी संन्यासी बन रहे हैं और किसी को कोई आपत्ति भी नहीं है। उन्होंने कहा कि हिंदू दूसरों का धर्म परिवर्तन नहीं कराते लेकिन कोरोना काल में दुनिया में जितने लोगों ने योग, आयुर्वेद और दूसरी भारतीय पद्धतियाँ अपनाईं, उससे भारतीय विचार का पूरे विश्व में व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ है। उन्होंने कहा कि मोहन भागवतजी के चिंतनपरक उद्बोधनों में भारत के स्वर्णिम भविष्य के निर्माण का 

विशिष्ट अतिथि राजीव महर्षि ने भी हिन्दू कौन विषय को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि संघ और सरसंघचालक मोहन भागवत के चिंतन में सदैव ‘राष्ट्र’ रहता है और इसीलिए इस वैश्विक संगठन की स्वीकार्यता समाज में निरंतर बढ़ रही है। 

पुस्तक में सरसंघचालक मोहन भागवत के अलग-अलग अवसरों पर दिए गए 17 भाषणों का संकलन है। प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित 286 पृष्ठों की इस पुस्तक का संपादन लोक सभा टीवी के संपादक श्याम किशोर ने किया है। प्रभात प्रकाशन के निदेशक पीयूष कुमार ने उपस्थित अभ्यागतों का स्वागत किया। प्रभात कुमार ने उपस्थित विशिष्टजनों का और प्रकाशन में सहयोगी रहे सभी व्यक्तियों का धन्यवाद ज्ञापन किया।

वनवासी कल्याण आश्रम के स्थापना दिवस पर विशेष : आश्रम से हुआ ‘कल्याण’:

 वनवासी कल्याण आश्रम के छात्रावासों में रहकर पढ़ने वाले जनजातीय समाज के सैकड़ों युवा आज  समाज जीवन के हर क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। ये स्वयं कह रहे हैं कि यदि कल्याण आश्रम में नहीं जाते तो आज जहां हैं, वहां नहीं पहुंच पाते।  इन युवाओं की कहानियां बहुत ही मार्मिक  और  प्रेरक हैं

आज देश में वनवासी कल्याण आश्रम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। 62 साल पहले रोपा गया संगठन रूपी यह पौधा आज विशाल वट वृक्ष का रूप ले चुका है। इसमें हजारों लोग आश्रय पाकर अपने सपनों को साकार कर रहे हैं। सच में यह संगठन जो कर रहा है, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। क्या आप सोच सकते हैं कि गरीबी के कारण बचपन में कोई छात्र पढ़ाई छोड़कर पिता के साथ सब्जी बेचने लगे और बाद में डॉक्टर बन जाए? शायद आप ऐसी कल्पना नहीं कर सकते। पर वनवासी कल्याण आश्रम के कारण ऐसा हो रहा है। यह संगठन शरणार्थी, निर्धन और वनवासी समाज के हजारों युवाओं का ‘कल्याण’ कर रहा है। एक ऐसे ही युवा हैं डॉ. धनंजय रियांग। ये इन दिनों दिल्ली की रोहिणी में ईएसआई अस्पताल में मुख्य चिकित्सा अधिकारी हैं। वे कहते हैं, ‘‘यह पक्की बात है कि मैं कल्याण आश्रम से नहीं जुड़ता तो आज सब्जी बेचता या मजदूरी करके गुजारा करता।’’


