Saturday, May 16, 2020

भारतीय दर्शन, दृष्टि और विचार को समझने का समय

भारतीय दर्शन, दृष्टि और विचार को समझने का समय

आज हम स्वतंत्र हैं। परन्तु हमारी स्वतंत्रता की लड़ाई केवल राजनैतिक लड़ाई नहीं थी, हम जिस दर्शन, दृष्टि और विचार के लिये विश्व में जगद्गुरू के स्थान पर प्रतिष्ठित थे, उस दर्शन, दृष्टि और विचार को फिर से स्थापित करने की लड़ाई अभी शेष है

t_1  H x W: 0 x

किसी भू-भाग के किसी अंश पर जब जीवित सृष्टि का निर्माण होता है तो उसे देश की संज्ञा प्राप्त हो जाती है। इसी के साथ देश के लोग जिन जीवन मूल्यों एवं सिद्धान्तों का विकास करते हैं, उसके आधार पर उनके जो श्रृद्धा, आस्था व विश्वाास के केन्द्र बनते हैं, वह भी देश होने का एक अनिवार्य तत्व हैं। इस दृष्टि से विचार करने पर भारत विश्व का प्राचीनतम राष्ट्र है। हमारे ऋषि, मुनियों ने साधना एवं तपस्या के आधार पर सृष्टि के गूढ़तम रहस्यों का साक्षात्कार किया, जिसे केवल भारत के लिये नहीं, संपूर्ण सृष्टि के लिए दिया, यही दृष्टिकोण भारत को जगदृगुरु बनाता है।

वैश्विक दर्शन, दृष्टि और विचार के आधार पर भारत न केवल ज्ञान और विज्ञान, न केवल समृद्धि और विकास, अपितु पराक्रम की दृष्टि से भी विश्व में अग्रणी रहा है। विश्व का कोई ऐसा फलक या क्षेत्र नहीं है, जिस पर समय के किसी न किसी कालखंड में भारत का कोई न कोई व्यक्ति शीर्ष या शीर्ष के आसपास न रहा हो।

विश्व में जिस सृष्टि का निर्माण हुआ वह केवल हमारे अथवा हमारे विज्ञान की दृष्टि से नहीं बल्कि हमारे पराक्रमी सम्राटों के पराक्रम का ही नतीजा रहा कि वह हिन्दुकुश पर्वत की सीमाओं के पार दूर-दूर तक विकसित हुई, पहुंची। परन्तु उन पराक्रमी महापुरुषों ने अपने अहंकार को दूसरों पर आरोपित करने के लिये विजय अभियान नहीं चलाये। बल्कि सत्य और न्याय की प्रतिष्ठा के लिये उन्होंने अपने पराक्रम और शक्ति का प्रयोग किया। उनका ज्ञान भी विवाद के लिये नहीं था।

t_1  H x W: 0 x

बहस के लिये नहीं था। उनकी शक्ति दूसरों के उत्पीड़न के लिये नहीं थी। उनका जो समृद्धि और विकास था, वह भी अहंकार का साधन नहीं था, बल्कि विद्या और ज्ञान के लिये था। धन दूसरों की सहायता के लिये था। शक्ति अन्याय से पीड़ित लोगों की रक्षा के लिये थी। अपने इसी दर्शन-दृष्टि और विचार के आधार पर भारत विश्व गुरू रहा। परन्तु परमात्मा की इस सृष्टि में कुछ भी स्थाई और विशुद्ध नहीं है। समय के साथ-साथ विसंगतियां और विकृतियां आती हैं। हमारे जीवन में भी विसंगतियां और विकृतियां आयीं। अपनी विसंगतियों और विकृतियों के कारण 700-800 वर्षों तक न केवल राजनैतिक दृष्टि से पराधीन रहे बल्कि जीवन के सभी क्षेत्रों में हम दूर-दूर तक पिछड़ते चले गये।

हमारे महापुरूषों ने इस देश को स्वतंत्र कराने के लिये एक लम्बा संघर्ष किया। इन 700-800 वर्षों में एक दिन भी ऐसा नहीं रहा, जब भारत माता का कोई न कोई पुत्र कहीं न कहीं बलिदान न हुआ हो। यह भी सही है कि इतने लम्बे समय तक कोई देश पराधीन नहीं रहा परन्तु यह भी सही है कि इतने लम्बे समय तक पराधीन रहने के बाद फिर कोई स्वतंत्र नहीं हुआ।

आज हम स्वतंत्र हैं। परन्तु हमारी स्वतंत्रता की लड़ाई केवल राजनैतिक लड़ाई नहीं थी, हम जिस दर्शन, दृष्टि और विचार के लिये विश्व में जगद्गुरू के स्थान पर प्रतिष्ठित थे, उस दर्शन, दृष्टि और विचार को फिर से स्थापित करने की लड़ाई थी, जो अभी शेष है। व्यक्ति, राष्ट्र और समाज के जीवन में स्वतंत्रता, संप्रभुता और स्वायत्तता मायने रखती है। परन्तु इससे भी ज्यादा मायने यह बात रखती है कि कोई व्यक्ति, कोई समाज, कोई राष्ट्र लम्बे समय तक अपनी स्वतंत्रता, संप्रभुता और स्वायत्तता को कैसे सुरक्षित रखता है। यह वही व्यक्ति, वही समाज और वही राष्ट्र कर सकता है, जो शिक्षा और ज्ञान की दृष्टि से स्वतंत्र, संप्रभु और स्वायत्त है। इसलिये हमारे यहां शिक्षा और ज्ञान की स्वतत्रंता, संप्रभुता और स्वायत्तता बनाये रखने पर विशेष ज़ोर रहा है।

शिक्षा की स्वायत्तता, स्वतंत्रता और संप्रभुता से आशय उस शिक्षा के ज्ञान और व्यवस्था से है जो न केवल मनुष्य के मस्तिष्क बल्कि उनके हृदय का भी परिमार्जन करती है। यह वही शिक्षा कर सकती है, जो हमारे राष्ट्रीय जीवन मूल्यों के मूल में प्रतिष्ठित हो। इसलिए यह आवश्यक हो उठा कि हम भारत के इस दर्शन, दृष्टि और विचार को समझें, जिसके आधार पर हमारा शिक्षा का विचार, हमारा ज्ञान का विचार, हमारा पुरूषार्थ चतुष्टय-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का विचार हमारे जीवन का आधार था । इसी के कारण न केवल हम अपनी बल्कि सम्पूर्ण मानवता की रक्षा के लिये प्रतिबद्ध रहे। सफल भी रहे।

आज की समस्याओं, वातावरण को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक है। पर इस हक़ीक़त से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि हर समाज के सामने हर समय अपने—अपने तरह की समस्याएं और चुनौतियां आई हैं। रही हैं। लेकिन अगर हमने इन समस्याओं और चुनौतियों से निपटने के लिए अपने दर्शन, दृष्टि, विचार अर्थात जीवन मूल्यों के अनुकूल हल निकाला तो वह समाधान स्थायी होगा। मंगलकारी होगा। आने वाली पीढ़ियों के लिये नई समस्यायें पैदा नहीं करेगा।

मैनें इस दृष्टि से विचार किया तो यह तथ्य और सत्य हाथ लगा कि हमारे ऋषियों ने अपनी आध्यात्मिक साधना और तपस्या के आधार पर सृष्टि का निर्माण परमात्मा के निर्गुण, निराकार बह्म के स्वरूप में ‘‘एको हम् बहुस्याम् ’’ (मैं अकेला हूं अनेकों रूपों में प्रकट हूं) के विचार से किया। इसी विचार से सृष्टि को जन्म दिया। इसीलिये भारतीय दर्शन, विचार और दृष्टि यह मानती है कि यह संपूर्ण सृष्टि परमात्मा का ही स्वरूप है। चूंकि यह सम्पूर्ण सृष्टि परमात्मा का ही स्वरूप है, इसीलिए हमारे भारतीय दर्शन ने प्रतिपादित किया-‘‘वसुधैव कुटुबंकम्’’ यानी यह सम्पूर्ण वसुधा हमारा परिवार है। जब सम्पूर्ण वसुधा हमारा परिवार है। जब पूरा विश्व हमारा परिवार है तो हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम सबको प्रसन्न रखें। तभी तो कहा गया है- ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः।’’

दूसरे दर्शन बहुत उदार हुए तो उन्होंने कहा- जियो और जीने दो।

भारत के दर्शन और दृष्टि में, उसकी सीमाओं में केवल मनुष्य नहीं है। केवल प्राणी नहीं है।

उसके विचार का केंद्र विंदु समस्त सृष्टि है। इसलिये हमने एक प्रकृति सुसंगत जीवनशैली का प्रतिपादन किया है। हमारे यहां विचार हुआ-

माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः ।
बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥

t_1  H x W: 0 x

दर्शन, दृष्टि और विचार के आधार पर हमारे ऋषियों ने यह प्रतिपादित किया कि यह सम्पूर्ण धरती ही नहीं, आकाश और पाताल भी हमारे स्वदेश का ही स्वरूप हैं। जो सकारात्मक सोच में लगे हैं, जो मंगल कामना करते हैं, वे सभी लोग आपस में बन्धु और बान्धव हैं। हमारी प्रार्थना है सम्पूर्ण विश्व की रक्षा हो। हमने कभी यह नहीं कहा कि जो हम कर रहे हैं वही अन्तिम सत्य है, जो हम कह रहे हैं वह भी सत्य हो सकता है, जो दूसरा कह रहा है वह भी सत्य हो सकता है और हो सकता है जो तीसरा व्यक्ति कर रहा है, वह हम दोनों से अधिक सही हो। इसलिये हमारे ऋषियों ने कहा-आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरितासउद्भिदः।
समाज में अनेक प्रकार के चिन्तन, साथ-साथ चलने के कारण, मतभेद स्वभाविक हैं, परन्तु मतभेदों के साथ-साथ एक ही तरीका है। परस्पर विचार-विमर्श। यह संवाद की भूमि है। शास्त्रार्थ की भूमि है। जहां हारने वाला, जीतने वाले को अपना शत्रु नहीं मानता था। वह कहता था कि मुझे सत्य का ज्ञान नहीं था, आज आपने मुझे सत्य का ज्ञान कराया और इसलिये मैं, आज से आपका अनुयायी हुआ।

आज समाज में जिस तरह का संकट हैं, व्यक्तियों के बीच टकराव है, समूहों के बीच टकराव है, राष्ट्रों के बीच टकराव है। मनुष्य और प्रकृति के बीच टकराव है। अगर इन सारे टकरावों और इनकी पृष्ठभूमि पर विचार करें तो मुझे लगता है कि एकमात्र विकल्प भारत का दर्शन, दृष्टि और विचार है। किसी राष्ट्र का निर्माण अचानक नहीं होता, उसे सामर्थ्यवान, संस्कारवान, चरित्रवान और देशभक्त लोग करते हैं। ऐसे लोगों के निर्माण की व्यवस्था और प्रक्रिया का नाम शिक्षा है। इसलिये इस शिक्षा में कहीं न कहीं हमारे भारत के दर्शन, दृष्टि और विचार को शामिल किया जाना आवश्यक है।

हम जिस देश की आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे, वह केवल किसी भाग की आजादी की लड़ाई नहीं थी, 700-800 वर्षों के कालखण्ड में हमारा दर्शन, दृष्टि और विचार मन्द पड़ा था। यद्यपि हमारे पूर्वजों ने उस दर्शन, दृष्टि और विचार की रक्षा के लिए सत्ता संघर्ष किये, तभी तो वह दर्शन, दृष्टि और विचार बीज रूप में इस देश में उस समय भी सुरक्षित रहा जब अनेक प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियां खड़ी थीं।

ऐसे में हम सब लोगों का यह कर्तव्य बनता है कि हम उस दर्शन, दृष्टि, विचार को समझें। आने वाली पीढ़ियों को समझानें की चेष्टा करें कि यह सम्पूर्ण सृष्टि हमारा परिवार है। परिवार में कोई एक व्यक्ति दुखी होता है तो शेष व्यक्ति अपने आप दुखी हो जाते हैं।

कहीं भी अगर कोई पीड़ित व्यक्ति दिखायी पड़ता है तो हजारों हांथ उठते हैं, उस पीड़ित और असहाय व्यक्ति की मदद के लिये। सरकार अपना काम करती है। परन्तु समाज इस वसुधाको अपना परिवार मानने के विचार में रहा है। इसलिये किसी के साथ अन्याय, अत्याचार और शोषण करने का विचार हमारे सिद्धान्तों और विचार के विरूद्ध है। अगर ऐसा विचार आता है तो पीड़ित की सहायता के लिये अपने ज्ञान, धन, शक्ति, पुरूषार्थ का उपयोग करते हैं।

हमारे यहां पुरूषार्थ चतुष्टय में धर्म में भी अर्थ, काम, मोक्ष में समाहित है, अर्थ में भी धर्म, काम एवं मोक्ष शामिल है, इसी तरह काम में भी धर्म, अर्थ, मोक्ष शामिल है, और मोक्ष भी धर्म, अर्थ काम ग्रहित है। ऐसा मोक्ष कालजयी नहीं हो सकता, जिसमें पुरुषार्थ चतुष्टय न हो। यदि आने वाली पीढ़ियां इससे जुड़ती हैं तो बहुत सारी समस्याओं का समाधान वे स्वतः कर लेंगी, उनको किसी बड़े कानून की, बड़े विधान की या सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता कम से कम पड़ेगी। यही नहीं, जो इस दर्शन, दृष्टि और विचार के आधार पर खड़े हैं, वे न केवल अपना निर्माण करेंगे बल्कि अपने से जुड़े हुये प्राणियों और सृष्टि के शेष हिस्सों का भी संरक्षण और संवर्धन करेंगे। तब यह सम्पूर्ण प्रकृति, मनुष्य जाति का संवर्धन और संरक्षण भी सुनिश्चित करेगी। कहा जा सकेगा-धर्मो रक्षति रक्षितः।

कोरोना संकट: भारतीय चिकित्सा पद्धति और उपचार

कोरोना संकट: भारतीय चिकित्सा पद्धति और उपचार


अमेरिका के एन आई एच नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (मैरीलैंड )ने यह पाया भारतीय ध्यान योग की पद्धति ब्लड प्रेशर के मरीजों को अत्यधिक लाभ देती है। एन आई एच अमेरिका एलोपैथी के अलावा वैकल्पिक आयुर्वेदिक स्वास्थ्य उपचार विधि पर कई वर्षों से शोध कर रहा है। अमेरिकी वैज्ञानिक भारतीय आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति चरक ऋषि और आयुर्वेद के सिद्धांतों का बहुत गंभीर अध्ययन कर रहे हैं

indian health _1 &nb

हमें यह सुनने में मिलता है कि कई प्रकार के संक्रमण जो फैलते हैं वह कुछ समय के पश्चात अपने आप दम तोड़ देते हैं जैसे जहां पर उन्हें मानव संपर्क नहीं मिलता है या यूं कहिए अटलांटिक डेजर्ट में या सहारा डेजर्ट में जहां मनुष्य संपर्क में नहीं आते हैं तब क्रमण अपने आप दम तोड़ देता है।
लेकिन कोरोना वायरस एक अलग प्रकार का वायरस देखने को मिलता है यह इटली जैसे ठंडे प्रदेशों में अफ्रीका के उत्तरी क्षेत्रों में भारत , चीन में या कहें लगभग सभी महाद्वीपों में यह व्यापक रूप से फैल गया है। सभी कॉन्टिनेंट का वातावरण जलवायु सभी अलग-अलग प्रकार के है और यह जहां जहां संपर्क में आया वहां पर यह व्यापक रूप से फैला चाहे वहां सर्दी हो या गर्मी हो या आर्द्रता वाला क्षेत्र रहा है।
अब हम बात करते हैं भारत की भारत की जलवायु गर्म है यहां पर वह प्रयोग सटीक नहीं हो सकते जो यूरोप या अमेरिका में सटीक बैठते हो क्योंकि यूरोप और अमेरिका का वातावरण भारतीय वातावरण से बिल्कुल भिन्न है तो भी ग्लोबल विलेज और संचार गंतव्य स्थानों पर पहुंचने के त्रिव साधनों के होने के कारण हमारे यहां के वैज्ञानिक और डॉक्टर पिछले 40 वर्षों में अमेरिका यूरोप या पश्चिम जगत की मान्यताओं को ही प्रमाणित मानते हैं और अब इस मामले में व्यापक रूप से थोड़ा बहुत विरोधाभास भी देखने को मिल रहा है ।

उपवास

ईशा फाउंडेशन में सतगुरु से एक परिचर्चा में आईआईटी के छात्र ने पूछा के उपवास को ले करके मैंने पहले रूढ़ीवादी दी मान्यताओं को सुना कि यह भारत के रूढ़िवादी लोग उपवास को प्रमाणिक मानते हैं लेकिन जब अमेरिका के शोधकर्ताओं ने कहा कि उपवास से जीवन में एकाग्रता शुद्धि और स्वास्थ्य में अत्यधिक सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलता है तब जाकर के मैंने भी उपवास रखना प्रारंभ किया है और महीने में मैं 3 बार उपवास रखता हूं आखिर इसका कारण क्या है जब पश्चिम जगत किसी शोध को मान्यता देता है तभी भारत के लोग उसे प्रमाणित मानते हैं!

