Thursday, April 9, 2020

मनोबल ऊंचा हो तो कठिन से कठिन कार्य भी हो जाता है संभव: गौतम बुद्ध



  • मनोबल ऊंचा हो तो कठिन से कठिन कार्य भी हो जाता है संभव:



एक बार की बात है गौतम बुद्ध अपने भिक्षुओं के साथ विहार करते हुए शाल्यवन में एक वटवृक्ष के नीचे बैठ गए। धर्म चर्चा शुरू हुई और उसी क्रम में एक भिक्षु ने उनसे प्रश्न किया "भगवन्! कई लोग दुर्बल और साधनहीन होते हुए भी कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी मात देते हुए बड़े-बड़े कार्य कर जाते हैं, जबकि अच्छी स्थिति वाले साधन सम्पन्न लोग भी उन कार्यों को करने में असफल रहते हैं। इसकाक्या कारण हैं? क्या पूर्वजन्मों के कर्म अवरोध बनकर खड़े हो जाते हैं?"

‘नहीं’ बुद्ध उन्हें समझाने के लिए एक प्रेरक कथा सुनाने लगे। भगवान बुद्ध ने कहा, “विराट् नगर के राजासुकीर्ति के पास लौहशांग नामक एक हाथी था। राजा ने कई युद्धों में इस पर आरूढ़ होकर विजय प्राप्त की थी। शैशव से ही लौहशांग को इस तरह प्रशिक्षित किया था कि वह युद्ध कला में बड़ा प्रवीण हो गया था। सेना के आगे चलते हुए पर्वताकार लौहशांग जब प्रचण्ड हुंकार भरता हुआ शत्रु सेनाओं में प्रवेश करता था तो विपक्षियों के पांव उखड़ जाते थे।

धीरे-धीरे समय से साथ जिस तरह जन्म के बाद सभी प्राणियों को युवा और जरावस्था से गुजरना पड़ता है, उसी क्रम से लौहशांग भी वृद्ध होने लगा, उसकी चमड़ी झूल गई और युवावस्था वाला पराक्रम जाता रहा। अब वह हाथीशाला की शोभा मात्र बनकर रह गया. उपयोगिता और महत्व कम हो जाने के कारण उसकी ओर पहले जैसा ध्यान भी नहीं दिया जा रहा था। उसे मिलने वाले भोजन में कमी कर दी गई। एक बूढ़ा सेवक उसके भोजन पानी की व्यवस्था करता, वह भी कई बार चूक कर जाता और हाथी को भूखा प्यासा ही रहना पड़ता।

बहुत प्यासा होने और कई दिनों से पानी न मिलने के कारण एक बार लौहशांग हाथी शाला से निकल कर पुराने तालाब की ओर चल पड़ा, जहां उसे पहले कभी प्रायः ले जाया करता था. उसने भरपेट पानी पीकर प्यास बुझाई और गहरे जल में स्नान के लिए चल पड़ा। उस तालाब में कीचड़ बहुत था दुर्भाग्य से वृद्ध हाथी उसमें फंस गया। जितना भी वह निकलने का प्रयास करता उतना ही फंसता जाता और आखिर गर्दन तक कीचड़ में फंस गया.

यह समाचार राजा सुकीर्ति तक पहुँचा, तो वे बड़े दुःखी हुए। हाथी को निकलवाने के बहुत से प्रयास किए गए पर वह सफल नहीं हुए। उसे इस दयनीय दुर्दशा के साथ मृत्यु मुख में जाते देखकर सभी दुखी हो गए। जब सारे प्रयास असफल हो गये, तब एक चतुर मंत्री ने युक्ति सुझाई। इसके अनुसार हाथी को निकलवाने वाले सभी प्रयत्न करने वालों को वापस बुलाया गया और उन्हें युद्ध सैनिकों की वेशभूषा पहनाई गई। युद्ध में बजने वाली रणभेरियां मंगवाई गई।

हाथी के सामने युद्ध के समय बजने वाले नगाड़े बजने लगे और सैनिक इस प्रकार कूच करने लगे जैसे वे शत्रुपक्ष की ओर से लौहशांग की ओर बढ़ रहे हैं। यह दृश्य देखकर लौहशांग ने पूरी ताकत से चिंघाड़ लगाई और शत्रु सैनिकों पर आक्रमण करने के लिए पूरी शक्ति लगाकर बाहर निकल आया। वह दौड़ा और कीचड़ को रौंदता हुआ तालाब के तट पर जा पहुंचा। उसे बड़ी मुश्किल से नियंत्रित किया गया।
यह कथा सुनाकर तथागत ने कहा - “भिक्षुओं! संसार में मनोबल ही प्रथम है। वह जाग उठे तो असहाय और विवश प्राणी भी असंभव होनेवाले काम कर दिखाते हैं तथा मनुष्य अप्रत्याशित सफलताएं प्राप्त करते हैं।

Sunday, April 5, 2020

परम पूजनीय प्रथम सरसंघचालक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूजनीय प्रथम सरसंघचालक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी









Friday, March 27, 2020

संघ परिचय:



संघ परिचय:-
- कर्तव्य है
- निस्वार्थ सेवा है - त्याग है - समर्पण है - मातृभूमि से अथाह प्रेम है - संस्कार है - चरित्र है - संस्कृति है - शक्ति है - सुरक्षा है - सम्मान है - राष्ट्रवाद है - संगठित है - हिंदू,हिंदू है - आत्मबल है - अनुशासन है - धर्म पथ है - विनम्रता है
- सरलता है
- ध्येय निष्ठां है
- दायित्व है
- समरसता है

दुनिया का सबसे बड़ा राष्ट्रवादी संगठन "संघ" हर आपदा में देश को समर्पित..
RSS प्रमुख प. पू. मोहन भागवत जी ने नागपुर मुख्यालय को अस्पताल में बदलने की घोषणा की.. और इसके लिए होने वाला पूरा खर्च भी RSS ही वहन करेगा.. हमें गर्व है कि देश के हिंदुओं के भीतर संघ के संस्कार हैं..

Thursday, March 26, 2020

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे

वन्दे मातरम्

प्रार्थना
नमस्ते सदा वत्सले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना है।
सम्पूर्ण प्रार्थना संस्कृत में है
केवल इसकी अन्तिम पंक्ति (भारत माता की जय!) हिन्दी में है।
१९३९ में की थी। इसे सर्वप्रथम २३ अप्रैल १९४० को
पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में गाया गया था।

यादव राव जोशी ने इसे सुर प्रदान किया था।
लड़कियों/स्त्रियों की शाखा राष्ट्र सेविका समिति और
विदेशों में लगने वाली हिन्दू स्वयंसेवक संघ
की प्रार्थना अलग है। संघ की शाखा या अन्य कार्यक्रमों में
इस प्रार्थना को अनिवार्यतः गाया जाता है
और ध्वज के सम्मुख नमन किया जाता है।
हिन्दू धर्म में भगवा रंग ही क्यों ...      

   नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
       त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।
       महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
       पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥१॥

       प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
       इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
       त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयम्
       शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये।

       अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम्
       सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
       श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्णमार्गम्
       स्वयं स्वीकृतं नः सुगंकारयेत्॥२॥

       समुत्कर्ष निःश्रेयसस्यैकमुग्रम्
       परं साधनं नाम वीरव्रतम्
       तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
       हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्राऽनिशम्।

       विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
       विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्

       परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्
       समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥३॥

          ॥भारत माता की जय॥

सरलार्थ:

      नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, 
      त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।
     हे प्यार करने वाली मातृभूमि! 
    मैं तुझे सदा (सदैव) नमस्कार करता हूँ। 
    तूने मेरा सुख से पालन-पोषण किया है।
     महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे, 
     पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥ १॥
    हे महामंगलमयी पुण्यभूमि! 
    तेरे ही कार्य में मेरा यह शरीर अर्पण हो। 
    मैं तुझे बारम्बार नमस्कार करता हूँ।
     प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता, 
     इमे सादरं त्वाम नमामो वयम्  II

          हे सर्वशक्तिशाली परमेश्वर! 

    हम हिन्दूराष्ट्र के अंगभूत तुझे 
    आदरसहित प्रणाम करते हैं।

     त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं, 
     शुभामाशिषम देहि तत्पूर्तये।
     तेरे ही कार्य के लिए 
     हमने अपनी कमर कसी है। 
     उसकी पूर्ति के लिए हमें अपना 
     शुभाशीर्वाद दे।
    अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम, 
    सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्,

           हे प्रभु! हमें ऐसी शक्ति दे, 
     जिसे विश्व में कभी कोई चुनौती न 
     दे सके, ऐसा शुद्ध चारित्र्य दे जिसके 
    समक्ष सम्पूर्ण विश्व नतमस्तक हो जाये I 

श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं, 

 स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत्॥ २॥

     ऐसा ज्ञान दे कि स्वयं के 
     द्वारा स्वीकृत किया गया 
     यह कंटकाकीर्ण मार्ग सुगम हो जाये।
      'समुत्कर्षनिःश्रेयसस्यैकमुग्रं, 
       परं साधनं नाम वीरव्रतम्
           उग्र वीरव्रती की भावना हम में 

     उत्स्फूर्त होती रहे जो उच्चतम 
     आध्यात्मिक सुख एवं महानतम 
     ऐहिक समृद्धि प्राप्त करने का एकमेव
     श्रेष्ठतम साधन है। 

      तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा, 

      हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्राऽनिशम्।

तीव्र एवं अखंड ध्येयनिष्ठा हमारे 
अंतःकरणों में सदैव जागती रहे।
      विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्, 
      विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्।
      परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं, 
      समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥ ३॥ 
           ॥ भारत माता की जय॥
  तेरी कृपा से हमारी यह विजयशालिनी 
  संघठित कार्यशक्ति हमारे 
  धर्म का सरंक्षण कर इस राष्ट्र को 
  वैभव के उच्चतम शिखर पर 
  पहुँचाने में समर्थ हो। 
        भारत माता की जय।[1]