उल्लेखनीय है कि डॉ. धनंजय उस रियांग समाज से हैं, जिसे सरकारी शह पर चर्च के लोगों ने मिजोरम से मारकर खदेड़ दिया था। यह समाज अभी भी त्रिपुरा, असम और मेघालय के विभिन्न हिस्सों में शरणार्थियों का जीवन जी रहा है। इस समाज के लोग बरसों तक दो जून की रोटी तक के लिए तरसते रहे, तो भला अपने बच्चों को कहां से पढ़ा-लिखा पाते। ऐसे में वनवासी कल्याण आश्रम ने उनके बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा उठाया और आज ये बच्चे हर क्षेत्र में काम करके भारत की सेवा कर रहे हैं। डॉ. धनंजय कहते हैं, ‘‘मैं बचपन में असम के एक सुदूर इलाके में रहता था। वहां दूर-दूर तक कोई विद्यालय नहीं था। उन्हीं दिनों हमारे गांव में एकल विद्यालय शुरू हुआ। वहीं से मैंने चौथी तक की पढ़ाई की। इसके बाद की पढ़ाई के लिए स्कूल जाना मेरे लिए संभव नहीं था, क्योंकि वह बहुत दूर था। इसलिए पढ़ाई छूट गई। इसके बाद पिताजी के साथ सब्जी बेचने लगा।’’ वे कहते हैं, ‘‘दो साल तक सब्जी बेचने का काम किया। इसके बाद वनवासी कल्याण आश्रम के एक कार्यकर्ता से भेंट हुई तो उन्होंने मेरे पिताजी से कहा कि पढ़ने के लिए इसको कानपुर ले जाओ। वहां कोई खर्च नहीं होगा। इस पर वे तैयार हो गए, लेकिन उनके पास किराए का भी पैसा नहीं था। किसी से उधार लेकर वे मुझे कानपुर छोड़ गए।’’ डॉ. रियांग कहते हैं, ‘‘वनवासी कल्याण आश्रम के छात्रावास में रहकर 12वीं तक की पढ़ाई की। इसके बाद कानपुर मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के लिए मेरा चयन हो गया। वहीं से एमडी की भी पढ़ाई करने के बाद नौकरी करने लगा। जब तक नौकरी नहीं लगी तब तक कल्याण आश्रम ने हर तरह की मदद की।’’




कुछ ऐसी ही कहानी डॉ. दानीरूंग रियांग की भी है। वे भी एक शरणार्थी परिवार से हैं। इन दिनों वे गुवाहाटी में सेवा भारती द्वारा संचालित एक अस्पताल में योग एवं नेचुरोपैथी विभाग में चिकित्सक हैं। 1988 में मिजोरम के एक शरणार्थी शिविर में जन्मीं रियांग को यहां तक पहुंचाने का काम वनवासी कल्याण आश्रम ने किया है। 2000 में जब वे केवल 12 साल की थीं तभी वनवासी कल्याण आश्रम के रायपुर स्थित छात्रावास में लाई गई थीं। वहां कक्षा छठी से उनकी पढ़ाई शुरू हुई। वहां से 12वीं करने के बाद दुर्ग, पुणे और जर्मनी से उच्च शिक्षा प्राप्त कर वे आज देश की सेवा कर रही हैं। वे कहती हैं, ‘‘पढ़ाई के दौरान आश्रम के अधिकारियों ने कदम-कदम पर मेरा मार्गदर्शन किया और जब भी किसी चीज की जरूरत पड़ी उसे उपलब्ध कराया। वनवासी कल्याण आश्रम ने सिखाया कि अपने देश और समाज से बढ़कर कुछ नहीं है। इसलिए जब तक जीना है, देश के लिए जीना है।’’


देश में आज वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा गढ़े गए ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है। कभी कल्याण आश्रम के छात्रावासों में रहकर पढ़ने वाले बहुत सारे लोग आज सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। इनमें कई तो आज मंत्री, सांसद और विधायक तक हैं। इसके एक उदाहरण हैं पूर्व केंद्रीय मंत्री और वर्तमान में लोहरदगा से सांसद सुदर्शन भगत। वे स्वयं कहते हैं, ‘‘मैं जो कुछ हूं, कल्याण आश्रम के कारण हंू। आश्रम के संपर्क में आने के बाद ही यह समझ बढ़ी कि भारत क्या है, भारतीय संस्कृति क्या है और भारत के सर्वांगीण विकास के लिए हमारी क्या भूमिका हो सकती है। यह भी जाना कि धर्म और अध्यात्म क्या है। अध्यात्म के प्रति बढ़ी रुचि ने जीवन की राह आसान कर दी।’’