सतगुरु ने बहुत सुंदर उत्तर दिया शायद यह हमारे रंग का दोष है और हम गोरे रंग पर अधिक विश्वास करते हैं और अगर वह गोरा रंग पश्चिम का हो तो ज्यादा विश्वास करते हैं।

भारत की प्राचीन मान्यताएं भारत में रोगों और संक्रमण से लड़ने हेतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सटीक बैठती थी जिसे समय के अनुसार अंधाधुंध भौतिकवाद की दौड़ में हम भूलते गए इस विषय पर पहले भी कई बार लिखा जा चुका है किंतु हम मानते नहीं हम तो तभी मानते हैं जब पश्चिम जगत की मीडिया और वहां के वैज्ञानिक इस पर अपनी राय सहमति की दे देते हैं।

उपवास, उपवास हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है सद्गुरु कहते हैं भोजन के पश्चात मैंने कई बीमारियों को जन्म लेते देखा है और उन बीमारियों के कारण से मैंने कई लोगों की मृत्यु देखी है लेकिन खाली पेट रहने और उपवास रखने के पश्चात शायद ही मैंने किसी को मरते हुए देखा है। हमारा शरीर और हमारा दिमाग तभी अच्छे से काम कर सकता है जब हमारा पेट खाली हो हमारे शरीर में कई सुधार तब हो सकते हैं जब हमारा शरीर या पेट खाली हो मेरा मानना है दुनिया में कई बड़े अविष्कार भूखे पेट रहते हुए ही हुए हैं जब शरीर भूखा रहता है तो दिमाग की यांत्रिकी तेज गति से कार्य करती है और वही अविष्कार की ओर बढ़ती है।

अफ्रीका के एक छोटे से देश मलावी में विलियम कम क्वाला 14 वर्ष के एक बालक ने अपने गांव में भीषण अकाल में जिसमें उसकी एक गाय और एक उसका कुत्ता भी भूख से मर गया था और उसके घर में पड़े हुए कुछ मक्की के दाने भी चोरों ने चोरी कर लिए थे विकट परिस्थिति में और भूखे पेट विलियम ने अपने पिता की साइकिल और कुछ टूटे हुए इलेक्ट्रॉनिक सामानों को जोड़कर के पवन चक्की का आविष्कार किया था।और हवा से ऊर्जा को कैसे प्राप्त कर सकते हैं और वह सिंचाई में किस प्रकार से सहयोगी हो सकता है इसके कारण से अपने सूखाग्रस्त गांव को कृषि योग्य भूमि में बदल दिया मलावी के इस बालक की कहानी पर हॉलीवुड मैं प्रसिद्ध फिल्में भी बन चुकी है।

भूख के कारण से विलियम ने अविष्कार किया और हजारों भूखे लोगों को भोजन की व्यवस्था में एक साधक के रूप में कार्य किया। उपवास हमारी प्रतिरोधक क्षमता को ही नहीं बढ़ाता अपितु सामाजिक और राजनीतिक जीवन में उपवास एक संदेश का भी बहुत बड़ा हथियार होता है जैसे गांधी जी का उपवास विश्व प्रसिद्ध रहा अन्ना हजारे का उपवास आज के आंदोलन का मुख्य हथियार बना उपवास कई रोगों को जड़ से समाप्त कर सकता है उपवास से श्रद्धा जागृत होती है और मनुष्य सत्य की ओर बढ़ता है उपवास आचरण की शुद्धता की श्रेष्ठ औषधि है।

उपवास शरीर में प्रतिरोधक क्षमता ओं में आश्चर्यजनक वृद्धि करता है और यह कोरोनावायरस में अत्यधिक सहायक सिद्ध हो सकता है। पिछले 80 वर्षों में विज्ञान ने बहुत तेज गति से प्रगति की है और बहुत तेजी से हवाई जहाज पेट्रोल-डीजल ऊर्जा का अत्यधिक प्रयोग हुआ है आवागमन के साधनों ने बीमारियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंचाने में बहुत मदद की है और मनुष्य का शरीर अब एक बाजार में बदल गया है और इस शरीर को ठीक रखने के लिए बड़ी दवा कंपनियों का गिरोह पूरे विश्व में काम कर रहा है।
अब विश्व के जितने भी दवा कंपनियां है वह जीवन रक्षा और लाभ के लिए नहीं अपितु मुनाफाखोरी के लिए काम करने लगी है।

व्यापार का सिद्धांत है अगर व्यापार लाभ के लिए होता है तो उसका दृष्टिकोण व्यापक और जन कल्याण हेतु होता है और व्यापार अगर मुनाफाखोरी में बदल जाए तो वह डकैती के अलावा कुछ नहीं करता ।

शाकाहार

इसी प्रकार अगली कड़ी में उपवास के साथ शाकाहार जीवन रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है शाकाहारी व्यक्ति अपना जीवन कम बीमारियों के साथ सहज और स्वस्थ रूप से जीता है। शाकाहारी भोजन में संतृप्त वसा प्राणी प्रोटीन का स्तर कम होता है और मैग्निशियम फाइबर पोटैशियम फोलेट विटामिन सी ई एंटीऑक्सीडेंट का स्तर ऊंचा होता है। यह प्रमाणिक मान्यता है की शाकाहारी लोग मांसाहारी लोगों से ज्यादा समय तक जीते हैं शाकाहारी भोजन आसानी से पच जाता है जिसके चलते आपका दिमाग स्वस्थ रहता है शाकाहारी भोजन के कारण से विषाक्त पदार्थों का शरीर में संग्रह कम होता है साथ यानी शरीर का पाचन तंत्र बहुत अच्छा और सुदृढ़ होता है ही पाचन तंत्र को नुकसान कम पहुंचता है।

योग और ध्यान

योग और ध्यान से ब्लड प्रेशर के मरीजों में अप्रत्याशित परिवर्तन देखने को मिला है जो कहते थे ब्लड प्रेशर की बीमारी कभी समाप्त नहीं हो सकती बल्कि यह समाप्त भी हुई और उच्च रक्तचाप के रोगी ने पूर्व स्वास्थ्य जीवन को जीने लगे हैं।

अमेरिका के एन आई एच नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (मैरीलैंड )ने यह पाया भारतीय ध्यान योग की पद्धति ब्लड प्रेशर के मरीजों को अत्यधिक लाभ देती है। एन आई एच अमेरिका एलोपैथी के अलावा वैकल्पिक आयुर्वेदिक स्वास्थ्य उपचार विधि पर कई वर्षों से शोध कर रहा है। अमेरिकी वैज्ञानिक भारतीय आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति चरक ऋषि और आयुर्वेद के सिद्धांतों का बहुत गंभीर अध्ययन कर रहे हैं

डॉक्टर ए के वर्मा जो स्वयं एलोपैथी के डॉक्टर है अपने ब्लड प्रेशर के इलाज के लिए उन्होंने आयुर्वेदिक की पद्धति को अपनाया। वर्मा प्रोफेसर हैं एंडोक्राइन सर्जरी विभाग संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान लखनऊ में उन्होंने अपने अनुभव से बताया ध्यान और योग ने मुझे काम करने की क्षमताओं में आशातीत सफलता दिलवाई और मेरा ब्लड प्रेशर लगभग समाप्ति की ओर है। अंततः प्रत्येक दिन कम से कम 20 मिनट योग और ध्यान करने से हम अपने मन पर नियंत्रण करके शाकाहार ,उपवास ,और पानी पीने की पद्धति को ठीक से अपने जीवन को व्यवस्थित कर सकते हैं। रोगों से लड़ने की क्षमताओं में हमारे शरीर में अत्यधिक सकारात्मक बदलाव आ सकता है, जो करोना जैसी वैश्विक महामारी से लड़ने में हमारे समाज के लिए अत्यधिक व्यवहार कारगर उपकरण साबित हो सकता है।

Sunday, May 10, 2020

स्वाभिमान एवं स्वतंत्रता के प्रेरणा स्रोत हैं महाराणा प्रताप:

स्वाभिमान एवं स्वतंत्रता के प्रेरणा स्रोत हैं महाराणा प्रताप:

महाराणा प्रताप बप्पा रावल की उस परम्परा के प्रतिनिधि शूरवीर रहे हैं, जिन्होंने विदेशी भूमि से आए आक्रमणकारी आततायियों के सामने घुटने नहीं टेके

maharana _1  H

भारतवर्ष धर्मवीरों, दयावीरों, दानवीरों एवं कर्मवीरों की जन्मभूमि रही है। यह प्रकृति की सुंदरतम सृजन है। इसकी रक्षा सदैव महर्षियों, ब्रह्मऋषियों, एवं राजर्षियों ने की है। यहां के महात्माओं, महामनाओं, एवं महाराणाओं की अद्भुत कीर्ति रही है। यहां का जीवनदर्शन श्रेयस और प्रेयस रहा है। यहां का प्रत्येक तृण औषधि एवं प्रत्येक अक्षर मंत्र है। यह त्रिनों की शान्ति, दिशाओं की शांति , आकाश की शान्ति, पृथ्वी की शान्ति, सजीव और निर्जीव की शान्ति हेतु प्रार्थना और साधनारत नागरिकों की भूमि रही है। आत्मबोध एवं आत्मशोध से श्रीयुक्त यहां का सामान्य जन भी पहले परोपकार और सर्वोपकार को ही प्राथमिकता देता रहा है। स्वोपकार को तो वह द्वितीयक प्राथमिकता देता रहा है। यह शैव और वैष्णव परम्परा की संस्कृति का अद्भुत संगम स्थल है। ऐसी श्रेष्ठताओं के इस देश में सनातन प्राणशक्ति शास्वत रूप से प्रवाहित होती रही और इस प्रवाह को प्राणमय एवं प्रणमय बनाये रखने का परमदायित्व शीलवान राजपुरुषों का रहा है, जिनको श्रेष्ठ आचार्यों ने संस्कारों के प्रशिक्षण के माध्यम से आत्मयोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, एवं सहयोग का स्तंभपुरुष बनाया। ऐसे ही सिद्ध उत्तराधिकारी राजा अपने प्रजा की सर्वांगींण रक्षा करते हुए ‘स्वराज’ ‘सुराज’ एवं ‘स्वतंत्र’ राज्य का बोध कराता था। आधुनिक विश्व के श्रेष्ठतम लोकतंत्र से भी भारत के श्रेष्ठ राजा श्रेष्ठतम प्रजापालक सिद्ध हुए। ऐसे ही राजाओं में भी दृष्टांत योग्य हर्षवर्धन, अशोक, चित्रगुप्त, बप्पा रावल, पृथ्वीराज, राणा सांगा एवं महाराणा प्रताप हुए हैं।