सुदर्शन झारखंड में गुमला जिले के रहने वाले हैं। प्रारंभिक पढ़ाई गांव में करने के बाद वे 1984 में पहली बार वनवासी कल्याण आश्रम के गुमला स्थित ‘वाल्मीकि छात्रावास’ में आए। वहां रहकर उन्होंने स्नातक तक की पढ़ाई की। उन्हीं दिनों वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े। फिर बाद में भाजपा में गए। 2000 में पहली बार विधायक बनने से पहले कई साल तक उन्होंने ‘पाञ्चजन्य’ का वितरण भी किया है। 


इन दिनों हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में पुलिस विभाग में एएसआई के पद पर कार्यरत विजय कुमार भी वनवासी कल्याण आश्रम की ही देन हैं। वे गांव करगानू, जिला सिरमौर के रहने वाले हैं। वे कहते हैं, ‘‘बात 1989 की है। मेरे गांव में संघ की शाखा लगती थी। मैं भी अपने घर वालों के साथ वहां जाता था। वहीं एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने मेरे घर की आर्थिक स्थिति के बारे में जाना तो उन्होंने मुझे ‘हिमगिरि कल्याण छात्रावास’ जाने को कहा। वहां 12वीं तक की पढ़ाई की। इसके बाद ही जीवन में बदलाव आया।’’


12वीं करने के बाद उन्होंने तीन साल तक पूर्णकालिक कार्यकर्ता के नाते कार्य किया, साथ ही स्नातक की पढ़ाई भी की। स्नातक करते ही पुलिस विभाग में नौकरी लग गई।

पहले दानदाता

वनवासी कल्याण आश्रम पूरी तरह समाज के सहयोग से काम करता है। इसके पहले दानदाता थे राजा विजय भूषण सिंह जूदेव। इसके बाद कार्यकर्ताओं ने समाज से संपर्क कर दान लेना शुरू किया। उसी दान से कल्याण आश्रम मुख्य रूप से शिक्षा, स्वावलंबन और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करता है। देश में जहां भी जनजातीय समाज है, वहां आश्रम का काम है। 


ऐसे हुई स्थापना

वनवासी कल्याण आश्रम के संस्थापक हैं वनयोगी रमाकांत केशव देशपांडे उपाख्य बाला साहब। वे संघ के स्वयंसेवक थे। श्रीगुरुजी की प्रेरणा से वे जनजातियों के बीच कार्य करने के लिए सपत्नीक नागपुर से जशपुर चले आए। उस समय उनकी उम्र केवल 35 साल थी और वे नागपुर में अच्छी-खासी वकालत कर रहे थे। सबसे बड़ी समस्या थी राष्ट्रीय विचारों की, शिक्षा की। उन्होंने थोड़ा-बहुत पढ़े ग्रामीणों को ही शिक्षक बनाया और उन्हें बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी। बाला साहब ने एक वर्ष के अंदर ही जशपुर के आस-पास 108 विद्यालय शुरू करवा दिए। इससे ग्रामीणों में उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी और वे उनकी बात मानने लगे। उन्होंने वनवासी बच्चों के लिए 26 दिसंबर, 1952 को छात्रावास की शुरुआत की। इसी दिन को वनवासी कल्याण आश्रम के स्थापना दिवस के रूप में भी जाना जाता है।


52,000 गांवों तक पहुंच

अभी वनवासी कल्याण आश्रम में 1,200 पूर्णकालिक कार्यकर्ता हैं। इनमें से 300 महिलाएं हैं। सबसे बड़ी बात है कि इन कार्यकर्ताओं में 70 प्रतिशत जनजातीय समाज से ग्रामीण पृष्ठभूमि के हैं। देश के 323 जिलों में कल्याण आश्रम का कार्य है। पूरे देश में लगभग 20,000 प्रकल्प हैं। लगभग 14,000 गांवों में समितियां हैं। कल्याण आश्रम की पहुंच लगभग 52,000 गांवों तक है। नगरों में भी वनवासी कल्याण आश्रम की समितियां हैं, जिनका कार्य है प्रकल्पों के लिए धन संग्रह करना।

वचनदेव कुजूर इन दिनों झारखंड में चतरा के समीप सिमरिया में सबडिवीजनल पुलिस आॅफिसर (एसडीपीओ) हैं। ये भी मानते हैं कि यहां तक का सफर पूरा करने में वनवासी कल्याण आश्रम की अहम भूमिका रही। वे 1997 में जब नौवीं कक्षा में थे तब गुमला में आश्रम के साथ जुड़े। वे कहते हैं, ‘‘आश्रम में नैतिक शिक्षा और जो संस्कार मिले, वे अभी भी काम आ रहे हैं। आज चारों ओर नैतिक पतन दिख रहा है। ऐसे समय में लगता है कि यदि मैं भी आश्रम के संपर्क में नहीं आता तो शायद उतना नैतिक  बल मेरे पास नहीं होता जितना आज है।’’


उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के चौबेपुर प्रखंड में पशुधन प्रसार पदाधिकारी के रूप में कार्यरत मनोज कुमार कहते हैं, ‘‘वनवासी कल्याण आश्रम के छात्रावास तो देवस्थान हैं और वहां सेवा करने वाले देव से कम नहीं हैं। इन देवों के आशीर्वाद से ही मुझ जैसे गरीब और उपेक्षित युवा आज एक सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं।’’ मनोज कुमार बलरामपुर जिले के नवलगढ़ के रहने वाले हैं। गरीबी के कारण घर वाले इन्हें पढ़ाने में समर्थ नहीं थे। जब उन्हें पता चला कि कानपुर के ‘बिरसा मुंडा वनवासी छात्रावास’ में बच्चों को पढ़ाने का कोई पैसा नहीं लगता तो वे मनोज को 1992 में छात्रावास छोड़ गए। वहां उन्होंने कक्षा छठी से पढ़ाई शुरू की। वहीं रहकर उन्होेंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और आज सरकारी अधिकारी हैं।


वनवासी कल्याण आश्रम के छात्रावासों में पढ़ने वाले कई युवा तो उच्च शिक्षा पाकर आश्रम का ही कार्य करने लगे हैं। जैसे मोहन भगत, डॉ. राजकिशोर हांसदा आदि। मोहन भगत तो इन दिनों वनवासी कल्याण आश्रम, असम के प्रांत संगठन मंत्री का दायित्व निभा रहे हैं। ये जब नौंवी कक्षा में पढ़ते थे तभी छत्तीसगढ़ में जशपुर के पास स्थित एक आश्रम से जुड़े। बाद में जशपुर आए और कल्याण आश्रम का काम करने के साथ-साथ पढ़ाई भी करने लगे। राजनीतिशास्त्र में स्नातकोत्तर करने के बाद वे पूरी तरह कल्याण आश्रम के कार्य में लग गए। वे कहते हैं, ‘‘आश्रम में पढ़ाई करने के दौरान अधिकारी कहा करते थे कि समाज के सहयोग से हम लोग काम कर रहे हैं। इसलिए हमें समाज के लिए भी कार्य करना चाहिए। उनकी इन बातों का मुझ पर बड़ा प्रभाव हुआ और तय किया कि पढ़ाई पूरी करके एक साल के लिए आश्रम के लिए कार्य करना है, लेकिन यहां ऐसा रम गया कि आज 20वें साल में भी लग रहा है कि अभी तो बहुत कुछ करना बाकी है।’’