महाराणा प्रताप बप्पा रावल की उस परम्परा के प्रतिनिधि शूरवीर रहे हैं, जिन्होंने विदेशी भूमि से आये आक्रमणकारी आततायियों के सामने घुटने नहीं टेके। उन्होंने भारतीय शौर्य, स्वाभिमान, और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए ही ‘महारण’ लड़ा और आजतक यहां के भारतवंशियों को ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है कि भारत का एक-एक बच्चा, अपने को ‘महाराणा’ ही समझता है, एक-एक बच्ची महाराणा प्रताप की उस बेटी जैसे ही आत्मसम्मान और राष्ट्रसम्मान के लिए सन्नद्ध रहती है, जैसे महाराणा प्रताप जी की पत्नी और बेटी ने महाराणा को सन्धि- पत्र लिखने से रोक लिया था। स्मरण करें कि जंगल में रहते हुए दूब घास की बनी रोटी को उदबिलावके झपट कर खा लेने पर भी अपने कर्मपथ से विपथित नहीं हुए। मेवाड़ की यह घटना और ऐसी स्वाभिमान की गाथा दुनिया में दूसरी नहीं मिलती है। यह था ‘महाराणा’ और ऐसे थे इसके नायक ‘महाराणा’।

महाराणा प्रताप जी ने 1572 ई. में राजगद्दी पर उत्तराधिकारी प्राप्त करने से लेकर लगातार 20 वर्षों तक अकबर से युद्ध करते रहे। इस युद्ध की घड़ी में उन्हें अपने ही कुल तथा जाति के कुलद्रोही एवं राष्ट्रद्रोही लोगों से भी लड़ना पड़ा। एक तरफ़ उनके अपने अनुज शक्ति सिंह प्रारम्भ में राजपूतों को लेकर महाराणा प्रताप के विरुद्ध लड़े तो इसी क्रम में राजामान सिंह जो क्षत्रिय जाति भारतवर्ष के गौरवमयी परम्परा को गिरवी रखकर अकबर की ओर से आकर महाराणा प्रताप से लड़ा। ऐसा प्रतिघात क्रूर इतिहास में यदा- कदा ही मिलता है। महाराणा ने अपनी प्रजा के हित पोषण,राज्य की रक्षा, स्वतंत्रता, स्वाभिमान, और शौर्य के लिए अकथ्य कठिन दिनों का सामना किया तथा समय ऐसा भी आया कि महाराणा को अपनी पत्नी एवं कम उम्र की बेटी के साथ जंगलों में अपना दिन काटनापड़ा था । महाराणा ने कभी भी अपनी मज़बूत आत्मबल को क्षीण नहीं होने दिया । जंगल में फलों को खाकर किसी भी तरह जीवन यापन किया । जंगलों में महाराणा को परिवार के साथ घास की बनी रोटी तक खानी पड़ी। उसी समय महाराणा का पितारूपी हृदय करूणवश अकबर से सन्धि-पत्र लिखने को विवश कर दिया था, परन्तु आदिशक्ति मां दुर्गा स्वरूप महारानी ने उस सन्धि-पत्र को रोक लिया था, तथा और भी प्रेरणादायी चरित्र उस अल्पायु बेटी का उभर कर सामने आया जिसने सन्धि पत्र को फाड़ भी दिया। अब पाठक वृंद आप ही विचार करें की महान कौन था ? वीर कौन था ? वीरांगना कौन थी ?

हल्दीघाटी के युद्ध में ही सरदार झाला ने अपना जीवन गंवा दिया था। राणा के अनुज शक्ति सिंह ने इसी युद्ध में अपनी त्रुटि पर पश्चाताप करते हुए महाराणा प्रताप जी के साथ खड़ाकर अपनी खोई हुई नैतिकता को प्राप्त किया। उनके घोड़े चेतक ने तो अद्भुत स्वामिभक्ति दिखायी जो अविस्मरणीय है। मंत्री भामाशाह ने तो अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति ही महाराणा प्रताप जी को सौंप दी थी। साथ देने वालों में मेवाड़ राज्य की जनजाति थी जिनकी राष्ट्रभक्ति से प्रभावित होकर महाराणा प्रताप ने अपने छापामार युद्धकाल में यह व्रत ही ले लिया था कि अपने राज्य की वापसी होने तक वह जंगल में भूमि पर शयन करेंगे तथा पत्तल में ही भोजन करेंगे। इस प्रकार के व्रत और त्याग से ही यह राष्ट्र बच पाया है। भारत के इतिहास के इस शुक्ल पक्ष को तो अभी तक कोई भी शब्द भी हम नहीं दे पाए हैं। दोषपूर्ण झूठाइतिहास पढ़ाना जाना चाहिए। महान तो महाराणा कुल था, मेवाड़ के गिरिजन थे, सरदार आला थे, घोड़ा चेतक था, मंत्री भामाशाह थे तथा सुधरे हुए अनुज शक्ति सिंह थे।

अकबर को ‘महान’ विशेषण से अलंकृत करने वाले इतिहासकारों एवं इस झूठ को दस्तावेज के रूप में अब भी प्रचारित एवं प्रसारित करने वाले विद्वानों से मेरे कुछ प्रश्न हैं। पहला - क्या वह महान इसलिए था कि ‘हरम’ में जाता था, और एक से अधिक विवश नारियों से सम्बंध बनाता था ? दूसरा - क्या वह ‘मीना’ बाज़ार नहीं लगवाता था ? क्या मीना बाज़ार लगवाना महानता का परिचायक है ? तीसरा - क्या वह प्रलोभन द्वारा धर्मांतरण नहीं करवाता था ? चौथा - क्या वह छल, छद्म एवं पाखण्ड का सहारा नहीं लेता था ? पांचवा - क्या वह पवित्र क्षत्राणियों को जौहर व्रत के अंतर्गत सती होने के लिए विवश नहीं करता था ? छठा - क्या उस दीन-ए- इलाही स्वयं इस्लाम के वसूलों के विपरीत नहीं था ?और सातवां - क्या उसका सम्पूर्ण आचरण घिनौना, क्रूर तथा दानवीय नहीं था ?

इतिहास विध्वंसंकों को एक सुझाव है कि वह कर्नल टॉड की प्रसिद्ध पुस्तक "एनल्सएंडएंटीक्विटीज़ ऑफ़ राजस्थान" अवश्य पढ़ें तथा उसकी स्वीकारोक्ति के हिन्दी अनुवाद को इन पंक्तियों में देखें।

“अरावली की पर्वतमाला में एक भी घाटी ऐसी नहीं है,

जो राणा प्रताप के पुण्य कर्म से पवित्र नहीं हुई हो,

चाहे वहां उनकी विजय हुई या यशस्वी पराजय ”

राजस्थान की महादेवियों का महासतित्व और महाराणा का शौर्य ही भारत के अस्तित्व को बचा पाया है।

पत्रकारिता के पितामह हैं देवर्षि नारद:

पत्रकारिता के पितामह हैं देवर्षि नारद:

देवर्षि नारद के संपूर्ण संचार का अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि वह लोककल्याण के लिए संवाद का सृजन करते थे। देवर्षि नारद सही अर्थों में पत्रकारिता के पितामह हैं

narad muni _1  

भारतीय परंपरा में प्रत्येक कार्यक्षेत्र के लिए एक अधिष्ठात्रा देवता/देवी का होना हमारे पूर्वजों ने सुनिश्चित किया है। इसका उद्देश्य प्रत्येक कार्यक्षेत्र के लिए कुछ सनातन मूल्यों की स्थापना करना ही रहा होगा। सनातन मूल्य अर्थात् वे मूल्य जो प्रत्येक समय और परिस्थिति में कार्य की पवित्रता एवं उसके लोकहितकारी स्वरूप को बचाए रखने में सहायक होते हैं। यह स्वाभाविक ही है कि समय के साथ कार्य की पद्धति एवं स्वरूप बदलता है। इस क्रम में मूल्यों से भटकाव की स्थिति भी आती है। देश-काल-परिस्थिति के अनुसार हम मूल्यों की पुनर्स्थापना पर विमर्श करते हैं, तब अधिष्ठात्रा देवता/देवी हमें सनातन मूल्यों का स्मरण कराते हैं। ये आदर्श हमें भटकाव और फिसलन से बचाते हैं। हमारा पथ-प्रदर्शित करते हैं। उनसे प्राप्त ज्ञान-प्रकाश के आलोक में हम फिर से उसी मार्ग का अनुसरण करते हैं, जिसमें लोकहित है। इसलिए भारत में जब आधुनिक पत्रकारिता प्रारंभ हुई, तब हमारे पूर्वजों ने इसके लिए दैवीय अधिष्ठान की खोज प्रारंभ कर दी। उनकी वह तलाश तीनों लोक में भ्रमण करने वाले और कल्याणकारी समाचारों का संचार करने वाले देवर्षि नारद पर जाकर पूरी हुई। भारत के प्रथम हिंदी समाचार-पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रकाशन के लिए संपादक पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने देवर्षि नारद जयंती (30 मई, 1826 / ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया) की तिथि का ही चयन किया। हिंदी पत्रकारिता की आधारशिला रखने वाले पंडित जुगलकिशोर शुक्ल ने उदन्त मार्तण्ड के प्रथम अंक के प्रथम पृष्ठ पर आनंद व्यक्त करते हुए लिखा कि आद्य पत्रकार देवर्षि नारद की जयंती के शुभ अवसर पर यह पत्रिका प्रारंभ होने जा रही है।

ऐसा नहीं है कि पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने ही पत्रकारिता के अधिष्ठात्रा देवता के रूप में देवर्षि नारद को मान्यता दी, अपितु अन्य प्रारम्भिक व्यक्तियों/संस्थाओं ने भी उनको ही संचार का प्रेरणास्रोत माना। जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, अमर उजाला के पूर्व संपादक और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने अपने एक आलेख ‘ब्रह्माण्ड के प्रथम पत्रकार’ में लिखा है- “हमारे यहां सन् 1940 के आस-पास पत्रकारिता की शिक्षा बाकायदा शुरू हुई। लेकिन पत्रकारिता का जो दूसरा या तीसरा इंस्टीट्यूट खुला था, नागपुर में, वह एक क्रिश्चिन कॉलेज था। उसका नाम है इस्लाब कॉलेज। जब मैं नागपुर में रह रहा था तब पता चला था कि उस कॉलेज के बाहर नारद जी की एक मूर्ति लगाई गई थी।” इसी तरह 1948 में जब दादा साहब आप्टे ने भारतीय भाषाओं की प्रथम संवाद समिति (न्यूज एजेंसी) ‘हिंदुस्थान समाचार’ शुरू की थी, तब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल ने हिंदुस्थान समाचार को जो पत्र लिखा था, उसमें उन्होंने उल्लेख किया था कि देवर्षि नारद पत्रकारिता के पितामह हैं। पत्रकारिता उन्हीं से शुरू होती है।

हमने दो-तीन उदाहरण इसलिए दिए हैं, क्योंकि भारत में एक वर्ग ऐसा है, जो सदैव भारतीय परंपरा का विरोध करता है। देवर्षि नारद को पत्रकारिता का आदर्श मानने पर वह विरोध ही नहीं करता, अपितु देवर्षि नारद का उपहास भी उड़ाता है। इसके लिए वह जुमला उछालता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पत्रकारिता का ‘भगवाकरण’ करने का प्रयास कर रहा है। इस वर्ग ने त्याग और समर्पण के प्रतीक ‘भगवा’ को गाली की तरह उपयोग करना प्रारंभ किया है। इससे ही इनकी मानसिक और वैचारिक क्षुद्रता का परिचय मिल जाता है। बहरहाल, उपरोक्त उदाहरणों से यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि आरएसएस ने देवर्षि नारद को पत्रकारिता का आदर्श या आद्य पत्रकार घोषित नहीं किया है, बल्कि भारत में प्रारंभ से ही पत्रकारिता विद्या से जुड़े महानुभावों ने देवर्षि नारद को स्वाभाविक ही अपने आदर्श के रूप में स्वीकार कर लिया था। क्योंकि यह भारतीय परंपरा है कि हमारे प्रत्येक कार्यक्षेत्र के लिए एक दैवीय अधिष्ठान है और जब हम वह कार्य शुरू करते हैं तो उस अधिष्ठात्रा देवता/देवी का स्मरण करते हैं। पत्रकारिता क्षेत्र के भारतीय मानस ने तो देवर्षि नारद को सहज स्वीकार कर ही लिया है। जिन्हें देवर्षि नारद के नाम से चिढ़ होती है, उनकी मानसिक अवस्था के बारे में सहज कल्पना की जा सकती है। उनका आचरण देखकर तो यही प्रतीत होता है कि भारतीय ज्ञान-परंपरा में उनकी आस्था नहीं है। अब तो प्रत्येक वर्ष देवर्षि नारद जयंती के अवसर पर देशभर में अनेक जगह महत्वपूर्ण आयोजन होते हैं। नारदीय पत्रकारिता का स्मरण किया जाता है।

पिछले कुछ वर्षों में आई जागरूकता का प्रभाव दिखना प्रारंभ हो गया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाली नयी पीढ़ी भी अब देवर्षि नारद को संचार के आदर्श के रूप में अपना रही है। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (डीएविवि) के पत्रकारिता विभाग के बाहर दीवार पर युवा कार्टूनिस्टों ने देवर्षि नारद का चित्र बनाया है, जिसमें उन्हें पत्रकार के रूप में प्रदर्शित किया है। संभवत: वे युवा पत्रकारिता के विद्यार्थी ही रहे होंगे। डीएविवि जाना हुआ, तब वह चित्र देखा, बहुत आकर्षक और प्रभावी था। इसी तरह एशिया के प्रथम पत्रकारिता विश्वविद्यालय माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर देवर्षि नारद का चित्र एवं उनके भक्ति सूत्र उकेरे गए हैं। विश्वविद्यालय के द्वार पर प्रदर्शित नारद भक्ति सूत्र बहुत महत्वपूर्ण हैं। दरअसल, उन सूत्रों में पत्रकारिता के आधारभूत सिद्धांत शामिल हैं। ये सूत्र पत्रकारिता के विद्यार्थियों को दिशा देने वाले हैं। पहला सूत्र लिखा है- ‘तल्लक्षणानि वच्यन्ते नानामतभेदात।’ अर्थात् मतों में विभिन्नता एवं अनेकता है। ‘विचारों में विभिन्नता और उनका सम्मान’ यह पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है। इसी तरह दूसरा है- ‘तद्विहीनं जाराणामिव।’ अर्थात् वास्तविकता (पूर्ण सत्य) की अनुपस्थिति घातक है। अकसर हम देखते हैं कि पत्रकार जल्दबाजी में आधी-अधूरी जानकारी पर समाचार बना देते हैं। उसके कितने घातक परिणाम आते हैं, सबको कल्पना है। इसलिए यह सूत्र सिखाता है कि समाचार में सत्य की अनुपस्थिति नहीं होनी चाहिए। पूर्ण जानकारी प्राप्त करके ही समाचार प्रकाशन करना चाहिए। एक और सूत्र को देखें- ‘दु:संग: सर्वथैव त्याज्य:।’ अर्थात् हर हाल में बुराई त्याग करने योग्य है। उसका प्रतिपालन या प्रचार-प्रसार नहीं करना चाहिए। देवर्षि नारद के संपूर्ण संचार का अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि वह लोककल्याण के लिए संवाद का सृजन करते थे। देवर्षि नारद सही अर्थों में पत्रकारिता के अधिष्ठात्रा हैं।

Sunday, May 3, 2020

शस्त्र और शास्त्र के अनूठे समन्वयक भगवान परशुराम:

शस्त्र और शास्त्र के अनूठे समन्वयक भगवान परशुराम:

भगवान परशुराम का समूचा जीवन अनुपम प्रेरणाओं व उपलब्धियों से परिपूर्ण है। वे न सिर्फ ब्रह्मास्त् समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में पारंगत थे, बल्कि शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र की रचना उन्होंने ही की थी.