ऐसे ही दूसरे कार्यकर्ता हैं डॉ. राजकिशोर हांसदा। वे इन दिनों ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ के राष्टÑीय सह संयोजक हैं। वे 1983 में झारखंड में जामताड़ा जिले के विद्यासागर स्थित छात्रावास में पढ़ने के लिए आए थे। वहीं इनका संघ से संपर्क हुआ और पढ़ाई के बाद प्रचारक बन गए। 1992 तक प्रचारक के रूप में इन्होंने प्रत्यक्ष रूप से संघ का कार्य किया। 1993 में उन्हें वनवासी कल्याण आश्रम का पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनाया गया। डॉ. हांसदा संथाल समाज से पहले ऐसे व्यक्ति हैं, जो संघ के प्रचारक बने। वे कहते हैं, ‘‘छात्रावास में रहते हुए यह जाना कि समाज के लिए नि:स्वार्थ भाव से कुछ करना ही सच्ची देश-सेवा है। सेवा की यह भावना हर व्यक्ति में आ जाए तो भारत पूरी दुनिया को पछाड़कर आगे निकल सकता है।’’


डॉ. हांसदा इन दिनों झारखंड में ‘सरना धर्म कोड’ के विरुद्ध आवाज बुलंद कर रहे हैं। उनका मानना है कि इस ‘कोड’ की मांग के पीछे देश-विरोधी ताकतें हैं। इसका उद्देश्य है जनजाति समाज को हिंदू समाज से दूर करना। इसलिए इसका विरोध होना ही चाहिए।


चाहे डॉ. धनंजय रियांग हों, डॉ. राजकिशोर हांसदा, सुदर्शन भगत या इस तरह के अन्य कार्यकर्ता, इन सबके जीवन को संवारने का काम वनवासी कल्याण आश्रम के उन हजारों कार्यकर्ताओं ने किया है, जिन्होंने कभी अपने लिए किसी से कुछ नहीं मांगा। ये लोग नींव के पत्थर के रूप में दिन-रात कार्य कर रहे हैं। इसी नींव पर वह भवन टिका है, जिसकी छत के नीचे जनजाति समाज के युवा अपना सुनहरा भविष्य गढ़ रहे हैं।

Friday, December 18, 2020

वॉलस्ट्रीट जर्नल तथा राहुल गांधी माफी मांगें: विहिप

 विश्व हिंदू परिषद ने एक बयान जारी कर कहा है कि बजरंग दल के विषय में वॉलस्ट्रीट जर्नल की मिथ्या रिपोर्ट के आधार पर राहुल गांधी ने जिस प्रकार फेसबुक की आड़ में बजरंग दल को बदनाम करने का षड्यंत्र रचा, उससे उनकी मानसिकता की कलई खुल गई है।

विश्व हिंदू परिषद ने एक बयान जारी कर कहा है कि बजरंग दल के विषय में वॉलस्ट्रीट जर्नल की मिथ्या रिपोर्ट के आधार पर राहुल गांधी ने जिस प्रकार फेसबुक की आड़ में बजरंग दल को बदनाम करने का षड्यंत्र रचा, उससे उनकी मानसिकता की कलई खुल गई है। विहिप महासचिव  मिलिंद परांडे की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा गया कि टुकड़े—टुकड़े गैंग, सीएए विरोधियों तथा दिल्ली के दंगाइयों सहित अनेक राष्ट्र विरोधियों के साथ खड़े होकर उनकी पैरवी करने वाले राहुल गांधी को बजरंग दल जैसा राष्ट्रवादी संगठन आंखों में खटक रहा है।

चीन के साथ उनके रिश्ते जगजाहिर हैं। उन्हें अमेरिकी जर्नल पर तो विश्वास है किंतु एक राष्ट्रव्यापी राष्ट्रवादी युवा संगठन पर नहीं! श्री परांडे ने वॉल स्ट्रीट जनरल से भी उसके इस अक्षम्य अपराध के लिए माफी मांगने को कहा है। उन्होंने कहा कि उसने बजरंग दल की आड़ में भारत को बदनाम करने का जो दुस्साहस किया है, उसे हम कदापि स्वीकार नहीं करेंगे।