इस धराधाम पर अवतरित भगवान परशुराम ऐसी ही अमर विभूति हैं जिनके प्रतिपादित सिद्धांत आज भी अपनी प्रासंगिकता रखते हैं। अपने युग की सबसे बड़ी धार्मिक क्रांति के पुरोधा भगवान परशुराम की मान्यता थी कि स्वस्थ समाज की संरचना के लिए ब्रह्मशक्ति और शस्त्र शक्ति दोनों का समन्वय आवश्यक है। पौराणिक परंपरा के अष्ट चिरंजीवियों (अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, भगवान परशुराम तथा महर्षि मार्कण्डेय) की कड़ी में गिने जाने वाले महर्षि परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है।
 भृगुकुल शिरोमणि परशुराम जी ऋषियों के ओज और क्षत्रियों के तेज दोनों का अद्भुत संगम माने जाते हैं। इनके माता-पिता ऋषि जमदग्नि व रेणुका दोनों ही विलक्षण गुणों से सम्पन्न थे। जहां जमदग्नि जी को आग पर नियंत्रण पाने का वरदान प्राप्त था, वहीं माता रेणुका को पानी पर नियंत्रण पाने का। देवराज इंद्र्र के वरदान के फलस्वरूप ऋषि दम्पती की पांचवीं संतान के रूप में बैसाख माह की तृतीया को जन्मे परशुराम जी का प्रारंभिक नाम 'राम' था जो कालान्तर में महादेव से परशु प्राप्त होने के बाद परशुराम हो गया। राम बालपन से ही बेहद साहसी, पराक्रमी, त्यागी व तपस्वी स्वभाव के थे। उन्होंने बहुत कम आयु में अपने पिता से धनुर्विद्या सीख ली थी। कहते हैं, महादेव शिव के प्रति विशेष श्रद्धा भाव के चलते एक बार बालक राम भगवान शंकर की आराधना करने कैलाश जा पहुंचे। वहां देवाधिदेव ने उनकी भक्ति और शक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अनेक अस्त्र-शस्त्रों सहित दिव्य परशु प्रदान किया। इस अमोघ परशु को धारण करने के बाद बालक राम 'परशुराम' के नाम से विख्यात हो गये।
परशुराम जी की गणना महान पितृभक्तों में होती है। श्रीमद्भागवत में एक दृष्टान्त है कि एक बार माता रेणुका स्नान करने व हवन हेतु जल लाने गंगा तट गयीं। उस वक्त वहां गन्धर्वराज चित्ररथ अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे। रेणुका उनकी जलक्रीड़ा देखने में ऐसी निमग्न हो गयीं कि उन्हें समय का बोध ही न रहा। जमदग्नि ऋषि को जब अपनी पत्नी के उस मर्यादा विरोधी आचरण का पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर अपने पुत्रों को मां का शीश काटने की आज्ञा दी। प्रथम चारों पुत्रों ने पिता की आज्ञा नहीं मानी, किन्तु परशुराम ने पिता की आज्ञा पालन कर मां का सिर काट दिया। कहते हैं कि अपनी आज्ञा की अवहेलना से क्रोधित हो जमदग्नि ने जहां अपने चार पुत्रों को जड़ हो जाने का श्राप दिया, वहीं परशुराम से प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा। तब परशुराम ने पिता से वरदान में माता तथा अपने चारों भाइयों का पुनर्जीवन मांग कर न सिर्फ अपने हृदय की विशालता का परिचय दिया अपितु अपने पिता को भी उनकी भूल का भान करा दिया।



परशुराम जी का समूचा जीवन अनुपम प्रेरणाओं व उपलब्धियों से परिपूर्ण है। वे न सिर्फ ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में पारंगत थे अपितु योग, वेद और नीति तथा तंत्र कर्म में भी निष्णात थे। शिव पंचचत्वारिंशनाम स्तोत्र की रचना परशुराम जी ने ही की थी। कहते हैं, वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे, खूंखार वन्यजीव उनके स्पर्श मात्र से ही उनके मित्र बन जाते थे। इन्हें श्रेष्ठ राजनीति के मूल्यों का प्रतिष्ठाता माना गया है जो शासन में मानवीय गरिमा की सर्वोच्चता के पक्षधर थे। अन्याय के विरुद्ध आवेशपूर्ण आक्रामकता के विशिष्ट गुण के कारण उन्हें भगवान विष्णु के 'आवेशावतार' की संज्ञा दी गयी है। न्याय के प्रति उनका समर्पण इतना था कि उन्होंने हमेशा अन्यायी को खुद ही दंडित किया। दुनिया भर में शस्त्रविद्या के महान गुरु के नाम से विख्यात भगवान परशुराम ने महाभारत युग में भी अपने ज्ञान से कई महारथियों को शस्त्र विद्या प्रदान की थी।
जिस प्रकार देवनदी गंगा को धरती पर लाने का श्रेय राजा भगीरथ को जाता है ठीक उसी प्रकार पहले ब्रह्मकुंड (परशुराम कुंड) से और फिर लौहकुंड (प्रभु कुठार) पर हिमालय को काटकर ब्रह्मपुत्र जैसे उग्र महानद को धरती पर लाने का श्रेय परशुराम जी को ही जाता है। यह भी कहा जाता है कि गंगा की सहयोगी नदी रामगंगा को वे अपने पिता जमदग्नि की आज्ञा से धरा पर लाये थे। तमाम पौराणिक उद्धरणों के अनुसार केरल, कन्याकुमारी व रामेश्वरम की संस्थापना भगवान परशुराम ने ही की थी। उन्होंने जिस स्थान पर तपस्या की थी, वह स्थान आज तिरुअनंतपुरम के नाम से प्रसिद्ध है। केरल में आज भी पुरोहित वर्ग संकल्प मंत्र में परशुराम क्षेत्र का उच्चारण कर उक्त समूचे क्षेत्र को परशुराम की धरती की मान्यता देता है। विदेहराज जनक की राजसभा में सीता स्वयंवर के दौरान श्रीराम द्वारा शिवधनुष तोड़ने पर परशुरामजी का क्रोध व राम के अनुज लक्ष्मण से उनका संवाद सनातनधर्मियों में सर्वविदित है; मगर उनकी महानता इस बात में है कि ज्यों ही उन्हें अवतारी श्रीराम के शौर्य, पराक्रम व धर्मनिष्ठा का बोध हुआ और उनको योग्य क्षत्रिय कुलभूषण प्राप्त हो गया तो उन्होंने स्वत: दिव्य परशु सहित अपने समस्त अस्त्र-शस्त्र राम को सौंप दिये और महेन्द्र पर्वत पर तप करने के लिए चले गये। कांवड़ यात्रा का शुभारंभ परशुराम जी ने किया था। अंत्योदय की बुनियाद भी परशुराम जी ने ही डाली थी। समाज सुधार और समाज के शोषित-पीडि़त वर्ग को कृषिकर्म से जोड़कर उन्हें स्वावलंबन का पाठ पढ़ाने में भी परशुराम जी की महती भूमिका रही है।


                                     पाप संहारक परशुराम

सर्वविदित है कि परशुराम जी का क्षत्रियों के विरुद्ध अस्त्र उठाना उनकी उस अन्याय के विरुद्ध प्रबल प्रतिक्रिया थी जो महिष्मती राज्य के उस काल के हैहयवंशीय क्षत्रिय शासक आम प्रजा पर कर रहे थे, निर्दोष पिता की हत्या ने उनकी क्रोधाग्नि में घी का काम किया।

कहते हैं, उन दिनों महिष्मती राज्य का हैहय क्षत्रिय कार्तवीर्य सहस्रार्जुन राजमद में मदान्ध था। समूची प्रजा उसके क्रूर अत्याचारों से त्राहि-त्राहि कर कर ही थी। भृगुवंशीय ब्राह्मणों (परशुरामजी के वंशजों) ने जब उसे रोकने का प्रयत्न किया तो अहंकार में भरे सहस्रार्जुन ने उनके आश्रम पर धावा बोलकर उसे तहस-नहस कर दिया। इस पर भी क्रोध शांत न हुआ तो उसने परशुराम जी के पिता ऋषि जमदग्नि पर हमला बोलकर उन्हें 21 स्थानों से काटकर मार डाला। तब परशुराम जी ने अपने परशु से कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन को उसके समूचे कुल समेत मृत्युलोक पहुंचा दिया। 

                           संग्रह का नहीं, दान का महापर्व

अक्षय तृतीया को ईश्वरीय तिथि माना जाता है। इस दिन बिना पंचाग देखे कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। भविष्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन सतयुग एवं त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ था। भगवान विष्णु के 24 अवतारों में भगवान परशुराम, नर-नारायण एवं हयग्रीव आदि तीन अवतार अक्षय तृतीया के दिन ही प्रकट हुए थे। तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के पट भी अक्षय तृतीया को खुलते हैं। वृंदावन के बांके बिहारी के चरण दर्शन केवल अक्षय तृतीया को होते हैं। तृतीया तिथि मां गौरी की तिथि है जो बल-वुद्धिवर्धक मानी गयी है। जीवन में सुख, शांति, सौभाग्य तथा समृद्धि हेतु इस दिन शिव-पार्वती और नर-नारायण का पूजन शुभ फलदायी माना गया है।
भारतीय मनीषियों की मान्यता है कि वैशाख मास के शुक्लपक्ष की तृतीया में ऐसी दिव्य ऊर्जा है कि इस दिन किया जाने वाला जप-तप, दान, हवन, तीर्थस्थान का पुण्यफल 'अक्षय' हो जाता है। वैशाख मास में भगवान सूर्य की तेज धूप तथा प्रचंड गर्मी से प्रत्येक जीवधारी भूख-प्यास से व्याकुल हो उठता है इसलिए प्यासे को पानी पिलाना व यथा सामर्थ्य दान-पुण्य करना इस तिथि का सर्वप्रथम संदेश है।