उन्होंने कहा कि इससे पहले विकीलीक के माध्यम से मीडिया में आई खबरों से स्पष्ट होता है कि श्रीमती सोनिया गांधी भी बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने के अनेक षड्यंत्र रच चुकी हैं जिनमें, वे सफल नहीं हो पाईं। अब फेसबुक ने वॉल स्ट्रीट जनरल की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए जो सच्चाई बताई है, वह इन्हें पच नहीं पा रही। इससे इनकी विद्वेष पूर्ण हिन्दू विरोधी मानसिकता स्पष्ट परिलक्षित होती है।

श्री परांडे ने कहा कि राहुल गांधी तथा वाल स्ट्रीट जर्नल को बजरंग दल सहित देश के हिंदू समाज से माफी मांगनी चाहिए।

Saturday, December 12, 2020

अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे विपक्षी दल, इसलिए अब किसानों को भड़का रहे हैं

 

कथित किसान आंदोलन के पीछे एक ही सोच काम कर रही है और वह है अस्तित्व बचाने की आखिरी लड़ाई. कांग्रेस हो या टीआरएस, सपा हो या द्रमुक या फिर वामपंथी. इन सभी दलों के सामने अब अस्तित्व का संकट है. अस्तित्व बचाने की इस लड़ाई में ये दल कभी सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर राष्ट्र विरोधी ताकतों की गोद में बैठ जाते हैं. तो अब ये किसानों को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं.


22 पार्टियां मिलकर कृषि सुधारों को पलीता लगाने के लिए भारत बंद बुलाती हैं और ये फेल हो जाता है. क्यूं! बहुत से कारण हो सकते हैं. लेकिन इनमें सबसे अहम कारण है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लोगों का विश्वास. आप कितना ही जोर से चिल्ला लें, लेकिन आम भारतीय जनमानस कम से कम इस आरोप पर तो विश्वास नहीं कर सकता कि मोदी गरीबों, किसानों के अहित का कोई फैसला ले सकते हैं. अब इसका मुकाबला कीजिए, भारत बंद करने चली पार्टियों की विश्वसनीयता और ईमानदारी से. जरा तोल कर देखिए. एक तरफ मोदी और दूसरी तरफ चालीस चोर. दिल्ली में चल रहे प्रायोजित धरने-प्रदर्शन के अलावा कहीं विरोध नहीं. और विरोध तो छोड़िए, जरा राजस्थान के पंचायत चुनाव पर ही गौर कर लीजिए. विशुद्ध रूप से किसानों के बीच हुए इस चुनाव में भाजपा को जोरदार सफलता मिली है. ये सफलता कृषि सुधारों पर किसान की मोहर है.

किसानों की मसीहा बनने चली कांग्रेस पार्टी और उसके पिछलग्गू गैंग का ट्रैक रिकॉर्ड किसान के पास है. वही किसान, जो कभी यूरिया के लिए लाठी खाता. फिर ब्लैक में खाद खरीदता था. कांग्रेस के महान अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार को किसान भूला नहीं है. 2004 में जब यूपीए की सरकार बनी, तो अटल बिहारी वाजपेयी ने कृषि क्षेत्र में चार फीसद विकास दर की विरासत दी थी. सन 2014 में जब मनमोहन सिंह की मंडली से देश का पीछा छूटा, तो विकासदर नकारात्मक होकर शून्य से भी नीचे जा चुकी थी. यह कृषि और उस क्षेत्र से जुड़े समूचे वर्ग का सबसे अहम सूचकांक है. किसानों की ये दुर्गति करने में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार का अहम योगदान है. जी हां, वह यूपीए के स्टार कृषि मंत्री थे.

कृषि मंत्री बनने से पहले, मंत्री पद पर रहते हुए और उसके बाद भी आज तक, कृषि उत्पादों के दामों के साथ कैसे खेलना है, इसके पवार महारथी हैं. उनके इशारे पर आज भी एनसीडीएक्स के दामों में उठा-पटक चलती है. मनमोहन सिंह और शरद पवार की जोड़ी कितनी किसान हितैषी थी, जरा इन आंकड़ों पर गौर करें. आधिकारिक आंकड़ा एक लाख सत्तर हजार है. हालांकि उत्तर प्रदेश के कृषि अनुसंधान मंत्री सूर्य प्रताप शाही दावा करते हैं कि यूपीए के शासनकाल में कुल दो लाख 66 हजार किसानों ने आत्महत्या की. यह भी जानकर आपको ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि जिस महाराष्ट्र से शरद पवार आते हैं, वहां आबादी के औसत से किसानों की आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा रही. ये तो है कांग्रेस और उसके पिछलग्गू बनावटी किसान हितैषियों का काला सच.

अब जरा इस बात पर भी गौर कीजिए कि तमाम हाय-तौबा के बावजूद किसान क्यों झांसे में नहीं आ रहा है. 25 जून, 2015 को सरकार द्वारा प्रायोजित दुनिया की सबसे बड़ी आवासीय योजना शुरू हुई. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अभी तक 35 लाख गरीबों को पक्का मकान मिल चुका है. 60 लाख से ज्यादा आवास मंजूर किए जा चुके हैं. कुल मिलाकर एक करोड़ दस लाख लोगों के सिर पर पक्की छत के वादे में आधा काम पूरा हो चुका है. उन घरों में रहने वाला कोई व्यक्ति कैसे इस बात पर विश्वास कर सकता है कि उसे पक्की छत देने वाला शख्स उसकी जमीन छीन लेगा, उसकी उपज अमीरों को दे देगा. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2 अक्टूबर 2014 से अब तक देश में कुल 10,69,00,081 शौचालयों का निर्माण करवाया जा चुका है. जो शख्स आपकी बहु-बेटी को खुले में शौच के लिए जाते नहीं देख सकता, उस पर कितना बेजा लगता है ये इलजाम कि वह किसान के साथ धोखा कर देगा. उज्जवला योजना में अब तक आठ करोड़ से ज्यादा गैस कनेक्शन जारी किए गए हैं. इनके अधिकतर लाभार्थी ग्रामीण इलाकों की महिलाएं हैं. आप जब देखते हैं कि तमाम चुनावी सर्वेक्षण फेल हो जाते हैं और भाजपा जीतती है, तो वह इसी वजह से. सरकार घर की रसोई तक पहुंची है. बीपीएल परिवारों को मुख्य खाद्यान्न दिया जा रहा है. हर गांव तक बिजली पहुंचा देने जैसा असंभव काम हो चुका है.

जब आप ग्रेटर हैदराबाद नगर पालिका में भाजपा का चमत्कारी उदय देखते हैं, तो उसके पीछे वह गहरे तक जमती विश्वास की पूंजी है, जो मोदी सरकार ने बहुत मेहनत से कमाई है. इसी कथित किसान आंदोलन के बीच राजस्थान में पंचायत चुनाव हुए हैं. कांग्रेस ने तो पूरा चुनाव ही इस मुद्दे पर लड़ा. नतीजा, किसानों ने कांग्रेस को नकार दिया. राजस्थान विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा रही भाजपा 21 में से 14 जिलों में बोर्ड बनाने जा रही है. चुनाव आयोग द्वारा जारी फाइनल रिजल्ट के मुताबिक 636 जिला परिषद के सदस्यों में 353 पर भाजपा और 252 पर कांग्रेस सदस्य विजयी हुए हैं. वहीं पंचायत समिति की 4371 सीटों में से कांग्रेस ने 1799, तो भाजपा ने 1932 सीटें जीती हैं.