भारतीय जीवनशैली को अपनाकर जिया जा सकता है सुखी जीवन:

भारतीय जीवनशैली को अपनाकर जिया जा सकता है सुखी जीवन:

हिन्दू संस्कृति की परंपराएं वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं। ऐसे में उसके अनुसार जीवन व्यतीत करना हर पक्ष से वैज्ञानिकता एवं तार्किकता से परिपूर्ण है। लेकिन आधुनिकीकरण एवं मशीनीकरण ने धरती को बहुत अस्त व्यस्त किया। उसी का परिणाम है कि समय-समय पर दुष्परिणाम के रूप में भयानक महामारियां और त्रासदी हमारे सामने आती हैं

namaskar _1  H

आज विश्व भर में फैले कोरोना वायरस के कहर ने लोगों को हिन्दू संस्कृति में निहित मान्यताओं की ओर उन्मुख किया है। वे जाने-अनजाने भारतीय संस्कृति से वह सबक ले रहे हैं, जिनके माध्यम से उन्हें लगता है कि वे स्वयं को इस भयानक संक्रमण से बचा सकते हैं। कोरोना के चलते आज स्थितियां ऐसी बनी हैं कि लोग अपने सारे काम छोड़कर घरों में बैठने के लिए मजबूर हुए हैं। प्राथमिक रूप से इसका जो इलाज निकलकर आया है वह है सामाजिक दूरी।
इसके माध्यम से इससे बचा जा सकता है। लेकिन इस दौरान ध्यान देने वाली बात यह है कि कोरोना के डर से लोग जिन नियमों का पालन कर रहे हैं, वे हमें हमारी प्राचीन वैदिक संस्कृति की याद दिलाते हैं। हिन्दू धर्म में परस्पर नमस्ते करने का प्रचलन रहा है। हाथ मिलाना व गले मिलने का कल्चर पश्चिम से आया। सनातन हिन्दू धर्म सादा जीवन, उच्च विचार जैसी मान्यताओं को प्रश्रय देता है। लेकिन पाश्चात्य सभ्यता एवं जीवनशैली की चकाचैंध में लोगों ने अपनी संस्कृति को छोड़कर पश्चिम की संस्कृति को अपनाया था। लोग हाथ जोड़कर नमस्ते करने के बजाए हाथ बढ़ा कर हाथ मिलाने एवं गले लगाने को ज्यादा सभ्य समझने लगे थे। जबकि हाथ जोड़ने के वैज्ञानिक पहलू पर उनका कभी ध्यान नहीं गया। हाथ जोड़कर नमस्ते करने पर जब दोनों हाथ की उंगलियां एक साथ मिलती हैं तब नसों में आपस में एक दबाव बनता है, जो एक्यूपंचर का काम करता है।
इससे स्मरण शक्ति तीव्र होती है तथा यह आंख, नाक एवं कान के लिए भी लाभप्रद होती है। हिन्दू परिवारों में सदैव बाहर से आने के बाद हाथ पैर धो कर ही घर के भीतर घुसने और जमीन पर सुखासन में बैठकर खाने की परंपरा रही है। सुखासन में बैठ कर खाने से पाचन संबंधित परेशानियां कम होती हैं। आज के समय में कोरोना से बचाव के लिए बार-बार साबुन से हाथ धोने की बात की जा रही है। जबकि पहले के समय घरों का निर्माण भी कुछ इस प्रकार होता था कि दरवाजे से घुसते ही नल और पानी की व्यवस्था रहती थी जिससे व्यक्ति हाथ, पैर व मुुंह अच्छे से धोकर ही घर में प्रवेश करता था। लेकिन आज के आधुनिक समाज में कन्क्रीट के जंगल तैयार हो रहे हैं। ऊंची इमारतें की वजह से धूप और शुद्ध हवा की बहुत कम गुंजाइश बची है। आधुनिक जीवनशैली का अनुसरण कर लोग जूते चप्पल पहन कर ही भोजन आदि करने बैठ जाते हैं। हाथ धोने की जगह टिशू का प्रयोग करते हैं। ऐसे में इस तरह की आदतें व्यक्ति को बीमार बनाने के लिए काफी हैं।

यज्ञ-हवन से होती शुद्धि
namaskar _1  H
शहरों में बढ़ती आबादी के कारण, जहां एक ओर मोटर गाड़ियों की संख्या बढ़ रही है, वहीं तेजी से पेड़ों को काटा जा रहा है। इससे वायु प्रदूषण की दर, साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। जबकि हमारी परंपरा में दैनिक यज्ञ को अत्यधिक महत्व दिया गया है। हवन में आहुति देने के लिए जिस हवन सामग्री का प्रयोग होता है उसमें गुग्गुल, लोबान, कपूर आदि का सम्मिश्रण रहता है जो वातावरण को शुद्ध करने और उसमें उपस्थित हानिकारक कीटाणुओं एवं जीवाणुओं को नष्ट करने में सहायक सिद्ध होता है। पूजा-अर्चना के समय नियमित रूप से घी का दीपक जलाना एवं आरती करना धार्मिक क्रिया के साथ ही वैज्ञानिक तथ्यों की पुष्टि भी करती है। यह प्रक्रिया भी हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने मंे सहायक होती है। सनातन धर्म में प्रातः एवं सायंकाल मंदिरों तथा घरों में घण्टे और शंख बजाने की परम्परा रही है। ये ध्वनियां वातावरण में उपस्थित अनेकानेक विषाणुओं को खत्म करने में सहायक सिद्ध होती हैं।
रोग प्रतिरोधक क्षमता को जगाने की जरूरत
आज कोरोना वायरस के संक्रमण से लोग भयाक्रांत हैं। पाश्चात्य जीवनशैली से खोखले हो चुके मनुष्य शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता क्षीण सी हो गयी है। भारतीय संस्कृति को भूलकर लोग आधुनिक बनने की होड़ में लगे हुए हैं। जबकि हमारे यहां सूर्योदय पूर्व जागरण के पश्चात स्नान कर, उदय होते सूर्य को जल देने का नियम था। उदित होते सूर्य की किरणों का शरीर पर पड़ना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। मशीनी जीवनशैली को जीने वाले ज्यादातर लोग या तो सुबह देर से उठते हैं या फिर उठकर योग-व्यायाम करने की अपेक्षा जिमखाना जाना अधिक पसन्द करते हैं। प्रातःकाल खुले वातावरण में बैठ कर योग-व्यायाम एवं ध्यान करने से शरीर, मन, बुद्धि तथा आत्मा की शुद्धि होती है। व्यक्ति स्वस्थ एवं निरोगी रहता है। सकारात्मकता का अनुभव करता है। बन्द जिमखानों में एक ही मशीन पर तमाम लोग पसीना बहाते हैं और अशुद्ध हवा का सेवन करते हैं। इससे कई तरह की बीमारियों और संक्रमण का खतरा पैदा हो जाता है। पश्चिम की ये नकल कितनी नुकसानदायक है ये समझना बहुत आवश्यक है।

वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक: आदि शंकराचार्य

आद्य शंकराचार्य जयंती- वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक:

आदि शंकराचार्य का आगमन ऐसे समय हुआ, जब विदेशी आक्रांताओं के हमलों और षड्यंत्रों के कारण सनातन संस्कृति अपना ओज खो रही थी। ऐसे में उन्होंने न केवल वैदिक धर्म-संस्कृति की रक्षा की, बल्कि राष्ट्रीय भावना को मुखरित और जाग्रत करने के लिए चार धामों की स्थापना भी की