इस पूरे आंदोलन के पीछे एक ही सोच काम कर रही है और वह है अस्तित्व बचाने की आखिरी लड़ाई. कांग्रेस हो या टीआरएस, सपा हो या द्रमुक या फिर वामपंथी. इन सभी दलों के सामने अब अस्तित्व का संकट है. अस्तित्व बचाने की इस लड़ाई में ये दल कभी सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर राष्ट्र विरोधी ताकतों की गोद में बैठ जाते हैं. तो अब ये किसानों को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन जमाना बदल चुका है. हर गांव, नुक्कड़ तक मोबाइल फोन है और किसान को अपने फायदे व नुकसान को समझने के लिए कम से कम किसी कांग्रेसी नेता से ट्यूशन लेने की जरूरत तो बिल्कुल नहीं है

पहले वकालत फिर खिलाफत


कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों ने संसद की स्थायी समिति में किसान विधेयक में इन्हीं सुधारों की वकालत की थी और अब जब नरेन्द्र मोदी सरकार किसानों के हित में उन सुधारों को लागू कर रही है तो विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं।


कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों ने संसद की स्थायी समिति में किसान विधेयक में इन्हीं सुधारों की वकालत की थी और जब नरेन्द्र मोदी सरकार किसानों के हित में उन सुधारों को लागू कर रही है तो विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं।

यूपीए-2 की सरकार में कृषि मंत्री रहे शरद पवार ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी एक्ट में बदलाव की जरूरत बताते हुए देश में एक मॉडल एक्ट की वकालत की थी. कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों के चुनावी घोषणा पत्र में एपीएमसी एक्ट में संशोधन की बात प्रमुखता से कही गई. समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव, टीएमसी, अकाली दल और कांग्रेस के नेताओं ने संसद की स्थायी समिति में एपीएमसी एक्ट में संशोधन की आवश्यकता का समर्थन किया था.




इन सभी दलों ने समय-समय पर 'वन नेशन-वन मंडी' को देश के लिए उपयोगी बताया था लेकिन आज जब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार किसानों के उत्तम भविष्य को सुनिश्चित करते हुए यही कानून लाई है तो यही राजनीतिक दल इसका विरोध कर रहे हैं. जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार आई तो तत्कालीन कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया था कि हमें एपीएमसी एक्ट में संशोधन के लिए कोशिश करनी चाहिए. यही नहीं, दिल्ली की केजरीवाल सरकार तो नए अध्यादेश के मुताबिक नोटिफिकेशन जारी करने के बाद अब फिर इसी का विरोध कर रही है.

 उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस पूरे मसले पर कहा, “ यह दल जब सत्ता में रहते हैं तो इनका वक्तव्य कुछ और रहता है। स्टैंडिंग कमेटी में जहां गहन चर्चा होती है, वहां कुछ और कहते हैं और जब विपक्ष में होते हैं, तो इनके बयान आश्चर्यजनक रूप से बदल जाते हैं. दरअसल यही दोहरा चरित्र इनका असल चेहरा है. जनता इसे भली भांति समझती है. देश इस दोहरे रवैये वाले चरित्र को स्वीकार नहीं करेगा. एक ऐसे दौर में जबकि हम कोरोना के खिलाफ जारी वैश्विक जंग जीतने के कगार पर हैं, तब विपक्षी दलों द्वारा इस तरह किसानों को गुमराह कर अराजकता फैलाने की कोशिश हमारी लड़ाई को कमजोर करने का कुत्सित प्रयास है. पीएम किसान सम्मान, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना सहित अनेक योजनाओं के केंद्र में किसान कल्याण ही है. किसान भाइयों को गुमराह करने की हर कुत्सित कोशिश बेकार जाएगी. केंद्र की सरकार लगातार किसानों से वार्ता कर रही है, जल्द ही इसका सकारात्मक परिणाम सामने आएगा.”