a_1  H x W: 0 x
  
आदि शंकराचार्य का आगमन उस समय हुआ, जब विदेशी आक्रांताओं के षड्यंत्रों के कारण सनातन धर्म-संस्कृति खतरे में थी। 32 वर्ष की अल्पायु में वैदिक चिंतन और संस्कृति की रक्षा के लिए उन्होंने जो प्रयास किए उससे न केवल देश में राष्ट्रीय भावना मुखरित व जाग्रत हुई, बल्कि उन्होंने देश के चार कोनों में चार धामों– ब्रदीनाथ (उत्तर), रामेश्वरम (दक्षिण), जगन्नाथपुरी (पूरब) और द्वारिका (पश्चिम) की स्थापना कर देश में सांस्कृतिक जागरण का अपना दायित्व निभाया। साथ ही, राष्ट्रवाद की भावना को भी बलवती बनाया। इन धामों की स्थापना के पीछे उनका उद्देश्य राष्ट्र और संस्कृति को बचाना था।
शंकराचार्य का जन्म करीब 1200 साल पहले केरल के एक ब्राह्मण परिवार में बैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ था। उनके पिता शिवगुरु तैतरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। महज तीन-चार वर्ष की आयु में ही शंकराचार्य की बौद्धिक प्रतिभा दिखने लगी थी। सात वर्ष की आयु में वह कई शास्त्रों के ज्ञाता बन गए। उस युग के ख्यातिनाम ज्योतिषियों ने कुंडली देख कर बताया कि बालक अत्यंत दुर्लभ महापुरुष होगा, लेकिन इसकी आयु बहुत कम होगी। यह सुनकर शंकर की मां चितिंत हो गईं। एक ओर बालक शंकर अपना जीवन देश को अर्पित करने को तत्‍पर थे तो दूसरी ओर मां बेटे को अपने से अलग नहीं होने देना चाहती थी। बालक शंकर ने युक्ति से काम लिया। एक दिन वह मां के साथ नदी स्नान करने गए। तैरते-तैरते वह बीच नदी में पहुंच गए और चिल्लाने लगे,‘‘मां, मगरमच्छ ने मुझे पकड़ लिया है। अब केवल भगवान शंकर ही मेरी रक्षा कर सकते हैं। यदि तू मुझे उनको अर्पित कर दे तो मेरी जान बच सकती है।’’ मां के पास बेटे की बात मानने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। इस तरह, मात्र आठ वर्ष में घर त्याग कर वह मीलों का कष्टकारी सफर तय कर वेदांत के प्रकांड विद्वान महायोगी गोविंदपाद के पास पहुंचे। उनसे गुरु दीक्षा व संन्यास ग्रहण किया और दो वर्ष में ही अपनी शिक्षा पूरी कर ली।
इसके बाद गुरु आज्ञा से अपने वयोवृद्ध गुरु भाइयों के साथ काशी में जब उन्होंने वेदांत के गूढ़ रहस्यों पर प्रवचन दिया तो वहां हलचल मच गई। उन्होंने बड़े-बड़े पंडितों की शंकाओं का समाधान कर वेदांत-मत का प्रतिपादन किया। उस समय उनकी आयु 11 वर्ष थी। काशी प्रवास के दौरान ही उनका छुआछूत पर अहंकार भी टूटा था। हुआ यूं कि एक दिन शंकराचार्य प्रात:काल नदी में स्नान कर लौट रहे थे कि एक चांडाल से छू गए। चांडाल पर अपवित्र करने का आरोप लगाते हुए उसे भला-बुरा कहने लगे। इस पर चांडाल ने हंसते हुए कहा, ‘‘महाराज! संन्यास लेकर संत तो बन गए। वेद पढ़कर पंडित भी बन गए, पर तुच्छ देह का अभिमान नहीं गया। सबके शरीर में एक ही आत्मा का निवास है, इस सत्य को जाने बिना आपका संन्यास दिखावा है।’’ उसकी बातों ने शंकाराचार्य की आंखें खोल दीं।
शंकराचार्य के समय में महात्मा बुद्ध का दिव्य तत्व दर्शन अपना मूल स्वरूप खो चुका था। सीमाओं पर म्लेच्छों की दृष्टि थी। ऐसे संक्रमण काल में देश में विलुप्त वैदिक संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा करना उनकी राष्ट्र निर्माण योजना का एक महत्वपूर्ण अंग था। उन्होंने देशभर में वैदिक धर्म के प्रचार के लिए चिद्विलास, विष्णुगुप्त, हस्तामलक, समित पाणि, ज्ञानवृन्द, भानु गर्भिक, बुद्धि विरंचि, त्रोटकाचार्य, पद्मनाम, शुद्धकीर्ति, मंडन मिश्र, कृष्ण दर्शन आदि विद्वानों को संगठित कर उनके सहयोग से वेद धर्मानुयायियों की एक विशाल धर्म सेना बनाई और पूरे भारत में धर्म सुधार किया। इससे पूरे देश में फिर से वैदिक धर्म का शंखनाद गूंजने लगा। भगवान बुद्ध ने धर्म में आए गतिरोध व कुरीतियों को दूर करने के लिए बौद्ध मत की स्थापना की थी, लेकिन बौद्ध मतावलंबी ही जब हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने लगे और बौद्ध मठ वामाचार के केंद्र बनने लगे तो शंकराचार्य ने पूरे देश में पदयात्रा कर वैदिक धर्म का पुनरुद्धार किया। बौद्धों को शास्त्रार्थ में परास्त करने के बाद उन्होंने वैदिक धर्म के उत्कर्ष के लिए पाशुपत, शाक्त, तांत्रिक, शैव, माहेश्वर, वैष्णव आदि संप्रदायों के मठाधीशों को चुनौती दी, जिन्होंने धार्मिक कुरीतियों का प्रचार कर लोगों को कुमार्गी बना दिया था। उन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैतरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्य उपनिषद के भाष्य लिखकर नई विचार क्रांति को जन्म दिया। मंडन मिश्र और कुमारिलभट जैसे समकालीन बौद्ध विद्वानों से धर्म की उपादेयता पर शास्त्रार्थ कर वैदिक धर्म का पुनरुद्धार किया। इसके बाद उन्होंने जगन्नाथपुरी, उज्जयिनी, द्वारिका, कश्मीर, नेपाल, बल्ख, कांबोज तक पदयात्रा की और वैदिक धर्म का जयघोष किया।
बौद्ध धर्म के प्रकांड विद्वान आचार्य मंडन मिश्र के साथ भी उनका शास्त्रार्थ हुआ। शर्त थी कि शास्त्रार्थ में मंडन मिश्र पराजित हुए तो उन्हें संन्यास ग्रहण करना पड़ेगा, जबकि शंकराचार्य पराजित होते तो उन्हें गृहस्थ जीवन स्वीकार करना था। शास्त्रार्थ में निर्णायक की भूमिका मंडन मिश्र की पत्नी उभय भारती ने निभाई। एक रोचक घटनाक्रम में शंकराचार्य विजयी हुए और मंडन मिश्र को संन्यास लेना पड़ा। इस तरह शंकराचार्य ने वैदिक ज्ञान की सर्वोच्चता साबित की। देश भ्रमण के दौरान जब वह बद्रीनाथ धाम पहुंचे तो उन्हें मूर्तिविहीन देवालय की दुर्दशा का पता चला। बौद्धों ने नारद कुंड में मूर्ति फेंक दी थी। उन्होंने स्वयं नारद कुंड से देव प्रतिमा निकाली, पर विग्रह का एक पांव खंडित था। पंडितों ने खंडित विग्रह की स्थापना का विरोध किया, पर शंकराचार्य के तर्कों से वे निरुत्तर हो गए। अंतत: मूर्ति जोड़कर पुन: उसकी प्रतिष्ठा की गई। जीवन के अंत समय तक शंकराचार्य धर्म को प्रतिष्ठित करने में लगे रहे और अल्पायु में जगद्गुरु की पदवी पााई।

                        ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या के प्रतिपादक

अद्वैत वेदांत के प्रणेता आदि शंकराचार्य का चिंतन आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित है। इसके अनुसार, परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण, दोनों ही स्वरूपों में विद्यमान रहता है। उन्होंने वेदों को ईश्वर की वाणी कहा और पूरे देश में उसका प्रचार-प्रसार किया। उनके अनुसार सत्य वही है जो जैसा है वैसा ही दिखे। इसी आधार पर उन्होंने ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या बताया। उनका कहना था कि संसार में सब कुछ बदलता रहता है। नहीं बदलता है तो केवल आत्मा और ब्रह्म। उन्होंने पांच अद्भुत सूत्र दिए- सेवा, साधना, सत्कर्म, स्वाध्याय और परमात्मा के प्रति समर्पण भाव। उन्होंने कहा कि जन्म से हर आदमी शूद्र है, उसकी जाति का निर्धारण कर्मानुसार होता है।

             शंकराचार्य मंदिर: कला-संस्कृति की अनुपम धरोहर

जम्मू-कश्मीर स्थित भव्य शंकराचार्य मंदिर कला-संस्कृति व पुरातात्विक दृष्टि से भी अति विशिष्ट है। श्रीनगर में डल झील के पास पहाड़ी पर स्थित हजारों साल पुराने इस अष्टकोणीय मंदिर को प्रस्तर वास्तु शिल्प का नायाब नमूना माना जाता है। इस शिव मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा कश्मीर के राजा गोपादित्य ने ई.पू. 371 में कराई थी और इसकी देखरेख व पूजापाठ का जिम्मा स्थानीय अग्रवर्ती ब्राह्मणों को सौंपा था। शुरू में इस मंदिर का नाम गोपादारी मंदिर था जो बाद में शंकराचार्य मंदिर हो गया। कहते हैं कि पदयात्रा के क्रम में शंकराचार्य कश्मीर भी गए थे और श्रीनगर के इस पहाड़ी शिव मंदिर में भगवान शिव की आराधना की थी। उस समय अग्रवर्ती ब्राह्मणों से उनका शास्त्रार्थ भी हुआ था। शास्त्रार्थ में जीतने के बाद अग्रवर्ती ब्राह्मणों ने पारितोषिक के तौर पर मंदिर ही शंकराचार्य को समर्पित कर दिया।